वह शर्त

वह पतझड़ की एक रात थी। बूढ़ा बैंकर अपने स्टडी रूम में तेजी से इधर-उधर घूम रहा था और आज से ठीक पंद्रह वर्ष पहले दी गई एक दावत को याद कर रहा था। उस दावत में शहर के गण्यमान्य व्यक्ति मौजूद थे। उस दावत में अन्य विषयों के साथ-साथ मृत्युदंड पर भी गरमागरम बहस हुई थी। अधिकांश मेहमान, जिनमें बुद्धिजीवी और पत्रकार भी थे, मृत्युदंड पर अपनी असहमति जता रहे थे। उनका मानना था कि सजा के रूप में मृत्युदंड एक क्रिश्चियन राज्य के लिए अनुपयुक्त और अनैतिक है। उनमें से कुछ का विचार था कि मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल देना चाहिए।

‘मैं आपसे सहमत नहीं हूँ,’ मेजबान ने कहा, ‘हालाँकि मेरा अनुभव न तो मृत्युदंड का है और न ही आजीवन कारावास का। लेकिन अगर हम तार्किक दृष्टि से देखें, तो मृत्युदंड कारावास की तुलना में अधिक न्यायसंगत एवं मानवीय है। फाँसी व्यक्ति की जान तुरंत ले लेती है, आजीवन कारावास उसे किश्तों में मारता है। अधिक मानवीय जल्लाद कौन है, वह जो आपका जीवन कुछ ही क्षणों में समाप्त कर देता है या वह जो वर्षों तक आपके जीवन का कुछ हिस्सा लगातार निकालता रहता है?’

‘दोनों ही समान रूप से अनैतिक हैं,’ किसी दूसरे मेहमान ने अपना मत व्यक्त किया, ‘क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही है—जीवन को समाप्त कर देना। राजसत्ता कोई भगवान् नहीं है। उसे यह अधिकार कतई नहीं है कि वह उस वस्तु को छीन ले, जिसे वह चाहे भी तो वापस नहीं दे सकती।’

उस मंडली में एक अधिवक्ता भी था, करीब पच्चीस वर्ष का युवक। जब उसकी राय के बारे में पूछा गया, उसने कहा, ‘मृत्युदंड और आजीवन कारावास समान रूप से अनैतिक हैं; परंतु अगर मुझे किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो निश्चि रूप से मैं आजीवन कारावास को चुनूँगा। कैसे भी हालात में जीवित रहना जीवित नहीं रहने से बेहतर है।’

इस तरह एक रोचक परिचर्चा प्रारंभ हो गई थी। बैंकर ने, जो उस समय नवयुवक था, और कुछ असहिष्णु भी, अचानक आपा खोते हुए टेबल पर मुक्का मारा और अधिवक्ता की ओर पलटकर चिल्लाया, ‘यह झूठ है।’ मैं तुमसे बीस लाख की शर्त लगाता हूँ, तुम जेल की कोठरी में पाँच वर्ष भी नहीं रह पाओगे।’

‘अगर तुम वास्तव में गंभीर हो,’ अधिवक्ता ने उत्तर दिया, ‘तो मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है, और हाँ, मैं पाँच नहीं, पंद्रह वर्ष तक रहूँगा।’

‘पंद्रह! मंजूर है। बैंकर चिल्लाया, ‘महानुभावो, मैं बीस लाख का दाँव लगाता हूँ।’

‘मुझे मंजूर है। तुम बीस लाख का दाँव लगाते हो, और मैं अपनी आजादी का।’ अधिवक्ता ने कहा।

इस तरह एक बेहूदी और हास्यास्पद शर्त लग गई। बैंकर के पास उन दिनों काफी धन-दौलत थी, बिगड़ैल और तुनक-मिजाजी, वह उसी के उन्माद में डूबा हुआ था। रात्रि-भोजन के समय उसने अधिवक्ता से मजाक में कहा, ‘जवान घोड़े, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, जरा होश में आओ। मेरे लिए बीस लाख की रकम कुछ नहीं है, लेकिन तुम अपने जीवन के तीन या चार बेहतरीन वर्ष खो दोगे। तीन या चार वर्ष मैं इसलिए कह रहा हूँ कि इससे अधिक तुम किसी भी हालत में नहीं रह पाओगे। मेरे अभागे मित्र, यह मत भूलो कि स्वेच्छिक कारावास बाध्य-कारावास से अधिक दुखदायी है। तुम्हारे मन में उठता विचार कि तुम जब चाहो मुक्त हो सकते हो, काल-कोठरी के तुम्हारे समस्त जीवन में विष घोल देगा। मुझे तुम पर तरस आता है।’

