अपनी बात

अपनी बात

कविता मुझे घुट्टी में मिली थी। मेरे पितामह संस्कृत भाषा तथा साहित्य के अच्छे विद्वान् थे। घर की एक बैठक पुरानी पोथियों से भरी हुई थी। वे जहाँ जाते, वहाँ से अच्छी-अच्छी पुस्तकें ले आते थे। ज्योतिषी का उनका गहरा अध्ययन था। दूर-दूर से लोग उन्हें जन्मपत्रियाँ दिखाने के लिए लाते थे।

एक बार गाँव का एक लड़का परिवार से रूठकर घर छोड़कर चला गया। कहाँ गया, किसी को पता नहीं था? उसके पिता बेटे की जन्मपत्री लेकर पितामह के पास आ गए। बाबा ने एक मंत्र कागज पर लिखकर दिया। यह हिदायत भी दी कि मंत्र उसके किसी कपडे़ में बाँध दिया जाए। दो-तीन दिन बाद वह लड़का जब सचमुच वापस आ गया तो गाँव में बड़ी धूम मची। लेकिन पितामह का ध्यान ज्योतिष से अधिक साहित्य में था।

पिताजी श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी बटेश्वर से आकर ग्वालियर में बस गए थे। उन्होंने बदलते हुए वक्त को देखकर अंग्रेजी का पठन प्रारंभ किया। खड़ी बोली के साथ ब्रजभाषा और अवधी पर उनका अच्छा अधिकार था। ब्रजभाषा में लिखी उनकी कविताएँ और सवैये काफी पसंद किए जाते थे। बटेश्वर से ग्वालियर पहुँचकर साहित्य के लिए बड़ा क्षेत्र प्राप्त हुआ। रियासत के मुखपत्र ‘जियाजी प्रताप’ में उनकी कविताएँ नियमित रूप से छपती थीं।

जब यह तय हुआ कि ग्वालियर रियासत का अपना गीत होना चाहिए तो यह काम पिताजी को सौंपा गया। गीत ऐसा होना चाहिए था, जो सरलता से गाया जा सके। उसमें सिंधिया परिवार और ग्वालियर रियासत की कीर्ति का गान जरूरी था। पिताजी द्वारा लिखा गीत पूरी रियासत में प्रचलित था। उसका नियमित रूप से गायन होता था। उसकी दो पंक्तियाँ मुझे अभी तक याद हैं—

हम देश, विदेश कहीं भी हों, पर होगा तेरा ध्यान सदा।

तेरा ही पुत्र कहाने में होगा हमको अभिमान सदा॥

पिताजी ने और भी कविताएँ लिखी थीं, किंतु उनके प्रकाशन की ओर ध्यान नहीं दिया। वे इधर-उधर बिखर गईं।

पिताजी की हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू पर भी अच्छी पकड़ थी। उन दिनों बच्चों के लिए उर्दू अनिवार्य थी। रियासत में प्रतिवर्ष होनेवाले गणेशोत्सव में पिताजी के भाषण नियमित रूप से होते थे। पिताजी की विद्वत्ता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि वे स्वयं मैट्रिक पास होते हुए भी दसवीं कक्षा को पढ़ाते थे। बाद में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। एम.ए. का ज्ञान भी प्राप्त किया। स्कूलों के इंस्पेक्टर के रूप में रिटायर होने के बाद कानून का अध्ययन करने की ठानी।

२५ दिसंबर! पता नहीं कि उस दिन मेरा जन्म क्यों हुआ! बाद में, बड़ा होने पर, मुझे यह बताया गया कि २५ दिसंबर ईसामसीह का जन्मदिन है, इसलिए बडे़ दिन के रूप में मनाया जाता है। मुझे यह भी बताया गया कि जब मैं पैदा हुआ, तब पड़ोस के गिरजाघर में ईसामसीह के जन्मदिन का त्योहार मनाया जा रहा था। कैरोल गाए जा रहे थे। उल्लास का वातावरण था। बच्चों में मिठाई बाँटी जा रही थी।

