लोककाव्य में कुँअर सिंह

लोककाव्य में कुँअर सिंह

सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की शुरुआत बिहार की धरती पर बाबू कुँअर सिंह के नेतृत्व में हुई थी। १८५७ के राष्ट्रव्यापी जन-विद्रोह की अगुआई कुँअर सिंह ने लगातार आठ महीनों तक न केवल बिहार, बल्कि झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के बृहत्तर हिस्सों में की। जिस प्रकार मई १८५७ में मेरठ के सिपाहियों ने विद्रोह कर तत्कालीन मुगल शासन बहादुरशाह जफर का नेतृत्व स्वीकार किया, उसी प्रकार दानापुर की फौजी छावनी के विद्रोही सैनिकों ने २७ जुलाई, १८५७ को बाबू कुँअर सिंह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने का अनुरोध किया और बगैर कुछ सोचे-विचारे पूरे उत्साह के साथ अस्सी वर्ष के इस बूढ़े शेर कुँअर ने सक्रिय नेतृत्व प्रदान करने का बीड़ा उठा लिया।

वीर कुँअर सिंह महान् योद्धा, कुशल प्रशासक और सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में सदैव याद किए जाते हैं। उस समय के सभी स्वतंत्रता-सेनानी और रण-बाँकुरे, यथा बहादुर शाह जफर, बेगम हजरत महल, नाना साहेब, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे आदि, इन सबों से सामरिक रणनीति, त्वरित निर्णय-क्षमता, रण-कौशल आदि सभी दृष्टियों से वीर कुँअर आगे ही थे। दामोदर विनायक सावरकर ने लिखा है—‘‘सत्तावन की क्रांति में अपनी युद्ध-पद्धति और रण-कौशल में कुँवर सिंह की बराबरी का कोई नहीं था।’’

लोकनायक और महान् क्रांतिकारी बाबू कुँअर सिंह की वीरगाथाओं का लोकगीतों में भरपूर उल्लेख हुआ है। भोजपुरी लोकगीतों में बाबू कुँअर सिंह को क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ाव के कारण महात्मा गांधी से भी ज्यादा महत्त्व देते हुए उनकी वीरता और प्रेरक कथाओं को बड़े विस्तार से चित्रित किया गया है। लोकगीतों की विभिन्न धुनों और लयों में कुँअर सिंह पर विभिन्न रचनाएँ उपलब्ध हैं।