और अब स्टडी रूम में तेजी से घूमते हुए, बैंकर को यह सब याद आया और उसने स्वयं से पूछा, ‘मैंने यह शर्त क्यों लगाई? इससे क्या हासिल हुआ? अधिवक्ता अपने जीवन के बेशकीमती पंद्रह वर्ष खो रहा है, और इधर मैं बीस लाख गँवा रहा हूँ। क्या यह लोगों को विश्वास दिला पाएगा कि मृत्युदंड आजीवन कारावास से अच्छा है या बुरा? नहीं-नहीं! यह सब बकवास है। एक खाते-पीते अभिमानी व्यक्ति की सनक और एक अधिवक्ता की निरी धन-लोलुपता के सिवाय कुछ नहीं।’

उसे फिर याद किया, जो उस शाम दावत के बाद हुआ था। यह तय हुआ था कि अधिवक्ता को कारावास, बैंकर के बगीचे के पार्श्वभाग में, कड़े-से-कड़े निरीक्षण के तहत भोगना होगा। यह सहमति बनी थी कि कारावास के दौरान वह तय सीमा को लाँघने, लोगों को देखने, मानव-आवाज सुनने और पत्र-पत्रिकाओं-अखबारों को प्राप्त करने के अधिकार से वंचित रहेगा। हाँ, उसे वाद्य यंत्र रखने, पुस्तकें पढ़ने, पत्र लिखने, मदिरा व तंबकू के सेवन की अनुमति थी। अनुबंध के अनुसार वह बाहरी-संसार से संपर्क बनाए रख सकता था, लेकिन मौन रहते हुए, एक खिड़की के जरिये, जो खासतौर पर इस प्रयोजन के लिए बनाई गई थी। खिड़की से एक नोट भेजकर, वह आवश्यकता की सभी वस्तुएँ, पुस्तकें, संगीत के यंत्र, मदिरा आदि प्राप्त कर सकता था। अनुबंध को बहुत ही बारीकी से तैयार किया गया था, जिसने कारावास को पूरी तरह से एकाकी बना दिया था और अधिवक्ता को ठीक पंद्रह वर्ष १४ नवंबर, १८७० के बारह बजे से १४ नवंबर, १८८५ में बारह बजे तक के लिए बाँध दिया था। अनुबंध की शर्तों को भंग करने का उसका कोई भी प्रयास, उसका समय से दो मिनट पहले बाहर निकलना भी बैंकर को उसे बीस लाख देने की बाध्यता से मुक्त कर सकता था।

कारावास के पहले वर्ष में, उसके लिखे छोटे-छोटे नोट्स से जो निष्कर्ष निकला, अधिवक्ता एकाकीपन और उबाऊपन से भयंकर रूप से पीडि़त रहा। बगीचे के पार्श्व भाग से दिन-रात पियानो की आवाज आती। मदिरा और तंबाकू को उसने हाथ नहीं लगाया। ‘मदिरा,’ उसने लिखा, ‘वासनाओं को भड़काती है, और वासनाएँ एक कैदी की प्रमुख शत्रु हैं, साथ ही अच्छी मदिरा अकेले पीने से अधिक उबाऊ कोई और चीज नहीं है,’ और तंबाकू उसके कमरे की दूषित करता है। पहले वर्ष में अधिवक्ता के पास हलकी-फुलकी किस्म की पुस्तकें भेजी गईं; पेचीदा प्रेम-संबंधों के उपन्यास, अपराध व कल्पनालोक की कहानियाँ और हास्य-नाटक इत्यादि।

