मेरी चार धाम यात्रा

मेरी चार धाम यात्रा

चार धाम यात्रा के नाम से मन बहुत उत्साहित हो गया था, जब हमारे परिवार के लोगों ने गरमियों की छुट्टियों में जाने का निश्चय किया। जब चार धाम यात्रा की बात होती है तो भारत के चारों सीमा क्षेत्र परम पावन तीर्थ श्रीबदरीनाथ, उत्तर में हिमालय शृंखला की चोटी, फिर पश्चिम में अरब सागर के निकट पूजनीय मंदिर श्रीद्वारकाधीशजी, उसके बाद धुर दक्षिण में हिंद महासागर के निकट परम पूज्य रामेश्वरम् और पूर्व में बंगाल सागर के निकट श्रीजगन्नाथपुरी के नाम लिये जाते हैं। हमारे ऋषियों, तपस्वियों एवं मनीषियों ने चार और धाम भी जोड़ दिए। उन्हें भी हम भारतीय चार धाम की यात्रा एवं धार्मिक आस्था के तीर्थ मानते हैं और ये चारों धाम हिमालय पर्वत के उत्तर में स्थित हैं। ये चार धाम हैं—बदरीनाथ, श्रीकेदारनाथ, जमुना का उद्गम स्थल जमुनोत्तरी या यमुनोत्तरी और पावन गंगा नदी का गोमुख या उद्गम स्थल गंगोत्तरी। इन चारों धामों की यात्रा जितना पुण्य देती है, उतनी ही प्रकृति सौंदर्य का आनंद भी। मन को लुभानेवाले दृश्य सभी का मन मोह लेते हैं। इन धामों के दर्शन बडे़ भाग्यशाली लोगों को ही होते हैं।

हम लोग दक्षिण भारत में रहते हैं और पहाड़ों पर जाने का यह पहला ही अवसर था। मैं और मेरे पति को पहाड़ों पर जाने के लिए कुछ दिन पहले पैदल चलने का अभ्यास शुरू करना पड़ा था। वहाँ जाने से पहले हम लोगों ने गरम कपडे़, दस्ताने, मफलर, टोपी आदि खरीदे। हमारे साथ मेरी नंद-ननदोई, जेठानी आदि भी गए थे। हम लोग विद्यानगर तौरंगलू, जिला बल्लारी में रहते हैं। वहाँ अभी नया एयरपोर्ट बना है। एक फ्लाइट हैदराबाद से विद्यानगर, फिर विद्यानगर से बंगलौर जाती है, वही फ्लाइट फिर लौटकर विद्यानगर होती हुई हैदराबाद जाती है। मैं और मेरे पति श्री श्रीनिवासजी २५ अप्रैल, २०१८ को जिंदल एयरपोर्ट से दोपहर दो बजे सुपरजेट हवाई जहाज से बंगलौर के लिए रवाना हुए। लगभग एक घंटे में बंगलौर के एयरपोर्ट पर हम लोग पहुँच गए थे। हमारी फ्लाइट २६ अप्रैल को सुबह बंगलौर से दिल्ली के लिए थी। हम लोग बंगलौर में अपनी छोटी पुत्री संध्या के घर ठहरे।

२६ अप्रैल को सुबह हम लोग बंगलौर एयरपोर्ट पहुँचे, वहाँ पर मैं, जेठानी, दो ननदें व जीजाजी (ननदोई) तथा उनके छोटे भाई एवं उनकी पत्नी भी पहुँच गए थे। इस तीर्थयात्रा में हम कुल आठ व्यक्ति थे। हमारी यह बंगलौर से दिल्ली की फ्लाइट ९ः२० बजे की थी। हम लोग दिल्ली एयरपोर्ट १२ः३० बजे पहुँच गए थे। दिल्ली से हरिद्वार शताब्दी एक्सप्रेस से रात ८ बजे पहुँचे। दो इनोवा गाड़ी से हम होटल आ गए, जो पहले से आरक्षित करवाए थे। रात का खाना खाए और सो गए।

