अदृश्य विकास और ईश्वर

अदृश्य विकास और ईश्वर

कुछ की मान्यता है—विकास एक सफर है। यह कोई हवाई या ट्रेन यात्रा नहीं है कि दिल्ली से मुंबई या बैंगलुरु के लिए चले तो देर-सबेरे पहुँच ही जाएँगे। यह एक ऐसी अनवरत यात्रा है, जिसका लक्ष्य वक्त के साथ आगे खिसकता रहता है। कभी विज्ञान की नई खोजों से, कभी तकनीकी प्रगति से। जब सैल-फोन आया तो उसका स्वागत संचार के क्षेत्र में नई क्रांति के रूप में किया गया। आज स्मार्ट फोन के युग में उसकी हैसियत है क्या? कौन कहे कल क्या हो? यों सफर है तो ‘सफरिंग’ भी है। लगातार सफर के चाहनेवाले यायावर कम ही होते हैं। यों थोड़ा-बहुत रुककर सुस्ताना उनके लिए भी अनिवार्यता है।

सफर के साथ परिवर्तन भी है। कभी उसके साधनों का, कभी सवारियों का। कभी छोटे जहाज थे, अब बड़े हैं। रेल के डिब्बे भी कौन स्थायी हैं? वे भी बदलते रहते हैं और इन डिब्बों को खींचनेवाले इंजन भी। इस विकास में सरकार की बड़ी भूमिका है, न जहाज सस्ते हैं न रेल के नए इंजन, न डिब्बे। एयर इंडिया के नए जहाज हों या देश की रक्षा के उपकरण, सरकार का ध्यान इन की ओर खुद-बखुद तो आकृष्ट होने से रहा। इस आवश्यक काम के लिए हर निर्माता-कंपनी के पास उसकी ‘ध्यान आकर्षण टीम’ होती है। यह दल जी-जान से लगा रहता है बाबू से लेकर मंत्री का ध्यान खींचने में।

ज्ञानी पुरुष यह भी जानते हैं कि ध्यान-आकर्षण में गुणवत्ता के साथ एक अन्य तत्त्व भी महत्त्वपूर्ण है। इसे छोटे और सामान्य कर्मचारियों के संदर्भ में ‘घूस’ कहा जाता है। पर बड़े लोगों को छोटे सड़क के किनारे बने ढाबे के खाने से परहेज है। यह सामान्य बाबू के लिए है। बड़े सिर्फ पाँच तारा होटलों में पका और प्रचलित कमीशन खाते हैं। इसके नाम से ही जाहिर है कि यह हर ‘कमी’ को ‘शन’ करता है, यानी घूस से बड़ा और महान् है। कमीशन कैसा हो, कितना हो, लेन-देन की प्रक्रिया क्या हो, इसे कैसे दुनिया की नजरों से छिपा के रखा जाए आदि ऐसे मूलभूत प्रश्न हैं, जिनके समाधान के बिना सरकार का ध्यान, किसी पंछी के समान उड़ता-फुदकता, आता-जाता रहता है। ध्यान आकर्षक टीम जानती है कि समझौता गुणवत्ता में संभव है, कमीशन पर नहीं। वह पूरे मनोयोग से अपने मिशन में लगी रहती है।

प्रगति से संबद्ध ज्ञानियों की मान्यता है कि त्वरित विकास और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है। स्कूल की इमारत का निर्माण हो या सड़क का, दोनों सरकार की स्वीकृति के बिना संभव नहीं हैं। इसमें सबका कल्याण निहित है। स्वीकृति देनेवाले का और जनता का। सरकार से संपर्क के आनेवाले हर व्यक्ति को पता है कि जड़ फाइलों के पैर तो हैं नहीं। जब उनमें पैसे के पैर लगते हैं, तभी उनमें गति आती है। नहीं तो वह जहाँ टिकी हैं, वहाँ-की-वहीं, टिकी रहती है। गुम होना या दीमक-चटना उनकी स्वाभाविक नियति है। ठेकेदार इस तथ्य से परिचित हैं। लिहाजा, वह एक हाथ में रुपयों का थैला रखता है और दूसरे में टैंडर के आधार पर चयनित होने के कागज। इनफ्लेशन के मानक से कमीशन की बढ़ी दर वह देने को प्रस्तुत है। स्कूल की इमारत और सड़क बनने से जुड़े हर व्यक्ति की चाँदी है। सरकार को कमीशन, ठेकेदार को मुनाफा, मजदूरों को दिहाड़ी, छात्रों को छत, कीचड़ सने कच्चे रास्तों पर चलनेवालों को डामर की सड़क, आदि उपलब्ध होती हैं। देखने में आया है कि अफसरों के बँगले, ठेकेदारों की कोठी, जनता को सुभीता, आदि के पीछे विकास की सक्रिय और सार्थक भूमिका है।

