महात्मा गांधी की १५०वीं जयंती

दोअक्तूबर महात्मा गांधी का जन्मदिवस है। गांधी जयंती पूरे देश में अनेक स्तरों पर बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। लेकिन यह दिन एक रस्म बनकर रह गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ वर्ष पहले गांधीजी के जन्मदिवस को ‘अहिंसा दिवस’ घोषित किया था। अतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गांधी जयंती मनाई जाती है। अहिंसा का प्रश्न विश्वशांति से जुड़ा है, जिसकी कामना सबको है, अशांति का वातावरण विश्व को आंदोलित कर रहा है। इस वर्ष दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला की जन्मशती मनाई गई। नेल्सन मंडेला उन राष्ट्र पुरुषों में थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के जीवन और कृतित्व से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने अपने देश की स्वराज प्राप्ति के लिए क्रांतिकारी मार्ग छोड़कर अहिंसा का मार्ग अपनाया। बीस वर्ष के कठिन कारावास के उपरांत भी उन्होंने अपने जीवन में घृणा और कटुता को नहीं आने दिया। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के उपरांत चेष्टा की कि समता और सामाजिक न्याय के आधार पर देश के हर वर्ग को, विशेषतया अंग्रेजों के सब मतभेदों और अत्याचारों को भूलकर नए उभरते राष्ट्र से जोड़ा जाए। यही नहीं, अफ्रीका में अनेक जातियाँ हैं, उनमें भी आपस में सौहार्द स्थापित हो, ताकि दक्षिण अफ्रीका एक संयुक्त व सशक्त राष्ट्र के रूप में उभर सके। उनके शती वर्ष महोत्सव के अवसर पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा को मुख्य सेंट्रेनरी (शताब्दी) मेमोरियल भाषण के लिए बुलाया गया। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का वह भाषण भी अत्यंत मार्मिक है। विश्व शांति तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण के विभिन्न पक्षों का उन्होंने बहुत संतुलित और समीचीन विवेचन किया है, जो सबके लिए पठनीय है। ओबामा के भाषण में भी महात्मा गांधी के आदर्शों और अपेक्षाओं की गूँज है। दक्षिण अफ्रीका केअपने अनुभव और व्यवहार से मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा बनकर भारत वापस आए।

महात्मा गांधी आज विश्वमानव के रूप में स्वीकारे जाते हैं। उनका संदेश शांति, मातृभाव, समता, न्याय और उपेक्षित मानव को उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त करने का रहा है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने जो उद्बोधन देशवासियों को दिया था, उसमें गांधीजी के संदेशों व भावनाओं को आज की परिस्थितियों में प्रस्तुत किया था। वह उद्बोधन अत्यंत सामयिक है। उस पर देशवासियों को विचार करने की आवश्यकता है। छोटी-छोटी बातों और मतभेदों को भुलाकर सामने आई चुनौतियों का सामना सबको मिलकर करना चाहिए। स्वतंत्रता संग्राम के उछाह और त्योहारी मूड में हम गांधीजी केमूल संदेश को भूल जाते हैं।

इस वर्ष का २ अक्तूबर एक विशेष महत्त्व रखता है। २ अक्तूबर, २०१९, यानी अगले वर्ष गांधीजी का १५०वाँ जन्मदिवस होगा। उसके आयोजन का प्रारंभ २ अक्तूबर, २०१८ से ही प्रारंभ होगा। भारत सरकार ने इस आयोजन को बड़े धूमधाम और सार्थकता के साथ करने का निश्चय किया है। एक सर्वदलीय एवं विशेषज्ञों की बड़ी समिति ने इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों पर विचार-विमर्श किया था और फिर एक छोटी समिति को कार्यक्रम तैयार करने का दायित्व सौंपा गया था। संभवतः २ अक्तूबर को पूरी रूपरेखा हमारे सामने होगी। विश्वमानव का संदेश विश्वव्यापी है और प्रासंगिक भी, उसका प्रचार-प्रसार उसी रूप में होना ही चाहिए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेश से अपने एक रेडियो प्रसारण में १९४२ में महात्मा गांधी को सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था। नेताजी के इस उद्बोधन के प्रेरक मूल तत्त्वों की जानकारी देश के साधारण नागरिक, विशेषतया नई पीढ़ी को होनी चाहिए। संस्कृति मंत्रालय के द्वारा इस दायित्व का संपादन होगा। रवींद्रनाथ टैगोर के १५०वीं जयंती का आयोजन भी विश्वव्यापी रहा था और अत्यंत सुचारु रूप से श्री प्रणब मुखर्जी की देख-रेख में हुआ था। उसका विवरण और आकलन भी पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ था। आशा है कि महत्मा गांधी की १५०वीं जयंती उसी प्रकार से व्यवस्थित और कल्पनाशील ढंग से आयोजित होगी। महात्मा गांधी की १५०वीं जयंती को गौरवपूर्ण ढंग से सफल बनाने में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी भारतीय नागरिकों का सहयोग और सहकार प्राप्त होगा।

