देवनागरी लिपि से ही होगी भारतीय अस्मिता और भाषाओं की रक्षा

देवनागरी लिपि से ही होगी भारतीय अस्मिता और भाषाओं की रक्षा

हिंदी भाषा के विश्व मंच पर मैं भारतीय अस्मिता और भारत की विकट भाषा समस्या के बारे में महान् देशभक्त नेता सुभाषचंद्र बोस की पावन स्मृति को प्रणाम करती हूँ। श्रद्धा-सम्मान व्यक्त कर एक सूत्र में देश भर में गुँजाती अपनी बात कहूँगी—‘तुम मुझे देवनागरी लिपि दो, मैं तुम्हें देश की एकता दूँगी।’

सुनने-पढ़ने में यह छोटा मुँह बड़ी बात या बड़बोलापन लग सकता है, पर व्यावहारिक रूप देने पर ऐसा नहीं रहेगा। यह कठिन भी नहीं है। अब भाषा वैज्ञानिकों और संगणक तत्त्वों ने यह स्थापित किया है कि कुछ अतिरिक्त ध्वनि-चिह्नों के समावेश से सारी भारतीय जनभाषाएँ देवनागरी लिपि में लिखी-पढ़ी जा सकती हैं। दूसरी बात, भाषाई समस्या हिंदी भाषा और भारतीय भाषा-बोलियों की नहीं, लिपियों की है। भारत की सारी भाषाओं का जन्म (कुछ एक को छोड़) संस्कृत से हुआ है और उनमें एक किस्म का संरचनात्मक बहनापा है। उर्दू-हिंदी तो सगी बहनें हैं, इनके अलगाव का कारण लिपि है। लिपि के कारण ही उर्दू के नाजुक खयाल पर असर पड़ा है और उर्दू साहित्य से हम कितने वंचित रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। उर्दू में अरबी व फारसी के शब्द प्रयोग कर अलगाव बढ़ाने के प्रयास कम नहीं हुए, पर यह नुस्खा भाषाओं के बीच लिपियों के अंतर से बने अलगाव और दूरी को खत्म करेगा।

मेरी सखी व जानी-मानी लेखिका डॉ. विद्या केशव चिटको ने अपने अमरीका प्रवास में अंकगणित के अंकों की सहायता से देवनागरी लिपि की सारणी बनाई और हिंदी सीखने के इच्छुक व्यक्तियों को उस सारणी की सहायता से १ से २ सप्ताह की अवधि में देवनागरी लिपि में हिंदी लिखना-पढ़ना सिखा दिया। बोलने के लिए कैसेटों की सहायता ली गई। इस अनुभूत प्रयोग के आधार पर उक्त बड़बोली बात को सहज करने के लिए सभी भारतीय जनभाषा व बोलियों के आधार मूलभूत तत्त्वों से देवनागरी लिपि में ऐसा ही ढाँचा बनाया जाना चाहिए। ऐसा होने पर देवनागरी लिपि के माध्यम से देवनागरी हिंदी भारतीय जनभाषाओं तक पहुँचेगी और भारतीय जनभाषाएँ व बोलियाँ इस तरह राष्ट्रभाषा या शीर्षस्थ भारतीय जनभाषा हिंदी तक पहुँचेंगी। लिपियों की अड़चन छोड़ देवनागरी सीखना-जानना सुगम होगा।

भारतीय जनभाषा बोलियों के मूलभूत ढाँचे का देवनागरी लिपि में निर्माण होने में आनेवाली कठिनाई के संदर्भ में इनके संस्कृत से उद्भव की बात कही गई। दक्षिण की भाषाओं के अध्ययन का भी यह तथ्य है कि कन्नड़ और मलयालम में ४० से ६० प्रतिशत संस्कृत के शब्द हैं। चेन्नई में रहने का मेरा अनुभव है कि देवनागरी लिपि के माध्यम से तमिल सीखना अधिक कठिन नहीं है। देवनागरी लिपि में भारतीय भाषा व बोलियों के इन ढाँचों का सबसे बड़ा सदुपयोग देश भर के सभी प्रांतों में वहाँ के शहर, कस्बों, गाँवों, स्थानों एवं सड़कों के नाम लिखने में होगा और ये हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का भी बड़ा माध्यम बनेंगे। देश में ही नहीं, विदेशों में भी सड़क व स्थानों के नाम पढ़ने हेतु विदेशी पर्यटक भी कामचलाऊ देवनागरी हिंदी सीखकर आएँगे।

अभी कुछ प्रांतों में सड़क व स्थानों के नाम स्थानीय भाषा के साथ रोमन लिपि में लिखे होते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्ति पढ़ नहीं पाता और विदेशी पर्यटक देवनागरी हिंदी सीखकर आने की जरूरत नहीं समझते, क्योंकि उनका काम चल जाता है। अतः रोमन लिपि में लिखकर यह घाटा हम क्यों उठा रहे हैं, क्या कोई बताएगा?