विकास के कई आयाम हैं। हर उपभोक्ता का खुद का अनुभव है। कई सरकारें महँगाई का विकास करती हैं। हमने अपने व्यापारी मित्र से इस विषय में शिकायत की तो उन्होंने हमें चुप करा दिया, ‘‘हम स्वतंत्रता के तत्काल बाद से सबका साथ, सबका विकास के इच्छुक हैं। क्या दुकानदार इस देश के नागरिक नहीं हैं? बड़े जनकल्याणी मिशन की कामयाबी के लिए कुछ कष्ट तो सहना ही पड़ता है। देश की प्रगति के रास्ते में रोड़े अटकाना उचित है क्या?’’ हम उनसे क्या कहते? आजादी के बाद से हर दल ने अपनी और अपनों की दौलत का विकास किया है। इसे हम व्यक्तिगत दुर्भाग्य ही कहेंगे कि अपन किसी भी दल के कभी अपने नहीं रहे हैं। न अतीत में, न वर्तमान में। कुछ ऐसे प्रगतिशील भी हैं, जो हर पार्टी में खाते हैं। वे बधाई के पात्र हैं। यहाँ तो निजी फर्म के स्वामी ने लक्ष्य निर्धारित कर रखे हैं। उन्हें प्राप्त करो तो तनख्वाह मिलती है, नहीं तो उस तक में कटाई का खतरा है।

इस मामले में हम ही क्यों, हमारे ऐसे अनेक सरकार की उदारता के कायल हैं। वहाँ काम करने पर भले ही कोई दंडित हो, काम न करने पर वेतन, प्रमोशन, महँगाई भत्ता आदि सब उपलब्ध हैं। महिमा-मंडित शासन तंत्र, ‘सरकाने’ की सरकार है। जो इधर-उधर फाइल सरकाने में माहिर है, वही कार्य-कुशल है। आजादी के बाद से उनकी बिरादरी खूब फल-फूल रही है। देश का विकास हो या दल का, उसके पर्याय वह खुद ही हैं। उनकी अपनी तरक्की मुल्क की तरक्की का मानक है। इस मानसिकता की पकड़ इतनी प्रबल है कि कोई देश की प्रगति के लिए प्राणों की बाजी भी लगाने को प्रस्तुत हो तो नौकरशाह और नेता उसके विरुद्ध शर्तिया आत्महत्या का केस दर्ज करवा दें?

ऐसा नहीं है कि विगत छह-सात दशकों में देश ने प्रगति नहीं की है। पुल, बाँध, सड़कें, इमारतें, शिक्षा संस्थान, कृषि, विज्ञान आदि हर क्षेत्र में तरक्की हुई है। एक इंजीनियर जो इस विकास के साझीदार रहे हैं, वे हमें बताते हैं कि ‘‘यह व्यर्थ का दुष्प्रचार है कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता का अभाव है। यह जो थोड़ा-बहुत है, वह हमने जान-बूझकर किया है।’’ हम अविश्वास की मुद्रा में उनसे पूछते हैं, ‘‘ऐसा क्यों?’’ विश्वास के साथ और बिना किसी अपराध-बोध के उनका उत्तर है कि ‘‘आप व्यापक राष्ट्र-हित का नहीं सोचते हैं? यदि सड़क या इमारत ऐसी पुख्ता बन गई कि दस-बीस साल तक उसमें कोई मरम्मत की दरकार नहीं होगी तो रोजगार का क्या होगा? दिहाड़ी के मजदूर कहाँ काम करेंगे? हम उनके प्रति संवेदनशील हैं। उनकी रोजी-रोटी का खयाल रखते हैं। इसीलिए हमारे द्वारा पोले मकान और सड़क बनाए जाते हैं। इससे हर वर्ष मजदूरों की आवश्यकता पड़े। इसी को ‘धनवान का पैसा निर्धन के काम आना’ कहते हैं।’’

विकास भी दो प्रकार का है: एक दृश्य, दूसरा अदृश्य। देवदूतों की विशेषता है। यह इधर विकास की बात भी करते हैं तो उधर विकास के फूल खिलते हैं। इतना ही नहीं, कई आस्थावानों को विश्वास है कि इन्होंने एक बार विकास पर जनसभा में भाषण दिया तो प्रत्यक्षदर्शियों ने विकास के लहलहाते झाड़ तक देख लिये! कठिनाई यह है कि ऐसा अदृश्य विकास आस्थावानों को ही नजर आता है। सत्ता से देवता हटे तो विकास का भी लुप्त होना निश्चित है। इसके बावजूद उनके आस्था-समुदाय का मत है कि मुल्क जो भी तरक्की कर रहा है, उसकी नींव देवदूत परिवार के सदस्यों ने ही रखी है। दिक्कत है, नींव दिखती नहीं है, खासकर सामान्य आदमियों को।