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री और भारत

पूर्व क्रिकेटर एवं पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने २०११ में एक पुस्तक लिखी थी, उसका नाम है ‘पाकिस्तान-ए-पर्सनल हिस्टरी’। इसे इमरान ने यह बताने के लिए लिखा था कि वे कैसे और क्यों राजनीति में आए तथा किस उद्देश्य से उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘तहरी इनसाफ’ बनाई। पुस्तक में पाकिस्तान बनने के बाद क्या राजनीतिक स्थिति बनी, उसका विवेचन है। पुस्तक में एक तरह से अपना आत्मचरित और पाकिस्तान के प्रथम राष्ट्रपति मुहम्मद अली जिन्ना के निधन के बाद कैसे-कैसे पाकिस्तान की अवनति होती रही है, इसे दरशाने की चेष्टा है। पुस्तक में उन्होंने अपनी पार्टी के उद्देश्य बताए हैं—पाकिस्तान में सुशासन और सामाजिक न्याय जनसाधारण को मिल सके तथा न्यायप्रिय एवं माननीय व्यवस्था स्थापित हो सके। पाकिस्तान में कानून का राज नहीं है, महिलाओं की प्रतारणा होती है। दिन-दहाड़े सत्ता के विरोध में तनिक भी आवाज उठानेवाले का अपहरण हो जाता है, पुलिस और नीचे स्तर की न्यायपालिका अत्यंत भ्रष्ट हैं। गरीबी, भुखमरी, शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था का कोई ध्यान नहीं है, मानव अधिकारों का हर तरह से हनन हो रहा है। उनका कहना है कि जिन्ना की मृत्यु के उपरांत सत्ताधारी उनके सिद्धांतों को भूल गए और अपने स्वार्थ-साधन में जुट गए। इमरान खान ने स्वयं को एक आध्यात्मिक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। उनको अपने पर पूरा विश्वास है और उनकी मान्यता है कि कुरान की आयतों के आधार पर पाकिस्तान की समस्याओं का हल संभव है। लियाकत अली और उसके बाद प्र्रेसीडेंट को अपदस्य कर जनरल अयूब द्वारा फौजी शासन की स्थापना, संविधान को निरस्त करना, पूर्वी पाकिस्तान में अलगाव की भावना का उदय, अयूब का शासन जनरल याहया खाँ को सौंपना, पूर्वी पाकिस्तान का अपनी अस्मिता का संघर्ष, जुल्फीकार अली भुट्टो का शासन और पाकिस्तान की जनता की उससे आशाएँ, जनरल जिया का भुट्टो को अपदस्थ करना, भुट्टो को फाँसी, बेनजीर भुट्टो, शरीफ के पहले तीन शासनों तथा शरीफ को अपदस्थ कर जनरल मुशर्रफ केसत्ताकाल का विश्लेषण है। इन सबके समय में भ्रष्टाचार का बोलबाला कैसे बढ़ता गया और जनता गरीबी में पिसती रही। जनरल मुशर्रफ का वहाँ के सुप्रीम कोर्ट के विवाद के उपरांत मजबूरन सत्ता छोड़ना, बेनजीर भुट्टो की हत्या आदि इसमें सबकी चर्चा है। पुस्तक में न केवल वे स्वयं को एक आस्थावान व्यक्ति की तरह प्रस्तुत करते हैं, बल्कि एक उदारवारी तथा हर प्रकार की रूढि़ता एवं अतिवाद से दूर, सूफी परंपरा से प्रभावित सहृदय नागरिक के रूप में दिखाई देते हैं। जगह-जगह वे कुरान की आयतों का हवाला देते हैं। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी, बेरोजगारी, अन्याय, आर्थिक विषमता आदि का निदान कैसे हो, इसके विषय में वे अपने विचार प्रकट करते हैं। युवा पीढ़ी में एक नैतिक अभाव, ऐथिकल वैक्युम की चर्चा करते हैं। कठमुल्लों की वे आलोचना करते हैं। उनके अनुसार कुरान अतिवाद से बचकर मध्यम मार्ग का अनुसरण करने की हिदायत देता है। इमरान खान आतंकवाद का विरोध करते हैं, पड़ोसी देशों और अन्य सभी देशों से अच्छे रिश्तों की बात करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान पर काफी समय से अमेरिका हावी रहा है तथा पाकिस्तान ने अपनी प्रभुसत्ता खो दी है। इमरान खान के अनुसार पाकिस्तान को पुनः आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्राप्त करना है। अफगानिस्तान की लड़ाई में सत्ताधारी अमेरिकी डॉलर प्राप्त करने और अपनी तिजोरी भरने में लगे रहे तथा अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया। वे आई.एम.एफ. और विश्वबैंक की भी आलोचना करते हैं। अमेरिकी खुफिया पुलिस की घुसपैठ की वे भर्त्सना करते हैं। वे पाकिस्तान में सेना के हस्तक्षेप के विरोधी हैं तथा निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका के हामी हैं। इमरान खान ने अपनी पार्टी की अभी तक की असफलता का भी विवेचन किया है। जिया ने उन पर मंत्री बनने का बहुत दवाब डाला, पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इमरान खान डॉ. मुहम्मद इकबाल के बड़े प्रशंसक हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि अल्लामा इकबाल की विचारधारा व सिद्धांतों में ही पाकिस्तान का भविष्य निहित है। डॉ. इकबाल की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Reconstruction of Religious Thought in Islam’ में जो उनके भाषण हैं, उनकी लंबी चर्चा की है। इमरान खान लिखते हैं—इकबाल ने मुसलमानों को कहा कि वे खुले दिमाग से कुरान और इसलामिक कानून की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए। ताकि वे शीघ्रता से बदलती दुनिया में प्रासंगिक रह सकें। इमरान खान लिखते हैं—‘While Islam and the two-Nation theory- the Ideology on which the split between Pakistan and India was based remain the bedrock fo Pakistan foundations it is clear that religaous dogma should not. He used to spread prejudice intolerance and sectarianism unfortunately, though, one of the worst aspecs of Muslim religious bigots is that they preach hatred towords minorites or other Islamic sects, taking quranicverses out of context to jnsifty their actions. They ignore—or are. ignorant of the fact that the prophet’s (PBUH) life has many examples of tolerance towords other relegious groups.’ संक्षेप में इमरान खान का कहना है कि यद्यपि इसलाम और द्विराष्ट्र थ्योरी पाकिस्तान का मूल है, किंतु धर्म और असहनशीलता के लिए स्थान नहीं है, जो कि कठमुल्ले फैलाते हैं। प्रश्न है कि इमरान खान प्रधानमंत्री बनने के बाद कहाँ तक अपने विचारों का अनुपालन करवा पाते हैं।

