हर चेहरा अनजान सा क्यों है?

वक्त के आईने में

वक्त के आईने में

हर चेहरा मुरझाया सा क्यों है?

 

मानव मानव से परेशान सा क्यों है?

जिंदगी जिंदगी से हैरान सी क्यों है?

वक्त के आईने में हर चेहरा

मुरझाया सा क्यों है?

 

वक्त के आईने में

हर फूल कुम्हलाया सा क्यों है?

भरी जमात में

इनसान तन्हा सा क्यों है?

 

हर इनसान परेशान सा क्यों है?

व्यक्ति व्यक्ति से अनजान सा क्यों है?

हर इनसान बौखलाया सा क्यों है?

 

वक्त के आईने में

हसीं चेहरों पर उदासी सी क्यों है?

भरी दोपहरी में कोहरा सा क्यों है?

हर चेहरा अनजान सा क्यों है?

इनसान के वेश में शैतान सा क्यों है?

 

वक्त के आईने में

हर चेहरा मुरझाया सा क्यों है?

सबकुछ है पर मन बेचैन सा क्यों है?

वक्त के आईने में

हर चेहरा मुरझाया सा क्यों है?

 

आत्मचिंतन

पिता के लिए पुत्र की भक्ति का

उपदेश देने मैं चला पर

आत्मचिंतन न किया,

साधु बनने मैं चला पर खुद

का विश्लेषण न किया

 

पुलिस का दारोगा बन बैठा

पर खुद राहजनी और गैंग

रेप, लूटपाट की

और वर्दी का मान न किया।

मूँछ पर ताव दे दिया पर

मन में कायरता को जगह दे दी,

पुलिस बनकर भी सेवा-भाव तज दिया

आत्मविश्लेषण न किया, न आत्मचिंतन किया,

पुत्र में जन्म लिया पर

पुत्र का धर्म न निभाया,

जीते जी किसी की मौत का कारण बन बैठा,

सदियों की सँजोई प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई

पर आत्मविश्लेषण न किया, न आत्मचिंतन किया,

सभ्यता-संस्कृति सूली चढ़ गई,

पर अपने अकड़ूपन का दंभ भरता रहा

एक दिन चिडि़या फुर्र से उड़ गई,

पर मूढ़ मन उसे मना न सका,

आत्मविश्लेषण न कर सका, न आत्मचिंतन कर सका,

मानव बनकर भी मानव का हक

अदा न कर सका, क्योंकि आत्मचिंतन न किया।

सह-प्राध्यापक
प्रसार शिक्षा, डॉ. रा.प्र.के.कृ.वि.वि.
पूसा, नई दिल्ली
दूरभाष: ९९३४९२०४२४
अरुणिमा शर्मा

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