अंतरराष्ट्रीय स्वरूप लेता विश्व हिंदी सम्मेलन

अंतरराष्ट्रीय स्वरूप लेता विश्व हिंदी सम्मेलन

मॉरीशस में बीते १८ से २० अगस्त, २०१८ को संपन्न ११वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन कई कारणों से तात्पर्यपूर्ण रहा। इस सम्मेलन में बीस देशों के दो हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उससे स्पष्ट था कि विश्व हिंदी सम्मेलन ने एक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया है। सम्मेलन का उद्घाटन सत्र १८ अगस्त को पूर्वाह्न १० बजे मॉरीशस के स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सभागार में आरंभ हुआ। इस सभागार को अभिमन्यु अनत सभागार का नाम दिया गया था। सम्मेलन की प्रस्तावना रखते हुए भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा कि इस सम्मेलन पर दो भाव एक साथ उभर रहे हैं। पहला शोक का भाव और दूसरा संतोष का भाव। अटल बिहारी वाजपेयीजी के निधन के कारण शोक की छाया इस सम्मेलन पर है किंतु दूसरा संतोष का भाव भी है कि समूचा हिंदी विश्व अटलजी को श्रद्धांजलि देने के लिए यहाँ एकत्र है। इसीलिए उद्घाटन सत्र के बाद ही श्रद्धांजलि सत्र रखा गया है।

श्रीमती स्वराज ने कहा कि गिरमिटिया देशों में लुप्त हो रही भाषा को बचाने की जिम्मेदारी भारत की है। भारत ने वह जिम्मेदारी सँभाली है। इसीलिए भोपाल के सम्मेलन में भाषा पर केंद्रित १२ सत्र रखे गए थे। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की अनुशंसाओं को ‘भोपाल से मॉरीशस’ शीर्षक से पुस्तक में प्रकाशित कर दिया गया है। श्रीमती स्वराज ने कहा कि भाषा के बाद हमने सोचा कि अगला पड़ाव संस्कृति की ओर ले जाया जाए। इसलिए ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति’ रखा गया। गिरमिटिया देशों में संस्कृति का गौरव कायम है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ अभी अफसोस कर रहे थे कि वे हिंदी भली-भाँति नहीं बोल पाते हैं किंतु उन्होंने अपनी पत्नी से कहा है कि संक्रांति के दिन वे खिचड़ी ही खाएँगे। भारत में भी संक्रांति के दिन खिचड़ी खाई जाती है। संस्कृति को बचाने की छटपटाहट उनमें दिखाई दी। श्रीमती स्वराज ने सम्मेलन लोगों पर बनी एनिमेशन फिल्म का हवाला देते हुए कहा कि भारत का मोर आएगा और डोडो को बचाएगा।

विदेश मंत्री ने उल्लेख किया कि हर विश्व हिंदी सम्मेलन में दो प्रस्ताव पारित किए जाते रहे हैं। एक यह कि मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय का अपना भवन हो। हर्ष है कि वह प्रस्ताव अनुपालित हो गया है और इसी वर्ष मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय के भवन का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंदजी के हाथों संपन्न हो चुका है। दूसरा प्रस्ताव हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने का रहा है। उसमें मुख्य समस्या यह है कि प्रस्ताव के समर्थक देशों को संबंधित व्यय का भार वहन करना होगा। यदि भारत को व्यय वहन करना होता तो ४०० करोड़ रुपए देकर भी हम उसे हासिल कर लेते। भारतीय विदेश मंत्री ने उम्मीद जताई कि जब योग दिवस के लिए भारत १७७ देशों का समर्थन हासिल कर सकता है तो संयुक्त राष्ट्र की भाषा के लिए १२९ देशों का समर्थन भी वह हासिल कर लेगा। श्रीमती स्वराज ने विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रतिभागियों से आग्रह किया कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हर शुक्रवार को आनेवाले हिंदी विश्व समाचार को अधिक-से-अधिक सुना जा सकेताकि उसे दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए दबाव बन सके।

उद्घाटन सत्र के आरंभ में ही भारत के दिवंगत राजनेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का सामूहिक मौन रखा गया। उसके बाद मॉरीशस और भारत का राष्ट्रगान हुआ। भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज तथा मॉरीशस की शिक्षा मंत्री श्रीमती लीलादेवी दुकन लछुमन ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के विदेशी विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। उसके बाद महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस के विद्यार्थियों ने सुमधुर स्वर में हिंदी गान प्रस्तुत किया। मॉरीशस की शिक्षा मंत्री लीलादेवी दुकन लछुमन ने स्वागत भाषण किया। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ ने विश्व हिंदी सम्मेलन पर दो डाक टिकट जारी किए तथा सम्मेलन ‘स्मारिका’ का लोकार्पण किया। गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने विश्व हिंदी सम्मेलन पर निकले ‘गगनांचल’ के विशेषांक का, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल व कवि केशरीनाथ त्रिपाठी ने ‘दुर्गा’ पत्रिका का, भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ‘राजभाषा भारती’ पत्रिका विशेषांक का, मॉरीशस की शिक्षा मंत्री लीलादेवी दुकन लछुमन ने विश्व हिंदी सचिवालय की पत्रिका ‘विश्व हिंदी साहित्य’ पत्रिका का, भारत के विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने अभिमन्यु अनत की पुस्तक ‘प्रिया’ का और भारत के विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने ‘भोपाल से मॉरीशस तक’ पुस्तक का लोकार्पण किया। समारोह का संचालन प्रो. कुमुद शर्मा और माधुरी रामधारी ने किया। सत्र के अंत में धन्यवाद ज्ञापन भारत के विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने किया।