दूसरे वर्ष में पियानो के स्वर नहीं सुनाई दिए। अधिवक्ता ने केवल क्लासिक्स की माँग की। पाँचवें वर्ष में संगीत के स्वर फिर से सुनाई दिए और कैदी ने मदिरा की माँग की। उस पर नजर रखनेवालों ने बताया कि उस वर्ष वह केवल खाता रहा, पीता रहा और बिस्तर पर लेटा रहा। वह अकसर उबासी लेता और अपने आप पर झल्लाता रहता। पुस्तकें उसने नहीं पढ़ीं। रात को कभी-कभी वह लिखने जरूर बैठ जाता। वह लंबे समय तक लिखता और सुबह सबकुछ फाड़ देता। एक-दो बार उसे रोते हुए भी देखा गया।

छठे वर्ष की दूसरी छमाही में कैदी ने बहुत ही उत्साह के साथ विभिन्न भाषाओं का, दर्शनशास्त्र और इतिहास का अध्ययन प्रारंभ किया। इन विषयों पर गहन अध्ययन की उसकी लालसा के चलते बैंकर को पर्याप्त पुस्तकें जुटाना भी मुश्किल हो गया। चार वर्षों की समयावधि में, उसकी माँग पर करीब छह सौ जिल्दें खरीदी गईं। उसके इस जुनून की समाप्ति के साथ ही बैंकर को कैदी से यह पत्र प्राप्त हुआ, ‘मेरे प्रिय जेलर, मैं इन पंक्तियों को छह भाषाओं में लिख रहा हूँ। उन्हें विशेषज्ञों को दिखाना, वे उन्हें पढ़ें, अगर उन्हें एक भी गलती नहीं मिलती है, तो मैं  तुमसे विनती करता हूँ, तुम बगीचे में बंदूक से गोली चलाने का आदेश देना। गोली की आवाज से मैं समझ जाऊँगा कि मेरे प्रयास व्यर्थ नहीं गए हैं। सभी युगों और देशों की प्रतिभाएँ अलग-अलग भाषाओं में बोलती हैं, परंतु उन सभी के भीतर एक सी ज्योति प्रज्वलित होती है। ओह, काश! तुम मेरे परमानंद को जान पाते कि अब मैं उन्हें समझ सकता हूँ!’ कैदी की माँग पूरी हुई। बैंकर के आदेश पर बगीचे में दो गोलियाँ दागी गईं।

दसवें वर्ष के पश्चात् अधिवक्ता अचल-स्थिर अवस्था में मेज के सामने बैठकर केवल ‘न्यू टेस्टामेंट’ को पढ़ता रहा। बैंकर को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि जिस व्यक्ति ने चार वर्षों में छह सौ से अधिक बहुश्रुत ग्रंथों में प्रवीणता हासिल कर ली थी, उसे लगभग एक वर्ष का समय केवल एक पुस्तक पढ़ने में लगा, जो समझने में आसान थी और मोटी भी नहीं थी। बाद में ‘न्यू टेस्टामेंट’ का स्थान धर्मों के इतिहास और धर्मशास्त्र ने ले लिया।

अंतिम दो वर्षों के उसके कारावास में कैदी ने असाधारण मात्रा में अध्ययन किया, लेकिन बहुत ही अव्यवस्थित रूप से। कभी वह प्राकृत विज्ञान का अध्ययन करता, तो कभी बायरन अथवा शेक्सपियर को पढ़ता। उसके नोट्स आते रहते, जिनमें एक ही साथ रसायनशास्त्र की पुस्तक, चिकित्सा पद्धति की पाठ्य-पुस्तक, उपन्यास और कुछ दर्शन या धर्मशास्त्र पर समीक्षात्मक पुस्तकों की माँग होती। उसने इस तरह से अध्ययन किया, जैसे वह टूटे हुए जहाज के खंडों के साथ समुद्र में तैर रहा था, और अपनी जीवन-रक्षा की अदम्य इच्छा से प्रेरित एक के बाद दूसरा खंड व्यग्रता से पकड़ रहा था।

बूढ़े बैंकर ने यह सब याद किया, और विचार किया, ‘कल बारह बजे उसे अपनी आजादी मिल जाएगी। अनुबंध के अनुसार मुझे उसे बीस लाख देने पड़ेंगे। अगर मैं रकम देता हूँ, तो मेरा सबकुछ समाप्त समझो। मैं हमेशा के लिए तबाह हो जाऊँगा...।’

