शिक्षक दिवस (५-९-२०१७)

शिक्षक दिवस (५-९-२०१७)

हाँ, आज शिक्षक दिवस है। मेरे लिए तो इसका दुहरा अर्थ है, यानी मेरे शिक्षक तो थे ही, मैं भी ३४ वर्ष तक शिक्षक रहा हूँ। दोनों के अनुभवों की जुगलबंदी से गुजर रहा हूँ। याद आ रहे हैं गाँव के प्राइमरी और मिडिल स्कूल। उनकी याद आती है तो एक खुशबू से भर जाता हूँ। यों उस समय की पढ़ाई के साथ दंड जुड़ा हुआ था। मैं पढ़ने में अच्छा रहा, फिर भी कभी-कभी अकारण या सकारण रूप से दंडित होता रहा। सकारण दंडित होने पर दुःख नहीं होता था, किंतु अकारण पिट जाने पर दुःख के साथ क्रोध भी आता था। पंडित रामचंद्र त्रिपाठी तो छात्रों को पीटने के लिए विख्यात थे, बल्कि कुख्यात थे। वे समझते थे कि मारने-पीटने से ही छात्रों को विद्या आएगी, किंतु होता उसका उल्टा था। जिस बात के लिए वे पीटते थे, कक्षा में वह बात बनती तो क्या और बिगड़ जाती थी। हाँ, जब घर आकर इत्मीनान से स्वयं या भइया के सहयोग से उस पर विचार करता था, तब बात बन जाती थी। इसी प्रक्रिया से मैं पढ़ाई में आगे निकलता गया। अपनी कक्षा में अच्छा छात्र माना जाता रहा।

याद आता है एक प्रसंग। मैं दर्जा एक में था। संभवतः सात साल का रहा होऊँगा। पाठ्यक्रम में मन्नन द्विवेदी की ‘बाल कवितावली’ लगी थी, उस मरकहे शिक्षक ने बच्चों से कहा कि बाल कवितावली की कविताएँ जुबानी सुनाओ। कोई भी याद करके नहीं आया था। भला यह भी कोई बात थी कि बच्चे कवितावली की कविताएँ याद करके आए हों। फिर क्या था, उस निर्दय शिक्षक ने बच्चों को धूप में खड़ा कर दिया और कहा कि आँखें फाड़-फाड़कर सूरज की ओर देखो। फिर उसने बच्चो के तलवों पर डंडे से प्रहार करना शुरू कर दिया। बच्चे चिल्लाने लगे। दर्जा दो की कक्षा ले रहे गुजेशवरी पंडित चिल्लाकर बोले, ‘अरे जल्लाद, बच्चों की जान लेगा क्या?’

उसी पंडित रामचंद्र ने कई वर्ष पूर्व भैया की बाँह पर डंडा मारा था। बाँह कट गई थी, खून बह रहा था। भैया घर आए तो खाना खाते हुए रोए जा रहे थे। बात खुली तो पिताजी कई मित्रों के साथ लाठी लेकर स्कूल पहुँच गए। पंडित रामचंद्र तो छिप गए। प्रधानाचार्य (जो कि बहुत सम्मानित शिक्षक थे और जिन्हें बड़का पंडित भी कहा जाता था) ने क्षमायाचना की।

पाठशालाओं में पढ़ाने के क्रम में बच्चों की पिटाई करने की प्रथा इतनी अनुचित थी कि कई छात्र तो पाठशाला तो पाठशाला, घर छोड़कर भाग जाते थे। पिटाई अकारण भी हो जाती थी। दो प्रसंग मुझे याद आ रहे हैं। तब मैं दर्जा चार में था, गंगा पंडित पढ़ाते थे, उस कक्षा में मेरे गाँव का संत प्रसाद भी पढ़ता था। वे खाते-पीते घर का बिगड़ंत लड़का था। पढ़ाई-लिखाई में शून्यवत् या उसके पास पैसे तो होते ही थे और भी चीजें होती थीं। एक दिन उसने गंगा पंडित से शिकायत की कि किसी लड़के ने उसका चाकू चुरा लिया है। गंगा पंडित ने कहा, ‘जिसने चाकू लिया हो, वह दे दे, नहीं तो पूरी कक्षा की पिटाई होगी।’ चाकू किसी ने नहीं लिया था तो दे कहाँ से दे। बस फिर क्या था, पूरी कक्षा की पिटाई हो गई। मैंने सोचा, यह कोई न्याय नहीं है, यह तो शिक्षक की गुंडागर्दी है। दरअसल चाकू की चोरी हुई नहीं थी, यह तो संतप्रसाद यानी संतू की बदमाशी थी।