श्रद्धांजलि सत्र

उद्घाटन सत्र के बाद अटल बिहारी वाजपेयीजी की याद में श्रद्धांजलि सत्र रखा गया, जिसका संचालन अशोक चक्रधर ने किया। इस सत्र में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अटलजी से जुड़े संस्मरण सुनाए तथा उनके योगदान पर प्रकाश डाला। चीन, तजाकिस्तान, पोर्ट ऑफ स्पेन, अमेरिका, नीदरलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, ब्रिटेन आदि देशों के हिंदी विद्वानों, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी, गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा, मॉरीशस के मार्गदर्शक मंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ तथा भारतीय सांसद के.सी. त्यागी तथा भर्तृहरि मेहताभ ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

विश्व हिंदी सम्मेलन के पहले दिन भाषा एवं लोक-संस्कृति के अंतर्संबध पर समानांतर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने लोक और भाषा के घनिष्ठ संबंध को रेखांकित किया। लोक-साहित्य को लिखनेवाले का पता न होने पर भी यह समाज की स्मृति में रचा-बसा हुआ है और भारत से लेकर सभी गिरमिटिया देशों तक की साझी विरासत है।

सत्र की सह-अध्यक्ष सरिता बुद्धु ने कहा कि लोक-साहित्य एवं लोक-संस्कार साथ-साथ चलते हैं और एक-दूसरे को सबल करते हैं। गिरमिटिया देशों में आनेवाले भारतीय अपने साथ जो भाषा और लोक-संस्कृति लेकर आए, उसी ने उनकी पहचान सुरक्षित रखी। डॉ. मृदुल कीर्ति ने कहा कि जैसे अर्थ सदैव उपस्थित रहता है और शब्द उसकी अभिव्यक्ति के लिए गढ़े जाते हैं, वैसे ही लोक में लोक-संस्कृति सदैव उपस्थित रहती है और भाषा तदनुसार आकार ग्रहण करती रहती है। उन्होंने वेदों, उपनिषदों, गीता, पातंजल योग दर्शन आदि से अनेक ऐसे उदाहरण दिए जो कालांतर में लोक संस्कृति का अंग बनते चले गए। डॉ. पूर्णिमा वर्मन ने कहा कि अब लोक ग्रामीण परिवेश तक सीमित नहीं हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति का लोक आज विश्वव्यापी हो चुका है। जो प्रवासी भारतीय विभिन्न देशों में कार्य कर रहे हैं, हमें उनके बारे में भी बात करनी चाहिए। सत्र के अंत में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गोवा की राज्यपाल व लेखिका मृदुला सिन्हा ने कहा कि भारतीयों ने दूर देश की धरती में आकर भाषा के आधार पर ही अपनी पहचान बनाई। लोक-संस्कृति की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि लोक एवं शास्त्र में अंतर नहीं है। वस्तुतः इन शास्त्रों से छलके हुए ज्ञान और संस्कार लोक-संस्कृति में समा गए, उसका अंग बन गए। वसुधैव कुटुंबकम और वेदों के शांति मंत्रों का प्रतिबिंब लोकमानस में पूर्णतः दिखाई देता है। हिंदी को ‘विश्व भगिनी’ का दर्जा मिले, इस कामना के साथ उन्होंने अपना वक्तव्य समाप्त किया।

सत्र का विषय प्रवर्तन एवं समापन समन्वयक पद्मजा ने किया। इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. सांस्कृतिक अवध ग्राम की स्थापना की जाए, क्योंकि रामचरितमानस यहाँ का प्राण है। २. भारत और प्रवासी क्षेत्रों को सम्मिलित कर लोक कथाओं तथा लोकगीतों का प्रकाशन किया जाए। ३. विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में लोकजीवन तथा लोक-संस्कृति का समावेश किया जाए। ४. लोकजीवन, लोकसाहित्य पर शोध परियोजनाओं में वरीयता एवं उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए। ५. लोक भाषा के लिए कार्यरत संस्थाएँ लोक साहित्य एवं लोक संगीत, लोक जीवन के संवर्धन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर कार्य योजनाएँ बनाएँ।