इमरान खान ने अपनी विजय के समय कहा था कि यदि भारत दोस्ती की ओर एक कदम बढ़ाएगा तो वे दो कदम आगे बढ़ेंगे। प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद आई.एस.आई. के मुख्यालय गए और वहाँ कहा कि आई.एस.आई. का खुफिया विभाग देश की पहली सुरक्षा लाइन है। यही आई.एस.आई. पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को सुरक्षा देने के लिए जिम्मेदार है। आई.एस.आई. जम्मू-कश्मीर में आतंकियों को भेजने की व्यवस्था करता है। कश्मीर घाटी में आंदोलन और हिंसक काररवाइयाँ करने के लिए यही साधन जुटाता है। इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी इन हरकतों में कोई कमी दिखाई नहीं दे रही है। उनके अधिकतर मंत्री जनरल मुशर्रफ के समय के मंत्री हैं। चुनाव के पहले ही यह प्रचारित था कि मिलिटरी इमरान खान के समर्थन में है। नवाज शरीफ चौथी बार प्रधानमंत्री के पद से हटाए गए। पाकिस्तान में सत्ता के पीछे मिलिटरी है। मिलिटरी की मर्जी के खिलाफ कुछ भी हुआ तो तुरंत तख्ता पलट जाएगा। मुशर्रफ खुलेआम शरीफ को हटाकर स्वयं पाकिस्तान के सी.ई.ओ. और फिर प्रेसीडेंट बने। इस बार शरीफ मिलिटरी और पाकिस्तान की न्यायपालिका की मिलीभगत से अपदस्थ हुए। पनामा पेपर्स और भ्रष्टाचार के आधार पर वे पूरे जीवन के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराए गए। वे, उनकी पुत्री और दामाद जेल में हैं। अपनी पत्नी की कैंसर से मृत्यु के बाद केवल तीन दिन के लिए अंतिम रीति-रिवाज पूरा करने के हेतु पैरोल पर छोड़े गए थे। पूरी सैन्यशक्ति पाकिस्तान की विदेश नीति और डिफेंस पॉलिसी को स्वयं नियोजित करना चाहती है। वही उसको नियंत्रित भी करती है। हर प्रकार से उसकी छाप लोकतांत्रिक राजनीति पर है। देखें इमरान खान कहाँ तक और कब तक अपनी नीतियों या विचारों के अनुसार प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य कर सकेंगे। स्वाभाविक है कि भारत की निगाहें इस ओर हैं, क्योंकि वह पड़ोसी से अच्छे संबंध बनाना चाहता है तथा पाकिस्तान में शांति, राजनैतिक स्थिरता और उसकी खुशहाली की कामना करता है। शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण आपसी रिश्तों से ही दोनों देशों का भला है। खेद इस बात का है कि पाकिस्तान की सैन्यशक्ति की धारणा है कि उसकी अस्मिता और सार्थकता निर्भर करती है भारत को हौवा के रूप में ही प्रस्तुत करने से। पाकिस्तान को इसीलिए एक डीप स्टेट कहा गया। तथाकथित प्रजातंत्रात्मक सत्ता के पीछे है सैन्यशक्ति की वास्तविक सत्ता। क्या इस सच को इमरान खान में असत्य साबित करने की क्षमता है? एक और समस्या पाकिस्तान की इस समय है कि वहाँ की आर्थिक अवस्था बहुत खराब है। इमरान खान इंटरनेशनल मानोटरी फंड की नीतियों के विरोध में हैं। क्या वह पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबारने में सहायता करेगा। अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को नियंत्रित करे। वह हो नहीं पा रहा है। ऐसे में अमेरिका भी वांछित सहायता शायद ही करे। चीन पर ही पाकिस्तान अधिक निर्भर करेगा, इससे उनके रिश्ते और घने हो सकते हैं। अतएव भारत को पाकिस्तान से अभी सावधान ही रहना पडे़गा।