और भी बड़ा विचारणीय पक्ष है कि क्या पिछले डेढ़ सौ वर्षों के हिंदी साहित्य में देश के प्रत्येक प्रांत, अंचल, जनपद की भाषाई संस्कृति जो प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह, गोविंद मिश्र, राजेंद्र अवस्थी, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा—नाम और भी बहुत से यहाँ जुड़ सकते हैं, के साहित्य ने जन-जन तक, देश-विदेश तक हिंदी के माध्यम से पहुँचाई है, क्या यह जबरिया लेखन उस सांस्कृतिक अस्मिता को साहित्य के पटल पर रखने का, जन-जन से जोड़ने का, विश्वव्यापी बनाने का अगला कदम है?

सभी प्रांतों में शहर, गाँव, सड़कों व स्थानों के नाम देवनागरी लिपि में स्थानीय जनभाषा के साथ लिखे होने पर क्या पूरा देश एकता के सूत्र में नहीं बँध जाएगा?

हम पश्चिम बंगाल गए तो वाहन चालक और हम सड़कों व स्थानों के नाम बँगला लिपि में लिखे होने से पढ़ न सके और इस कारण शांतिनिकेतन नहीं जा सके। ये नाम देवनागरी लिपि में लिखे होने पर ऐसे अनुभव की पुनरावृत्ति नहीं होगी और हिंदी भाषा का देशभर में प्रचार-प्रसार भी होगा।

देवनागरी लिपि हमारी संविधान-मान्य राष्ट्रीय लिपि है, जो हमारे संविधान निर्माताओं की सूझबूझ, खोज और भारतीय अस्मिता की रक्षा की दूरदर्शिता का फल है।

देवनागरी लिपि हमारी भारतीय अस्मिता का भंडार, हर क्षेत्र के सहस्रों वर्षों के ज्ञान-विज्ञान के भंडार अमूल्य धरोहर की कुंजी, भारतीय अस्मिता की श्वास, हृदय की धड़कन व जीवन है, क्योंकि यह विश्व के पहले लिखित ज्ञान-भंडार की भाषा संस्कृत की लिपि है। जैन व बौद्ध धर्म-ग्रंथों की भाषा पाली एवं प्राकृत की लिपि है। हिंदी भाषा मराठी, पाली व प्राकृत की लिपि है। हिंदी भाषा मराठी एवं इसकी साहित्यिक बोलियों ब्रज, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी और अनेक बोलियों, जो शब्दों का अक्षय भंडर है, की लिपि है। अफ्रीका की कुछ भाषाओं, जिनकी अपनी लिपि नहीं है, उन्हें देवनागरी में लिखने के प्रयास चल रहे हैं, पर स्वतंत्रता के बाद ही अंग्रेजीपरस्त सत्ताधीशों के प्रयास हिंदी और देवनागरी लिपि को उसके पद से खदेड़ने के रहे तथा रोमन, लिपि को स्थान देने के लिए तर्क-कुतर्कों का लंबा सिलसिला चला। हिंदी राष्ट्रभाषा, राजभाषा व संपर्क भाषा कही गई, तथापि यह डाकतार विभाग, रेलवे और बैंकों में भी नहीं रही। देवनागरी लिपि में आई हिंदी भी खत्म हो गई है। धनादेश (मनीऑर्डर) आवेदन, पत्र गणक पर लिखी रोमन में आता है।

भारतीय जनभाषाओं की समस्या भाषाओं की है ही नहीं, यह समस्या लिपियों की है और यह कुछ ऐसी है, जैसे किसी भोज्य पदार्थ से लगाव के साथ उसके बरतन से भी लगाव हो जाए।

मैं चिंतित हूँ कॉन्वेंट और अंग्रेजी माध्यम की अपनी नई पीढ़ी के लिए, जो देवनागरी लिपि की हिंदी नहीं पढ़ती। यह पीढ़ी क्या अपनी भारतीय अस्मिता के समूचे संस्कृत भाषा के साहित्य से कटकर शून्य नहीं रह जाएगी?

