सहजो की कमाई

सहजो की कमाई

दिल्ली शहर में तीस वर्ष पूर्व घरेलू महिलाओं के पास कमाई का एक सरल साधन होता था। निम्न-मध्य वर्ग की महिलाएँ लिफाफा उद्योग को आसानी से अपना लेती थीं। इसका सीधा कारण यह था कि न तो इसका प्रशिक्षण लेने कहीं जाना था, न ही कागज खरीदने और न ही लिफाफे बेचने। सारे काम घर बैठे ही हो जाते थे। घरों से अखबार की रद्दी खरीदनेवाले कुछ लाभ कमाकर स्वयं ही घरों में अखबार बेच जाते थे। आटे या मैदा को पकाकर लेही बनाना सब आसानी से सीख जाते थे। कोई अनुभवी महिला कागज अलग साइज में काटना और मोड़ना सिखा देती और बच्चे भी लेही से एक ओर चिपकाना सीख जाते। फिर कोई व्यक्ति सौ-सौ लिफाफों की गड्डियाँ घरों से ही खरीदकर ले जाता या घर का कोई सदस्य साइकिल पर घूम-घूमकर दुकानों में आवश्यकतानुसार निश्चित दर पर बेच आता। सुविधा इतनी कि महिलाओं को कहीं बाहर जाना ही नहीं होता, सब काम घर बैठे ही हो जाते थे। इसमें घर के बच्चे भी कभी शौक से, कभी दबाव से खूब सहयोग करते थे। कुल मिलाकर यह गृह-उद्योग महिलाओं की अतिरिक्त आमदनी का साधन था। जब से पॉलिथीन बैग चल पडे़, तब से यह लिफाफा उद्योग बरबाद हो गया। महिलाओं की आय धीरे-धीरे समाप्त ही हो गई।

सहजो जिस मकान में रहती थी, उसमें बीस कमरे थे। सभी में किराएदार रहते थे। मकान मालिक (सेठ) कहीं और रहता था। उसका मुनीम हर महीने किराया लेने आया करता था। मकान मालिक से न कोई मिलने जाता और न वह कभी मकान देखने आता। सहजो के पास एक कमरा और एक बरामदा था। हर किराएदार के पास एक कमरा ही था; किसी के पास तो मात्र बरामदा ही था, उसी में किवाड़ लगवा लिये थे। लिफाफे का उद्योग सब चलाते थे।

सहजो सबसे आगे इसलिए थी, क्योंकि उसका कमरा मुख्य द्वार के ठीक सामने और नीचे ही था। कागज देनेवाले और लिफाफे लेनेवाले, सब पहले सहजो से ही बात करते थे। सहजो को एक लाभ यह था कि उसके छह बच्चे थे—तीन पुत्र और तीन पुत्रियाँ। सब लिफाफे बनाने में सहयोग करते थे। मकान के मुख्य द्वार के पास ही एक नल था, पास ही शौचालय भी। सभी किराएदार वहीं से पानी लेते और उसी शौचालय का उपयोग करते।

सहजो के बडे़ पुत्र की नौकरी लग गई थी। सबसे छोटी पुत्री को छोड़कर सभी विद्यालय जाते थे। परंतु बड़ी पुत्री और बडे़ पुत्र को छोड़कर शेष नौवीं तक नहीं पहुँच पाए। पुत्र-पुत्रियाँ विद्यालय से आकर घर में कभी नहीं पढ़ पाते थे, क्योंकि सहजो उन्हें लिफाफे के लिए कागज मोड़ने का या चिपकाने का कोई काम दे देती। माता-पिता प्रायः डाँट-डपटकर बच्चों को पढ़ने बिठाते हैं, परंतु सहजो कहती, ‘‘पहले अपने हिस्से का यह काम पूरा करो, पढ़ाई का काम बाद में।’’ विद्यालय का काम रह जाता तो बच्चे बहाना करते, झूठ बोलते, पर सहजो भाभी का काम पहेल करते। वास्तव में सहजो नाम से ही सहजो थी, पर थी बड़ी कड़ी। छोटी-छोटी गलती पर भी इतनी पिटाई करती कि बच्चे बिलबिला जाते। अतः डर के मारे पहले सहजो भाभी के काम को करना उनकी मजबूरी थी।