आज भी होली-गीतों की शुरुआत बाबू कुँअर सिंह को याद करते हुए ही की जाती है, ‘‘बाबू कुँवर सिंह तेगवा बहादुर/बँगला में उँड़ेला अबीर।’’ एक अन्य होली-गीत में लड़ाई में कुँअर सिंह की जीत की कामना की गई है, ‘‘बाबू कुँअर सिंह तोहरे राज बिनु, अब न रँगइबो केसरिया। इतते आइल घेरि फिरंगी, उतते कुँअर दोऊ भाई। गोला-बारूद के चले पिचकारी, बिचवा में होला लड़ाई।’’ होली के अवसर पर ही गाए जानेवाले ‘जोगीड़ा’ गीत में भी कुँअर सिंह की वीर-गाथा का उत्साहवर्धक उल्लेख है, ‘‘बगसर में अब चले कुँअर सिंह, पटना जाकर ठीक। पटना में मजिस्टर बोले, करो कुँअर को ठीक। पटना अतना बात जो सुनलें कुँअर सिंह, बँगला देले फुँकवाई। गली-गली मजिस्टर रोव, लाट गए घबराई।’’ ‘चैता’ गीत में भी कुँअर की वीरता का अद्भुत बखान है, ‘‘आहे, बाबू हो कुँअर सिंह गदर मचावे, ए रामा गाँवा-गाई। गँवा-गँवा नेवता पठावे ए रामा गँवा-गाई।’’ तथा ‘‘कुँअर के लड़इया लड़े जाइब हो रामा, आरा नगरिया।’’ ‘बिरहा गीत’ में भी अस्सी वर्षीय बाबू कुँअर की वीरता का गायन आज भी रोंगटे खड़ा कर देता है—‘‘बबुआ ओहि दिन दादा लेले, तरूअरिया हो ना। बबुआ असी हो बरिस के उमिरिया हो ना। बबुआ थर-थर काँपे जेकर मुडि़या हो ना/ बबुआ बकुला के पाँख अस केसिया हो ना।’’ पचरा-शैली के गायन में भी बाबू कुँअर सिंह की अस्सी वर्ष में जगी जवानी का उल्लेख अत्यंत प्रेरणादायी है—‘‘धन भोजपुर, धन भोजपुरिया पानी/असियो बरिस में जहाँ आवेला जवानी/जेकर अस्सी बरिस में लवटल बा जवनियाँ/कहनियाँ बाबू कुँअर के सुनीं।’’ एक धोबी गीत में कुँअर सिंह द्वारा लौह वस्त्र सिलवाने का उल्लेख मिलता है—‘‘बाबू कुँअर सिंह पछिम से जब पाँयत कइलीं/पवना में डेरा गिरवलीं ना। लोहा के जामा सिअवलीं कुँअर सिंह तम्मन बंद लगवलीं ना।’’ शिशु-जन्म के समय होनेवाले पँवरिया नृत्य के अवसर पर पँवरिया द्वारा गाए जानेवाले गीत में भी कुँअर की वीरता का विस्तृत और अनुपम उल्लेख है—‘‘भर भोजपुर में कुँअर बिरजलें, रीवाँ रहल सरनिया नूँ/हाट-बजरिया कवन विसारे, के कहल सब गुनवा नूँ/बेतिया अवरू दरभंगा बाड़े, अउर बाड़े टेकारी नूँ/जयपुर-जोधपुर दूर बसेलें, छोटे राजा मझउली नूँ/भोजपुर में डुमराँव बसेले, ऊहो बाड़े फिरंगिये नूँ/सबे बिसेन मिली घुस लुकइलें, बाबू पड़ले अकेले नूँ/जल्दी-से-जल्दी कागज मँगाव, जल्दी पूरजा लिखाय नूँ/परयाग जी में उतरे सिपहिया, सबके कुरसी दिहलसि नूँ/उहाँ से चिट््ठी जगदीशपुर अइलें, सुन ल अमर सिंह भाई नूँ/पतिया देखि अमर सिंह रोअलें, छाती मुक्का मरलनि नूँ/होके सवार कुँअर अमर सिंह, बिज्जू घोड़ा कसवलनि नूँ/ऊहाँ से डेरा टेकारी में राखल, रानी अकेले बेचारी नूँ/बाबू साहेब गुनावन करीला, अब का करीं अमर सिंह नूँ।’’

मल्लाह लोग भी उनका कीर्ति-गायन मानर-शैली में करते हैं—‘‘घोड़वा चढ़ल जब चललन कुँअर सिंह हो बाबू, धरती पर मचल हो कुलेल/ मोंछ के उठान देख ताना मारे घोड़वा, खेलेला जवनिया गुलेल/ जबहिं कुँअर सिंह तनलें लगमियाँ, घोड़ा उड़ी चललन आकास/फर-फर उड़इत विजय के पतखवा, झनर-झनर बाजे तरूआर/कंकरी-अस फाटे अँगरेज के करेजवा, बाबू हो कुँअर सिंह के बार/पीछे-पीछे चलइन हजारो-लाखों सेनमा, दुसमन के लागेला पिआस।’’

दिन भर की खेती-बारी से निबटने के बाद रात में ढोल-झाल पर पद्यात्मक कथा सुनने की परंपरा भोजपुर क्षेत्र में रही है। एक कथा-गीत ‘पँवारा’ में कुँअर सिंह की शौर्य-गाथा का उल्लेख इस प्रकार है, ‘‘गंगा माता, गंगा देवी, गंगा सरन तोहार/सात तरी हेल कर गंगा, तू बड़ी संसार/हूकुम दीन का ऐसा होय, एक दिन दुनिया पैदा होय/ जनम युग लिये न कोई, हँसि-खेलि के माटी होय/कौन-कौन बाबू बाँधे तरूआर, श्रीकिसुन सिंहवाले नाम/दरभंजन सिंह वाके नाम, कुँअर सिंह बाँधे तरूआर/अँगरेज के देहिया देव उड़ाय, इतना बात लाट सुना...भोजपुर मानी बाबू है, हन-हन तेगा मारता है/सोन नदी में धोता है, विक्टोरिया को मेरा सलाम।’’