पंद्रह वर्ष पहले उसके पास करोड़ों की संपत्ति थी, परंतु आज उसे अपने से पूछने में भी डर लगता है कि उसके पास अधिक क्या है—पैसा अथवा कर्ज? स्टॉक मार्केट पर जुआ, जोखिम भरी सट्टेबाजी और लापरवाही, जिनसे  वह इस उम्र में भी छुटकारा नहीं पा सका था, उसके व्यवसाय को धीरे-धीरे चौपट कर दिया था; व्यापार-जगत् का वह साहसी उद्यमी, आत्मविश्वास से भरा हुआ स्वाभिमानी व्यक्ति, एक साधारण सा बैंकर बनकर रह गया था—बाजार के हर उतार-चढ़ाव पर काँपता हुआ।

‘वह अभिशप्त शर्त,’ बूढ़ा व्यक्ति बुदबुदाया, हताशा में अपने माथे को जकड़ते हुए...‘वह व्यक्ति मर क्यों नहीं गया? वह केवल चालीस साल का है। वह मेरी दमड़ी तक ले लेगा, शादी करेगा, जीवन का लुत्फ उठाएगा, एक्सचेंज पर सट्टा लगाएगा और मैं एक ईर्ष्यालु भिखारी की तरह उसे देखूँगा तथा उसके मुँह से हमेशा इन्हीं शब्दों को सुनूँगा, ‘मेरे जीवन की तमाम खुशियों के लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ। मुझे तुम्हारी सहायता करने दो।’ नहीं, नहीं! यह असहनीय है! दिवालियेपन और कलंकित होने से बचने का एक मात्र उपाय है कि उस व्यक्ति को मरना होगा।’

घड़ी ने अभी तीन घंटे बजाए थे। बैंकर सुन रहा था। मकान में सभी सो रहे थे, खिड़की के बाहर केवल बर्फ से ढके पेड़ों के रिरियाने की आवाज आ रही थी। चुपचाप, बिना कोई आवाज किए, उसने तिजोरी में से उस दरवाजे की चाबी निकाली, जो पिछले पंद्रह वर्षों से नहीं खुला था, अपना ओवरकोट पहना और मकान से बाहर निकल गया। बगीचे में ठंडक और अँधेरा था। बारिश हो रही थी। सर्द, कँपकँपानेवाली तीखी हवा बगीचे में सनसना रही थी और वृक्षों को विचलित कर रही थी। हालाँकि उसने आँखों पर जोर डाला, लेकिन बैंकर न ग्राउंड, न सफेद मूर्तियाँ, न बगीचे का पार्श्वभाग, न वृक्षों को देख पाया। बगीचे के पार्श्वभाग में पहुँचकर उसने दो बार वॉचमैन को आवाज दी। उधर से कोई जवाब नहीं आया। अवश्य ही वॉचमैन खराब मौसम से बचने के लिए रसोईघर या पौधघर में कहीं सोया हुआ था।

‘अगर मुझमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने का साहस है,’ बूढ़े व्यक्ति ने सोचा, ‘तो सबसे पहले वॉचमैन ही संदेह के घेरे में आएगा।’

अँधेरे में उसने सीढि़यों और दरवाजे को टटोला और बगीचे के पार्श्वभाग में दाखिल हो गया। फिर, धीरे-धीरे रास्ता बनाते हुए सकिंड़े गलियारे तक आया तथा माचिस जलाई। वहाँ कोई प्राणी नहीं था। किसी का पलंग बिना कवर के वहाँ पड़ा हुआ था और कोने में एक लोहे का स्टोव, अँधरे में धुँधला-सा दिखाई देता हुआ। उस दरवाजे की सील, जो कैदी के कमरे की ओर खुलता था, साबुत थीं।

जब दियासलाई बुझ गई, बूढ़े व्यक्ति ने उत्तेजना से काँपते हुए उस छोटी सी खिड़की में से झाँककर देखा। कैदी के कमरे में एक मोमबत्ती मंद रूप से जल रही थी। कैदी खुद मेज के पास बैठा हुआ था। केवल उसकी पीठ, उसके सिर के बाल और उसके हाथ दिखाई दे रहे थे। खुली पुस्तकें मेज, दो कुरसियों पर, और मेज के पास कॉरपेट पर बिखरी हुई थीं।