बाद में मुझे यह भी पता लगा कि बड़ा दिन हिंदू धर्म के उन्नायक पं. मदन मोहन मालवीय का भी जन्मदिन है। मुझे जीवन भर इस बात का अभिमान रहा कि मेरा जन्म ऐसे महापुरुषों के जन्म के दिन ही हुआ।

मुझे यह बात अभी तक अच्छी तरह से याद है कि मेरे पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी मेरी अंगुली पकड़कर मुझे आर्य समाज के वार्षिकोत्सव में ले जाते थे। उपदेशकों के सस्वर भजन मुझे अच्छे लगते थे। आर्य विद्वानों के उपदेश मुझे प्रभावित करने लगे थे। भजनों और उपदेशों के साथ-साथ स्वतंत्रता-संग्राम की बातें भी सुनने को मिलती थीं।

क्या यह एक संयोग मात्र था? क्या इसके पीछे कोई विधान था?

घर में साहित्य-प्रेम का वातावरण था। मैंने भी तुकबंदी शुरू कर दी। मुझे याद है कि मेरी पहली कविता ‘ताजमहल’ कुछ इस तरह थी—

ताजमहल, यह ताजमहल,

कैसा सुंदर अति सुंदरतर।

किंतु ताजमहल पर लिखी गई यह कविता केवल उसके सौंदर्य तक ही सीमित नहीं थी। कविता उन कारीगरों की व्यथा तक पहुँच गई थी, जिन्होंने पसीना बहाकर, जीवन खपाकर ताजमहल का निर्माण किया था। कविता की अंतिम पंक्तियाँ मुझे अभी तक याद हैं—

जब रोया हिंदुस्तान सकल,

तब बन पाया यह ताजमहल।

निश्चय ही उन दिनों मुझे आर्य विद्वानों के साथ-साथ कम्युनिस्ट क्रांति प्रभावित करने लगी थी। आज जब भी मैं उन दिनों की बात सोचता हूँ तो मेरे अधकचरे मन की तसवीर मेरे सामने खड़ी हो जाती है।

मुख्य रूप से मैंने देशभक्ति से परिपूर्ण कविताएँ लिखी थीं। कवि-सम्मेलनों में उनकी माँग थी। लोग उन्हें पसंद करते थे। वीर रस की कविताएँ पसंद की जाती थीं।

कविता के साथ उन दिनों नौजवानों में वक्तृत्व कला की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं। ओजस्वी कवि श्रोताओं द्वारा पसंद किए जाते थे। आजादी के आंदोलन से ऐसे नौजवानों को प्रेरणा मिलती थी।

यह उन दिनों की बात है, जब मैं विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में पढ़ा करता था। पढ़ाई-लिखाई के साथ साहित्य में भी मेरी रुचि थी। मैं कॉलेज में छात्र संघ का पहले प्रधानमंत्री और फिर उपाध्यक्ष चुना गया था। अध्यक्ष उन दिनों कोई प्रोफेसर हुआ करते थे। छात्र संघ की जिम्मेदारी थी कि वह वार्षिकोत्सव का आयोजन करे।

मुझे याद है कि छात्र संघ ने एक साल कॉलेज में कवि-सम्मेलन करने का फैसला किया। ग्वालियर से बाहर के कवि भी आमंत्रित किए गए थे। यह तय हुआ कि कॉलेज के वार्षिक समारोह में महाकवि निरालाजी को आमंत्रित किया जाए। उन दिनों श्रीमती महादेवी वर्मा तथा श्री सुमित्रानंदन पंत की बड़ी धूम थी। निरालाजी को आमंत्रित करने का काम प्रो. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ को सौंपा गया। कॉलेज के लिए यह बडे़ गौरव का दिन था।