रोमन लिपि का भूत थककर भी नहीं थका। संवाद माध्यमों में उठ बैठता है। प्रांतीय भाषाओं पर तो उसने कब्जा जमा ही रखा है, मगर उनके कार्यक्रमों के नाम-उद्धरण यदि देवनागरी में आएँ तो देश की सांस्कृतिक एकता बढे़गी और भारतीय जनभाषाओं का भी विस्तार होगा। हमारे सत्ताधीश देवनागरी हिंदी को शासकीय क्षेत्रों में चाहे जितना खदेडे़ं, पर देवनागरी हिंदी आज भी चलचित्र, दूरदर्शन व रेडियो पर देश-विदेश में अपनी संजीवनी शक्ति से जिंदा है और जिंदा रहेगी।

क्या होगा हिंदी की भाषाई संस्कृति का

पिछले तीन-चार दशक से शैक्षणिक सुविधाओं के कारण पूर्व का ऑक्सफोर्ड बने और देश के कोने-कोने से आईटीज में काम करने, पढ़ने आए विविध भाषाभाषी समुदायों के सभी प्रकार के समारोह-आयोजनों में शामिल होने का, देखने का मौका मिला है। इस समय सभी भाषाई संस्कृतियों के दृश्य मेरी आँखों में झूल रहे हैं। भविष्य के एक भयावह परिदृश्य की रचना करते देश के कोने-कोने से उठ रहे इस प्रश्न के दंश उत्तर माँगते हैं, उपचार चाहते हैं कि तमिल, तेलुगु, मराठी, बँगला, गुजराती आदि भारतीय भाषाओं की ही नहीं, हिंदी की अपनी उपभाषाओं—ब्रज, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, मगही, मैथिली, छत्तीसगढ़ी की जैसी भाषाई संस्कृतियाँ हैं, उर्दू-अंग्रेजी की जैसी भाषाई संस्कृति हैं, क्या हिंदी की वैसी अपनी भाषा-संस्कृति है?

उत्तर एक ही था और है, ये सब भाषाई संस्कृतियाँ ही हिंदी की भाषाई संस्कृति हैं। हिंदी साहित्य की अस्मिता हैं। हिंदी की इनसे अलग अपनी कोई भाषाई संस्कृति नहीं है। हिंदी की भाषाई संस्कृति इन्हीं उपभाषाओं, भारतीय भाषाओं की भाषाई संस्कृति का समुच्चय है।

तब फिर पिछले दो-तीन दशक से हिंदी की क्षेत्रीय भाषा और बोलियों में जबरिया लेखन-प्रकाशन का जो दौर और उफान उन्हें संविधान की ८वीं अनुसूची में शामिल कराने के साथ आया है, ‘गली का राजा’ बनने की हमारी जो कोशिशें हैं, वे क्या हिंदी पर कुठाराघात और भाषा-बोलियों के लिए आत्मघाती नहीं हैं?

इस जबरिया लेखन-प्रकाशन के पीछे सबल तर्क है, क्षेत्रीय भाषा और बोलियों के विकास का। आंचलिक और जनपदीय लोक-सांस्कृतिक मूल्यों को आधुनिक विधाओं में प्रस्तुत कर नई पीढि़यों से जोड़ने का।

पर इस पक्ष पर हम जरा सा सोचें, ब्रजभाषा का गद्य जब ‘प्रेम सागर’, ‘सुख सागर’ से आगे नहीं बढ़ सका तो आज ब्रज, बुंदेली, मगही, मैथिली में लिखा गद्य क्या ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना कर सकेगा? यह लेखन कितनों तक पहुँचेगा और कैसे यह जनपदीय संस्कृति और जीवन-मूल्यों को प्रस्तुत कर उन्हें अखिल भारतीय स्तर दे सकेगा?

और भी बड़ा विचारणीय पक्ष है कि क्या पिछले डेढ़ सौ वर्षों के हिंदी साहित्य में देश के प्रत्येक प्रांत, अंचल, जनपद की भाषाई संस्कृति जो प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह, गोविंद मिश्र, राजेंद्र अवस्थी, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा—नाम और भी बहुत से यहाँ जुड़ सकते हैं, के साहित्य ने जन-जन तक, देश-विदेश तक हिंदी के माध्यम से पहुँचाई है, क्या यह जबरिया लेखन उस सांस्कृतिक अस्मिता को साहित्य के पटल पर रखने का, जन-जन से जोड़ने का, विश्वव्यापी बनाने का अगला कदम है?

