इसे कॉर्पोरेट कल्चर भी कहते हैं

एक श्रवण कुमार घर से अंतर्धान हो गए। बापू के पास संदेश भिजवाया। फिरौती पहुँचाओ नहीं तो...। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो वे पिताश्री से अपने अपहरण की फिरौती माँग कर रहे थे।

एक प्रकार से यह इन हाउस जैसा मामला थी। हम-तुम और कोई नहीं। हम अपहृत होंगे। हम ही फिरौती वसूल करेंगे, तुम्हीं को दर्द देंगे, तुम्हीं से दवा लेंगे—कायदे से पिताश्री को इस मामले में शोक-संतृप्त नहीं होना चाहिए। बाप नाम की प्रजाति की आत्मा को शांति मिलनी चाहिए। खुश होना चाहिए कि उनका पुत्र स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम में लगा है—आज खुद को अपहृत बताकर अपने ही बाप से फिरौती माँग रहा है। कल भगवान् ने कृपा की तो दूसरों के बेटों को उड़ाएगा। दूसरों के बापों से फिरौती डिमांड करेगा—मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा।

अपने महान् देश की तो परंपरा भी यह रही कि दान घर से ही आरंभ होता है—चैरिटी बिगेन फ्रॉम होम। घर-वार्त्ता से कुछ बच गया तो खुरचन जरूरतमंदों के हाथ में भी पहुँच जाती है।

बात संस्कार वाली भी है। अपहरण कला में पारंगत होना भी सुसंस्कृत होना है। संस्कारवान होना है। संस्कारवान पिता बच्चों में संस्कार विकसित होते देखते हैं तो छाती छप्पन इंच की हो जाती है। मेरे एक सेठ मित्र थे। घटतौली के क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा थी। तनिक देर के लिए उनके चिरंजीव दुकान पर बैठते थे। इतने में ही गल्ले में नोटबंदी की तरह रकम का अकाल पड़ जाता था। मित्र अहिंसावादी थे। इसलिए क्रोध नहीं करते थे! दुखी होकर मन बहला लेते थे। लेकिन बाद में दोस्तों के साथ सबेरे, चींटी चुगाओ अनुष्ठान में, पारिवारिक आत्मतुष्टि से लबलबा रहे होते थे—‘भैया हमाये तौ संस्कारई ऐसे हैमें। बाँकेबिहारी की मेहर हैगी के छोरा मैऊँ बैसेई संस्कार भर रये हैंगे। आज हमारौ गल्लौ साफ कर रयौ हैगो। कल्ल कनैयाजी की किरपा भई तो ग्राहकन की जेब खाली करैगौ। बोलो राधे-राधे।’

अब ट्रेंड यही है। हिट हो रहा है यह फॉर्मूला। अपने संसाधनों को विकसित करने का। उन पर भरोसा करने का। कौन किसका अपहरण करने जाए। उसमें खतरा है। आखिर पुलिस नाम का एक विभाग भी तो अपने यहाँ पाया जाता है। अति-अति विशिष्टों के अंगों की रक्षा करने से फुरसत मिलती है तो अपराध-जगत् में हस्तक्षेप करना आरंभ कर देता है। यह असुविधाजनक होता है। काम में बाधा पहुँचाती है पुलिस। अच्छा है, खुद ही अपहृत हो लो। पिता नाम के प्राणी से फिरौती मिल गई तो मौजाई मौजा। नहीं मिली, जितना हाथ की सफाई करके अपहृत हुए थे, वह उड़ा लिया, खुद घर वापसी करनी पड़ी तो बाप क्या कर लेगा। सिवाय पुलिस से बेटे के अपहरण की रपट वापस लेने की प्रार्थना करने के अलावा। जैसे पहले अपहरण की रपट लिखाने के एवज में कुछ गालियाँ खाई थीं। कुछ पूजा-अर्चन सामग्री भेंट की थी, वैसे ही अब रपट वापस लेने के अपराध में चंद तीखे बोल साथ में मिठाई खाने के साधन अर्पित करेगा। आखिर बाप नाम का प्राणी होता किसलिए है। अब श्रवण कुमार के समय के बाप थोड़े ही रहे हैं कि कंधों पर लादे-लादे घूमें। यह काम अब कुलदीपक ही कर लेते हैं। व्यवस्था ने बेरोजगार रहने का प्रबंध कर दिया है। इसलिए बाप की पेंशन पर पूरा हक उनका होता है। उस पर लदे रहने लगे हैं। वे अब उत्तराधिकारी की भूमिका से आगे निकलकर पूर्वाधिकारी की प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।