२७ अप्रैल को सुबह हम सब तैयार होकर ‘हरकी पौड़ी’ गंगा-स्नान के लिए निकल पडे़। गंगा नदी कल-कल करती स्वच्छ एवं पवित्र जल से बह रही थी। पानी बहुत ठंडा था; हमने भगवान् का नाम लेकर उसमें डुबकी लगाई। परिवार के लोगों के नाम से भी डुबकी लगाई। हम महिलाओं ने आरती की तथा मंदिरों के दर्शन किए। शिव-पार्वती मंदिर के भी दर्शन किए, उसके बाद भारत माता मंदिर देखा, जो सात मंजिला है। एक-एक मंजिल पर अलग-अलग धर्म के देवी-देवता तथा संत-महापुरुषों की मूर्तियाँ हैं।

दोपहर में भोजन किया व थोड़ा-बहुत जो वहाँ मिलता था, खरीदा भी। शाम को उड़न-खटोले से मनसा देवी व चामुंडा देवी के दर्शन करने गए। रात को बड़ी ही मनमोहक ‘हरकी पौड़ी’ पर गंगाजी की आरती का आनंद लिया। हरकी पौड़ी पर हम लोगों ने पंडितों के माध्यम से अपने पूर्वजों का तर्पण भी किया।

२८ अप्रैल को श्रीबदरीनाथ धाम की यात्रा के लिए टे्रवल एजेंट के द्वारा हमने बड़ी गाड़ी टाटा ट्रेवलर का प्रबंध कर लिया था। यात्रा आरंभ करने से पहले ड्राइवर ने हमें कहा कि माया देवी मंदिर के दर्शन करने चाहिए। उसने हमें दर्शन कराए व एक नारियल चढ़ाया। यात्रा प्रारंभ हुई गाड़ी का ए.सी. खराब था तथा गाड़ी में कुछ खराबी भी थी। ऋषिकेश पहुँचकर हमें पंजाब के रजिस्टे्रशन की गाड़ी लेनी पड़ी। इस ड्राइवर का नाम नीटू था। यह समझदार टैक्सी ड्राइवर था। हम रात के ९ बजे देहरादून-मसूरी होते हुए बड़कोट पहुँच गए। यहाँ हम लोग होटल में रुके, जो पहले से टे्रवल एजेंट के द्वारा बुक था। यहाँ रात को आराम किया।

२९ अप्रैल को सुबह जल्दी ही हम लोग यमुनोत्तरी के लिए निकले। पहाड़ों की वादियों में हमारी गाड़ी साँप जैसे घुमावदार रास्तों पर चल रही थी। चारों ओर के दृश्य बहुत आकर्षक लग रहे थे। प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद हम ले ही रहे थे कि अचानक हमारी गाड़ी रुक गई। पता चला कि रात को बारिश होने के कारण भू-स्खलन हुआ और यात्रा में रुकावट आ गई थी। सड़क से पत्थर साफ करने-हटाने में लोग लगे हुए थे। हमें वहाँ आधा घंटा ही रुकना पड़ा। रास्ता बहुत सुंदर लग रहा था, अलग-अलग तरह के पहाड़ तथा नीचे नदी बह रही थी। बादलों में आँख-मिचौनी खेलते पहाड़ और देवदार के पेड़ों की हरियाली ने सफर बड़ा सुहाना बना दिया था। दो घंटे की यात्रा के बाद ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी, क्योंकि उसके बाद की यात्रा पालकी, पिट्ठू या घोडे़ पर करनी थी। छह किलोमीटर हम लोग पालकी में बैठकर गए। पालकी के ऊपर बैठकर जाना अच्छा तो नहीं लगता, क्योंकि वहाँ के पहाड़ी लोग अपनी जीविका चलाने के लिए ही पालकी हमारे बोझ के साथ उठाते हैं। एक पालकी का किराया हमें चार से साढे़ चार हजार रुपए देना पड़ा था। वे बडे़ मेहनती लोग हैं। हम लोग पालकियों में बैठकर प्रकृति का आनंद ले रहे थे। धीरे-धीरे पहाडि़याँ सीधी ऊँची हो रही थीं, हमें डर लग रहा था। नीचे देखते तो दिल काँप उठता था। पालकीवाले आगे-पीछे होते रहते थे। इन पालकीवालों के पास अपने आई.डी. कार्ड थे, इसलिए हमें इन पर विश्वास भी था। पहाड़ी रास्तों पर पल-पल पर कुछ-न-कुछ नया देखने को मिलता था। वहाँ स्वच्छ-निर्मल यमुना नदी के भी दर्शन होते रहे। बीच-बीच में हमें पैदल भी चलना पड़ा, साँस फूल जाती थी। पालकी उठानेवालों में बड़ा धैर्य-साहस होता है। उनके प्रति हमें दया आती थी, उन्हें नमन करने का मन होता था।