‘प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का विकास’ पर आयोजित दूसरे सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में भारत के गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजु ने कहा कि सोशल मीडिया और प्रौद्योगिकी आज हमारी शक्ति बन गई है। इस समानांतर सत्र में सी-डैक द्वारा विकसित ‘कंठस्थ’ का लोकार्पण किया गया एवं ‘निकष’ पर एक प्रस्तुति दी गई। बीज वक्ता के रूप में प्रो. अशोक चक्रधर ने कहा कि प्रौद्योगिकी के नकारात्मक क्षेत्र जल्दी नजर आने लगते हैं परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके कई गुण भी हैं। भाषा प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा ने भारतीय भाषाओं में स्पेल चेकर, ग्रामर चेकर और डी.टी.पी. सॉफ्टवेयर की आवश्यकता को चिह्नित किया। सी-डैक के महा संचालक डॉ. हेमंत दरबारी ने भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी के विकास में सी-डैक की भूमिका पर प्रकाश डाला। महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. कुमार दत्त गुदारी ने कहा कि भारतीय डायस्पोरा का प्रसार करने के लिए मॉरीशस का खिड़की के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। माइक्रोसॉफ्ट के बालेंदु दाधीच ने कई ऑनलाइन प्रदर्शन करते हुए सहभागियों को माइक्रोसॉफ्ट के नवीनतम टूल्स जैसे कोरटाना, वॉक पहचान एवं मशीनी अनुवाद के बारे में जानकारी दी। प्रह्लाद रामशरण ने धन्यवाद ज्ञापन किया। सत्र का संयोजन अरविंद बिसेसर तथा सह संयोजन बिपिन बिहारी, संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग ने किया। प्रश्नोत्तर सत्र में केवल कृष्ण, डॉ. एम.ए. गुप्ता, प्रो. गुरप्रीत, प्रो. रंजना अरगड़े, हरपाल सिंह, जय प्रकाश, योगेंद्र प्रसाद, डॉ. यतीश अग्रवाल इत्यादि ने भाग लिया।

इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. हिंदी शिक्षा को समाज के प्रत्येक स्तर पर लागू किया जाए। २. यूनिकोड स्क्रिप्ट सर्चेबल किया जाए। ३. बैंकिंग सेक्टर में यूनिकोड का प्रचार-प्रसार किया जाए। ४. बीमा, आई.टी सोल्यूशन, जो अंग्रेजी में है, उन्हें हिंदी में किया जाए। ५. सभी निजी एवं सरकारी ऑनलाइन सेवाएँ हिंदी में की जाएँ। ६. भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार हेतु सभी वेबसाइट्स द्विभाषी (हिंदी और अंग्रेजी) स्वरूप में किए जाएँ। ७. यूनिकोड का मानकीकरण किया जाए। ८. प्रकाशकों के लिए भी आवश्यक सॉफ्टवेयर का निर्माण हो, जिनसे उनका काम आसान हो जाए। ९. हिंदी में इ-मेल एड्रेस लिखने की सुविधा प्रदान की जाए। (बालेंदु दाधीच ने बताया कि २० फरवरी, २०१८ से पंद्रह भारतीय भाषाओं में इ-मेल लिखा जाने लगा है) १०. डेटा एनालिसिस के लिए हिंदी में शोधकार्य हेतु नवीनतम टूल्स उपलब्ध किए जाएँ। ११. सी-डैक द्वारा श्रुतलेखन आदि का प्रचार-प्रसार किया जाए। १२. बी.टेक. के विद्यार्थियों को हिंदी नहीं आती है और हिंदी के छात्रों को आई-टी नहीं आती है। इस दूरी को मिटाने के लिए प्रयत्न किए जाएँ। १३. हिंदी में पूर्णरूप से एक कुंजीपटल का निर्माण हो, जिसपर हिंदीभाषी काम कर सकें। १४. हिंदी की अपनी एक विशिष्ट प्रोग्रामिंग की भाषा नहीं है। इसे उपलब्ध कराया जाए। १५. चिकित्सा संबंधी सभी सामग्रियों को हिंदी में भी उपलब्ध कराया जाए।

हिंदी शिक्षण में भारतीय संस्कृति

‘हिंदी शिक्षण में भारतीय संस्कृति’ पर आयोजित तीसरे सत्र की अध्यक्षता उदयनारायण गंगू ने की। बीज वक्तव्य सुरेंद्र गंभीर ने दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिका के लगभग सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। हिंदी सीखने की अलग-अलग रुचियाँ और वर्ग हैं। स्वीडन से आए हैंस वेसलर वेज ने कहा कि आज हम बहुसंस्कृति की दुनिया में रहते हैं। उन्होंने कहा कि जर्मनी और फ्रांस के निवासी हिंदी सीखते हैं। जापान में अध्यापक रहे प्रो. हरजेंद्र चंद्र ने कहा कि विदेशियों को भारतीय संस्कृति के बारे में बताना सरल नहीं है। इस सत्र को प्रो. जी. गोपीनाथन, वेंकटेश्वर मन्नार, त्रिभुवन नाथ शुक्ल, अतुल कोठारी, विमलेश कांति वर्मा ने भी संबोधित किया। सत्र का समन्वयन प्रो. नंद किशोर पांडेय ने किया। इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. हिंदी के विदेशी विद्यार्थियों को आरंभ में भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाना चाहिए। २. भाषा शिक्षण में गीत, नाटक और फिल्मों का उपयोग किया जाए। ३. अध्यापकों के लिए भाषा शिक्षण के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जाए। ४. बच्चों की कविताओं के माध्यम से भी संस्कृति का ज्ञान कराना चाहिए।