एन.पी.ए. अथवा फँसे कर्ज में वृद्धि क्यों?

भारतीय संसद् की आकलन समिति को, जिसके अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी हैं, के अनुरोध पर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराज राजन ने एक टिप्पणी ऐसे ऋणों के बारे में दी है, जो समय पर नहीं चुकाए जा रहे हैं, उद्योग समूहों और बड़े व्यापारिक संस्थानों द्वारा। ऐसे ऋणों की संख्या निरंतर बढ़ रही है और यह प्रश्न पिछले दो-तीन दशकों में कई बार दोनों सदनों में उठा है। देश चिंतित है। पर कोई सुधार आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। बैंकों की व्यवस्था चरमरा रही है। एक बार जब डॉ. मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे, तब राज्यसभा में हमने अनुरोध किया था कि कम-से-कम ऐसे व्यक्तियों, उद्योगपतियों, व्यवसायियों के नाम प्रकाशित किए जाएँ, ताकि देश जान सके कि कौन देनदार हैं, जो अपने वादे से मुकर रहे हैं। दूसरे, रोक लगानी चाहिए ऐसे कर्जदारों पर, ताकि वे एक बैंक के कर्जे का भुगतान कर नहीं रहे हैं और दूसरे बैंकों से अपने संबंध बनाकर और कर्ज लेने लगते हैं। आखिरकार बैंकों में पैसा जनता का है, उसे सुरक्षित रखने का दायित्व बैंकों का है। इस समय जो कोताही हो रही है, उसे नियंत्रित करना जरूरी है। डॉ. मनमोहन सिंह का उत्तर था कि इससे देश की आर्थिक प्रगति पर कुप्रभाव पड़ेगा। इस समय नीरव मोदी और चौकसी, जिनके व्यापारिक संबंध पंजाब नेशनल बैंक और अन्य बैंकों से थे, उसमें जो धोखाधड़ी हुई, उसके कारण नानपेइंग लोन्स, यानी ऐसे कर्ज, जिनका भुगतान नहीं हो रहा है, और न संभावना ही है, इनकी चर्चा दिन-प्रतिदिन टी.वी. और समाचार-पत्रों में बड़े जोर-शोर से हो रही है। विजय माल्या का भी बैंकों के कर्जे का मामला पहले ही जानकारी में आ चुका था। किंतु इस आर्थिक देनदारी के मामले का विशद रूप में राजनीतीकरण हो गया है। ऐसे राजनीतिक गरम के माहौल में आर.बी.आई. के पूर्व गवर्नर रघुराज राजन की टिप्पणी का एक विशेष महत्त्व है। वे कुशल अर्थशास्त्री हैं। २००८ का विश्वव्यापी आर्थिक संकट, जो अमेरिका में प्रसिद्ध संस्थान लेहमैन ब्रदर्स के दिवालिया हो जाने के बाद प्रारंभ हुआ और उसका प्रभाव अमेरिका तक सीमित नहीं रहा। दूसरे देश और भारत भी उसकी चपेट में आए। यह मंदी का दौर अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इस आर्थिक मंदी की संभावना के बारे में रघुराजन ने चेतावनी दी थी। ऐसे अनुभवी और सुविज्ञ अर्थशास्त्री की टिप्पणी अत्यंत विचारणीय मानी जानी चाहिए। वित्तीय वर्ष २०१८ में बैंकों के नॉनपेंइग कर्जे, यानी जिनकी अदायगी की संभावना नहीं है, १०.३ लाख करोड़ रुपए हो गई। बैंकों ने जो धनराशि कर्ज के तौर पर दी, उसका यह ११.२ प्रतिशत है। संदेहास्पद कर्जों का यह एक बड़ा भाग है। यही नहीं, बैंकों को २०१७-१८ में १.४४ लाख करोड़ रुपए राइट ऑफ करना पड़ा, यानि इसकी अदायगी की संभावना नहीं है। इसे ‘खराब लोन’ कहते हैं। इसी कारण किसान और संगठन सरकार को उलाहना देते हैं कि जब बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों का कर्जा माफ हो सकता है तो हमारा क्यों नहीं? देश के सामने यह एक विकट परिस्थिति है। समय-समय पर सरकारों ने कुछ कदम उठाए, पर वे पूर्ण रूप से सफल नहीं हुए। यह कहना भी सही नहीं है कि यह समस्या एन.डी.ए. सरकार के समय पैदा हुई है। यह बीमारी पुरानी है और उसका इलाज समय से पूरा नहीं हुआ, अतएव इस विकट रूप में अब प्रकट हो रही है।