दूसरा प्रसंग याद आ रहा है कि हम लोग जिस कमरे में पढ़ते थे, उसकी छत पर मधुमक्खी का छत्ता लगा हुआ था। एक दिन क्लास छूटने के समय कोई लड़का छत्ते को छेड़ गया। मैं पीछे था। मधुमक्खियों ने समझ लिया कि मैंने ही छेड़ा है।

वे मुझे काटने लगीं, उन्होंने तो काटा ही, गंगा पंडित भी काटने लगे। यह समझकर कि छत्ते को मैंने ही छेड़ा है।

जो भी हो, वे मेरे शिक्षक रहे हैं और कक्षाओं में मुझे जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उन्हीं की वजह से हुआ। उन्हीं के प्रयत्नों से सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ता गया। बाद में (यानी जब मैं कुछ बना गया) जब वे लोग मिलते थे तो मैं साभार उनके सामने झुक जाता था और वे लोग भी गौरव अनुभव करते थे कि मैं उनका शिष्य रहा हूँ तथा वे मुझे खुले मन से आशीष देते थे।

मेरी समूची पढ़ाई-यात्रा में बहुत से गुरु मिले और सबने मुझे  कुछ-न-कुछ दिया ही, किंतु कुछ गुरु ऐसे मिले, जिन्होंने अपने गहरे ज्ञान और मानवीय व्यवहार से मुझे गहरे प्रभावित किया। उन्हें मैं सदा बहुत शिद्दत से याद करता हूँ। याद कर-करके भाव-विभोर हो जाता हूँ। उन पर मैंने संस्मरण भी लिखे हैं। वे हैं मिडिल स्कूल बिकाऊ पंडित, विशेष योग्यता के शिक्षक पंडित रामगोपाल शुक्ल और उच्चतम शिक्षा के गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। मैंने इनसे शिक्षा ही नहीं पाई, जीवन-ज्योति भी पाई। इनका व्यक्तित्व बहुविध छवियों से दीप्त था। आज भी लगता है कि इनके ज्ञान और छात्र-स्नेह की ज्योति मेरे भीतर जगमगा रही है।

और मैं अपनी शुरुआत को कैसे भूल सकता हूँ। वह माता तो थी ही, अक्षर करानेवाली गुरु भी थी। उसी ने मेरी जड़ता को तोड़कर अक्षर-ज्ञान कराया था। उसने मुझे अक्षरों के साथ न लगाया होता तो मैं क्या बना होता। तब मुझे याद करनेवाले गुरु कहाँ मिलते? वह माँ के रूप में मुझमें छाई ही रहती है, सारस्वत ज्ञान के रूप में भी दीप्त रहती है। वह मेरी सारस्वत-यात्रा की प्रवर्तक गुरु माँ रही है। अनेक गुरुओं का ज्ञान ग्रहण करते-करते एक दिन मैं स्वयं शिक्षक बन गया।

अंत में ही सही, सर्वाधिक प्रमुखता से अपने बी.एच.यू. के शिक्षक कल को याद कर रहा हूँ। एम.ए. करके निकला था तो चार महीने के लिए बी.एच.यू. के कमच्छा स्थित सेंट्रल हिंदू कॉलेज में अध्यापन का अवसर मिल गया था। तब मैं था ही क्या? नया-नया शिक्षक हुआ था, लेकिन उन चार महीनों में बहुत सारे शिष्य मिल गए। उन्होंने मुझे बहुत मान दिया। कौशल किशोर और वंशबहादुर आगे चलकर उच्च पदस्थ हुए किंतु वे मुझे सदा गुरु मानते हैं और सम्मान देते रहे हैं। आज के यशस्वी कवि विजेंद्र भी मेरी कक्षा में थे और वे आज तक मुझे गुरु के रूप में देखते रहे हैं तथा याद करते रहते हैं। कथाकार काशीनाथ भी उस कक्षा में थे और उनका भी सम्मान-भाव मुझे मिलता रहा।

मैंने शिक्षण कार्य बी.एच.यू. से शुरू किया औए एम.एस. यूनिवर्सिटी बड़ौदा तथा गुजरात विश्वविद्यालय से होता हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय पहुँचा। मैं नहीं जानता कि मैंने छात्रों को क्या दिया किंतु अपनी शक्ति भर देने का प्रयास करता रहा तथा अपने और उनके बीच की दूरी कम करने का प्रयास करता रहा। कौन मुझे कितना याद करता है, मुझे ज्ञात नहीं।

लेकिन कुछ संदर्भों को याद कर बहुत सुकून अनुभव करता हूँ। याद है अहमदाबाद में तब बी.ए. ऑनर्स की कक्षा लेनी शुरू की, तब एक छात्र उद्दंड सा लगा। लगा कि वह कक्षा में पढ़ने नहीं, मौज-मस्ती करने आया है। कुछ दिनों बाद वह मेरे घर आया और पाँव छूकर बैठ गया। मैंने पूछा, ‘कहिए कुछ काम है?’ उसने कहा, ‘नहीं गुरुजी, कृतज्ञता ज्ञापित करने आया हूँ।’ ‘किस बात की भाई?’ ‘गुरुजी, मैं पहले कक्षा में आकर यों ही बैठता था। छात्रों और गुरुओं से चुहुल करता था। शुरू में मैंने आपको भी गंभीरता से नहीं लिया किंतु आपकी कक्षा में बैठते-बैठते पढ़ने में जी लगने लगा। लगा कि अब मुझे कुछ बनना है।’

‘खुश रहो बेटे, देर से सही, तुम सही रास्ते पर आ गए?’