जब हम निरालाजी को रेलवे स्टेशन से उनके ठहरने की जगह ले जा रहे थे, तब एक ऐसी घटना हुई, जो जीवन भर प्रभावित करती रही। हुआ यह कि जब ताँगा उस सड़क से निकला, जिसपर महारानी लक्ष्मीबाई स्मृति चिह्न बना हुआ था, तो निरालाजी ने उस वीरांगना को नमन करने के लिए ताँगा थोड़ी देर रुकवा लिया। उनकी नजर लक्ष्मीबाई के स्मारक के निकट बैठी एक निर्धन महिला पर गई, वह महिला सर्दी से स्वयं को बचाने के प्रयास में लगी थी। जैसे ही निरालाजी की नजर उस महिला के ऊपर गई, तो महाकवि ने अपना कंबल उतारकर उस महिला को ओढ़ा दिया। हम सब यह देखकर दंग रह गए।

निरालाजी के महान् व्यक्तित्व की एक छोटी सी झलक पाकर हम लोग भाव-विभोर हो गए। घर पहुँचने पर हमने निरालाजी के लिए अलग से एक कंबल का प्रबंध किया। लेकिन निरालाजी द्वारा सर्दी से ठिठुरती हुई महिला को कंबल देने की घटना हमारे मानस-पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गई।

विक्टोरिया कॉलेज से संबंधित एक और घटना मुझे याद आ रही है। छात्र संघ की ओर से रात्रि में कवि-सम्मेलन का आयोजन था। प्रतिवर्ष की भाँति उस साल भी स्थानीय कवियों के साथ बाहर से कवियों को भी निमंत्रित किया गया था। विक्टोरिया कॉलेज के पिं्रसिपल प्रो. पियर्स सम्मेलन देखने के लिए स्वयं आए थे। हॉल खचाखच भरा था, लेकिन कुछ कवियों को मंच पर आने में विलंब हो रहा था। वे अवसर के अनुरूप सजने-धजने में लगे हुए थे।

जब ज्यादा देर होने लगी और छात्रों के धैर्य का बाँध टूटने लगा तो मैंने एक साहसपूर्ण निर्णय लिया। मैं मंच पर चला गया और घोषणा कर दी कि कुछ कवियों और शायरों के आने में देर हो रही है, श्रोता अधिक विलंब के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए कविता-पाठ स्थगित किया जाता है। श्रोता अपने घरों के लिए प्रस्थान करें। पूरे सभा-भवन में सन्नाटा छा गया। छात्र कविता के शौकीन थे और कवियों को सुनना चाहते थे। लेकिन कुछ कवियों द्वार मंच पर आने में अत्यधिक विलंब किए जाने के कारण छात्र बिगड़ गए। तब तक कुछ कवि मंच पर पहुँच चुके थे। वे नौजवानों से अपील कर रहे थे कि वे अब कविता सुनकर ही जाएँ, किंतु वे नहीं माने। मेरे यह कहते ही कि अब सम्मेलन भंग किया जाता है; सब छात्र सदन के बाहर चले गए। बाद में फिर जब कभी सम्मेलन होते थे तो कवि समय से आने का ध्यान रखने लगे थे।

मैंने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से स्नातक की परीक्षा पास की थी। आगे पढ़ने का इरादा जरूर था, लेकिन साधनों का अभाव था। ग्वालियर की रियासत मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति दिया करती थी। इसमें दक्षिण से आए क्षत्रिय छात्र अधिक होते थे।

मैंने बी.ए. पास करते-करते अच्छा नाम कमा लिया था। मेरे भाषण शौक से सुने जाते तथा मेरी कविताएँ भी पसंद की जाती थीं। ग्वालियर रियासत में मेरा नाम हो गया था। जब उच्च शिक्षा के छात्रों का चयन होने लगा तो मुझे भी उसमें मौका मिल गया।

ग्वालियर के छात्र आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के कारण कानपुर जाते थे। कानपुर में डी.ए.वी. कॉलेज और सनातन धर्म कॉलेज, दोनों का बड़ा नाम था। मैंने डी.ए.वी. कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज का भवन काफी विशाल था। छात्रावास में उसके छात्रों के रहने की व्यवस्था सरलता से हो जाती थी। मैंने छात्रावास में रहने का निश्चय किया।