हिंदी साहित्य में संस्कृति चिंतन

‘हिंदी साहित्य में संस्कृति चिंतन’ पर आयोजित चौथे सत्र की अध्यक्षता डॉ. राजरानी कोविन ने की। बीज वक्ता डॉ. नरेंद्र कोहली ने संस्कृति के प्रवाह को अविच्छिन्न मानते हुए हिंदी की पूर्ववर्ती भाषाओं का ऋण स्वीकार किया। तुलसीदास के महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के सांस्कृतिक संदर्भों की विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने संप्रति मानस की प्रासंगिकता को स्पष्ट किया। डॉ. पी.के. हरदयाल का वक्तव्य ‘रामचरित मानस’ पर केंद्रित था। सत्र के सह-अध्यक्ष डॉ. राजरानी गोबिन ने इस बात पर जोर दिया कि वही रचनाएँ महत्त्वपूर्ण बनती हैं, जो सांस्कृतिक चिंतन के उपादान बनने की क्षमता से युक्त होती हैं। इस सत्र को डॉ. स्वर्ण अनिल, डॉ. श्रीनिवास पांडेय, डॉ. रंजना, डॉ. राजेश श्रीवास्तव, डॉ. सत्य केतु, डॉ. ओमप्रकाश पांडेय, डॉ. सदानंद गुप्त, डॉ. उदयप्रताप सिंह ने भी संबोधित किया। इस सत्र में अभिराम की पुस्तक ‘बालगंधर्व’ तथा दो पत्रिकाओं ‘साक्षात्कार’ एवं ‘हिंदुस्तानी’ के नए अंको का विमोचन किया गया। सत्र-संचालन डॉ. रवि शर्मा ने किया। इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. साहित्य और संस्कृति के संबंध को मजबूत बनाया जाए। २. नई पीढ़ी को सांस्कृतिक दृष्टि से जागरूक बनाया जाए। ३. भारतीय संस्कृति पर हो रहे हमलों को रोकने का उपक्रम किया जाए। ४. प्रौद्योगिकी का उपयोग कर संस्कृति की वैज्ञानिक व्याख्या को प्रोत्साहन किया जाए।

फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण

सम्मेलन के दूसरे दिन पाँचवें सत्र का विषय था—‘फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण’। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध फिल्मकार और सेंसर बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी ने की। बीज वक्तव्य देते हुए शशि दुक्खन ने कहा कि संस्कृति उतनी ही पुरानी है जितनी मानवता, भारतीय संस्कृति विभिन्न पहलुओं में झलकती है। इन सबकी छवि भारतीय सिनेमा में देखने को मिलती है। भारतीय सिनेमा अपने संघर्षों में उतार-चढ़ाव के १०० वर्ष मना चुका है। भारत में आज १००० से भी ज्यादा फिल्में बनती हैं। फिल्मों ने संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया है। सिनेमा ने दर्शकों के मन को आलोचनात्मक विवेक दिया। फिल्मों ने समाज के सरोकारों को दिखाया है। भाषा को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी है। शिक्षा के क्षेत्र में जिन विषयों को कक्षाओं में नहीं पढ़ाया जाता, वे सिनेमा से आए हैं। सिनेमा के बिना सब नीरस है। फिल्मों ने विश्व मंच पर भारत की छवि को बनाया है। फिल्में समाज की दृष्टा और सृष्टा होती हैं। यह सत्र परिचर्चा के स्वरूप में रहा, परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सतपाल सिंह ने कहा कि क्या फिल्मों के माध्यम से संस्कृति को बचाया जा सकता है? संस्कृति का अर्थ है जो संस्कार दे सके। संस्कार जो मिट्टी को सिरेमिक बना सके, जो लोहे को हथियार, जो आदमी को इंसान में बदल दे, वह संस्कृति है। प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का नाम सभ्यता है। एन.एस.डी. की प्रशिक्षिका वाणी त्रिपाठी ने कहा कि भाषा ऐसे झरने और प्रवाह का नाम है, जो अपने साथ किसी पत्थर, कंकड़ सभी को लेकर चलता है, उसे संस्कृति कहते हैं। सिनेमा में भारतीय जीवन की संस्कृति ही परिलक्षित होती है। साहित्य समाज का दर्पण है, सिनेमा आज भी जिंदगी का दर्पण है। इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. ग्रामीण क्षेत्र से आए फिल्मकारों को फिल्म निर्माण के लिए मदद दी जाए। २. कलात्मक फिल्मों को बढ़ावा दिया जाए। ३. देवनागरी लिपि ही स्वीकार की जाए। ४. वेब सीरीज की विषयवस्तु पर नियंत्रण रखा जाए। ५. फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए चर्चा-परिचर्चा का आयोजन किया जाए।

संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति

सम्मेलन के दूसरे दिन ‘संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति’ विषय पर छठवें सत्र की अध्यक्षता सत्यदेव टेंगर ने की। ‘हिंदुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई संस्कृति की रक्षा की लड़ाई थी और संस्कृति की रक्षा के लिए भारतीय सदैव तत्पर रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति वी.के. कुठियाला ने कहा कि हमारे आस-पास मीडिया के कई स्वरूप हैं। कभी-कभी हमारा मीडिया भारतीय संस्कृति का दर्शन नहीं कराता, लेकिन उसकी आत्मा मूलतः भारतीय ही है। सन्मार्ग के समूह संपादक तथा पूर्व सांसद विवेक गुप्ता ने कहा कि हर युग में ऐसे संचार माध्यम रहे हैं, जो संस्कृति को प्रभावित करते हैं लेकिन आज संस्कृति संचार माध्यमों को प्रभावित कर रही है।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने कहा कि संस्कृति के पीछे एक दर्शन होता है। संस्कृति से संस्कार आते हैं, जिनमें नीति, नियम, मूल्य सभी समाहित हैं। संस्कृति भारत की आत्मा का शृंगार है। केसन बद्दू ने मॉरीशस के परिप्रेक्ष्य में मीडिया और भारतीय संस्कृति के स्वरूप पर प्रकाश डाला। मॉरीशस के दूसरे विद्वान सत्यदेव प्रीतम ने मॉरीशस में पत्रकारिता के स्वरूप पर सूचनाप्रद विचार प्रस्तुत किए। सत्र में बाबूराम त्रिपाठी, टी.एन. सिंह, राजेंद्र शर्मा, आर. सेतुनाथ, भारती कुठियाला, विजयशंकर चतुर्वेदी, मनोज तिवारी, रीना यादव, आशा रानी, श्रीनिवास पांडेय, गीता सहाय, कविता सहाय, शीला शर्मा, हरेंद्र प्रताप, योगेंद्र प्रताप, मीना यादव, एम.एल. गुप्त, विष्णु लोक बिहारी, आरती कुमारी, निर्मला भुराडि़या आदि ने विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किए। संचालन सहअध्यक्ष राम मोहन पाठक ने किया।

इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. नव माध्यम को ‘सोशल मीडिया’ के स्थान पर नई हिंदी नाम दिया जाए। २. भारतीय जनमाध्यमों को विदेशों, विशेषरूप से प्रवासी भारतीय बहुल क्षेत्रों के जनमाध्यमों, प्रसारण सामग्री की प्राप्ति तथा आदान-प्रदान हेतु कार्य योजना तैयार की जाए। ३. भारत में किसी उपयुक्त स्थान पर भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी पत्रकारिता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। उनके द्वारा पत्रकारिता और पत्रकारों के विषय में व्यक्त विचारों व संपादकीय अग्रलेखों का संकलन तथा प्रकाशन किया जाए। ४. भारतीय तथा विदेशी पत्रकारों-संपादकों के लिए भारतीय संस्कृति के परिचय एवं लेखन शिक्षण का पाठ्यक्रम प्रारंभ हो। ५. मीडिया तथा जनसंचार शिक्षण में भारतीय संस्कृति विषय को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए। ६. भारत के संचार माध्यमों (यथा समाचार पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन तथा फिल्मों) में इंडिया के स्थान पर ‘भारत’ के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाए। ७. पत्रकारिता एवं संपादन के क्षेत्र में भारत के शीर्ष राजनेताओं के अवदान पर शोध-कार्य हो। ८. महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर के अध्यापकों के लिए सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी के बढ़ते प्रयोग और उपयोग की दृष्टि से प्रशिक्षण तथा अभिमुखीकरण कार्यक्रम चलाए जाएँ। ९. क्षेत्रीय स्तर पर संस्कृति तथा मूल्यपरक ज्ञान संवर्धन एवं उनके विषय में जागरूकता के लिए सामुदायिक रेडियो के संजाल का विस्तार किया जाए। इस हेतु सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना प्रक्रिया सरल बने। १०. ‘व्हाट्स एप’ जैसे नवाचारी डिजिटल प्लेटफार्मों का सांस्कृतिक पत्रिका के रूप में उपयोग किया जाए। ११. भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों पर आधारित प्रकाशन एवं प्रसारण मीडिया अंतर्वस्तु लेख-समाचार, फीचर आदि तैयार कर विभिन्न देशों के मीडिया संस्थानों को उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाएँ।

प्रवासी संसार : भाषा और संस्कृति

सम्मेलन के दूसरे दिन ‘प्रवासी संसार भाषा और संस्कृति’ विषयक सातवें सत्र की अध्यक्षता डॉ. कमल किशोर गोयनका ने की। संयोजन नारायण कुमार ने किया। बीज वक्तव्य में डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि प्रवासी देशों में भाषा और संस्कृति पहचान के सबसे सशक्त माध्यम होते हैं। बड़े यत्न से सहेजी गई विरासत को आगे बढ़ाने के लिए युवा लोगों में भाषा एवं संस्कृति को अपनाना आवश्यक है। मॉरीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने कहा कि राजसत्ता को चुनौती देने का कार्य हिंदी भाषा के माध्यम से ही किया जा सका। मॉरीशस की जीवन संस्कृति में रची-बसी भोजपुरी बोली, पूजा-पाठ एवं फिल्मों के माध्यम से हिंदी भाषा आगे बढ़ी है। हिंदी में हस्ताक्षर कर सकने के कारण ही मॉरीशस के नागरिकों को वोट का अधिकार मिल सका। इसी के बल पर कुली संतानों ने प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने का सफर पूरा किया है।