वह लड़का पढ़-लिखकर एक कॉलेज में प्राचार्य बन गया।

दूसरे छात्र थे विनीत गोस्वामी। उनके बड़े भाई नवनीत गोस्वामी बी.ए., एम.ए. में मेरे छात्र रहे। अत्यंत शालीन और अध्ययनशील छात्र थे। वे मुझसे कहते थे, ‘सर, विनीत तो अत्यंत लापरवाह है। घूमता-घामता रहता है, पढ़ने में उसका जी नहीं लगता है।’ लेकिन जब वह मेरा छात्र बना तो मेरे व्यक्तिगत संपर्क में भी आता गया और उसका मन अध्ययन में रमता गया। अच्छे अंकों से एम.ए. करके पिलवई कॉलेज में प्रवक्ता बन गया और पी-एच.डी. के लिए अच्छा शोध-प्रबंध लिखा। वह मेरे उन थोड़े से छात्रों में रहा, जो सदा मेरे साथ गहरा लगाव अनुभव करते रहे हैं। विनीत एक दिन अनंत यात्रा पर चला गया। उसकी बहुत याद आती है। मैंने ‘शिष्य चरित’ नामक एक संस्मरण उस पर लिखा है।

दिल्ली के शिष्य तो दिल्ली में ही हैं और कभी-कभी मिलते-जुलते रहते हैं। हाँ, ज्ञानचंद गुप्त मेरे शिष्य ही नहीं रहे, मेरे सुख-दुःख में शरीक होनेवाले पारिवारिक सदस्य भी बन गए थे, दुःख है कि वे वर्षों से बीमार होकर अपने घर में कैद से हो गए हैं। दिल्ली तो पास होकर भी उतनी पास नहीं लगती किंतु गुजरात दूर होकर भी बहुत पास लगता है। स्व. भोलाभाई पटेल, रघुवीर चौधरी, स्व. अवधनारायण त्रिपाठी, स्व. महावीर सिंह चौहान, स्व. करुणेश शुक्ल, स्व. नवनीत, विनीत गोस्वामी, भवर लाल गुर्जर आदि मेरे पास ही बैठे हैं और हमारे सुख-दुःख परस्पर संवाद कर रहे हैं।

अंत में ही सही, सर्वाधिक प्रमुखता से अपने बी.एच.यू. के शिक्षक कल को याद कर रहा हूँ। एम.ए. करके निकला था तो चार महीने के लिए बी.एच.यू. के कमच्छा स्थित सेंट्रल हिंदू कॉलेज में अध्यापन का अवसर मिल गया था। तब मैं था ही क्या? नया-नया शिक्षक हुआ था, लेकिन उन चार महीनों में बहुत सारे शिष्य मिल गए। उन्होंने मुझे बहुत मान दिया। कौशल किशोर और वंशबहादुर आगे चलकर उच्च पदस्थ हुए किंतु वे मुझे सदा गुरु मानते हैं और सम्मान देते रहे हैं। आज के यशस्वी कवि विजेंद्र भी मेरी कक्षा में थे और वे आज तक मुझे गुरु के रूप में देखते रहे हैं तथा याद करते रहते हैं। कथाकार काशीनाथ भी उस कक्षा में थे और उनका भी सम्मान-भाव मुझे मिलता रहा।

कमच्छा से छूटा तो शोध-छात्र के रूप में बी.एच.यू. में बी.ए. की कक्षाएँ लेने लगा। मैंने अपने को कभी प्रभावशाली शिक्षक नहीं माना, न तब न इलाहाबाद में। लेकिन कुछ प्रतिभाशाली छात्र मेरे निकट आते गए। पहले ही वर्ष में शुकदेव सिंह तथा राजेंद्रकृष्ण जैसे मेधावी छात्र मिल गए, जिनके लिए मैं सदा अति सम्मानित गुरु बना रहा। वे सदा मेरे निकट बने रहे। अब दोनों नहीं हैं किंतु लगता है कि आकाश मैं बैठे-बैठे वे पूछ रहे हैं, ‘कैसे हैं गुरुजी?’

आर-३८, वाणी विहार
उत्तम नगर, नई दिल्ली-११००५९
दूरभाष: ९२११३८७२१०
रामदरश मिश्र

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