इसे कॉर्पोरेट कल्चर भी कहा जा सकता है—बहुत सारे काम खुद करो। बाजार पर अपनी पकड़ बनाओ, आजकल इस संस्कृति का बहुत जोर है। मेरे क्षेत्र की सब्जी मंडी में पौत्र से लेकर दादाजी तक ठेले लगाए बैठे रहते हैं। समय की नजाकत देखते हुए चाची, भौजी, गुडि़या, बिन्नू इत्यादि भी वहीं ठीया लगाए बरामद हो जाती हैं। आप कहीं से भी सब्जी लेंगे, दिए गए पैसे का प्रवाह एक ही परिवार की ओर होगा। सब्जीवाले परिवार से लेकर टाटा-अंबानी तक कॉर्पोरेट कल्चर का शव ढो रहे हैं। जैसे दुनिया अब हमसे सब सीख रही है, वैसे ही अब हमसे यह गुण सीख रही है। सौंदर्य तारिकाओं वाला साबुन लें या तंदुरुस्ती की रक्षा करनेवाला, बाल उगानेवाला तेल लें या बाल उड़ानेवाला लोशन, पैसा एक ही विदेशी कंपनी के खाते में पहुँचेगा। लोग सिंगल देशभक्त होते हैं। बहूद्देशीय कंपनियाँ अधिकांश देशों की भक्ति कर रही होती हैं। उनके उत्पाद पाकिस्तान में भी बिक रहे हैं, भारत में भी। वे दोनों देशों के रक्षा कोष को समृद्धि प्रदान कर रहे हैं—लड़ो ससुर तुम। अपना तो धंधा चलना चाहिए। हम तो अपना माल बेच रहे हैं। वक्त की गोली से लेकर बुखार की गोली तक बना रहे हैं। समरसता ही है कि दोनों देशों के लोग उनकी गोली का सेवन करके ही मर रहे हैं। उनके बनाए हथियारों से ही मर रहे हैं।

अब कॉर्पोरेटिंग कल्चर का स्वदेशीकरण भी हो गया है। मस्तिष्क को शांत करने से लेकर उत्तेजना पैदा करनेवाले उत्पाद तक बाबा की दिव्य दुकानों पर बिक रहे हैं। कुछ भी खरीद लीजिए। मन मारकर कुंठित रहनेवाले उत्पाद या खा लगाकर धूम मचा देने का दावा करनेवाले पैसा खींचू उत्पाद।

अपने स्वअपहरण की दिशा में कुछ मौलिक प्रयोग भी हुए हैं—व्यवसाय चतुर व्यवसाइयों ने सहृदयता के साथ कर्ज स्वीकारे। वापस करने में निर्ममता के साथ ‘आपको हुई असुविधा के लिए खेद है’ वाली तख्ती गले में धारण करके बैठ गए। कर्ज देनेवालों को भैंसें पानी में जाती महसूस हुईं तो वे भी हर बाधा को दूर करने में जुट गए। कर्ज ग्रहण करनेवाले व्यवसाइयों का विजय माल्याकरण हो गया। नीरव मोदीकरण हो गया, अपहरण हो गया, पुलिस की तत्परता भी कभी-कभी धोखेबाजी कर देती है। पुलिस ने सूँघ-साँघकर खोज कर ली कि भाई मुंबई पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहित कर रहे थे। पुलिस भी बेचारी क्या करती। परिवार की ओर से कुछ ऐसा संगीत ही नहीं छेड़ा गया कि कहाँ गया उसे ढूढ़ो। संदेह में पुलिस स्वयं ही ढूँढ़ने में पिल पड़ी।

अपने स्वअपहरण की दिशा में कुछ मौलिक प्रयोग भी हुए हैं—व्यवसाय चतुर व्यवसाइयों ने सहृदयता के साथ कर्ज स्वीकारे। वापस करने में निर्ममता के साथ ‘आपको हुई असुविधा के लिए खेद है’ वाली तख्ती गले में धारण करके बैठ गए। कर्ज देनेवालों को भैंसें पानी में जाती महसूस हुईं तो वे भी हर बाधा को दूर करने में जुट गए। कर्ज ग्रहण करनेवाले व्यवसाइयों का विजय माल्याकरण हो गया। नीरव मोदीकरण हो गया, अपहरण हो गया, पुलिस की तत्परता भी कभी-कभी धोखेबाजी कर देती है। पुलिस ने सूँघ-साँघकर खोज कर ली कि भाई मुंबई पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहित कर रहे थे। पुलिस भी बेचारी क्या करती। परिवार की ओर से कुछ ऐसा संगीत ही नहीं छेड़ा गया कि कहाँ गया उसे ढूढ़ो। संदेह में पुलिस स्वयं ही ढूँढ़ने में पिल पड़ी।

बहुधंधी होना समारे समाज का गुण है। दशकों पहले मिड-मुरैना के गाँवों में जाने का अवसर मिला था। तब डाकू दिल्ली-लखनऊ में नहीं, वहीं पाए जाते थे—हालाँकि वे तथा वहाँ के लोग उन्हें डाकू नहीं बागी कहते थे—दोपहर के भोजन के बाद मेजबान विनम्र हो उठे और क्या सेवा करें आपकी, हमने अवसर का लाभ उठाया—डाकू-दर्शन, क्षमा करें, बागी दर्शन करा दीजिए, जीवन धन्य हो जाएगा। मित्र ने तनिक धैर्य रखने की सलाह दी। बोले, दो बागी विभूति अपने ही घर में हैं। एक ऑपरेशन पर गए हैं। कल सबेरे तक पकड़ के साथ उनकी आमद होगी। एक की जमानत हो गई है। शाम तक आ जाएँगे। दरअसल भतीजा वकील है। शाम को उसी की गाड़ी में दोनों साथ लौटेंगे। मित्र स्वयं पुलिस की सेवा में थे। गाँव छुट्टियाँ मनाने आए थे। उनके एक भ्राता सीमाओं की रक्षा में थे। एक सूबे में उप-कानून मंत्री का पद सुशोभित कर रहे थे।

देखकर छाती जुड़ा गई। कैसा आदर्श परिवार है। कहीं और जाना ही नहीं है। भगवान् का दिया सब है अपने घर में।

३ गुरुद्वारा, नगरा,
झाँसी-२८४००३
दूरभाष: ०८००४२७१५०३
—दिनेश बैस

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