शादी के दिन का इंतजार

शादी के दिन का इंतजार

आलू

पूरे साल है मिलता आलू,

हर सब्जी में डलता आलू।

छोटा-बड़ा, गोल या मोटा,

तरह-तरह का होता आलू।

है कोई दुनिया में ऐसा,

जिसको नहीं है भाता आलू।

ऐसा नहीं कि बस सब्जी ही,

बन सकता है अपना आलू।

पराँठे, पकौड़े, चिप्स, रायता,

कई रूपों में ढलता आलू।

 

भोलूराम का ब्याह

कल है भोलूराम का ब्याह,

मन में उनके भरा उत्साह।

यही तमन्ना भोलूजी की,

सब कहें—भई वाह, भई वाह!

कसर न आए कोई निकल,

ध्यान रख रहे वे पल-पल।

उनको नहीं जरा भी चैन,

बात-बात पर हों बेचैन।

उनकी चिंता नहीं बेकार,

आखिर ब्याह होना इक बार।

बेचैनी से कर रहे वे,

शादी के दिन का इंतजार।

अच्छा लगता है

सुबह देर तक मुझको सोना अच्छा लगता है,

बिस्तर में लेट अलसाना अच्छा लगता है।

करते रहते मना मम्मी-पापा मगर फिर भी,

खट्टी इमली-मीठा चूरन खाना अच्छा लगता है।

लगता मुझे बहुत प्यारा छोटा-सा भइया,

लेकिन जब-तब उससे लड़ना अच्छा लगता है।

सब कहते हैं बात-बात पर मत करो रूठा,

बार-बार पर रूठ जाना अच्छा लगता है।

भूख का इलाज

नन्हा चूहा जाने लगा स्कूल,

इक दिन खाना घर गया भूल।

हुई आधी छुट्टी दो घंटे बाद,

खाने की तब उसे आई याद।

हुई हालत खराब भूख के मारे,

खाना खाते थे दूजे बच्चे सारे।

नन्हा चूहा कुछ लगा सोचने,

किताब लेकर फिर लगा कुतरने।

दीवार घड़ी

बड़ी निराली यह दीवार घड़ी,

लगता है अपनी जिद पर अड़ी।

वैसे चलती रहती है दिनभर,

रुक जाती है सात तीन पर।

इस कारण हो जाती गड़बड़,

हों सब लेट, करें फिर हड़बड़।

करवा लेंगे इसको ठीक कल,

यही सोचते दिन जाते निकल।

गरमागरम रोटियाँ

होती हैं मजेदार गरमागरम रोटियाँ,

हर एक का प्यार गरमागरम रोटियाँ।

भूख लगी हो जब-जब भइया जोरों की,

लगें स्वाद का भंडार गरमागरम रोटियाँ।

दिखती हैं फूली हुई गोलगप्पे-सी,

सोंधी-सोंधी खुशबूदार गरमागरम रोटियाँ।

भरे किसी का पेट एक ही खाने से,

कोई खाए तीन-चार गरमागरम रोटियाँ।

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हरीश कुमार ‘अमित’

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