पाँच मिनट गुजर गए और कैदी एक बार भी नहीं हिला। पंद्रह वर्षों के कारावास ने उसे स्थिर बैठना सिखा दिया था। बैंकर ने अपनी उँगली से खिड़की को धीमे से थपथपाया, लेकिन कैदी में कोई हलचल नहीं हुई। तब बैंकर ने सावधानी से दरवाजे पर लगी सील को तोड़ा और ताले में चाबी लगाई। जंग लगे ताले से एक कर्कश आवाज आई और दरवाजा चरमराया। बैंकर को एक आकस्मिक चीख और कदमों के आवाज की प्रत्याशा थी। तीन मिनट बीत गए, लेकिन अंदर पहले जैसी शांति बनी हुई थी। उसने अंदर जाने का मानस बनाया।

मेज के सामने एक व्यक्ति बैठा हुआ था, एक साधारण मानव से भिन्न। वह एक कंकाल था, कसी-खिंची चमड़ी, औरतों की तरह लंबे घुँघराले बाल और झबरी दाढ़ी। उसके चेहरे का रंग पीला था, मिट्टी का शेड लिये हुए; गाल पिचक गए थे, पीठ लंबी और सिकुड़ी हुई, और वह हाथ जिस पर उसने अपना झबरा माथा झुका रखा था, इतना पतला-दुबला था कि उसको देखना बहुत ही कष्टदायक था। उसके बाल सफेद हो गए थे, और उसके जराग्रस्त क्षीण चेहरे को देखकर लगता ही नहीं था कि वह केवल चालीस वर्ष का था। वहाँ मेज पर, उसके झुके हुए सिर के सामने, एक कागज की शीट पड़ी थी, जिस पर छोटे अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

‘बेचारी दुष्टात्मा,’ बैंकर ने सोचा, ‘वह नींद में है और शायद सपनों में लाखों में खेल रहा है। मुझे केवल इस अधमरी-सी वस्तु को उठाना है और उसे बिस्तर पर पटक देना है, और तकिये से एक क्षण के लिए उसका गला दबा देना है। किसी भी तरह की जाँच-पड़ताल, इस अस्वाभाविक मृत्यु का सुराग नहीं लगा पाएगी। लेकिन पहले पढ़ लूँ कि उसने यहाँ क्या लिखा है।

बैंकर ने मेज से शीट उठाई और पढ़ा, ‘कल आधी रात को बारह बजे, मुझे मेरी आजादी मिलेगी और लोगों से मिलने-जुलने का अधिकार। लेकिन इससे पहले कि मैं इस कमरे से बाहर निकलकर सूर्य को देखूँ, मुझे लगता है कि यह जरूरी है कि मैं आपसे कुछ कहूँ। पवित्र अंतर्मन से और ईश्वर के समक्ष, जिसकी दृष्टि मुझ पर है, मैं आपके सामने घोषणा करता हूँ कि आजादी, जीवन, स्वास्थ्य और वे सभी, जिन्हें आपके महान् ग्रंथ संसार की सुखकर वस्तुएँ मानते हैं, मैं उन्हें तुच्छ मानकर उनका तिरस्कार करता हूँ।

‘पंद्रह वर्षों तक मैंने बड़ी लगन और मेहनत के साथ सांसारिक जीवन का अध्ययन किया है। यह सत्य है कि इन पंद्रह वर्षों में मैंने न संसार को देखा और न ही लोगों को। परंतु आपकी पुस्तकों में डूबकर मैंने सुगंधित मदिरा का सेवन किया, गीत गाए, जंगलों में हिरण व जंगली-सूअर का शिकार किया, महिलाओं से प्रेम किया...और, आपके कवियों की प्रतिभा के मंत्र-मोह से सृजित सुंदर महिलाएँ, अलौकिक बादलों की तरह, रात को मेरे पास आतीं और मुझे अद्भुत गाथाएँ सुनातीं, जो मुझे मदहोश कर देती। आपकी पुस्तकों के जरिए ही मैं एल्ब्रूज और माउंट ब्लॉक की चोटियों पर पहुँचा और वहाँ से मैं सूरज को प्रातःकाल में उदय होते और सायंकाल में आकाश, समुद्र और पर्वत-श्रेणियों पर सुनहरे नील-लोहित रंग की छटा बिखराते देखा। उन चोटियों से मैंने मेरे ऊपर बादलों को चीरकर बिजलियाँ चमकती देखी; मैंने हरे-भरे जंगलों, खेतों, नदियों, झीलों, शहरों को देखा; मैंने साइरेन की आवाजें और पान देवता का बाँसुरी वादन सुना; मैंने उन दुष्टात्माओं के पंखों को भी छुआ, जो मेरे पास उड़ती हुई आई थीं, भगवान् को बुरा-भला कहने...आपके ग्रंथों से ही मैंने स्वयं को अथाह रसातल में डाला, चमत्कार किए, शहरों को जलाकर धराशायी किया, नए धर्मों का प्रचार-प्रसार किया, समस्त देशों को परास्त कर विजय प्राप्त की।