पिताजी ने जब यह सुना तो उनके मन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की जो इच्छा थी, वह फिर जाग्रत् हो गई। उन्होंने ग्वालियर छोड़कर कानपुर के डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़ने का फैसला किया। उनके लिए कॉलेज में भरती होना और कानून की पढ़ाई करना बड़ी चर्चा का विषय बना। ‘पिता-पुत्र साथ-साथ’ इस शीर्षक से अखबारों में खबरें छपीं।

डी.ए.वी. कॉलेज छात्रावास के वे दिन मुझे अभी भी अच्छी तरह याद हैं। पिता और पुत्र एक ही कमरे में रहते थे। पिताजी को हाथ अपने का खाना पसंद था। इससे हमें भी अच्छा खाना मिल जाता था। रोज रात को सोने से पहले दूध निश्चित रूप से मिला करता था। अन्य छात्र दूध के प्रति प्रेम देखकर उसकी चर्चा किया करते थे।

दुग्धपान के संबंध में एक घटना स्मरणीय है। एक रात पं. दीनदयाल उपाध्याय भ्रमण करते हुए मेरे घर ग्वालियर पहुँच गए। मैं घर में नहीं था। पिताजी ने उनका स्वागत-सत्कार किया। रात को जब सोने का वक्त हुआ तो उपाध्यायजी के लिए पिताजी दूध से भरा एक गिलास लेकर पहुँचे। उपाध्यायजी आश्चर्य में पड़ गए। उनको रात में दूध पीने की आदत नहीं थी। पिताजी रात में बिना दूध पिए और पिलाए सो नहीं सकते थे। जिस प्रेम से पिताजी ने अतिथि को दुग्धपान कराया, उससे यह छाटी सी घटना दूर-दूर तक फैल गई। जो रात में दूध पीना नहीं चाहते थे, उन्होंने ग्वालियर में मेरे घर पर रुकना बंद कर दिया।

दूध से संबंधित एक और घटना है, जो श्री यज्ञदत्त शर्मा से जुड़ी हुई है। उन्हें दूध पीने का बड़ा शौक था। प्रवास में जहाँ जाते, दूध की फरमाइश किए बिना नहीं रह सकते थे। लेकिन सब जगह दूध का मिलना मुश्किल था। दक्षिण भारत में प्रवास के दौरान एक घर में रात को सोने से पहले एक छोटे से गिलास में दूध पेश किया गया। यज्ञदत्तजी को पूरे पंजाबी गिलास की आदत थी। संकोचवश कुछ बोले नहीं। सुबह पानी बडे़ गिलास में आया तो कुछ आशा जगी, शायद रात में दूध भी बडे़ गिलास में आएगा, लेकिन दूध फिर उसी छोटे गिलास में लाया गया। सुबह फिर पानी से भरे बडे़ गिलास को देखते ही करबद्ध होकर उसको प्रणाम किया और पूछा—‘‘भगवान्, आप रात में कहाँ रहते हो?’’ सरा परिवार हँसने लगा। श्री यज्ञदत्त शर्मा का दुग्ध-प्रेम अखिल भारती स्वरूप धारण कर बैठा था। इस तरह के और भी विनोद व हास्य के प्रसंग चलते रहते थे।

आज बरसों बाद ऐसी गुदगुदानेवाली घटनाएँ स्मृति-पटल पर उभरकर खड़ी हो जाती हैं।

डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से एम.ए. करने के पश्चात् मेरे सामने कई रास्ते खुले थे। मैं कानून की शिक्षा पूर्ण कर वकालत कर सकता था। ग्वालियर राज्य मुझे कॉलेज में प्राध्यापक का दायित्व देने के लिए तैयार था। तीसरा रास्ता यह था कि मैं पत्रकारिता के क्षेत्र को अपनाता और कलम के माध्यम से राष्ट्र की सेवा करता। ग्वालियर में प्राध्यापक का पद स्वीकार करने में एक कठिनाई थी। मेरी एम.ए. की पढ़ाई पर राज्य ने जो खर्च किया था, वह धन मुझे लौटाना पड़ता।