गयाना के हरिशंकर शर्मा ने संस्कारों के महत्त्व पर प्रकाश डाला। हिंदी भाषा और संस्कारों की उपस्थिति के कारण ही आज भारतीय जहाँ भी बसते हैं, वहाँ का मान बढ़ जाता है। त्रिनिदाद के रवि महाराज ने विचार रखा कि भाषा एवं संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए उसे स्थानीय संदर्भों एवं जरूरतों के आधार पर प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए। इंग्लैंड की सुश्री शैल अग्रवाल ने प्रवासी संसार में भारतीय संस्कृति एवं अपनेपन की कमी की ओर ध्यान आकृष्ट किया। संयुक्त राज्य अमेरिका की डॉ. मृदुल कीर्ति ने भाषा एवं संस्कृति के बिखरे सूत्रों को स्वस्थ मनःस्थिति में जोड़ने की बात कही। फीजी के श्री अनिल जोशी ने संस्कृति, भाषा एवं साहित्य में संस्थागत ढंग से हस्तक्षेप करने का प्रस्ताव रखा। सिंगापुर की संध्या सिंह ने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी भाषा के शिक्षण एवं शिक्षकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। हरजेंद्र चौधरी ने मत व्यक्त किया कि हिंदी के जीवित रहने के लिए इसे जिंदगी की जरूरतों से जोड़ना अति आवश्यक है। गुलशन सुखलाल ने प्रवासी भाषा एवं साहित्य को समझने के लिए वर्गीकरण से आगे बढ़कर एक सैद्धांतिकी विकसित किए जाने की आवश्यकता प्रतिपादित की। इस सत्र में हिंदी भाषा एवं संस्कृति को फ्रैंकोफोन, दक्षणि एशियाई एवं ल्यूसोफोन क्षेत्रों तक विस्तारित किए जाने हेतु विशेष आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया। सत्र में कुल इक्कीस वक्ताओं द्वारा विभिन्न पक्षों पर मंतव्य रखे गए।

इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. डायस्पोरा देशों में भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन हेतु प्राथमिकता के साथ प्रयास किए जाएँ। २. प्रवासी भारतीयों के बीच युवा पीढ़ी की जरूरतों के अनुरूप हिंदी के प्रचार-प्रसार की योजना बनाई जाए तथा उसे क्रियान्वित किया जाए। ३. हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण में प्रवासी दृष्टिकोण को अपनाया जाए। भारतवंशी छात्रों के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम विकसित किए जाएँ। ४. ‘क्रियोल’ में सृजित हो रहे साहित्य को हिंदी में अनूदित किया जाए। ५. भारतीय संस्कृति एवं भाषा को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए गैर-सरकारी परंतु प्रामाणिक प्रयासों को वित्तीय सहायता दी जाए। ६. प्रवासी भारतीय युवा पीढ़ी को भारत को कर्मभूमि बनाने के लिए प्रेरित तथा प्रोत्साहित किया जाए। ७. प्रवासी रचनाओं को फ्रांसीसी, डच, अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाए। ८. दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में हिंदी शिक्षण में संलग्न लोगों को विशिष्ट प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। ९. हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण हेतु ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार किया जाए। १०. विश्व हिंदी सचिवालय की उप-शाखाएँ प्रशांत, कैरेबियाई एवं यूरोपीय देशों में खोली जाएँ। ११. फीजी में हिंदी को राजभाषा का गौरव प्राप्त है, अतः विश्व हिंदी सम्मेलन फीजी में आयोजित किया जाए। १२. गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर एक ‘सांस्कृतिक ग्राम’ स्थापित किया जाए।

हिंदी बाल साहित्य और संस्कृति : ‘हिंदी बाल साहित्य और संस्कृति’ विषयक आठवें सत्र में बीज वक्तव्य में डॉ. दिविक रमेश ने कहा कि जितना भी सृजनात्मक साहित्य है, वह संस्कृति ही है। कोई भी साहित्य देशद्रोही नहीं हो सकता। हमारे देश में बाल साहित्य पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से आया था। देवेंद्र मेवाड़ी ने सिंधु सभ्यता से लेकर वैदिक काल तथा पुराणों से लेकर हिंदी के भक्ति काल और कृष्ण की लीलाओं की चर्चा करते हुए उसे बाल साहित्य की पूर्व पीठिका के लिए महत्त्वपूर्ण बताया। अमीर खुसरो की पहेलियाँ भी बाल साहित्य का एक रूप हैं। सह अध्यक्ष डॉ. अलका धनपत ने मॉरीशस के बाल साहित्य की विस्तार से चर्चा की तथा ‘मुडिया पहाड़’ एवं ‘परीसरोवर’ की लोक-कथाओं के बारे में बताते हुए कहा कि भारतीय गिरमिटिया में यह कथा अत्यंत चर्चित है।

उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने अपील की कि मॉरीशस के बाल साहित्यकार अपनी रचनाएँ अथवा संपादित रचनाएँ उन्हें भेजें। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान उन्हें प्रकाशित करेगा। सुरेंद्र विक्रम ने बाल साहित्य के विकास में राष्ट्रीय बाल भवन, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि की चर्चा करते हुए कहा कि आज का बाल साहित्य सपाटबयानी से इतर गंभीर लेखन कर रहा है।

‘बाली’ से आई उषा पुरी ने बाल साहित्य की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बाल साहित्य को गंभीर साहित्य नहीं माना जाता, न ही प्रकाशन जगत् में आदर मिलता है। हरे कृष्ण देवसरे, प्रकाश मनु, जयप्रकाश भारती, द्रोणवीर कोहली आदि महत्त्वपूर्ण बाल साहित्यकार हैं। आज के बाल साहित्यकार को अत्यंत सावधानी की जरूरत है। खुले संवाद के अंतर्गत प्रो. मोहन लाल छीपा ने बाल साहित्यकारों से निवेदन किया कि वे गर्भवती महिलाओं के लिए संवाद लिखें, जो अच्छा संस्कार डाल सकें। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, पर है महत्त्वपूर्ण। इसी सत्र में विवेक गौतम, गिरिराज शरण, प्रदीप राव तथा मनोहर पुरी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। ‘देवपुत्र’ के संपादक एवं सत्र के अध्यक्ष कृष्ण कुमार अस्थाना ने कहा कि बालकों में बाल साहित्य के माध्यम से शाश्वत मूल्यों का विकास होना चाहिए। आज का बच्चा परीकथाओं को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहता है। बच्चे को आज क्या करना चाहिए, यह भी अनिवार्यतः समझना होगा। सत्र का संयोजन डॉ. मधुपंत ने किया।

इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. मॉरीशस के बाल-साहित्य के लेखकों के प्रकाशन की व्यवस्था की जाए। २. साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में बाल साहित्य का एक कॉलम अनिवार्यतः रखा जाना चाहिए। ३. प्रतिवर्ष बाल साहित्य पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की जाए। ४. बाल साहित्य का वार्षिक आकलन किया जाए। ५. हिंदी बाल साहित्य का तथ्यात्मक इतिहास लिखा जाए। ६. बाल साहित्य अकादमी स्थापित की जाए। ७. गर्भवती महिलाओं में अच्छे संस्कार डालने के लिए बाल साहित्य विषयक पुस्तकें एवं कार्यशाला होनी चाहिए। ८. बाल साहित्य में ‘युगधर्म’ और ‘राष्ट्रधर्म’ पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। ९. प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए बाल साहित्य विषयक उन्मुखीकरण (ओरिएंटेशन) एवं पुनश्चर्या कार्यक्रम (रिफ्रेशर) आयोजित किया जाए। १०. विभिन्न देशों में शिक्षकों का आदान-प्रदान किया जाए।

प्रौद्योगिकी का भविष्य

सम्मेलन के दूसरे दिन ‘प्रौद्योगिकी का भविष्य, निकष एवं इमली सहित अन्य प्रौद्योगिकी उत्पाद’ पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता भारत के विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने की। उन्होंने कहा कि सोचने की कभी सीमा समाप्त नहीं होती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक गरीब का हथियार बन सकती है। यह गरीबी दूर करने में काफी मदद कर सकती है। जब तक हम अपना काम निजी क्षेत्र तक लेकर नहीं जाएँगे तब तक वह अधूरा रहेगा। मॉरीशस गणराज्य के साथ संयुक्त रूप से मिलकर हिंदी को और समृद्ध बनाने की दिशा में कार्य किया जाएगा। इस सत्र में विपिन बिहारी, डॉ. सुरेंद्र गंभीर, डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ. हेमंत दरबारी, बालेंदु दाधीच, आदित्य चौधरी, प्रो. वशिनी शर्मा, अनूप भार्गव, डॉ. स्वर्ण लता, डॉ. विवेक दुबे, अजय कुमार, करीमुल्ला, डॉ. ओम निश्चल, अनुपम श्रीवास्तव और कुमारदत्त गुदारी ने सहभागिता की। संचालन करते हुए प्रो. अशोक चक्रधर ने कहा कि इंटरनेट एवं क्लाउड कंप्यूटिंग से पूरी दुनिया में क्रांति हुई है। अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व अभी भी बना हुआ है। सत्र की शुरुआत में निकष एवं कंठस्थ के बारे में पी.पी.टी. प्रस्तुति का प्रदर्शन किया गया। पी.पी.टी. में निकष को हिंदी में दक्षता का प्रमाण-पत्र बताया गया कि वह पूरे विश्व के लिए भारत का प्रवेश द्वार सिद्ध होगा।

इस सत्र की अनुशंसाएँ थीं—१. निकष को अद्यतन रखा जाए एवं उसके अपडेट्स आई ओएस, माइक्रोसॉफ्ट एवं एंड्रायड प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होने चाहिए। निकष के लिए गुणवत्ता जाँच मीटर की आवश्यकता है एवं कारोके उपकरण द्वारा हिंदी आसानी से सिखाई जा सकती है। निकष और इमली की सफलता कृत्रिम मेधा का उपयोग कर सरलता से प्राप्त हो सकती है। २. निकष को दुनिया की सभी भाषाओं का इस्तेमाल करके बनाया जाए। ३. निकष द्वारा हिंदी ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुँचनी चाहिए। ४. हिंदी प्रौद्योगिकी संसाधन केंद्र को स्वायत्तता प्राप्त होनी चाहिए। ५. सर्च इंजन ऑप्टीमाइजेशन पर एवं प्रचार प्रसार पर काम होना चाहिए। ६. इमली एवं निकष के साथ अकादमिक संस्थाओं, युवा वर्ग व छात्रों को जोड़ा जाए। ७. प्रवासी देशों को भी इस प्रौद्योगिकी की यात्रा में शामिल किया जाए। ८. निकष में वयस्कों और बच्चों के लिए विकल्प होना चाहिए। बोलना, समझना, लिखना, पढ़ना हिंदी शिक्षण के इन चारों कौशलों पर आधारित सामग्री का निर्माण होना चाहिए। ९. सभी से प्राप्त प्रतिक्रियाओं और सुझावों पर काम किया जाना चाहिए। १०. निकष आम जन के लिए विश्वसनीय होना चाहिए, ताकि सभी उस पर पूरी तरह भरोसा कर सकें। ११. तकनीक का इस्तेमाल कर रहे उपयोगकर्ता के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। १२. निकष का एक अंतरराष्ट्रीय कोड हो, जिससे भारत और डायस्पोरा देश मिलकर कार्य कर सकें।