सहजो को बच्चे माँ या मम्मी नहीं, भाभी कहा करते थे। वास्तव में सहजो के दो देवर भी ऊपर की मंजिल में रहते थे। वे भी भाभी कहते तो बच्चों से भी सहजो ने भाभी कहलाने का इरादा किया। अम्माँ कहलाने से बुढि़या होने का आभास होता था और भाभी कहलवाकर वह स्वयं को जवान ही समझती थी।

बडे़ पुत्र का विवाह भी हो गया। सहजो सास बन गई। बहू भला भाभी कैसे कहती? अब सहजो माँजी और सासूजी कहलाती थी। बहू से ही नहीं, बच्चों से भी सहजो कठोरता से पेश आती। बहू को प्रभावित करने के लिए बेटियों को बात-बात पर खूब डाँटती। कभी गाली बकती और कभी पीट भी देती थी। सहजो शरीर से दुबली-पतली थी, परंतु हाव-भाव, बोलचाल से वह स्वयं को शक्तिशाली दिखाती थी। बहू का डील-डौल देखकर मन में भय खाती थी, अतः गरजकर बोलती और अवसर मिलते ही गलती की ओर संकेत करना न भूलती।

बहू भी अपनी तरह की एक ही थी। चौबीस घंटों में दो बार ही मुँह खोलती। सुबह या शाम, केवल इतना ही पूछती, ‘‘माँजी, सब्जी क्या बनानी है?’’ उत्तर जो भी मिलता, उसमें कोई ना-नुकुर नहीं करती। पीहर से सीखकर आई थी—हनुमान चालीसा और गायत्री मंत्र। काम करते-करते दिन-रात मन-ही-मन चालीसा या गायत्री मंत्र का पाठ करती रहती थी। सब्जी तो प्रायः बची ही रहती थी। कोई बाजार से छोले लाकर खा लेता तो कोई चार आने की दही ले आता। ससुर श्यामलाल सुबह निकल जाते तो दोपहर को आते और खाना खाकर चले जाते तो फिर रात को ही लौटते। सहजो तो मिर्च से ही रोटी खा लेती। इसलिए एक छोटी पतीली में ही सबका पूरा पड़ जाता था।

बच्चे विद्यालय से आकर कपडे़ बदलते, खाना खाते और लिफाफे बनाने में जुट जाते। बडे़ से छोटे तक खेलना तो किसी ने सीखा ही नहीं। न तो खेलने की जगह थी, न ही खेलने का वातावरण। लिफाफे बनाने से रविवार को भी छुट्टी नहीं होती थी। बच्चों को शिक्षक से अधिक सहजो भाभी की पिटाई से भय लगता था।

दिन भर का कार्यक्रम बताऊँ तो आप दाँतों तले उँगली दबाने लगेंगे। प्रातः तीन बजे से साढे़ चार बजे तक सारी नित्य क्रियाएँ पूरी कर ली जाती थीं। छोटी बेटी कभी उठने में आलस कर जाती तो उसे उठाकर फर्श पर पटक देती थी। एक ही नल जो है, अतः पहले उठकर स्नान करना आवश्यक था। किसी की हिम्मत है, जो बच्ची से सहानुभूति के दो शब्द भी कह दे। बड़ा पुत्र और बड़ी पुत्री दसवीं पास कर गए थे, शेष चार तो नौवीं तक भी नहीं पहुँचे। पहुँचते भी कैसे, उन्हें लिफाफे के काम में लगाए रखना सहजो की नजर में अधिक आवश्यक था। वास्तव में इस काम की कमाई से वह हर महीने सोना खरीदती थी। सोना खरीदती थी, परंतु पहनती नहीं थी, बक्स में जमा करके रखती थी। वह बुंदा भी एक कान में पहनती थी। एक कान तो साड़ी के पल्ले से ढक जाता था, एक ही दिखाई पड़ता था। बनवा सब रखे थे—चूडि़याँ, कडे़, हार, तगड़ी और जाने क्या-क्या? कमाई में सहयोग सब बच्चों का और सोने की मालिक सहजो।

