घोष बाबू का स्कूल

घोष बाबू का स्कूल

सुबह उठकर घंटा-दो घंटा पढ़ने के बाद थोड़ी देर बाहर लॉन में टहलना घोष बाबू का रोज का नियम है। और अकसर वे बाहर टहल रहे होते हैं, तभी मिल्दू आता है घरों का कूड़ा उठाने के लिए।

‘‘कूड़ा...!’’ उसकी रोज की आवाज एक साथ कई घरों में गूँजती है।

कुछ लोग उसी समय उठकर झटपट ताला खोलते हैं। जल्दी से दरवाजा खोल देते हैं, मगर कुछ मिल्दू के घंटी बजाने पर भी देर तक बेपरवाह सोए रहते हैं। कहीं-कहीं दो-दो, तीन-तीन बार घंटी बजानी पड़ती है। मिल्दू को हर घर का पता है। कौन सा घर सुबह जागा-जागा सा होता है, कौन सा आलस में पसरा, सोया-सोया सा। और कौन सा गहरी नींद की निस्तब्धता में डूबा।

पर घोष बाबू के यहाँ मिल्दू को कोई मुश्किल नहीं थी। क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह आया हो और घोष बाबू का बाहर का दरवाजा बंद हो। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता, जैसे घोष बाबू टहलते हुए उसी का इंतजार कर रहे हैं।

और इधर कुछ दिनों से तो घोष बाबू और उनकी पत्नी मिताली दोनों ही मिल जाते हैं। अकसर वे बाहर वाले लॉन में आरामकुरसी पर बैठे चाय पी रहे होते हैं। साथ ही धीरे-धीरे पता नहीं कौन-कौन सी दुनिया-जहान की बातें कर रहे होते हैं।

मिल्दू के आते ही घोष बाबू बड़े प्यार से कहते, ‘‘आओ बेटा...!’’

एक-दो बार उन्होंने नाश्ता करते हुए मिल्दू से बात करने की भी कोशिश की। यही कि वह रहता कहाँ है? घर में और कौन-कौन हैं और कब से यह काम कर रहा है? उसे कोई परेशानी तो नहीं? किसी चीज की जरूरत तो नहीं!

पर मिल्दू संकेत में जवाब देता, फिर आगे अपने काम पर निकल जाता। जैसे उसकी इस तरह के सवालों में कोई दिलचस्पी न हो।

मिताली अपने पति से कहतीं, ‘‘जब वह बात नहीं करना चाहता तो आप क्यों बार-बार छेड़ देते हैं?’’

घोष बाबू कटकर रह जाते। फिर धीरे से, रुक-रुककर कहते, ‘‘छोटा-सा बच्चा है। पता नहीं किस मजबूरी में उसे यह काम करना पड़ रहा है?’’

पर मिताली घोष बाबू की बात को पूरी तरह अनसुना कर देती थीं। जैसे कहना चाहती हों, ‘आखिर किसी-न-किसी को तो यह काम करना ही है न। तो यही इस काम को करके चार पैसे कमा ले, इसमें क्या बुरा है? कम-से-कम इसके सहारे घर तो चल रहा है न इसका!’

घोष बाबू भी आगे कुछ कहने के बजाय एकदम चुप्पी साध जाते।

पर अगले दिन मिल्दू आता तो फिर उनके मुँह से निकलता, ‘‘आओ बेटा, ठीक तो हो न?’’

पता नहीं क्या बात थी, मिल्दू उनके जेहन से निकलता ही न था।

एक बार घोष बाबू जब नाश्ता कर रहे थे तो उन्होंने मिल्दू को प्लेट में पड़े बिस्कुट उठाकर खाने को दिए। कहा, ‘‘लो बेटा, खा लो।’’ पर उसने मना कर दिया। बोला, ‘‘रहने दीजिए बाबूजी, ऐसे ही ठीक हूँ।’’

घोष बाबू को अचरज हुआ। वे फिर से मिल्दू के बारे में सोचने लगे। सोचते, ‘देखो, कपड़े कितने मामूली हैं, फटे-पुराने। लेकिन बोलना-चालना इसका...! सबमें कुछ नफासत है। जैसे काफी समझदार हो। अपनी उम्र से ज्यादा समझदार। फिर इनकार भी किया तो किस तरह?...सचमुच यह लड़का कुछ अलग सा है। इसमें कुछ अलग बात है।’

एक बार की बात, इतवार का दिन था। घोष बाबू को आज दफ्तर नहीं जाना था। मिल्दू कूड़ा उठाने के लिए आया। कूड़ा उठाने के बाद वापस कूड़ेदान रखकर जाने लगा तो घोष बाबू ने उसे पुकार लिया। बोले, ‘‘मिल्दू, कुछ काम है तुमसे। कब फ्री होगे?’’