विभिन्न प्राकृतिक गीतों में भी कुँअर सिंह के शौर्य और पराक्रम का बड़ा मार्मिक उल्लेख मिलता है। ‘कजरी’ धुन में भी कायरपन छोड़ युद्ध के मैदान में कुँवर सिंह का साथ देने के लिए अपने प्रियतम को प्रेरित करती एक वीरांगना कहती है—‘‘जाहु-जाहु पिया तूँ कुँअर के लड़इया में, छोड़ी देहु अब कदरइयो, हे हरि/होके मरद मरदानी देखाव, अब देसबा में होखता लड़इया, हे हरि/नाहीं त समर छोड़ घर में बइठ जाहु, औरत के पहिर लुगरिया, हे हरि/पहिर के साड़ी-चूड़ी मुँहवाँ छिपाई लेहु, नाहीं त रन में लड़इया, हे हरि।’’

खेल-गीतों में भी कुँअर सिंह की मर्दानगी को याद करते आम जन अपना जोश बढ़ाते दिखते हैं। एक कबड्डी-गीत भोजपुर क्षेत्र  में खूब प्रचलित है—‘‘चल कबड्डी आरा। संतावन गोली मारा/मारा, मारा-मारा।’’ चिक्का खेलने के दौरान भी लोग बोलते गाते हैं, ‘‘बाँसे फराठी/बाबू कुँअर सिंह के लाठी/झनाझन तरूआर/झनाझन तरूआर।’’

लोकगीतों और लोकगाथाओं में कुँअर सिंह से संबंधित विभिन्न गीत तो मिलते ही हैं, भोजपुरी शिष्ट साहित्य में भी कुँअर सिंह पर कई प्रबंध काव्य, नाट्य रचनाएँ और स्वतंत्र कविताएँ देखने को मिलती हैं।

कुँअर सिंह के ही समकालीन हथुआराज के राजकवि तोफा राय ने घनाक्षरी के पचास छंदों में ‘कुँअर पचासा’ की रचना की, जिसमें वीर काव्य के अनुकूल वर्ण-विन्यास, रस-विधान और काव्य-सौष्ठव देखते ही बनता है। ‘कुँअर पचासा’ में बीबीगंज (शाहाबाद) की लड़ाई का वर्णन है। कुँअर सिंह की वीरतापूर्ण विजय-कथा के साथ-साथ उनके युद्ध-कौशल और शौर्य का भी वर्णन अत्यंत उत्कृष्ट बन पड़ा है। यथा ‘‘एक-एक पेड़ पीछे एक-एक वीर जवान, तेज संगीन खाड़ा गही छिपी बइठल नूँ/दन्न-दन्न गोली चले, तोप धाँय-धाँय, झमझम मेघ करै लौका घहरि लौकल नूँ/...झूमत कुँअर बाँका वीर रन बीच जैसे, हाथी-दल कोपी सिंह फाँदी पइठल नूँ।’’

बाबू कुँअर सिंह के राज्याश्रित कवि रामकवि ने भी कुँअर सिंह के पराक्रम का बड़ा विशद वर्णन किया है। कुँअर सिंह के समकालीन होने की वजह इनकी रचनाओं में कथ्य की मौलिकता तो है ही, काव्य की रुचिरता भी है—‘‘जैसे मृगराज-गजराजन कै झुंडन पै प्रबल प्रचंड सूँड़ खंडत उदंड है/जैसे बाजि लपकि लपेट के लवान दल, दलमल डारत प्रचारत विहंड है/कहै रामकवि जैसे गरुड़ गरब, गहि अहि कुल दंडि-दंडि मेटत घमंड है/तैसे ही कुँअर सिंह कीरति अमर मंडि, फौज फिरंगानी की करि सु खंड-खंड है।’’

