बेहाल व्यवस्था

परीक्षा प्रभारी बसंत कुमार जोशी बोले, ‘‘सर! हर हाल में परीक्षाएँ तो हमें संपन्न करवानी ही हैं!’’

‘‘बेशक, करवानी हैं...’’ प्रिंसिपल उसे निहारने लगे।

‘‘तब सर, पाँच कमरों का एडजस्टमेंट कैसे करना है?’’ उसने समस्या का समाधान चाहा।

‘‘करना तो है ही।’’ प्रिंसिपल ने सुझाया, ‘‘स्टाफ के अलावा इन पाँचों कमरों के लिए दो में स्कूल के बाबू और दो में चपरासी...’’

‘‘ठीक है, साब!’’ सहमति में उसने गरदन हिलाई, ‘‘सर, एक कमरे की समस्या अभी भी रहेगी।’’

‘‘स्वीपर है स्कूल का...’’ बेलाग अंदाज में प्रिंसिपल कह गए।

‘‘ना सर,...जरा विद्यालय की शाख-नाक...!’’ दबी जबान से उसने प्रतिरोध जताया।

‘‘तो फिर मुझे लगा दो कमरे में, क्या हर्ज है?’’ प्रिंसिपल ने विकल्प सुझाया, ‘‘नौकरी है...यहाँ नहीं बैठा, वहाँ पर बैठ जाऊँगा। अंत-पंत, व्यवस्था तो हमें ही मिल-जुलकर...’’

‘‘नहीं सर...! ऐसे में स्वीपर को ही घर से बुलवा लेते हैं। पास ही मकान है, आ जाएगा।’’ परीक्षा प्रभारी ने अपनी दृढ़ता दरशाई।

‘‘देख लो, जो तुम उचित समझो।’’ और बेमन से प्रिंसिपल गेलरी में आकर टहलने लगे।

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सत्य शुचि

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