‘‘कौन सा काम?’’ मिल्दू एकाएक चौंका। जैसे बात का सिरा न पकड़ पा रहा हो।

‘‘वह तो बाद में बताऊँगा। पर पहले बताओ, तुम्हारा यह काम कब तक खत्म हो जाएगा। फिर कोई और काम तो नहीं है।’’

घोष बाबू की आँखें मिल्दू के चेहरे पर टँगी थीं।

पता चला, कोई बारह-साढ़े बारह बजे तक मिल्दू सब घरों का कूड़ा उठाता और उसे शहर के बाहरवाले बड़े कूड़ेदान में डालकर घर पहुँच जाता था। नहाता-धोता है, नाश्ता करता है और कोई एक बजे बिल्कुल फ्री हो जाता है। फिर यह भी पता चला कि शाम को पाँच-साढ़े पाँच बजे उसे कहीं और भी काम पर जाना होता है।

‘‘तो ठीक है, साढ़े बारह या एक बजे सही। थोड़ा सा काम है, आ जाना।’’ घोष बाबू ने कहा।

‘‘ठीक है, बाबूजी!’’ कहकर मिल्दू चला गया। कुछ-कुछ अपनी उधेड़-बुन में खोया सा।

घोष बाबू चुपचाप उसे जाते हुए देखते रहे।

दोपहर को मिल्दू आया तो सुबह से काफी कुछ अलग लग रहा था। नहाया-धोया हुआ, साफ-सुथरा। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की दीप्ति थी।

‘‘हाँ, बाबूजी, बताइए?’’ उसने गंभीरता से कहा।

घोष बाबू मुसकराए। बोले, ‘‘बैठो, काम भी बताता हूँ। पर पहले दो-चार बातें तो कर लें।’’

अब मिल्दू थोड़ा निश्चिंत सा, आराम से बैठ गया और बातें चल निकलीं।

पता चला कि मिल्दू के पिता नहीं हैं। कोई पाँच साल हुए वे गुजर गए। मिल्दू तब सात-आठ साल का रहा होगा। तभी से वह यह काम कर रहा है। घर में माँ है, एक छोटी बहन भी, और वे भी यही काम करती हैं।

‘‘क्या हमेशा यही करोगे, यही करते रहोगे?’’ घोष बाबू ने पूछा और गौर से मिल्दू की आँखों में देखने लगे।

मिल्दू ने हैरानी से घोष बाबू की ओर देखा कि वे कहना क्या चाहते हैं?

‘‘इसलिए कह रहा हूँ मिल्दू, कि जिस फैक्टरी में मैं काम करता हूँ, उसमें भी तुम्हें काम मिल सकता है। क्या नहीं करना चाहोगे? मैं मैनेजर साहब से कह दूँगा, वे तुम्हें रख लेंगे। तनख्वाह अच्छी है, और काम भी कुछ अलग सा...!’’

‘‘पर...पर साहब, यह कैसे?’’ मिल्दू कुछ हैरान हुआ। और यह हैरानी उसके चेहरे व आँखों में साफ पढ़ी जा रही है।

‘‘कुछ खास नहीं। मैं मैनेजर साहब से कह दूँगा तो वे रख लेंगे। उन्हीं के हाथ में है सब कुछ। सारी नियुक्तियाँ वे ही करते हैं, पर मेरा कहना मान लेते हैं। इसलिए जरा भी मुश्किल नहीं है।...तुम यकीन मानो।’’ घोष बाबू ने एक बार फिर दोहराया।

इस बार मिल्दू की आँखों में चमक दिखाई दी। ‘‘सच...?’’ उसने अंदर की खुशी छिपाते जैसे कहा।

‘‘हाँ, सच...बिल्कुल सच।’’ मिल्दू के चेहरे पर अचानक आई रौनक देखकर घोष बाबू इतने खुश हुए, मानो उन्हें कोई खजाना मिल गया हो।

‘‘पर साहब, वह कैसे?’’ थोड़ी देर बाद मिल्दू फिर पूछ रहा था। जैसे अंदर-ही-अंदर कुछ टटोल रहा हो।

‘‘वही तो बता रहा हूँ।’’ घोष बाबू हँसकर बोले, ‘‘काम तुम्हें मिल सकता है। बल्कि निश्चित मिल जाएगा। और इससे बहुत अच्छा काम होगा। पर अभी नहीं, तुम्हें उसके लिए अभी पढ़ना होगा।’’

सुनकर मिल्दू के चेहरे की खुशी कुछ-कुछ तिरोहित हो गई। वहाँ अब उलझन नजर आ रही थी। जैसे पास आई हुई चीज अचानक दूर चली गई हो।

‘‘अच्छा मिल्दू, तुम कितनी जमात पढ़े हो?’’ घोष बाबू ने पूछा।

‘‘कक्षा चार, बाबू साहब। उसके बाद तो पढ़ाई छूट ही गई...!’’ कहते हुए मिल्दू के चेहरे पर मलाल था। एक उदासी का तार अंदर-अंदर काटता हुआ।

‘‘तो क्या हुआ, मैं पढ़ाऊँगा।’’ घोष बाबू ने कहा, ‘‘एक साल बाद तुम पाँचवीं का इम्तिहान दे देना। फिर आगे हाईस्कूल तक तो तुम्हें पढ़ना ही चाहिए। प्राइवेट भी हाईस्कूल का इम्तिहान दे सकते हो। काम करते रहो और पढ़ते भी रहो।...पर तुम चिंता न करो, पढ़ाऊँगा मैं और किताबें भी दूँगा। यह जिम्मा मेरा।’’

‘‘अच्छा, बाबूजी...?’’ मिल्दू को यकीन नहीं हो रहा था।

‘‘हाँ-हाँ, तुम क्या सोच रहे हो? मैं क्या खाली कहने के लिए कह रहा हूँ?’’ घोष बाबू के चेहरे पर कोई अलग ही बात थी, जिसने मिल्दू को रिझा लिया।

हालाँकि मिल्दू अब भी अपनी कशमकश से बाहर नहीं आ पाया था। वह सोच रहा था, ‘यह कैसे होगा, होगा भी कि नहीं? यह सच है कि सपना...? क्या मैं सच ही पढ़-लिख पाऊँगा?’