हमें शंका कि कहीं यह स्वयं के भ्रष्ट आचरण का बचाव तो नहीं कर रहे हैं? उन्होंने शंका-समाधान के साथ हमारा ज्ञानवर्धन भी किया, ‘‘आप जानते हैं कि नहीं, यह विगत सरकारों की नीति के अंतर्गत है। सबके चुनावी घोषणा-पत्र नए रोजगारों के सृजन की बात करते हैं। नए निर्माण में होता भी है, पर यह पर्याप्त नहीं है। हर वर्ष की हमारी पोली इमारतें और धँसतीं सड़कें रोजगार के ढेरों अवसर प्रदान करती हैं। इतना ही नहीं, इससे मंत्री, अफसर, सामान्य जन के बीच धन के वितरण का समाजवाद भी पधारता है। सबको अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुरूप कमाई की राशि उपलब्ध होती है।’’

उनके इस आश्चर्यजनक स्पष्टीकरण से हमें यकीन होने लगा कि यह निजी करप्शन को नीतिगत बनाकर उसका औचित्य सिद्ध कर रहे हैं? उनसे इस प्रकार के सीधे सवाल की गुस्ताखी वर्तमान सभ्य आचरण की मनभावन संस्कृति के विपरीत होती। कौन कहे, वह भविष्य में हमसे अनबोलाचाली न साध लें? कुछ चेहरे ऐसे हैं, जो मन की बात कह जाते हैं। हमारी प्रश्नवाचक मुद्रा के उत्तर में उन्होंने हमें आश्वस्त किया, ‘‘इसमें शंकित होने जैसा कुछ नहीं है। बात बात पर विवाद करने के लतियल विद्वान् भी एक मत हैं कि मनुष्य एक निहायत स्वार्थी प्राणी है। बिना किसी स्वार्थ पूर्ति की संभावना के वह हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहता है। नेता, विक्रेता, दुकानदार, सामान्य इनसान हो या कोई पेशेवर वकील अथवा प्राध्यापक, सब अपने-अपने स्वार्थ की कठपुतली हैं। सूत्रधार स्वार्थ है। कुछ सत्ता के साधक हैं, कुछ पैसे के। कुछ की पेट भरने की विवशता है, तो कुछ की पहचान पाने की। लब्बो-लुआब यह कि सब स्वार्थ प्रेरित हैं। नेता का भाषण हो या फिर गुरुजी का प्रवचन। एक का कर्मयोग कुरसी है, दूसरे का महलनुमा आश्रम, जो विश्वासियों की श्रद्धा-भक्ति से बनकर ही रहता है।

आस्था हिमालय भी हिला सकती है। हालाँकि किसी ने हिमालय को हिलते नहीं देखा है, फिर भी भारत में इसके अनेक उदाहरण हैं। अपनी आस्था व लगन से कई गुरु गुरूघंटाल बन गए हैं। उनका जेल जाना अहम नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि चेलों की आस्था उन्हें मुक्त कब करवाती है? कोर्ट के आदेश से नहीं तो जेल तोड़कर? इसी आस्था ने कई परिवारों को प्रजातंत्र का पर्याय बनाकर देश को पारिवारिक प्रजातंत्र की सौगात दी है। प्रारंभ में संसार भर को भारत में प्रजातांत्रिक प्रणाली की सफलता के विषय में संदेह रहा है। प्रजातंत्र को टिकाए रखने में भी इन्हीं करिश्माई परिवारों का अहम योगदान है। सत्ता का पट्टा इन परिवारों के नाम हमेशा के लिए लिख देना था, पर लोकतंत्र में चुनावों की अनिवार्यता का कोई क्या करे? आस्थावानों के अनुसार इन परिवारों में इनसान नहीं, देवदूत जन्म लेते हैं। इनसान होते तो गलती करते! पर ये इनसान न होकर देवता हैं। इनके गलती करने का प्रश्न ही नहीं है।