यहाँ भविष्य का एक चौथा रास्ता खुलता हुआ दिखाई दिया। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पत्रकारिता जगत् में प्रवेश करना चाहता था। एक नया साप्ताहिक पत्र निकालने की उनकी योजना थी। संघ ने मुझे अपने पत्र में काम करने के लिए बुलाया।

मुझे पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था। लखनऊ जाकर संपादन का दायित्व सँभालने की पूरी तैयारी भी नहीं थी। लेकिन यह कठिनाई भी हल हो गई। श्री भाऊराव देवरस ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। सहायता के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय तैयार थे। रीवा के श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री साहित्य में रुचि रखते थे। उन्होंने बड़ी खुशी से लखनऊ आकर नए साप्ताहिक पत्र का भार सँभालने के लिए तैयार हो गए। हम दोनों में से किसी को पत्रकारिता का अनुभव नहीं था। किसी विषय पर लेख लिखना सरल है, किंतु किसी नए पत्र का संपादन का भार सँभालना एक चुनौती भरा दायित्व था। पू्रफ पढ़ने से लेकर संपादन तक की जिम्मेदारी उठानी थी।

‘राष्ट्रधर्म’ के प्रथम अंक का साहित्य जगत् में स्वागत हुआ। हम पत्र के अच्छे स्तर को कायम रखने के लिए सजग थे। ‘राष्ट्रधर्म’ ने शीघ्र ही एक अच्छे साप्ताहिक के रूप में स्थान ग्रहण कर लिया। पत्र की सफलता देखकर एवं एक और साप्ताहिक पत्र की आवश्यकता को देखकर राष्ट्रधर्म प्रकाशन मंडल ने साप्ताहिक। ‘पाञ्चजन्य’ ने भी पत्रकारिता जगत् में अपना स्थान बना लिया। ‘राष्ट्रधर्म’ विचार-प्रधान था। ‘पाञ्चजन्य’ ने प्रचार का मोरचा सँभाला। ऐसे पत्रों की आवश्यकता थी, जो राष्ट्रवाद के पोषक हों और जो समाज-जीवन के सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना लें।

‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’—दोनों पत्रों को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जो वामपंथी थे, वे हमें सांप्रदायिकता की श्रेणी में बिठाने के लिए तुले हुए थे। सांप्रदायिकता क्या है? राष्ट्रीयता का सही मापदंड क्या हो? इन प्रश्नों पर विवाद छिड़ गया। दोनों पत्रों ने अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखा। दोनों पत्र प्रखर राष्ट्रवाद के संबल बन गए।

सरकार नियमों का एक ढंग से पालन कराती थी कि पत्रों का छपना ही संभव न रहे। जिन दिनों मैं इन पत्रों का संपादन कर राह था, उनमें प्रेस की स्वतंत्रता पर ऊपर से देखने में कोई अंकुश नहीं था, लेकिन जिन प्रेसों में वे छापे जाते थे, उन पर ही ताला जड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि एक पत्र के बंद होने पर दूसरा पत्र निकालने की होड़ लगी और सरकार के साथ यह आँख-मिचौली का खेल चलता रहा। इस सबका परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध लोग राजनीति में आने के लिए विवश हुए। इस तरह छलावे की नीति से सरकार क्या प्राप्त करने में सफल हुई, इसकी मुझे अभी तक जानकारी नहीं मिली है।

एक पत्रकार के नाते मेरा यह अनुभव है कि सरकार पत्रों का गला घोटने का मन बना ले तो उसके तरकस में ऐसे कई तीर आसानी से मिल जाएँगे, जो ‘साँप मारे और लाठी भी न टूटे’ की कहावत को चरितार्थ करे।

उस समय की परिस्थितियों में एक नया राष्ट्रवादी दल गठित करने का फैसला हुआ। यह एक लंबी कहानी है। नेहरू मंत्रिमंडल से त्याग-पत्र देने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी किसी ऐसे मंच की तलाश में थे, जो कांग्रेस सरकार की बढ़ती हुई तानाशाही पर अंकुश लगाने के लिए तैयार हो और जिसके पीछे जनता सहज व स्वाभाविक रूप से खड़ी हो जाए।