पर चाहे सपना ही हो, इससे उसे इतनी खुशी हुई जैसे अभी उठकर नाचना शुरू कर दे।

‘‘पर यह काम...?’’ उसने घोष बाबू ने पूछा। फिर खुद ही कहा, ‘‘यह तो जरूरी है, वरना तो साहब, हमारा घर नहीं चल सकता।’’

‘‘हाँ-हाँ, तो इसे छोड़ने के लिए मैं कब कहता हूँ?...तुम इसे करते रहो, बस मेरे पास शाम के समय आ जाया करो। रोजाना कोई दो-ढाई घंटे पढ़ा दिया करूँगा और इतवार को जब मेरी छुट्टी रहती है, दोपहर को भी आ सकते हो।...उस दिन थोड़ी ज्यादा पढ़ाई हो जाएगी।’’ घोष बाबू ने समझाया।

‘‘पर साहब, किताबें...?’’ मिल्दू ने कुछ परेशान होकर कहा।

इस पर घोष बाबू अंदर गए और बच्चों की एक सुंदर सी किताब लेकर आए। उसे मिल्दू के हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ‘‘लो, पढ़ो।’’

उस सुंदर रंग-बिरंगी किताब में बच्चों के लिए छोटी-छोटी कविताएँ और कहानियाँ थीं। घोष बाबू बोले, ‘‘मिल्दू, यह रही तुम्हारी किताब। मैं बोल-बोलकर पढ़ दूँगा, तुम सुनते जाओ। चित्र भी हैं इनमें। बाद में खुद पढ़ना, अच्छे से समझ में आएगा।’’

फिर घोष बाबू ने एक-एक करके दो-तीन कविताएँ पढ़कर सुनाईं तो मिल्दू का चेहरा खिल गया। इनमें एक कविता थी, कुक्कू और उसकी नानी की। एक कविता थी, कुक्कू और उसका घोड़ा। एक और कविता में कुक्कू और बादलपुर का किस्सा था। सुनते हुए मिल्दू को लगा, जैसे वह भी कुक्कू के साथ दुनिया भर की सैर करके आ गया है। यहाँ तक कि एक छोटे से बादल के साथ उड़ते-उड़ते आसमान में बादलपुर तक जा पहुँचा है। इसी तरह दिल्ली की सैरवाली कविता भी मिल्दू को बहुत अच्छी लगी। मिल्दू ने कभी दिल्ली देखी न थी। उसे लगा, कविता पढ़कर उसने भी दिल्ली का लाल किला देख लिया, कुतुब मीनार देख ली। कनाट सर्कस का भी चक्कर लगा लिया।...

घोष बाबू ने देखा कि मिल्दू का मन किताब में रमने लगा है, तो उनके आनंद का ठिकाना न था। वह आनंद उनकी आवाज में भी छलकने लगा था। इससे मिल्दू को और भी मजा आया।

फिर कहानियों का नंबर आया। सबसे मजेदार कहानी थी, शरारती चुहिया और दर्जी की। उस शरारती चुहिया ने अपनी टोपी बनवाने के लिए दर्जी नफासत अली को क्या खूब छकाया? कैसी-कैसी बढि़या तरकीबें लगाईं। वाह-वाह...! पहले उसका पर्स छिपा दिया। फिर अपनी अटपटी बातों से उसे खूब हँसाया। हँसते-हँसते दर्जी नफासत अली के पेट में दर्द होने लगा। हारकर बोला, ‘ओ री ओ शरारती चुहिया, अभी सीता हूँ तेरे लिए सुंदर सी रंग-बिरंगी टोपी!’ और फिर वह नन्ही सी, सुंदर सी टोपी तैयार हुई तो उसे पहनकर नन्ही चुहिया खूब नाची, खूब...!

कहानी सुनकर मिल्दू खूब जोरों से खिलखिलाकर हँसा। देर तक हँसता ही रहा। मिल्दू की वह हँसी घोष बाबू के मन में गड़ी रह गई। सोचने लगे, ‘यह इसके भीतर का छिपा हुआ बचपन है। यकीनन इसके भीतर जो बच्चा है, वह सही माहौल मिले तो अच्छे संस्कारित रूप में सामने आ सकता है। आगे चलकर कुछ बन सकता है, कुछ कर सकता है। अब तो जो जिम्मेदारी का बोझ इसके सिर पर है, उसने इसके बचपन को पूरी तरह कुचलकर रख दिया है, पूरी तरह...!’

पर अच्छी बात यह थी कि पहले दिन ही मिल्दू पर घोष बाबू की बातों का जादू जैसा असर हो गया था।

पहली बार उसने अपने आपको अंदर-बाहर से बदला हुआ महसूस किया था। उसे लग रहा था, कुछ हो सकता है। जरूर हो सकता है। वह चाहे तो अपनी जिंदगी को सिरे से बदल सकता है।

इसके बाद मिल्दू रोजाना घोष बाबू के घर आने लगा। खूब ध्यान से पढ़ने-लिखने लगा। घोष बाबू जो कुछ पढ़ाते, उसे वह बहुत जल्दी समझ लेता। याद भी कर लेता। घोष बाबू समझ गए कि उनके सामने एक अनगढ़ पत्थर है, पर वे उसे तराशेंगे, तो उसकी चमक दूर तक दिखाई पड़ेगी। वे उसे खेल-खेल में ही पढ़ाते। बीच-बीच में खूब हँसाते। मिल्दू कभी इतना नहीं हँसा था। पर घोष बाबू का तरीका ही खूब हँसा-हँसाकर पढ़ाने का था। कहानी-किस्सों और मजेदार कविताओं के जरिए ही वे जीवन की बड़ी-बड़ी गूढ़ बातें समझा देते। ज्ञान-विज्ञान की बातें भी कहानियों की शक्ल में पेश करते तो मिल्दू झट से उन्हें याद कर लेता। खुद भी आगे सोचता। पहली बार उसके दिमाग के जंग लगे ताले खुले थे।