‘कुँअर विजयमल’ भी बहुत प्रसिद्ध गाथा-काव्य है। इसका समय भी ‘सोरठी बृजभान’ के बाद का है। डॉ. ग्रियर्सन ने इसको ११३८ पंक्तियों में ‘जर्नल ऑफ  द एसियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल’ (भाग-१, संख्या-१, सन् १८८४) के ६४-६५ पृष्ठों पर छपवाया है। यह शाहाबाद (बिहार) से प्राप्त पाठ था। इसकी पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं—‘‘रामा उहाँ सूबा साजेले फउदिया हो ना/रामा धुरिया लागेला असमनवा हो ना/रामा जवा बाजे जुझरवा हो ना/रामा बोलि उठे देबी दुरगवा हो ना/कुँअर इहे हवे मानिक पलटनिया हो ना/रामा घेरि लिहले सभ फउदिया हो ना/रामा बाजि गइले लोहवा जुझारवा हो ना/रामा मारे लागल कुँअर विजइया हो ना/रामा देबी दुरूगा कइलीं छतरछहिया हो ना/रामा बाचि गइले राजा मानिकचंदवा हो ना/रामा उनहके नाक काटि घलले हो ना/रामा उन्हके बहिया काटि घलले हो ना/रामा बाँधि देले घोड़ा के पिछडि़या हो ना/रामा चलि गइले राजा मानिकचंदवा हो ना।

वीर कुँअर सिंह को चरितनायक बनाकर भोजपुरी काव्य में प्रबंध काव्यों एवं नाट््य-ग्रंथों की भी रचना हुई है। श्री कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’ का खंडकाव्य ‘वीर बाबू कुँअर सिंह’, हरेंद्रदेव नारायण का महाकाव्य ‘कुँअर सिंह’, चंद्रशेखर मिश्र का महाकाव्य ‘कुँअर सिंह’, सर्वदेव तिवारी ‘राकेश’ का महाकाव्य ‘कालजयी कुँअर सिंह’, हीरा प्रसाद ठाकुर के काव्यग्रंथ ‘वीर कुँवर सिंह’, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह नाथ की नाट्य-रचना ‘बाबू कुँअर सिंह’ आदि कृतियाँ भोजपुरी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। भोजपुरी साहित्य में जितना बाबू कुँअर सिंह पर लिखा गया है, उतना किसी भी अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर नहीं रचा गया। सन् १९५७ में प्रकाशित हरेंद्र देव नारायण का महाकाव्य ‘कुँवर सिंह’ महाकाव्यीय निकष पर एक अत्यंत सफल रचना है। इस लोकप्रिय महाकाव्य के द्वितीय सर्ग की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं—‘‘हड्डी ठोस पेसानी दमकत पुष्ट वृषभ कंधा बा/अस्सी के बा उमर भइल, का कहे बूढ़-अंधा बा/सिंह चलन, रवि जलत नयन, जुग सुगठित चंड भुजा बा/अइसन डोलेला जइसे, डोलेला विजय-पताका।’’

पं. कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’ के खंड काव्य ‘वीर बाबू कुँअर सिंह’ में कुँअर सिंह का अंग्रेजों के प्रति रोष देखने लायक है, ‘‘जागल जोश-रोष बाबू का/जमल लहू गरमाइल रे/अँखियन से बरिसल अँगार/मुँह पर खुनवाँ बढि़आइल रे।’’ पं. चंद्रशेखर मिश्र रचित ‘कुँअर सिंह’ भोजपुरी का गौरव-ग्रंथ है। अनुपम भाव-सौंदर्य और काव्य-कला की दृष्टि से सौष्ठवपूर्ण इस कृति को हिंदी के किसी भी उत्कृष्ट महाकाव्य के समतुल्य विवेचित किया जा सकता है। कुँवर सिंह की वीरता और प्रताप का उल्लेख करते हुए चंद्रशेखरजी की पंक्तियाँ हैं—‘‘शेष परान रहा जबलें किछु, लालि रही लोहुआ कतरे में/मैल न लागन बाप की पाग, न माई के दाग लागल अँचरे में/काहे ना भाई गुमान करई, छिपलै अस लाल जहाँ कचरे में/झूमत बा इतिहास जहाँ, तँह कइसे भूगोल रहे खतरे में।’’