जब हम लोगों की पालकी एक-दूसरे से अलग हो जाती तो डर भी लगने लगता था। वहाँ के ताल कुंड में स्नान करने का मन भी किया, पर केवल उसके जल से हमने अपने ऊपर कुछ छींटे मारे। कुंड में चावल पकाए। गंगा माता और यमुना मैया की मूर्ति के आगे शीश नवाए, पूजा-अर्चना की। यमुना नदी का उद्गम बहुत रोमांचित करनेवाला था। पालकीवाले ने कहा कि यहाँ रोज एक से दो बजे के लगभग वर्षा होती है, ईश्वर की कृपा है। बस फिर वर्षा प्रारंभ हो गई। हमने रेनकोट खरीदे। वहाँ खाना खाया और उसके बाद पालकी में बैठकर नीचे उतरने लगे। रास्ते में देखा कि घोड़ों पर अधिक लोग यात्रा कर रहे थे, डर लग रहा था कि कोई घोड़ा टक्कर न मार दे। हम लोग सुरक्षित नीचे आ गए। हम लोग इस यात्रा में चित्र भी खींचते रहे और बड़कोट आ गए, रात का भोजन करके अपने होटल में विश्राम किया।

३० अप्रैल को हम लोग तैयार होकर अपनी टैक्सी से उत्तरकाशी के लिए निकले। यह रास्ता भी बड़ा रमणीय था। ऊँची-ऊँची पहाडि़याँ, उनसे निकलते छोटे-बडे़ झरनों की मधुर आवाज मन को मोह रही थी। बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ मन गद्गद हो गया था। दोपहर एक बजे हम लोग उत्तरकाशी के होटल ग्रेट गंगा पहुँच गए थे। होटल के पीछे गंगा नदी अपनी तेज धारा के साथ, संगीतमय आवाज के साथ बह रही थी। हम लोगों ने दोपहर का खाना खाकर विश्राम किया।

एक मई की सुबह हम लोगों ने गंगोत्तरी के लिए प्रस्थान किया। हिमालय पर्वत की घुमावदार सर्पीली सड़कों पर हमारी टैक्सी चली जा रही थी। रास्ते में पाइन के वृक्ष तथा रंग-बिरंगे फूलों की छटा मन को मोह रही थी। गंगोत्तरी के तट से एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था। मेरी जेठानी के लिए व्हील चेयर ले ली गई थी। रास्ते में लोग जड़ी-बूटियाँ, रुद्राक्ष की मालाएँ आदि बेच रहे थे। हमने वहाँ कुछ खरीदा नहीं, बस पूजा-अर्चना का सामान खरीदा। गंगाजल के लिए कलश खरीदे।

गंगा कोई साधारण नदी नहीं है। वेदों से लेकर वेदव्यास तक, वाल्मीकि से लेकर आधुनिक कवियों और साहित्यकारों ने इसका गुणगान किया है। इसका भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है। शास्त्रों ने इसे एक स्थावर, सुगम नित्य तीर्थ कहा है। वेदों और पुराणों में गंगा को बार-बार तीर्थमयी कहा गया है। महाभारत में कहा गया है कि गंगा अपना नाम उच्चारण करनेवाले के पापों का नाश करती है। दर्शन करनेवालों का कल्याण करती है तथा स्नान-पान करनेवालों की सात पीढि़याँ तक पवित्र हो जाती हैं। इसके लिए भगीरथ ने बहुत तप किया था। गंगा माँ के दर्शन गंगोत्तरी जाकर करने का सौभाग्य हमें मिला। हमने गंगाजी के तट पर बैठकर विधि-विधान से पंडित द्वारा पूजन किया। वहाँ पंडितजी ने पितृ तर्पण कराया। वहाँ गंगाजी में स्नान करने का मन था, परंतु रात को बारिश के कारण ऊपर ग्लेशियर टूट गया था, जिससे पानी में रेत अधिक थी। हम लोगों ने वहाँ के सुंदर चित्र अपने मोबाइल कैमरों से लिये। सभी स्थानों पर शिव-पार्वती, हनुमानजी की मूर्तियाँ थीं। वहाँ हमने अपने कलश में गंगाजल भरा। वहाँ प्राकृतिक सौंदर्य तो था ही, साथ में स्वच्छता भी थी। कहीं कोई प्रदूषण नहीं था। जनता के लिए सुलभ शौचालय बना हुआ था।