मिल्दू सोचता, ‘पढ़ाई-लिखाई इतनी मुश्किल चीज तो नहीं है। मैं तो बेकार ही डर रहा था।’

और घोष बाबू सोचते, ‘मिल्दू बहुत जल्दी पढ़ाई-लिखाई की दुनिया में चल निकला है। ऐसे ही यह सरपट दौड़ता रहा तो एक दिन...!’

फिर एक बार घोष बाबू ने मिल्दू से कहा, ‘‘मिल्दू, इस इतवार को मैं तुम्हारे घर आऊँगा।’’

मिल्दू को यकीन नहीं आया। बोला, ‘‘सच्ची, मास्टरजी?’’

‘‘हाँ सच्ची, एकदम सच्ची।’’ घोष बाबू बोले, ‘‘मैं तुम्हारे घर आऊँगा। वहीं तुम्हें पढ़ाऊँगा। साथ ही तुम्हारा घर भी देख लूँगा।’’

मिल्दू को यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी कोठी में रहने वाले घोष बाबू कभी उसके घर आएँगे। वह उन्हें कहाँ बैठाएगा, यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

पर इतवार आया तो सचमुच घोष बाबू मिल्दू के घर जा पहुँचे। मिल्दू बड़े संकोच में था कि उन्हें कहाँ बैठाए? कैसे उनका सत्कार करे?

पर घोष बाबू तो अपने आनंद में थे। वे मिल्दू के घर के सामने बिछी चारपाई पर ही बड़े ठाट से बैठे। बीच में अंदर जाकर उसका घर भी देखा। मिल्दू की माँ से बड़े आदर से मिले। उसकी छोटी बहन रेखा ने चाय बनाई तो वहाँ बैठकर चाय भी पी। और रेखा बिटिया के हाथ की बनी चाय की प्रशंसा करना भी न भूले।

फिर घोष बाबू ने मिल्दू को उसके घर के आगे एक पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाया, तो देखकर आसपास के और बच्चे भी आ गए। उनमें से ज्यादातर स्कूल नहीं जाते थे। सबकी हालत मिल्दू जैसी ही थी। मिल्दू ने सबको बता रखा था घोष बाबू के बारे में। घोष बाबू को देखा तो वे बच्चे पहले तो शरमाए, फिर हिम्मत करके पास आकर खड़े हो गए। बोले, ‘‘मास्टरजी, हम भी आ जाएँ?’’

‘‘अरे, आओ-आओ, यह तो खुला स्कूल है। यहाँ कोई हाजिरी नहीं, कोई फीस नहीं। हर किसी का स्वागत है!’’

घोष बाबू जोर से हँसे तो सबकी हिचक दूर हो गई। फिर तो देखते-ही-देखते वहाँ पंद्रह-बीस बच्चे इकट्ठा हो गए। उनकी खुशी, उनकी उमंग और उत्साह का ठिकाना न था। अब तक स्कूल उन्हें कोई डराने वाली खौफनाक चीज लगता था। पहली बार उन्होंने ऐसा स्कूल देखा, जो हँसने वाला स्कूल था। जहाँ हँसते-हँसते पढ़ाई होती थी और जीवन के अनमोल पाठ सीखे जाते थे।

इतने बच्चों को देखकर घोष बाबू भी उत्साहित थे। बच्चों के उत्साह ने उनका उत्साह और बढ़ा दिया था। वे अपने पूरे रंग में आ गए। मिल्दू के साथ-साथ वहाँ आए सारे बच्चों को उन्होंने एक से एक मजेदार कविता और कहानियाँ सुनाईं। उनसे खूब हँस-हँसकर बातें कीं और पढ़ाया भी। उन्हें खेल-खेल में इस दुनिया की बहुत सी मजेदार बातें बताईं। फिर विज्ञान के नए-नए आविष्कारों और करिश्मों के बारे में बताया। दुनिया के साहसी यात्रियों के बारे में बताया, जिन्होंने हर खतरा उठाकर दुनिया के अनजाने प्रदेशों की सैर की, और बड़ी-से-बड़ी बाधाओं और विपदाओं की परवाह नहीं की। देश-दुनिया के महापुरुषों के बारे में बताया। उन्होंने बचपन में बहुत गरीबी देखी, बड़ी से बड़ी मुश्किलें झेलीं, लेकिन बड़े होकर बड़े-बड़े काम किए। दुनिया में नाम कमाया।

हर किसी के लिए ये बातें नई थीं। बच्चों को लगा, ऐसी बातें तो कोई नहीं बताता। और इतनी मजेदार कविताएँ और कहानियाँ भी कोई नहीं सुनाता। जबकि घोष बाबू तो कहानियाँ सुनाते ही नहीं थे, खुद बच्चों से सुनते भी थे। इससे बच्चों का हौसला और बढ़ता था, आनंद भी। कोई दो-सवा दो घंटे तक घोष बाबू की क्लास चली। इस बीच न घोष बाबू को समय का कुछ खयाल रहा और न बच्चों को। बल्कि आस-पास बस्ती के बहुत सारे बड़े लोग भी इकट्ठे हो गए थे। वे भी हैरान होकर घोष बाबू के इस नए स्कूल को देख रहे थे और आनंद उठा रहे थे। साथ ही सोच रहे थे, कि उनके बचपन में भी ऐसा ही स्कूल होता तो वे भी क्यों न पढ़ने जाते और पढ़-लिखकर कुछ बन भी सकते थे।

क्लास के बाद घोष बाबू ने बच्चों से खुलकर बात की। पूछा, ‘‘हाँ भई, साफ-साफ बताओ, कैसा लगा हमारा स्कूल...?’’