रघुराम राजन ने इस संकट के पैदा होने के कई कारण बताए हैं। एक है, चूँकि २००६-०८ में आर्थिक प्रगति अच्छी, कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर समय से पूरा हो गया और आशावादिता बहुत बढ़ गई तथा बैंक खुले हाथ लोन देने लगे बिना उचित जाँच-पड़ताल के कि जो प्रोजेक्ट बना है, वह भविष्य में व्यवहार्य है या नहीं। दूसरा कारण बताया कि विश्व्यापी आर्थिक संकट के कारण उत्पादन में कमी आई, क्योंकि माँग में नर्मी आ गई। तीसरा कारण रहा कि जो सरकार की ओर से आवश्यक प्रोजेक्ट के लिए फैसले चाहिए, उनमें विलंब हुआ। फिर जब देरी हुई तो जो promoter (संवर्धक), परियोजना लाए थे, उनके उत्साह में कमी आ गई। बैंकों की दिलचस्पी में भी कमी आई, क्योंकि स्वयं अपनी धनराशि और लगाने के लिए प्रोत्साहक भी आनाकानी करने लगे। आवश्यकता है, समय से सरकारी निर्णय लेने की प्रणाली में। और bankrupty code अथवा दिवालिया बनने के पहले बैंकों के पास प्रमोटर या प्रोत्साहक पर किसी प्रकार के दवाब देने का कोई साधन नहीं था। डराना-धमकाना संभव नहीं था। इसके अतिरिक्त अनुचित या बदनीयती और भ्रष्टाचार कारण हो सकते हैं। यह अवश्य है कि बैंकर्स अति आत्मविश्वास में रहे और जितनी सख्त जाँच होनी चाहिए, वह नहीं हुई। ऋण स्वीकार करने के बाद बैंकर्स की कार्यकुशलता में कमी रही। प्रोजेक्ट के कठिनाई में होने पर और संवर्धक की नीयत साफ न होने पर भी अतिरिक्त कर्ज दिया गया इस बहाने कि कुछ और सामान लाने की आवश्यकता है। बैंकों के बोर्डों और खोजी एजेंसियों को संदेहप्रद या खराब कर्ज के पैटर्न या डिजाइन को देखना चाहिए तथा जो बैंकों के अधिकारी हैं, उनकीजायदाद परिसंपति की जाँच होनी चाहिए। तभी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार था और कितना था! सबसे बड़ी बात रही है व्यवस्था या सिस्टम की असफलता की कि एक भी धोखेबाज को चिह्नित और पकड़ा न जा सका। रिजर्व बैंक में रघुराजन ने एक मॉनिटरिंग सिस्टम की शुरुआत की थी। उनका कहना है कि उन्होंने एक हाई प्रोफाइल मामलों की सूची प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी थी कि रिजर्व बैंक और सरकार मिलकर कुछ के खिलाफ कानूनी काररवाई करें। आगे क्या हुआ, उसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उनका कहना है कि वैकरप्टसी कोड के बाद बहुत से नादेहंदा कर्जवाले बार-बार छोटे-छोटे मुद्दे उठाकर अदालतों का सहारा लेते हैं। अदालतों के इन मामलों में अधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि रिजर्व बैंक को, जब आशावादी वातावरण में लोन दिए जा रहे थे तो उस समय अधिक सावधानी बरतने की चेतावनी देनी थी। इस तरह की स्थिति फिर पैदा न हो उसके लिए उन्होंने व्यवस्था, कार्यप्रणाली, बैंकों को अधिक पेशेवर या प्रोफेशनल बनाने की सिफारिश की है। कार्यकर्ताओं की क्षमता तथा प्रोजेक्ट के इवैल्युएशन (आकलन) करने की कुशलता में बढ़ोतरी होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों के प्रबंधन में सुधार होने चाहिए और सरकारी प्रभाव से उन्हें दूर रखना चाहिए। बैंकों के सर्वोच्च अधिकारी का स्थान कभी भी रिक्त नहीं रहना चाहिए। उनका सुझाव है कि बैंकों के बोर्ड का गठन सरकार की जगह एक स्वतंत्र बोर्ड को करना चाहिए। नायक कमेटी की रिपोर्ट का अनुकरण सरकार गंभीरता से लेना चाहिए। अन्य सुझाव हैं, यहाँ सबके विस्तार में कहा जाना आवश्यक नहीं है।