काव्यांजलि : सम्मेलन के दूसरे दिन रात में अटलजी की याद में काव्यांजलि का सत्र रखा गया, जिसमें कई कवियों ने अटलजी को काव्यांजलि दी। काव्यांजलि में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक श्रोता के रूप में उपस्थित रहीं किंतु समापन के समय वे मंच पर आईं। सुषमाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह विश्व हिंदी सम्मेलन अटलमय हो गया है। उन्होंने अटलजी की कविताओं का सुचिंतित भाष्य भी किया।

विश्व हिंदी सम्मान : सम्मेलन के तीसरे दिन पूर्वाह्न में समापन सत्र में विभिन्न सत्रों की अनुशंसाओं की प्रस्तुति हुई और उसके बाद भारत के १८ तथा विदेशों के १८ हिंदी सेवियों को हिंदी में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से अलंकृत किया गया। सम्मान पानेवाले भारत के हिंदी विद्वान् थे—सर्वश्री जोरम आनिया ताना, प्रसून जोशी, सुरेश ऋतुपर्ण, इंद्रनाथ चौधरी, प्रेमशंकर त्रिपाठी, ऋता शुक्ल, चमनलाल गुप्त, श्रीधर पराड़कर, श्रीतंजनसोबा आओ, रमेशचंद्र शाह, मालती जोशी, ब्रजकिशोर शर्मा, धर्मपाल मैनी, बशीर अहमद मयूख, अजय कुमार पटनायक, डॉ. के. सी. अजय कुमार, सी. भास्कर राव और सुभाष सी. कश्यप। इनमें पाँच विद्वान्—रमेशचंद्र शाह, मालती जोशी, ब्रजकिशोर शर्मा, धर्मपाल मैनी, बशीर अहमद मयूख विश्व हिंदी सम्मान ग्रहण करने के लिए उपस्थित नहीं हो सके। उन्हें बाद में इस सम्मान से नवाजा जाएगा। विश्व हिंदी सम्मान पानेवाले विदेशी हिंदी विद्वान् थे—सर्वश्री जावेद खोलोव (तजाकिस्तान), रामप्रसाद परसराम (त्रिनिदाद), इनेस फार्नेल (जर्मनी), अन्ना चेल्कोकोवा (रूस), गलीना रुसोवा सोकोलोवा (बुल्गारिया), उन गू ली (दक्षिण कोरिया), गोपाल ठाकुर (नेपाल), सिंगेनामा चानरब (मंगोलिया), नेमानी बैनीवालू (फीजी), ब्रेसिल नगोडा विथान (श्रीलंका), सुनीता नारायण (न्यूजीलैंड), काजूहिको मचीदा (जापान), रत्नाकर नराले (कनाडा), ई मादे धर्मयश (इंडोनेशिया), अलीसन बूच (अमेरिका), उदयनारायण गंगू (मॉरीशस), हनुमान दुबे गिरधारी (मॉरीशस) और केसन बुधु (मॉरीशस)। इनमें अलीसन बूच (अमेरिका) अपरिहार्य कारणों से सम्मान लेने नहीं आ सकीं। उन्हें बाद में यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। भारत व विदेशों के ३६ विद्वानों के अलावा पाँच हिंदी सेवी संस्थाओं को भी विश्व हिंदी सम्मान से विभूषित किया गया—सी डैक (पुणे), तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज, हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस, आर्य सभा, मॉरीशस और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा। इनमें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रतिनिधि सम्मान लेने के लिए नहीं पहुँच सके। उन्हें बाद में यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र की अध्यक्षता प. बंगाल के राज्यपाल तथा वरिष्ठ कवि केशरीनाथ त्रिपाठी ने की। समापन-सत्र के मुख्य अतिथि मॉरीशस के कार्यवाहक राष्ट्रपति परमशिवम् पिल्लै वायापुरी, भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा मॉरीशस के मार्गदर्शक मंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ थे। आखिर में धन्यवाद ज्ञापन विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने किया।

११वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उपलक्ष्य में १९ अगस्त को मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान में ‘पाणिनि भाषा प्रयोगशाला’ का उद्घाटन भी किया गया। पाणिनि भाषा प्रयोगशाला में कंप्यूटरों के साथ-साथ अन्य संसाधन और अधुनातम सॉफ्टवेयर भारत सरकार ने उपलब्ध कराए हैं।

सम्मेलन की पूर्व संध्या पर मॉरीशस गंगा आरती भी भव्य ढंग से हुई। विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव विनोद कुमार मिश्र के संपादन में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के सहयोग से प्रतिदिन ‘हिंदी विश्व’ नामक दैनिक समाचार बुलेटिन भी ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान निकाला गया। विश्व हिंदी सम्मेलन की एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इधर उसकी अनुशंसाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हर तीन महीने में अनुशंसा अनुपालन समिति की बैठक होती है। विदेश मंत्री स्वयं उन बैठकों में भाग लेती रही हैं।

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दूरभाष : ०९८३६२१९०७८
—कृपाशंकर चौबे

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