सुनकर सारे बच्चों का समवेत स्वर, ‘‘बहुत अच्छा मास्टरजी, बहुत ही अच्छा।’’

‘‘तो क्या हर इतवार को मैं पढ़ाने आऊँ तो तुम लोग भी आओगे?’’

‘‘हाँ मास्टरजी, आएँगे, जरूर आएँगे।’’ बच्चों का उत्साहित स्वर। इनमें मिल्दू की बहन रेखा भी थी। बल्कि रेखा की कई और सहेलियाँ भी। लड़कियों को यहाँ कोई स्कूल भेजता ही नहीं था। पर मिल्दू ने अपनी बहन रेखा को बताया, तो उसके मन में भी पढ़ने की ललक पैदा हो गई। फिर उसने अपनी सहेलियों रेशमी, आरती और संध्या को बताया। उस बस्ती की और लड़कियों को भी पता चला। अब तो वे सभी घोष बाबू के स्कूल में पढ़ने के लिए उत्साहित हो गईं।

घोष बाबू को लगा, वे तो एक मिल्दू की तलाश में आए थे, पर यहाँ तो एक नहीं कई मिल्दू हैं। तो अब तय हुआ कि घोष बाबू हर इतवार को यहाँ आकर पढ़ाया करेंगे, ताकि मिल्दू के साथ-साथ बस्ती के और बच्चे भी पढ़-लिख लें। बाकी दिनों में मिल्दू शाम के वक्त घोष बाबू के घर जाकर पढ़ आया करेगा। जो कुछ सीखेगा, वह बस्ती के दूसरे बच्चों को भी सिखाएगा।

मिल्दू खूब उत्साहित था। बस्ती के और बच्चे भी। लड़के, लड़कियाँ दोनों ही। उन्होंने तय किया कि वे अपने घर के सामनेवाले मैदान को साफ करके बच्चों के बैठने का इंतजाम कर देंगे। बस्ती के बड़े-बुजुर्गों ने भी मदद करने का फैसला किया। घोष बाबू का स्कूल चल पड़ा।

इतवार आया तो शाम के समय घोष बाबू के आने से पहले ही सब बच्चों ने मिल-जुलकर मैदान की खूब अच्छी तरह सफाई की। फिर दौड़कर अपने-अपने घरों से बोरे ले आए और उन्हें बिछाकर बैठ गए। सब अपने घरों से अच्छी तरह हाथ-मुँह भी धोकर आए थे।

सबको घोष बाबू का इंतजार था। पिछली बार घोष बाबू की सुनाई हुई कविताएँ और कहानियाँ उन्हें याद आ रही थीं और सोचते थे, ‘देखें, भला आज घोष बाबू क्या सुनाते हैं?’

थोड़ी देर में घोष बाबू और उनकी पत्नी मिताली दोनों आ पहुँचे। पर इस बार घोष बाबू के पास लाल रंग का एक बहुत बड़ा थैला था। उसमें कहानी और कविताओं की सुंदर-सुंदर रंग-बिरंगी किताबें थीं। कॉपियाँ थीं, पेंसिल और रंग थे। और भी बहुत कुछ। साथ ही चेहरे पर बड़ी रहस्यपूर्ण मुसकान।

बच्चों की उत्सुक आँखें उन थैलों को टटोल रही थीं। उन्हें लगा, घोष बाबू इस बार अपने साथ सांताक्लॉज की तरह कोई जादू का पिटारा भी ले आए हैं, जो अभी खुलने ही वाला है। और सचमुच वह जादू का पिटारा थोड़ी देर बाद खुला। मिताली मैडम ने उस थैले में से सुंदर-सुंदर किताबें निकालीं और एक-एक करके सब बच्चों में बाँटनी शुरू कीं। यह क्या...? बच्चों की उत्सुक आँखों में सवाल। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सुंदर किताबें मिताली मैडम उन्हीं के लिए लाई हैं और अब ये हमेशा-हमेशा के लिए उन्हीं के पास रहेंगी।

वे बड़ी उत्सुकता से उन किताबों को छू रहे थे, धीरे-धीरे बड़ी सावधानी से उलट-पलट रहे थे और उनमें बने सुंदर-सुंदर रंग-बिरंगे चित्रों का आनंद ले रहे थे। किसी में किताब पढ़ता हुआ भालू था, किसी में माइक के आगे गाना गाती हुई चिडि़या, किसी में फुटबॉल खेलता हुआ हाथी, किसी में कंधे पर बस्ता टाँगे स्कूल जाता हुआ शेर। सबसे मजेदार थी बिन्नो बछिया, जो एक पार्क में बच्चों की फिसलन पट्टी पर झूल रही थी और पास खड़े बच्चे हँस-हँसकर पागल हुए जा रहे थे। ऐसे प्यारे चित्र बच्चों ने पहले कभी देखे नहीं थे। वे चित्रों को देख-देखकर रोमांचित थे। सोच रहे थे, ‘काश, हम इन सुंदर किताबों को पढ़ पाते!’