आगे ऐसी स्थिति पैदा न हो, रघुराम राजन ने इसके विषय में चेतावनी दी है। ये ध्यान देने योग्य हैं। उन्होंने कर्ज बाँटने के लिए लक्ष्य रखने का विरोध किया है। वे कर्ज माफ करने की प्रथा के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि इससे क्रेडिट कल्चर बिगड़ता है, जनता की मानसिकता दूषित होती है। रघुराम राजन ने तीन स्रोतों की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि वे भविष्य में खतरे का कारण बन सकते हैं। वे हैं—मुद्रा लोन, जो छोटे, अति छोटे उद्यमियों को दिए जा रहे प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना के अंर्तगत तथा किसान के्रडिट कार्ड के द्वारा किसानों को कर्ज तथा तीसरा है—क्रेडिट गारंटी स्कीम, जो स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया के अंतर्गत है। ये योजनाएँ आवश्यक हैं, यदि हम साधनहीन वर्गों को रोजगार देना चाहते हैं और उनका सशक्तीकरण चाहते हैं, तो इन योजनाओं द्वारा संभव है। पर इनकी निगरानी ढंग से होनी चाहिए, समय-समय पर इन योजनाओं का पुनरावलोकन होना चाहिए। ऐसा हो सकता है कि चूँकि ये लोन छोटे हैं, बैंकों का ध्यान उधर नहीं रहे या उनके पास निगरानी के साधन न हों, तब वे बैंक व्यवस्था के लिए संभावित खतरा हो सकते हैं। ये योजनाएँ एन.डी.ए. सरकार की विशेष योजनाएँ हैं। अकेले मुद्रा कर्ज वितरण के अंतर्गत ६.३७ लाख रुपए वितरित हो चुके हैं, जो कुल कर्ज वितरण का ७ प्रतिशत है। ये कर्ज छोटे हैं और इनका उद्देश्य है fund the unfunded अथवा जिनके पास आवश्यक धन नहीं है, उनको धन उपलब्ध कराया जाए। ये एक लाख से दस लाख तक के छोटे कर्ज हैं। उनकी वापसी और वसूली के विषय में चौकस रहना जरूरी है। छोटे कर्ज भी बैंक लोन में परिवर्तित हो सकते हैं, और यदि उनकी संख्या में बढ़ोतरी होती है तो वह भी बैंकों के लिए एक समस्या बन सकती है। बैंकों को इस बात का ध्यान रखना है, वरना ये भी खतरे का सबब हो सकते हैं। सरकार व वित्त मंत्रालय का दायित्व बनता है कि वे इनकी निगरानी सूक्ष्म दृष्टि से करें, ताकि ये लाभकारी योजनाएँ गले की हड्डी न बन जाएँ। इनकी मॉनिटरिंग की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