डॉ. मुकर्जी ने सभी मंचों को एक साथ लाने का प्रयास किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली। उनके दलों को अपनी-अपनी सीमा-रेखाएँ कायम रखते हुए एक सामान्य कार्यक्रम के आधर पर काम करने में कठिनाई नहीं थी।

देश की राजनीति कितने भागों में बँटी हुई है, इसकी थोड़ी अनुभूति पहले से हो रही थी; किंतु यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जो दल देश-निर्माण और सांस्कृतिक निष्ठा से परिचालित थे, उनके लिए भी एक मंच पर आना, बड़ा मुश्किल काम था। टुकड़ों में बँटी हुई राजनीति एक संगठित शक्ति की अनुभूमि कैसे देगी, यह सवाल सामने खड़ा था। डॉ. मुकर्जी के नेतृत्व में ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट’ का निर्माण इस दिशा में एक ठोस कदम था।

पाँच दशकों से अधिक की राजनीतिक-यात्रा के बाद भी देश की बँटी हुई राजनीति को जोड़ने की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है, जो केवल सत्ता के लिए नहीं, अपितु विधटनकारी शक्तियों से लोहा लेकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के काम में आगे बढ़ सके, उनके लिए ऐसे मंच की सार्थकता सदैव रहेगी।

आओ फिर से दीया जलाएँ

भरी दुपहरी में अँधियारा,

सूरज परछाईं से हारा,

अंतरतम का नेह निचोडें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दीया जलाएँ।

हम पड़ाव को समझे मंजिल,

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल,

वर्तमान के मोहजाल में आनेवाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दीया जलाएँ।

आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा,

अपनों के विघ्नों ने घेरा,

अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।

आओ फिर से दीया जलाएँ।

अमर आग है

कोटि-कोटि आकुल हृदयों में

सुलग रही है जो चिनगारी,

अमर आग है, अमर आग है।

उत्तर दिशा में अजित दुर्ग-सा

जागरूक प्रहरी युग-युग का,

मूर्तिमंत स्थैर्य, धीरता की प्रतिभा-सा

अटल अडिग नगपति विशाल है।

नभ की छाती को छूता-सा

कीर्ति-पुंज सा,

दिव्य दीपकों के प्रकाश में—

झिलमिल-झिलमिल—

ज्योतित माँ का पूज्य भाल है।

कौन कह रहा उसे हिमालय?

वह तो हिमावृत्त ज्वालागिरि,

अणु-अणु, कण-कण, गह्वर कंदर

गुंजित-ध्वनित कर रहा अब तक

डिम-डिम डमरु का भैरव स्वर।

गौरीशंकर के गिरि-गह्वर

शैल-शिखर, निर्झर, वन-उपवन

तरु तृण-दीपित।

 

शंकर के तीसरे नयन की—

प्रलय-विह्नि जगमग ज्योतित।

जिसको छूकर

क्षणभर ही में

काम रह गया था मुट्ठी भर।

 

यही आग ले प्रतिदिन प्राची

अपना अरुण सुहाग सजाती,

और प्रखर दिनकर की

कंचन काया,

इसी आग में पलकर

निशि-निशि, दिन-दिन

जल-जल, प्रतिपल

सृष्टि-प्रलय-पर्यंत समावृत

जगती को रास्ता दिखाती।

 

यही आग ले हिंद महासागर की

छाती है धधकाती।

लहर-लहर प्रज्वाल लपट बन

पूर्व-पश्चिमी घाटों को छू,

सदियों की हतभाग्य निशा में

सोए शिलाखंड सुलगाती।

 

नयन-नयन में यही आग ले

कंठ-कंठ में प्रलय राग ले,

अब तक हिंदुस्तान जिया हे।

 

इसी आग की दिव्य विभा में,

सप्त-सिंधु के कल कछार पर,

सुर-सरिता की धवल धार पर

तीर-तटों पर,

पर्णकुटी में, पर्णासन पर

कोटि-कोटि ऋषि-मुनियों ने

दिव्य ज्ञान का सोम पिया था।

 