फिर घोष बाबू ने कुछ बच्चों के हाथों से किताबें लेकर उनमें से खूब मजेदार कविता-कहानियाँ सुनाईं। थोड़ी गिनती और क, ख, ग सिखाया। बोलना और पढ़ना भी सिखाया। इसके बाद सबको कॉपियाँ, पेंसिलें और कलर देकर अपने मन से कोई-न-कोई चित्र बनाने के लिए कहा। इस पर सबसे ज्यादा उत्सुकता और गहमागहमी नजर आई। हर बच्चे के भीतर कोई-न-कोई अनगढ़ कलाकार छिपा बैठा था, जो निकलकर आया। एक से एक सुंदर और मनोरंजक चित्रों को देखकर घोष बाबू और मिताली रोमांचित थे। सोच रहे थे, इन मैले बच्चों के दिल कैसे हीरे जैसे हैं!

चलते-चलते घोष बाबू ने कुछ आस-पास की दुनिया-जहान की दिलचस्प बातें बताईं। और फिर अँधेरा छाने लगा तो सब बच्चों से विदा लेकर अगले इतवार को आने का वादा करके वे दोनों चल पड़े।

अगले इतवार को मिताली और घोष बाबू आए, तो पहले से कहीं ज्यादा बच्चे उस मैदान में जमा थे। सब पढ़ना चाहते थे, कविता-कहानी सुनना चाहते थे और खुद भी बहुत कुछ सुनाना चाहते थे।

इस बार घोष बाबू और मिताली ने बच्चों को एक नाटक की तैयारी कराई। नाटक का नाम था, ‘पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे अच्छे’। इसमें एक स्कूल के मास्टरजी थे, भोलानाथ मास्टरजी, और उनकी क्लास के बच्चे। इन बच्चों में एक पैसेवाले पिता का शरारती बच्चा भी था, बीरू। बड़ा मोटा और ऊधमी। खाने-पीने का शौकीन। न वह खुद पढ़ता था और न किसी को पढ़ने देता था। उल्टे मास्टर भोलानाथजी को तरह-तरह से तंग करता था। पर मास्टर भोलानाथजी इतने अच्छे थे और सब बच्चों को इतना प्यार करते थे कि आखिर तक आते-आते बीरू एकदम बदल गया।

घोष बाबू घर से ही पूरा नाटक लिखकर लाए थे। नाटक के संवाद बड़े चुस्त और मजेदार थे। बीच-बीच में हँसी की फुहारें भी थीं। बच्चों ने उसमें और भी जान डाल दी। उन्होंने इतनी अच्छी तरह से अपना-अपना पार्ट किया कि घोष बाबू को बहुत अच्छा लगा। कहा, ‘‘थोड़ी और प्रैक्टिस करो तो इसका बढि़या सा प्रदर्शन होगा। यहीं तुम्हारी बस्ती में।...क्यों, ठीक है न!’’

‘‘जी, मास्टरजी...!’’ एक साथ कई आवाजें।

और उस बार तो नहीं, पर दो-तीन इतवार छोड़कर नाटक के प्रदर्शन की भी तैयारी हुई। उसी मैदान में बल्लियाँ गाड़कर शामियाना लगाया गया। रंग-बिरंगी झंडियाँ लगीं। सुंदर सा मंच बना और फिर ‘डम-डम-डम...डम डमाडम’ संगीत के साथ नाटक शुरू हुआ तो उस बस्ती के सारे लोग वहाँ इकट्ठे हो गए। बच्चों ने अपना-अपना पार्ट बड़े लाजवाब ढंग से निभाया। बीच-बीच में चुटीली हँसी वाले संवाद थे। कहीं-कहीं तो बीरू की अटपटी शरारतों वाले प्रसंग में इतनी मजेदार सिचुएशन थी कि नाटक देखने वाले दर्शक हँस-हँसकर लोट-पोट हो गए। भोलानाथ मास्टरजी का पार्ट खुद घोष बाबू ने किया, और सच ही नाटक में जान डाल दी। बस्ती के बच्चों का जोश अब बढ़ गया था। उन्हें लगा, हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते? पर हमें बड़े सपने देखने चाहिए। फिर उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान से जुट जाना चाहिए।

और मिल्दू तो जैसे उन सबका नेता बन गया हो। वह सभी को समझाता, ‘‘हम इसी हालत में क्यों रहें? क्या हमें ईश्वर ने कूड़ा उठाने के लिए पैदा किया है? क्या हम बड़े-बड़े काम नहीं कर सकते? क्यों नहीं कर सकते?’’