शीर्ष न्यायालय का धारा ३७७ पर निर्णय

भारतीय दंड संहिता है (आई.पी.सी.) के सेक्शन (धारा) ३७७ को शीर्ष न्यायालय ने अपराध-विहीन कर दिया है। इसका अर्थ है कि यदि अपनी सहमति से एक ही लिंग का कोई भी, चाहे वे पुरुष हों अथवा महिला, संबंध रख सकते हैं और यह कोई अपराध नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निर्णय जुलाई २००९ में लिया था, किंतु शीर्ष न्यायालय की एक पीठ ने उसे निरस्त कर दिया था। लेकिन अब शीर्ष न्यायालय के पाँच न्यायधीशों की पीठ ने, जिसमें प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायाधीश नरीमन, न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ एवं न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने शीर्ष न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया। चार जजों ने अपने-अपने फैसले अलग-अलग तर्कों के साथ लिखे, लेकिन निष्कर्ष एक ही कि धारा ३७७ असंवैधानिक है। जो मौलिक अधिकार संविधान ने आर्टिकल १४, १९ और २१ द्वारा नागरिक को दिए हैं, उनका हनन धारा ३७७ द्वारा होता है। यह समता और निजता का उल्लंघन करता है। संक्षेप में हर एक को अपने निजी जीवन को अपने ढंग से जीने का अधिकार है। समलैंगिक आकर्षण कोई अपराध नहीं है, अपनी-अपनी रुचि का प्रश्न है। पिछले दिनों निर्णय के बाद टी.वी. और समाचार-पत्रों में इस पर काफी वाद-विवाद हुआ, पर अधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। किंतु आगे आपसी विवाह अथवा गोद लेने की समस्याएँ आएँगी और कई कानूनों में परिवर्तन करने होंगे। एक वर्ग ने तो इस फैसले को संवैधानिक क्रांति की संज्ञा दी है। कुछ लोगों ने कहा है कि पहली बार स्वतंत्रता का आभास हुआ है। अंग्रेजी समाचार-पत्रों में फैसले के समर्थन में बडे़ जोश-खरोश के साथ लेख आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह एक नए आधुनिक भारत का आभास कराता है। इसे एक अत्यंत गतिवादी और उन्नतिशील कदम बताया है। कुछ टिप्पणीकार शिखंडी, मोहनी अवतार तथा कुछ पुराने स्थापत्य और चित्रकला का सहारा भी निर्णय के समर्थन में लेते हैं। अब यह विवाद व्यर्थ है, क्योंकि संविधान के अनुसार शीर्ष न्यायालय का फैसला सर्वोपरि होता है, सर्वमान्य होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा मुसलिम और ईसाई धर्म गुरुओं ने इसे अनुचित कहा है। उनका कहना है कि यह प्रकृति की अपेक्षा के प्रतिकूल है। यौन संबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजनन है, जो यहाँ संभव नहीं है। ७२ देशों में समलैंगिक संबंध कानून-विरोधी माने जाते हैं। दूसरी तरफ एक बड़ी संख्या ऐसे देशों की है, जहाँ इसे वैध माना गया है और यह कोई अपराध नहीं है। विरोध करनेवालों का कहना है कि इससे एड्स जैसी भयंकर बीमारियाँ बढ़ सकती हैं, जो लाइलाज हैं। एक बेंगलुरी महिला टिप्पणीकार एहसास नायाब ने आश्चर्य प्रकट किया है कि एक महिला जज ने भी शीर्ष न्यायालय के फैसले में अपनी सहमति दी। उनके अनुसार यह फैसला किसी धर्म से संबंधित नहीं है, यह पूरे समाज की चिंता का विषय है और सबको विरोध करना चाहिए। फिलहाल ये सब विवाद निरर्थक हैं। शीर्ष न्यायालय ने अपना निर्णय दे दिया है, जो अब देश का कानून है। यू.एन.ओ. ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। पूरा मामला मानव के मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। भारत सरकार ने अदालत में इस विषय पर अपनी कोई राय नहीं दी, तटस्थ रही। पूरा मामला न्यायालय के विवेक पर छोड़ दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा एवं जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसकी आलोचना की है, और कहा है कि सरकार ने अपना दायित्व न्यायपालिका पर छोड़ दिया। उनका कहना है कि यह निर्णय तो कानून द्वारा विधायिका को करना चाहिए। दो मुद्दे सामने आएँग—पहला यह कि इस फैसले का प्रभाव कई अन्य कानूनों पर पडे़गा, उनमें परिवर्तन कितनी शीघ्रता से होता है! दूसरा यह कि समाज की मानसिकता में परिवर्तन कैसे और किस प्रकार से हो, ताकि पूरा समाज इस दूरगामी फैसले को दिल से स्वीकार करे। जब कानून और समाज की मानसिकता में अधिक दूरी होती है तो कानून का अनुपालन सदैव ठीक ढंग से हो नहीं पाता है। कानून और समाज की मानसिकता में सामंजस्य आवश्यक है।

सरदार पटेल स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

सरदार पटेल की जन्मतिथि ३१ अक्तूबर को मनाई जाएगी। इस वर्ष सरदार पटेल की मूर्ति का अनावरण गुजरात में होगा। यह दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी, अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से भी अधिक ऊँची। समुद्री तट पर स्थापित इस मूर्ति का नामकरण ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ अथवा ‘एकता की मूर्ति’ के रूप में किया गया है। दूर से या हवाई जहाज से यह मूर्ति दिखाई देगी। यह एक प्रेरणादायक कदम होगा। सरदार पटेल ने अपने पूरे राजनैतिक जीवन में भारत की एकता का चित्र सँजोया था और उसकी पूर्ति मूर्ति की स्थापना के साथ होगी। हमारे धर्मशास्त्रों में जिस भारत की कल्पना है, उसको मूर्तिमान करने का श्रेय सरदार पटेल को है। उन्होंने केवल देशी राज्यों का विलयन ही नहीं कराया, १९४७ के भाषणों के पहले की उनकी स्पीचों को पढ़ते हैं, तब पता चलता है कि किस प्रकार वे सदैव सचेत रहे कि उस समय की विदेशी सरकार द्वारा जिससे स्वतंत्र भारत की एकता को धक्का लगे, वे चुपचाप बिना आत्मप्रचार के प्रयत्न करते रहे कि जो अवधारणा हमारे शास्त्रों में भारत की रही है, वह पूर्ण हो। उन्होंने अपने निजी हित को कभी महत्त्व नहीं दिया। संघटन द्वारा बार-बार कांग्रेस अध्यक्ष होने का प्रस्ताव होने पर भी उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। १९४६ में भी यही हुआ। कांग्रेस के प्रांतीय संघटनों में तीन को छोड़कर सभी ने सरदार पटेल का समर्थन किया। उस समय गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू से पूछा कि वे क्या चाहते हैं? नेहरूजी चुप रहे। गांधीजी उनकी इच्छा समझ गए और गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल ने कांग्रेस के अध्यक्ष के पद के लिए अपने दावे को वापस ले लिया था। ऐसे थे सरदार पटेल, जिनका जन्मदिवस ३१ अक्तूबर को मनाया जाएगा। देश उनके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। यह सर्वविदित है कि जो उस समय कांग्रेस का अध्यक्ष हो, वही देश का भावी प्रधानमंत्री बनेगा। वे देश का विभाजन नहीं रोक सके, किंतु जितने भी षड्यंत्र ब्रिटिश नौकरशाही और फौजी अधिकारी कर रहे थे, उसको असफल बनाने में वे हमेशा चौकस रहे। गांधीजी के १९४२ के आंदोलन की सफलता के लिए भी वे भीतर-ही-भीतर चुपचाप कार्य करते रहे। गांधीजी की नीति से असहमत होते हुए भी गांधीजी के आदेश को मान लेते थे। वे अदम्य आत्मविश्वास और साहस के प्रतीक थे। देशसेवा में अपने आपको बलिदान कर दिया, बैरस्टरी छोड़कर फकीर बन गए और अंत तक फकीर ही रहे। अंतरराष्ट्रीय सिंड्रोम से वे हमेशा दूर रहे। उनके लिए देश परिवार था। इन्हीं दिनों प्रकाशित हिंडोल की पुस्तक ‘सरदार पटेल ऐंड हिज आइडिया ऑफ इंडिया’ सरदार पटेल के जीवन के कई अनछुए अथवा जिनके विषय में अधिक जानकारी नहीं है, उनको उद्धृत किया है। पुस्तक अत्यंत पठनीय है। जन्मदिवस के अवसर पर सरदार पटेल की स्मृति को सादर नमन!