दो मई को हमने गुप्तकाशी के लिए यात्रा शुरू की। यह यात्रा ८-१० घंटे की थी। हम लोग रास्ते भर अंताक्षरी का खेल, गाने गाते, भगवान् के भजन गाते हुए सफर का आनंद ले रहे थे। पहाड़ी रास्तों का सफर, फिर घनघोर घटाएँ, हलकी और कभी तेज बारिश में आनंद आ रहा था। हम गुप्तकाशी पहुँच गए। वहाँ हमारे टे्रवल एजेंट शास्त्रीजी ने पहाड़ी जगह पर कैंप होटल का प्रबंध किया था। हम सभी लोग बड़ी आयु के व कुछ बुजुर्ग भी थे, लगा कि यहाँ ठंड में कैसे रुका जाएगा। जब हम लोग कमरों में गए तो देखा कि वहाँ सब व्यवस्थित था, उस होटल का एक दिन पहले ही उद्घाटन हुआ था। वहाँ गरम पानी, बाथरूम आदि की अच्छी व्यवस्था थी। रात को खाना खाकर स्वेटर-मोजे आदि पहनकर सो गए। सुबह उठकर बाहर देखा तो बहुत ही सुंदर दृश्य था पहाड़ों का, उसे देखकर दाँतों तले उँगली दबा ली। इतनी सुंदरता की कभी कल्पना ही नहीं की थी। लोग विदेशों में घूमने जाते हैं, जबकि भारतवर्ष के पहाड़ कितने सुंदर हैं।

तीन मई को हम लोग सुबह ५ बजे केदारनाथ भगवान् के दर्शन के लिए निकल पडे़। वहाँ जाने के लिए हम लोगों ने हेलीकॉप्टर से यात्रा की। इसके लिए हम लोग निर्धारित स्थान हेलीपैड ग्लोबल पर गए। टिकट पहले से आरक्षित करा ली थी। इस यात्रा के लिए पास लेने होते हैं, इसकी लंबी लाइन थी और सबका वजन होना था, क्योंकि हेलीकॉप्टर में पाँच व्यक्ति ही बैठ सकते हैं। वजन के अनुसार हम लोग तीन समूहों में बँट गए। हम लोगों का नंबर आने में समय था। हमें भूख लगने लगी, हमारे साथ जो कुछ खाने-पीने का सामान था, वह खाया। जब तक हम अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहे, हम लोगों ने हेलीकॉप्टर टेकऑफ और लैंड करने के चित्र लिये। जो यात्री केदारनाथजी के दर्शन करके आते तो उनसे पूछते कि कैसा है वहाँ का मौसम? दर्शन कैसे हुए? हम लोग उनसे ऐसे पूछ रहे थे, जैसे वे कोई इंटरव्यू देकर लौटे हों। उन्होंने बताया कि ठंड बहुत है। इंतजार समाप्त हुआ, हमारा नंबर भी आ गया। हेलीकॉप्टर में सफर करने का यह हमारा पहला ही अवसर था। हल लोगों ने प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। ५-१० मिनट में हम लोग महादेवजी की भूमि पर उतर गए। ठंड बहुत थी, दाँत बजने लगे, हड्डियाँ काँपने लगीं, चारों ओर बर्फ-ही-बर्फ थी। हलकी-हलकी बारिश भी हो रही थी। इंद्र भगवान् के पल-पल बदलते रूपों को देखकर दो आँखें भी कम पड़ रही थीं। हेलीपैड से मंदिर तक जाने का सीड़ीनुमा रास्ता एक किलोमीटर था।