कुँअर सिंह के राज में गाँवों में चूडि़हारिनों का आना बंद हो गया है। नई चूडि़याँ बहुओं ने पहनना छोड़ दिया है। कवि-कल्पना की यह उड़ान चंद्रशेखरजी की मौलिक उद््भावना है, जहाँ काव्योत्कर्ष अद्वितीय है—‘‘नेवता बलि बेदी-क छोडि़ के, औरन कऽ कबहूँ यहँ आवत नाहीं/मारू-जुझारू बजइँ बजना, केउ दूसर राग बजावत नाहीं/ छोडि़ के बीर भरी कविता-रस दूसर में केहु गावत नाहीं/ छूरी-कटारी बिकइँ सगरउँ चुरिहारिनि गाउँ में आवत नाहीं।’’

अपनी आहत भुजा को बाबू कुँअर सिंह ने अपनी ही तलवार से भंजित कर माँ गंगा को समर्पित कर दिया था। इस मार्मिक प्रसंग का चंद्रशेखरजी की लेखनी ने अद््भुत वर्णन किया है—‘‘छाँटलि बाँह गिरी छपसे, किछु दूरी बनी तब लाल निसानी/भोजपुरी भुइयाँ हुलसी, कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी/भागीरथी से कहइ धरती, जब लेइ लहरा नदिया इतिरानी/बोलऽ ई नीर तोहार हउ कि, हमरे बेटवा के कटार क पानी?’’

सर्वदेव तिवारी राकेश का महाकाव्य ‘कालजयी कुँअर सिंह’ भोजपुरी प्रबंध काव्यों की परंपरा में एक ‘मील का पत्थर’ माना जाता है। इसकी पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं—‘‘भेदिन भेदले माई के खोजले, सोझले गोरन संग लड़ाई/ठीक बुझाइ, कि कुँवर आइल, लाल कपीस के भेख बनाई।’’ कुँअर सिंह में यहाँ भगवान् बजरंगबली की छवि देखी गई है।

बाबू कुँवर सिंह और अंग्रेजों के युद्ध को कवि राकेश ने जिस ओज और तेज के साथ वर्णित किया है, उसमें आलंकारिकता एवं ध्वनि काव्य की अपूर्व छटा देखते ही बनती है, ‘‘खंड गिरे, मुंड गिरे, झुंड-झुंड तुंड गिरे/कुंड भरे रक्त के प्रचंड चंड जारी बा/खंड-खंड भंड-महामंड हंड-दंड परे/भ्‍ाड्ड-भ्‍ाड्ड फटफटात तोबन के लारी बा।’’ हीरा प्रसाद ठाकुर के काव्य-ग्रंथ ‘वीर कुँवर सिंह’ में कुँवर सिंह की वीरता का बखान इन शब्दों में किया गया है—‘‘लह-लह धरती खूब अघइली/भइल सोर जोरे मयदान/रहे तेइस अप्रील महीना/विजय पताका उड़े असमान।’’ भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’ के अप्रकाशित महाकाव्य के कुछ अंश ‘कुँअर बावनी’ के नाम से प्रकाशित हुए हैं, जिससे भोजपुरी वीर काव्य की परंपरा समृद्ध हुई है। उनके काव्य-ग्रंथ की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं—‘‘ओरे माई-लॉड कहि गोरन के गोड़ छूटे/भागे भहरात छछनत लेले के/जीभ अस काल के निकलि करे लप्प-लप्प/छप्प-छप्प छाँटि छीटे रन में फिरंगी के।’’

कुँअर सिंह पर रामाकांत द्विवेदी ‘रमता’ की भी रचना उत्कृष्ट काव्य का नमूना है—‘‘झाँझर भारत के नइया खेवनहार कुँअर सिंह/आजादी के सपना के सिरिजनहार कुँअर सिंह/रहे मोछ ना ऊ बरछी के नोख रहे रे/तरूआरे अइसन, तेगा अइसन चोख रहे रे/कसल सोटा अइसन देह मनसोख रहे रे/अइसन वीर जनमावल धनि कोख रहे रे/ओह बुढ़ारी में जवानी के उभार कुँअर सिंह/अलबेला रे बछेड़ा असवार कुँअर सिंह/अस्सी बरिस के भोजपुरी चमत्कार कुँअर सिंह/लक्ष्मीबाई-तँतिया-नाना के इयार कुँअर सिंह।’’