हमें प्रसन्नता है कि जून मास के साहित्य अमृत के संपादकीय में कुछ टिप्पणियों के विषय में असहमति प्रकट की है। साहित्य अमृत विचार-विमर्श में विश्वास करता है। पूरा जीवन ही सीखने और कहीं त्रुटि है उसको सुधारने का है। गाजियाबाद से विकासजी ने इरफान हबीब की किताब के बारे में जो लिखा है, उससे अपनी नाराजगी प्रकट की है। इस पुस्तक के रचयिता इरफान हबीब अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मार्कसिस्ट इतिहासकार नहीं हैं, जिनका अरुण शौरी ने अपनी पुस्तक ‘Eminant Historians’ में पर्दाफाश किया है। जिस पुस्तक का हमने जिक्र किया है, उसके संकलनकर्ता इरफान हबीब दूसरे व्यक्ति हैं। वे अन्यत्र प्रोफेसर रहे हैं। प्रशंसा इस कारण थी कि उस विषय पर उन्होंने जो साधारण पाठक को उपलब्ध सामग्री आसानी से नहीं होती है, उसको संगृहीत किया था। वहाँ भी हमने उनकी अपनी कुछ टिप्पणियाँ हैं, उनसे असहमति भी प्रकट की थी। यहाँ एक सा नाम होने के कारण ही भ्रम पैदा हुआ है।

मैनपुरी से श्री के. ब्रह्मानंद तिवारीजी ने कहा है कि संपादक महोदय पढ़ते हैं, उस पर विश्वास कर लेते हैं। ऐसा नहीं है, उनको विश्वास दिलाना चाहेंगे, सीमित विवेक का भी इस्तेमाल करने की कोशिश रहती है, हम उनसे पूर्णतया सहमत हैं कि पुराना नाम कान्यकुंज है। वैसे कन्नौज के इतिहास के रचयिता डॉ. मिश्र ने लिखा है कि वैदिक काल से इस क्षेत्र के अनेक नाम रहे हैं। महाभारत काल में यहाँ महाराज द्रुपद का राज्य था। यह द्रुपद क्षेत्र कहलाता था। यह कहना हमारा मकसद नहीं था कि अरबों ने कन्नौज नगर को नाम दिया। राजस्थान के एक अप्रकाशित नामों की उत्तति विषयक संदर्भ में बात चल रही थी। चूँकि अरबी भाषा में कन्नौज का मतलब धनवान से है, शायद इसलिए वे कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित हुए। स्पष्टता से अपनी बात का प्रस्तुतीकरण नहीं हुआ, इससे यह भ्रांति पैदा हुई। हम तिवारीजी को धन्यवाद देंगे कि उन्होंने इस ओर हमारा ध्यान कुछ रोष के साथ ही सही, आकर्षित किया। त्रुटि हो या अस्पष्टता के कारण भ्र्रांति पैदा हो, यह हम नहीं चाहेंगे। सुधी पाठकों के ऐसे पत्रों का सदैव हार्दिक स्वागत है। वे ज्ञानवर्धन के सशक्त माध्यम हैं।

 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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