‘आपके ग्रंथों ने मुझे बुद्धिमत्ता प्रदान की। सदियों से निर्मित वह पूरी अथक मानवी-विचार शृंखला मेरी खोपड़ी के छोटे से पिंड में समा गई है। मैं जानता हूँ कि मैं आप सबसे ज्यादा समझदार हूँ।

‘और मैं आपके ग्रंथों का तिरस्कार करता हूँ, सारे सांसारिक सुखों और बुद्धिमत्ता का तिरस्कार करता हूँ। मृगजल की तरह सबकुछ असार, निर्बल, काल्पनिक और भ्रामक है। आप कितने ही अभिमानी और बुद्धिमान एवं सुंदर क्यों न हों, मृत्यु आपको पृथ्वी की सतह से पोंछ देगी; और आपकी संतानें, आपका इतिहास और आपके प्रतिभा-संपन्न व्यक्तियों की अनश्वरता, इस भू-मंडल के साथ-साथ भस्म हो जाएगी।

‘आप पागल हैं और गलत राह पर हैं, आप असत्य को सत्य और कुरूपता को सुंदरता समझते हैं। आप अचंभित हो जाएँगे, अगर अकस्मात् सेव और नारंगी के वृक्ष फलों के बजाय मेढक और छिपकलियाँ देने लगे तथा अगर गुलाब के फूल पसीने से तरबतर घोड़े की गंध देने लगे। इसी प्रकार मैं भी आप पर अचंभित हूँ, जिन्होंने स्वर्ग के बदले पृथ्वी लेकर घाटे का सौदा किया है। मैं आप को जानना-समझना नहीं चाहता हूँ।

‘कि जिसके साथ आप जी रहे हैं, उसके प्रति मेरी अवज्ञा को प्रकट करता हूँ, मैं उस बीस लाख की रकम पर अपना दावा छोड़ता हूँ, जिसका कभी मैंने स्वर्ग के रूप में सपना देखा था, जिसका अब मैं तिरस्कार करता हूँ। कि उस रकम पर मेरे अधिकार से मुझे वंचित कर दिया जाए, मैं निर्धारित अवधि से पाँच मिनट पहले यहाँ से बाहर आ जाऊँगा, और इस तरह मैं समझौते का उल्लंघन करूँगा।

बैंकर ने पढ़ने के बाद शीट मेज पर रख दी, उस विलक्षण व्यक्ति का माथा चूमा और रोने लगा। वह पार्श्व भाग से बाहर गया। आज से पहले उसे स्वयं पर इतनी ग्लानि कभी नहीं हुई थी, उस समय भी नहीं, जब उसे स्टॉक मार्किट में भयंकर नुकसान हुआ था। घर आकर वह अपने बिस्तर पर लेट गया, परंतु व्याकुलता और आँसुओं ने उसे देर तक सोने नहीं दिया।

अगली सुबह बेचारा वॉचमैन भागता हुआ उसके पास आया और उसे बताया कि उन्होंने उस आदमी को, जो पार्श्व भाग में रहता था, खिड़की से चढ़कर बगीचे में जाते देखा है। वह गेट तक गया और फिर ओझल हो गया। बैंकर तुरंत नौकरों के साथ पार्श्व भाग में गया और अपने कैदी के भाग निकलने की तसदीक की। अनावश्यक अफवाहों से बचने के लिए उसने विरक्त भाव से उस शीट को मेज से उठा लिया और घर लौटने के पर उसे अपनी तिजोरी में रखकर ताला लगा दिया।

१५२, टैगोर नगर, हिरणमगरी
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दूरभाष: ९९८३२२४३८३
अंतोन चेखव

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