विकास भी दो प्रकार का है ः एक दृश्य, दूसरा अदृश्य। देवदूतों की विशेषता है। यह इधर विकास की बात भी करते हैं तो उधर विकास के फूल खिलते हैं। इतना ही नहीं, कई आस्थावानों को विश्वास है कि इन्होंने एक बार विकास पर जनसभा में भाषण दिया तो प्रत्यक्षदर्शियों ने विकास के लहलहाते झाड़ तक देख लिये! कठिनाई यह है कि ऐसा अदृश्य विकास आस्थावानों को ही नजर आता है। सत्ता से देवता हटे तो विकास का भी लुप्त होना निश्चित है। इसके बावजूद उनके आस्था-समुदाय का मत है कि मुल्क जो भी तरक्की कर रहा है, उसकी नींव देवदूत परिवार के सदस्यों ने ही रखी है। दिक्कत है, नींव दिखती नहीं है, खासकर सामान्य आदमियों को। इधर जब से चुनावों में गड़बड़झाला होने लगा है, कुछ सेवक किस्म के लोग भी सत्ता में आ जाते हैं। जाहिर है कि इन सेवकों में आस्था का अभाव हो। जब इन्हें विकास के झाड़ तक नहीं दिखते हैं तो भला नींव कैसे दिखे?

प्रजातंत्र में आजकल विकास का दर्जा ईश्वर जैसा है। मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे, चर्च में जानेवाले जैसे ईश्वर की तलाश में जुटे हैं, वैसे ही लोकतंत्र में विकास के नाम पर सियासी दल वोट की। कुछ को वाकई भरोसा है कि विकास का मंत्र ऐसा हनुमान चालीसा हैं, जो चुनावी संकट से उबरने की शर्त है। चुनावी अखाड़े में कुछ सिद्ध पहलवान भी हैं। यह दिखाने को हनुमान चालीसा का पाठ तो करते ही हैं, पर जानते हैं कि साथ-साथ अपनी जाति और अल्पसंख्यकों को पटाना भी श्रेयस्कर है। वास्तविक निष्ठा के अभाव में इसके लिए मंदिरों में मत्था टेकने के अलावा दुपल्ली टोपी से लेकर जातिगत सम्मेलनों का और धर्म-गुरुओं का सहारा लिया जाता है। उनका परिवार अनुभवी है। उन्हें पता है कि हनुमान चालीसा के पाठ के मंत्र के साथ अपने प्रयास भी करते रहने से सफलता संभावित है। ऐसों के लिए अदृश्य विकास एक बेहद उपयोगी शै है। अपने सत्ता-काल में किए गए अदृश्य विकास के कार्यों की सूची गिनवाना वे नहीं भूलते हैं। कैसे उन्होंने वातावारण को प्रदूषण रहित करने को डेढ़ हजार करोड पेड़ लगवाए? विरोधियों ने सत्ता में आते ही इन्हें कटवा दिया। कैसे उन्होंने लाखों को रोजगार देने का प्रबंध किया। जो घरों में बेकार बैठे रहते, उन्हें ग्राम-प्रधान के जरिए ‘डोल’ की स्टाइल में, नरेगा-मनरेगा की राशि बाँटकर, किसी भी अन्य काम-काज के लिए असमर्थ और अयोग्य बना दिया। इस अदृश्य विकास के समर्थन में वे बहुधा बताते हैं कि उन्होंने गाँवों की दशा ऐसी सुधारी है कि जो कच्चे मकान में रहते थे, वही ग्राम प्रतिनिधि अब कोठियों तक तरक्की कर गए हैं, ‘डोल’ बाँटने की सामर्थ्य के कारण। ‘कंपू’ भैया देश को उन्हीं की देन है, वरना इंटरनेट, स्मार्ट फोन और इ-संस्कृति कैसे पनप पाती? अदृश्य विकास लाने में उन्होंने खून-पसीना खूब बहाया है। यही देश को समर्थ और समृद्ध बनाएगा।

कुछ उनके विकास के विषय में शंकालु हैं। वे उन्हें दिलासा देते हैं, ‘‘पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन के पश्चात् भी क्या भगवान् या हनुमानजी ने आपको दर्शन दिए हैं? किंतु प्रभु का आपके प्रति वह ऊपरवाले के समकक्ष है। दृष्टिकोण सकारात्मक है। वह कष्ट निवारण को सदा आपके साथ है। ऐसा ही हमारा विकास है। वह हर अभावग्रस्त-वंचित व्यक्ति की, आखिरी पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक की तरक्की में उसके साथ है। परिणाम आने में समय तो लगता ही है।’’

हमें आशा है कि अदृश्य विकास के जनक कभी हमें दाल-रोटी भी दे दें। सवाल यह है कि कितने दशकों बाद? फिर भी मन में उम्मीद की धुँधली किरण है कि अपने नहीं तो न सही, कौन जाने, यह अदृश्य विकास भविष्य की पीढि़यों के काम आए?

९/५, राणा प्रताप मार्ग
लखनऊ-२२६००१
दूरभाष: ९४१५३४८४३८
गोपाल चतुर्वेदी

हमारे संकलन