सन् १९८२ में रचित डॉ. प्रभाकर पाठक का खंड काव्य, ‘वीर कुँअर सिंह’ सर्गों में निबद्ध प्रबंधकाव्यीय गरिमा से परिपूर्ण है। इस कृति का अब तक प्रकाशित नहीं हो पाना, भोजपुरी काव्य-जगत् के लिए विस्मयकारी है। कुँअर सिंह की घमासान लड़ाई का वर्णन डॉ. पाठक की पंक्तियों में काव्यात्मक सौंदर्य की दृष्टि से भी अप्रतिम है, ‘‘बढ़ले कुँअर तेरूआर लेके आपन हो/धरती से सरग ले जोन्हिया छिंटइले/चमकल बिजुरी कि लावका लउकले हो/हाय दुसमन लोग के अँखिया मुंदइले/अगिया बरल कि जरल दुपहिरया हो/लुहिया लागल अँगरेज थहरइले/जोन्हिया, बिजुरिया, अगिनिया के साथ देखी/देखी तेरूआर दुसमन घबरइले।’’ इनके अतिरिक्त महेंद्र शास्त्री, श्यामजी सिंह मधुप, हरिहर सिंह, राजनाथ पाठक प्रणयी, सत्यनारायण लाल, अविनाश चंद्र विद्यार्थी सहित अन्य कई कवियों ने कुँवर सिंह पर बड़ी धारदार कविताएँ लिखी हैं।

कुँअर सिंह भोजपुरी क्षेत्र के ऐसे काव्य-नायक रहे हैं, जिनका उदात्त चरित्र कवियों और लोकगीतों में पूरी गरिमा में अभिव्यंजित हुआ है। भोजपुरी काव्य में कुँअर सिंह पर जितने काव्य-ग्रंथ, लोकगीत, कविताएँ व गीत, नाट्य, रचनाएँ आदि उपलब्ध हैं, उतनी शायद ही किसी लोकभाषा के काव्य में उनके किसी महानायक पर लिखी गई होंगी। लोकभाषा भोजपुरी में वीरकाव्य की जो परंपरा है, उसे इसके लोकगीतों और शिष्ट साहित्य, दोनों ने पर्याप्त रूप से प्रतिष्ठित और गौरवान्वित किया है। कुँअर सिंह भोजपुरी क्षेत्र के ही नहीं, सन् १८५७ के स्वतंत्रता-संग्राम के ऐसे वीर-बाँकुरे रहे हैं, जिन्हें भारतीय इतिहास में और अधिक समादर और गौरव मिलना चाहिए था। भोजपुरी लोकभाषा और साहित्य के साथ-साथ, इस क्षेत्र के महापुरुषों एवं व्यक्तित्वों को पर्याप्त ख्याति और प्रतिष्ठा मिल सके, इसके लिए इस क्षेत्र की विरासतों, सांस्कृतिक परंपराआें, सकारात्मक प्रतिरोधी क्षमताओं, संघर्षों आदि का पुनर्मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है। स्वतंत्रता-संग्राम में बाबू कुँअर सिंह के योगदान का अध्ययन एक ऐसा सार्थक प्रयत्न है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि भोजपुरी क्षेत्र की व्यापक स्वातंत्र्य-चेतना सामाजिक दृष्टि से भी जाति, धर्म एवं लिंग आदि के समस्त विभेदों से ऊपर उठकर कितनी समरस, समतामूलक और प्रगतिशील रूप में संचरित हुई है।

जी-३, ऑफिसर्स फ्लैट,
भारतीय स्टेट बैंक के समीप,
न्यू पुनाई चक, पटना-८०००२३
दूरभाष: ०९४३१२८३५९६
—सुनील कुमार पाठक

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