हम भावोन्माद में न बहें, ठंडे दिमाग से सोचें कि भाषा और बोलियाँ उन्हें बोलने और पढ़नेवालों में जीवित रहती हैं। उनमें लिखना और उसका छप जाना उन्हें जीवित नहीं रखता। अवधी में लिखा तुलसीदासजी का ‘रामचरितमानस’ आज विश्व में उसे पढ़नेवालों से ही जीवित है, जबकि अवधी का ही जायसी का ‘पद्मावत’ जैसा महाकाव्य अब कहीं-कहीं पाठ्यक्रमों में हो तो हो।

भाषा और बोलियाँ भाषाई संस्कृति के लोक-सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के प्रस्तुतीकरण का माध्यम भर हैं, ये स्वयं में संस्कृति नहीं। वक्त के साथ यदि माध्यम तदनुरूप न बदले तो संप्रेषण बाधित होता है। ब्रजभाषा के पहले उपन्यास ‘पूँछरी कौ लौठा’ में अब ब्रज और ब्रजभाषा नाम के लिए हैं। आज शायद उसका कोई नाम भी न जानता हो, किंतु गोविंद मिश्र के उपन्यास ‘धीर समीरे’ में ब्रज की पूरी भाषाई संस्कृति और सांस्कृतिक अस्मिता बोलती है। असंख्य हिंदी जाननेवाले-पढ़नेवालों तक पहुँचती है और जब तक हिंदी-अंग्रेजी से पूरी तरह अपदस्थ नहीं होती, पहुँचती रहेगी।

अस्तु, क्षेत्रीय बोली-भाषाओं में यह लेखन उन्हें समृद्ध तो बना सकता है, पर उन्हें जीवित नहीं रख सकता। यह लेखन हिंदी के भाषाई विकास का हिस्सा बन उसे अपने में सुदृढ कर सकता है।

जीवित रहने का प्रश्न पहले उठता है। हमारे देश का युवा वर्ग, जिसे इस लिखे को लिखनेवाली पीढ़ी के बाद पढ़ना है। इस धरोहर का जो उत्तराधिकारी है, वह तो हिंग्लिश बोलता है। अंगे्रजी पढ़ता-लिखता है, इस युवा वर्ग के साथ आज देश भर में बोली समझी जाती—पिछले सौ साल में कहें उसके जन्म के साथ की भाषा खड़ी बोली हिंदी के ही टिक पाने का प्रश्न है तो यह क्षेत्रीय भाषाओं का लेखन इन बोलियों को बोलने-लिखने, पढ़नेवाली ४० से ऊपर की पीढ़ी के साथ अलमारियों की सज्जा बन समाप्त हो जाएगा।

कहाँ बचेंगी ये क्षेत्रीय भाषा-बोलियाँ? कृषि सभ्यता और सामंती व्यवस्था की बहुत सी शब्दावली तो चलन से बाहर हो मूल स्थानों में ही मर चुकी है।

बात एकदम साफ है कि जनपदीय बोलियों, क्षेत्रीय-प्रांतीय भाषाओं से हिंदी का और इनकी सांस्कृतिक अस्मिता का जो रिश्ता हिंदी के स्वतंत्रता पूर्व एवं स्वतंत्रता के बाद के साहित्य में रहा, वही रिश्ता क्षेत्रीय भाषा और बोलियों व हिंदी के लिए जीवन-संजीवनी है।

हिंदी बुंदेली नौनी, ब्रजभाषा सुघर मलूक, उर्दू ‘कमसिन’, मराठी ‘देखणी’, गुजराती दर्शनीय और पंजाबी सोणी के साथ ही इन्हीं से सुंदर है। यदि हम अपनी करतूतों से बाज न आए तो हिंदी की भाषाई संस्कृति और अस्मिता ‘ब्यूटीफुल’ में बँधकर सीमित रह जाएगी, परायी हो जाएगी।

१०३४/१ मॉडल कॉलोनी, कैनाल रोड,
पुणे-४११०१६
दूरभाष: ०२०-२५६६३३१६
—मालती शर्मा

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