मिल्दू की बातें सुनकर बस्ती के सारे बच्चों में पढ़ने-लिखने की खासी ललक पैदा हो गई। अब तो घोष बाबू और मिताली पढ़ाने आते तो पूरा मैदान बच्चों से भरा होता। आस-पास उनके मम्मी-पापा और बड़े लोग भी आकर बैठ जाते। कभी-कभी तो इतने ज्यादा लोग हो जाते कि पढ़ाने-लिखाने में भी दिक्कत होने लगी।

घोष बाबू को एक तरीका सूझा। उन्होंने सोचा, ‘मिल्दू को जल्दी से पढ़ा-लिखा दिया जाए, तो वह बड़ा काम कर सकता है। वह दूसरों को तो पढ़ाएगा ही, पूरी बस्ती में भी जागृति की लहर पैदा हो सकती है।’

घोष बाबू ने मिल्दू को बुलाकर कहा, ‘‘देखो मिल्दू, मेरा रिटायरमेंट अब नजदीक आ गया। दो-तीन महीने की छुट्टियाँ बची हुई हैं। सोचता हूँ, ले लूँ। तो अब मेरे पास ज्यादा समय होगा। तुम चाहो तो ज्यादा देर तक पढ़ लो, ताकि हाईस्कूल तक का कोर्स तुम्हारा जल्दी से खत्म हो जाए। फिर इम्तिहान जब होगा, दे देना।’’

मिल्दू के लिए यह दुगनी खुशी की बात थी। एक तो उसे नई जिम्मेदारी मिल रही थी। दूसरे, तेजी से पढ़-लिखकर आगे निकलने का अवसर भी। उसे भला इसमें क्या आपत्ति होती? उसने खुशी-खुशी हाँ में सिर हिला दिया। मिल्दू दो-तीन महीने में ही खासा पढ़-लिख गया। तो अब वह खुद भी बस्ती के बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ा दिया करता। इतवार को घोष बाबू और मिताली पढ़ाने आते और बोलते-बोलते थक जाते तो बीच में मिल्दू खड़ा हो जाता। वह सब बच्चों को पढ़ाता, उनकी कॉपियाँ चेक करता और उन्हें नए जीवन की सीख देनेवाली बातें भी बताता।

धीरे-धीरे समय बीता। मिल्दू ने हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली। अच्छे नंबर आए तो घोष बाबू के कहने पर इंटरमीडिएट में दाखिला ले लिया। इंटरमीडिएट में वह और ज्यादा उत्साह से पढ़ा। घोष बाबू ने भी उसकी तैयारी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मिल्दू इस बार फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ।

जिस दिन रिजल्ट आया, मिल्दू की हालत अजीब थी। वह सीधा घोष बाबू के घर गया। बोला, ‘‘गुरुजी आपने मुझे मंत्र दिया था, शिक्षा का मंत्र! इम्तिहान में तो पास हो गया। पर...आप देख लीजिए, मैं आपकी कसौटी पर खरा उतरा हूँ या नहीं?’’

सुनकर घोष बाबू ने उसे छाती से लगा लिया। फिर कहा, ‘‘मुझे खुशी है, मैंने तुम्हारी आँखों में जो प्रकाश देखा, तो वह आज तुम्हारे पूरे जीवन में फैल गया है। पर यह प्रकाश केवल तुम्हारे जीवन में न रहे, बल्कि बस्ती के सब बच्चों तक पहुँचना चाहिए।...मेरी इच्छा है कि बस्ती के बस बच्चों को पढ़ाओ। हम एक स्कूल खोलते हैं। वहाँ कोई फीस नहीं ली जाएगी। हर बच्चा एडमिशन ले सकता है। वहाँ मुफ्त किताबें मिलेंगी, मुफ्त पढ़ाई। और अध्यापक का जिम्मा तुम्हें लेना पड़ेगा। तुम्हारा वेतन मैं दूँगा और स्कूल चलाने का खर्च भी।...और हाँ, साथ ही साथ आगे की पढ़ाई भी करते रहो। तुम्हें पढ़ाने का जिम्मा मेरा।’’

‘‘जी...!’’ मिल्दू के भीतर अजब सी आँधी चल रही थी। एक थरथराहट भरी शुरुआत। एक नया मिल्दू बहुत जल्दी सामने आनेवाला था। और घोष बाबू और मिल्दू की कोशिशों से बड़ी जल्दी वह स्कूल खुल गया, जिसका नाम था—‘नवप्रभात स्कूल’।

घोष बाबू कहते, ‘‘मिल्दू, अब बस्ती का अँधेरा छट जाएगा। यह नवप्रभात स्कूल बस्ती के लोगों को शिक्षा का एक नया मंत्र देगा। बस, तुम इससे दूर मत जाना। तुम्हीं इस नवप्रभात स्कूल की आत्मा हो।’’

मिल्दू ने कुछ कहा नहीं। धीरे से झुका और घोष बाबू के पैर छू लिये। उसकी आँखों में आँसू थे। और सचमुच दो-तीन महीनों में ही नवप्रभात स्कूल खूब चल निकला। उसमें घोष बाबू, मिताली, मिल्दू तो पढ़ाते ही हैं। धीरे-धीरे एक-दो और उत्साही अध्यापक आ गए। पढ़ाने के अलावा डिबेट होती, नाटक होते, कला और संगीत की शिक्षा दी जाती और खेल-कूद भी।

यह केवल क्लासरूम की पढ़ाई न थी। मिल्दू बच्चों को जीवन की सीख देने के लिए जगह-जगह अपने साथ लेकर जाता। नए-नए स्थल दिखाता। कभी उन्हें लाल किला और कुतुब मीनार जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर ले जाकर गुजरे हुए समय के इतिहास से रूबरू कराया जाता तो कभी बाग-बगीचों में जाकर रोचक ढंग से फूलों और वनस्पतियों की जानकारी दी जाती। नदियों और पहाड़ों की सैर कराई जाती। रोचक किस्से-कहानियों की तरह इतिहास, भूगोल और विज्ञान पढ़ाया जाता। अब केवल स्कूल स्कूल न था, पूरी जिंदगी ही एक स्कूल थी।

यह हँस-हँसकर पढ़ाने-लिखाने का नया प्रयोग था। बच्चों ने इसे नाम दे दिया, ‘हँसनेवाला स्कूल।’

अब मिल्दू की तो हालत यह थी कि जैसे उसे पंख लग गए हैं। जब से यह स्कूल खुला था, रात-दिन वह इसी के बारे में सोचता। और रहता भी यहीं था। वही इस स्कूल का प्रिंसिपल भी था, कर्ता-धर्ता भी। और घोष बाबू और मिताली तो दौड़-दौड़कर इस स्कूल में आते और कहते, ‘‘इन साधारण बच्चों को पढ़ाते हुए इतना सुख मिलता है कि हम नहीं जानते, स्वर्ग का सुख क्या होता है?’’