हमें जेठानीजी, जो वृद्ध हैं, उनके लिए पिट्ठू करना पड़ा था। चलने में हमारी साँस फूलने लगी थी। साथ में कपूर लाए थे, उसे सूँघा। उससे शक्ति आई। ‘हर-हर महादेव’ बोलते हुए आगे बढे़। पूजा-अर्चना के लिए प्रसाद व फूल आदि लिये और दर्शन के लिए लाइन में लग गए। एक घंटा प्रतीक्षा करने के बाद मंदिर के द्वार पर पहुँचे। वहाँ मन प्रफुल्लित हो गया। मंदिर की भव्यता विशाल लिंग रूपी शिला अवर्णनीय है। वहाँ पंडितजी ने हम दंपती से लिंग अभिषेक करवाया। लिंग के स्पर्श से मन श्रद्धा-भक्ति में नतमस्तक हो गया। साक्षात् प्रभु के दर्शन कर जीवन सार्थक हो गया। मंदिर की परिक्रमा की, वहाँ देखा कि सन् २०१३ में वर्षा के कारण जो बाढ़ आई थी, कि विशाल शिला ने मंदिर की रक्षा की थी। मन रोमांचित हो गया। वहाँ खूब ठंड थी, ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, इसलिए हम लोग एक छोटा ऑक्सीजन का सिलेंडर लेकर चले थे। पर इसकी आवश्यकता नहीं हुई। हम लोग हेलीकॉप्टर से सुरक्षित वापस आ गए, प्रभु की कृपा रही। केदारनाथ सचमुच स्वर्गलोक है, जहाँ देवताओं का वास है।

अगले दिन ४ मई को हम लोग जोशीमठ के लिए चले। रास्ते में चोपाता एक स्थान है, जिसे छोटा स्विट्जरलैंड कहा जाता है। वहाँ गाड़ी रोकी और प्रकृति की सुंदरता का आनंद लिया। वहाँ की घाटियों, पहाडि़यों, झरनों आदि के चित्र अपने कैमरों में कैद किए। भारत के हिमालय पर्वत इतने सुंदर होंगे, सोचा भी न था। शाम ६ बजे हम लोग श्रीबदरीधाम पहुँच गए। वहाँ जिस होटल में हमारे ठहरने का प्रबंध था, अच्छा था। कमरे ऊपर की मंजल में थे, वहाँ लिफ्ट से गए। शाम को नृसिंह देव मंदिर गए। शंकराचार्यजी की समाधि देखी।

पाँच मई की सुबह श्रीबदरीनाथजी मंदिर के दर्शन के लिए निकले। वहाँ ठंड बहुत थी, पर आसमान साफ था। पूजा-अर्चना की सामग्री लेकर हम मंदिर के प्रवेश-द्वार पर आ गए। लगभग डेढ़-दो घंटे में मंदिर के अंदर प्रवेश किया। वहाँ बदरीनारायण की मूर्ति, कुबेरजी की मूर्ति, लक्ष्मीजी की मूर्ति देखकर मन प्रसन्न हो गया। मंदिर की परिक्रमा की, हनुमानजी की मूर्ति को प्रणाम किया। वहाँ प्रसाद लिया व दान-पुण्य किया। वहाँ के पंडों, पुजारियों, गाइडों से श्रीबदरीनाथ धाम के बारे में जानकारी लीं। मंदिर में जो आरती गाई जाती है, वह एक मुसलमान भक्त द्वारा लिखी गई है। हमारे पास समय था, इसलिए हम फिर श्रीबदरीनाथजी के दर्शन करने गए। वहाँ खाना खाकर कुछ खरीदारी की। वहीं एक और दर्शनीय स्थान था—‘माना गाँव’। २-३ किलोमीटर पैदल चलकर उनके दर्शन किए। वहाँ सरस्वती नदी और अलकनंदा का संगम है, जो अलग-अलग रंग की हैं। बहुत अद्भुत दृश्य था। वहाँ सरस्वती लुप्त हो जाती है।

छह मई को हम लोग बदरीधाम से सुबह ७ बजे वापस हरिद्वार के लिए टैक्सी से निकले। ८-१० घंटे की यात्रा कर ऋषिकेश पहुँचे, वहाँ लक्ष्मण झूला देखा। रात ९ बजे हरिद्वार पहुँच होटल में आराम किया। रात को भोजन कर सो गए। सात मई को शताब्दी एक्सप्रेस से हम लोग दिल्ली आ गए। वहाँ से एयरपोर्ट पहुँचे। दिल्ली से हमारी फ्लाइट दोपहर २ बजे की थी। हम शाम ५ बजे बंगलौर पहुँच गए। बंगलौर से मेरी दोनों बेटियाँ भी रात को हंपी एक्सप्रेस से हमारे साथ विद्यानगर तौरंगलू आ गईं। इस तरह आठ तारीख की सुबह हम अपने घर आ गए। ईश्वर को धन्यवाद दिया।

०-१/२ जे.एस.डब्ल्यू. टाऊनशिप
विद्यानगर तौरंगलू
जिला—बल्लारी-५८३२७५ (कर्नाटक)
गुंजन गुप्ता

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