समय बदला, दूसरे पुत्र का भी विवाह हो गया। बेटियाँ एक-एक कर के तीनों ससुराल चली गईं। छोटा पुत्र असमय काल कवलित हो गया। पूरी कंजूसी से वह अपने सोने के गहनों की सुरक्षा करती रही। खर्च के समय भी सोना नहीं निकाला और मुसीबत के समय भी इधर-उधर से ही काम निकाल लिया, पर सोना छाती से लगाए रही।

एक दिन वह मकान ही टूट गया। पुराना तो था ही। मकान मालिक भी किराएदारों से छुटकारा पाना चाहता था। पुराने किराएदार और सस्ता किराया, इनसे छुटकारा पाने की वह तरकीबें सोचता था। ईश्वर ने यह अवसर दे दिया। सभी किराएदार इधर-उधर चले गए। सहजो और श्यामलाल का बड़ा पुत्र पहले ही शहर में जमीन लेकर रह रहा था। उसे पता चला तो अपने परिवार को भी वहीं जमीन दिलवा दी। उसमें दो कमरे बना लिये और परिवार रहने लगा। कमरे बनाने में श्यामलाल ने पूरी कमाई लगा दी, पर सहजो ने सोने के गहने नहीं निकाले। लड़कियाँ तो चली ही गई थीं, परंतु छोटी बहू साथ ही थी। उसके भी बाल-बच्चे थे।

एक दिन श्यामलालजी की आँखें मिच गईं। उनका विधिवत् संस्कार कर दिया गया। सहजो उसी दिन से असहज हो गई। अब उसमें अकड़ कतई न रही। अधिकतर वह अपने कमरे में ही लेटी रहती थी। वैसे वह बीमार नहीं थी। न बुखार, न खाँसी, परंतु बच्चों से भी बात कम ही करती। बहू से तो बोलने की इच्छा ही नहीं थी। सहजो को अपनी जमा पूँजी (गहनों) की चिंता थी। वह गहनों को बहू-बेटियों में अपने हिसाब से बाँटना चाहती थी, परंतु कंजूसी से इकट्ठा की गई जीवन भर की कमाई को बाँटना सहज नहीं था। श्यामलालजी को स्वर्गवासी हुए अभी तीन महीने भी नहीं बीते थे कि छोटी बहू की समझ में सहजो की चिंता आ गई। वह भी निगाह रखने लगी। उसे भी चिंता सताने लगी कि कहीं बुढि़या चुपके से सारे गहने बेटियों को न सौंप दे। उसने भी बाहर आना-जाना कम कर दिया।

सहजो को उस दिन थकान सी थी, पर वह दवाई लेने नहीं गई। शाम को बेटा आया तो डॉक्टर से दवाई लेने जाना पड़ा। शाम को रोटी भी नहीं खाई। दवाई पीकर सहजो बेसुध हो गई। रात को कमरे की बत्ती जलती रही। प्रातः आठ बजे बहू ने आस-पड़ोस में खबर कर दी कि सहजो चल बसी। रोना-धोना शुरू हो गया। रिश्तेदार आए, बेटियाँ आईं। जार-बेजार रोईं। तेरहवीं भी हुई, सब रिश्तेदार लौट गए। लड़कियाँ आपस में धीरे-धीरे चर्चा करती रहीं, परंतु किसी को पता नहीं चला कि माँ के पास कितने गहने थे और किसको दिए? कहाँ गए? बेटा-बहू भी यही कहते रहे, ‘‘हमें क्या पता कि किसको दिए? चुपसे से बेटियों को ही पूज दिए होंगे? हमें तो दिए नहीं।’’

जीवन भर मेहतन की। न अच्छा खाया, न पहना। सदा मिर्च से रोटी खाई। किस काम आई ये कंजूसी और इतनी कमाई? सहजो की याद आते ही मन में यही भाव उभरता है—पुण्य करो, परोपकार करो, दान करो, सेवा करो! कंजूसी से तिजोरी मत भरो! साथ कुछ नहीं जाता। सब यहीं रह जाता है।

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मायाराम ‘पतंग’

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