कोई घोष बाबू से उनके बच्चों के बारे में पूछता तो हँसकर कहते हैं, ‘‘भाई, हमारे तो यही बच्चे हैं। सबसे प्यारा बच्चा है मिल्दू, और फिर ये सारे बच्चे।’’

मालूम पड़ा, घोष बाबू का एक ही बेटा है, मुक्तेश, जो इंजीनियरिंग पढ़ने अमेरिका पढ़ने गया और फिर वहीं बस गया। वहीं उसने अंजिका नाम की लड़की से विवाह कर लिया। एक छोटा सा बच्चा भी है, कीर्तिसंभव। विवाह के बाद बेटे से बस इतना संबंध रह गया है कि वह साल में एक बार आ जाता है मिलने अंजिका और संभव के साथ।

घोष बाबू अपने बेटे-बहू और पोते संभव से कम प्यार करते हों, ऐसा नहीं। पर उनके जीवन में बहुत कुछ खाली-खाली सा छूट गया था। वहाँ कोई धड़कन नहीं थी, भावनाओं की कोई हलचल नहीं। सबकुछ रीता-रीता सा। उस खालीपन को भरा मिल्दू और लिखने-पढ़ने के लिए उत्सुक गरीब बच्चों की टोली ने। और सच्ची बात तो यह कि उनका मन गरीब बस्ती के इन गरीब बच्चों को देखकर ही खिलता है। और वे सबसे कहते हैं, ‘‘अब तो यही हैं मेरी आशा के केंद्र। इन्हीं में मेरा मन रमता है।’’

उन्होंने खुद अपने हाथों से वसीयत लिखकर रख ली है, ‘‘मेरे बेटे मुक्तेश को किसी चीज की कमी नहीं है। जबकि मिल्दू और उसके स्कूल के गरीब बच्चे छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसकर रह जाते हैं। यह देखकर मेरा मन तड़पता है।...तो मैंने तय कर लिया है कि मेरे और मिताली के बाद मिल्दू ही हमारी संपत्ति और विरासत का उत्तराधिकारी होगा। स्कूल का पूरा प्रबंध तो वह देखेगा ही, हमारी कोठी का मालिक भी वही होगा। वह किसी अच्छे काम के लिए इसका इस्तेमाल करेगा तो हमें खुशी होगी।...’’

ऐसे ही वर्षों बरस गुजर गए। मिल्दू का स्कूल चलता रहा और तरक्की करता रहा। घोष बाबू और मिताली का आशीर्वाद भी बना रहा। इस स्कूल की रौनक दिनोदिन बढ़ती ही जा रही थी, कम नहीं हुई। इन बच्चों में पढ़कर कुछ तो दूर-दूर चले गए, पर वहाँ से घोष बाबू और मिताली के लिए उनकी चिट्ठियाँ आतीं।

शिष्यों की चिट्ठियाँ आतीं, तो घोष बाबू के चेहरे पर बड़ी प्यारी मुसकान आ जाती। खुश होकर कहते हैं, ‘‘रोशनी दूर-दूर तक फैल रही है।’’

मिल्दू अब नवप्रभात स्कूल का अध्यापक ही नहीं, ज्ञान का हरकारा भी है, जो दूर-दूर तक नई रोशनी का संदेश फैलाता नजर आता है। कहीं भी कोई बच्चा अनपढ़ हो, तो मिल्दू उसके घर पहुँचकर टेर लगाता है। बस्ती में अब स्कूल खुल गया है तो कोई भी बच्चा भला अनपढ़ क्यों रहे? जल्दी से स्कूल भेजिए उसे, पढ़ाने-लिखाने की सारी चिंता हमारी। आप तो उसे बस स्कूल भेजना शुरू कीजिए।

घोष बाबू कभी-कभी आह्लादित होकर कहते हैं, ‘‘मिल्दू, हमने एक बहुत बड़ा दीया जलाया है, ज्ञान का दीया। वह तुम हो। तुम्हारे जैसे उत्साही लोग हों धरती पर, तो अँधेरा नहीं रहेगा। कभी नहीं।’’

श्रीमती मिताली घोष कहतीं, ‘‘हमने एक दीया जलाया था और मिल्दू ने एक से एक करते हुए हजारों दीये जला दिए। मिल्दू का काम हमसे ज्यादा बड़ा है।’’

और मिल्दू रात-दिन अपने नवप्रभात स्कूल को सँवारते हुए यही सोचता है कि घोष बाबू का सपना जल्दी से जल्दी पूरा हो, उसे पूरा होना ही चाहिए। क्योंकि तब कोई बच्चा सिर्फ कूड़ा बीनने के लिए अपनी पूरी जिंदगी बरबाद नहीं करेगा।

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—प्रकाश मनु

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