जिसका कुछ उच्छिष्ट मात्र

बर्बर पश्चिम ने,

दया दान-सा,

निज जीवन को सफल मानकर,

कर पसारकर,

सिर-आँखों पर धार लिया था।

 

वेद-वेद के मंत्र-मंत्र में

मंत्र-मंत्र की पंक्ति-पंक्ति में

पंक्ति-पंक्ति के शब्द-शब्द में,

शब्द-शब्द के अक्षर स्वर में,

दिव्य ज्ञान-आलोक प्रदीपित,

सत्यं शिवं सुंदरम् शोभित,

कपिल, कणाद और जैमिनि की

स्वानुभूति का अमर प्रकाशन,

विशद-विवेचन, प्रत्यालोचन,

 

ब्रह्म, जगत्, माया का दर्शन।

कोटि-कोटि कंठों में गूँजा

जो अतिमंगलमय स्वर्गिक स्वर,

अमर राग है, अमर आग है।

कोटि-कोटि आकुल हृदयों में

सुलग रही है जो चिनगारी

अमर आग है, अमर आग है।

 

यही आग सरयू के तट पर

दशरथजी के राजमहल में,

धन-समूह में चल चपला सा,

प्रगट हुई प्रज्वलित हुई थी।

 

दैत्य-दानवों के अधर्म से

पीडि़त पुण्यभूमि का जन-जन,

शंकित मन-मन,

त्रसित विप्र,

 

आकुल मुनिवर-गण,

बोल रही अधर्म की तूती

दुस्तर हुआ धर्म का पालन।

 

तब स्वदेश-रक्षार्थ देश का

सोया क्षत्रियत्व जागा था।

राम-रूप में प्रगट हुई यह ज्वाला,

जिसने

असुर जलाए

देश बचाया,

वाल्मीकि ने जिसको गाया।

 

चकाचौंध दुनिया ने देखी

सीता के सतीत्व की ज्वाला,

विश्व चकित रह गया देखकर

नारी की रक्षा-निमित्त जब

नर क्या वानर ने भी अपना

महाकाल की बलि-वेदी पर,

अगणित होकर

सस्मित हर्षित शीश चढ़ाया।

यही आग प्रज्वलित हुई थी—

यमुना की आकुल आहों से,

अत्याचार-प्रपीडि़त ब्रज के

अश्रु-सिंधु में बड़वानल बन—

कौन सह सका माँ का क्रंदन?

दीन देवकी ने कारा में

सुलगाई थी यही आग, जो

कृष्ण-रूप में फूट पड़ी थी।

जिसको छूकर

माँ के कर की कडि़याँ,

पग की लडि़याँ

चट-चट टूट पड़ी थीं।

‘पाञ्चजन्य’ का भैरव स्वर सुन

पड़प उठा आक्रुद्ध सुदर्शन,

अर्जुन का गांडीव,

भीम की गदा,

धर्म का धर्म डट गया,

अमर भूमि में,

समर भूमि में,

धर्म भूमि में,

कर्म भूमि में,

गूँज उठी गीता की वाणी,

मंगलमय जन-जन कल्याणी।

अपढ़, अजान विश्व ने पाई

शीश झुकाकर एक धरोहर।

कौन दार्शनिक दे पाया है।

अब तक ऐसा जीवन-दर्शन?

कालिंदी के कल कछार पर

कृष्ण-कंठ से गुँजा जो स्वर

अमर राग है, अमर राग है।

 

कोटि-कोटि आकुल हृदयों में

सुलग रही जो चिनगारी,

अमर आग है, अमर आग है।

 

ऊँचाई

ऊँचे पहाड़ पर,

पेड़ नहीं, लगते,

पौधे नहीं उगते,

न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,

जो कफन की तरह सफेद और

मौत की तरह ठंडी होती है।

खेलती, खिलखिलाती नदी,

जिसका रूप धारण कर

अपने भाग्य पर बूँद-बूँद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,

जिसका परस,

पानी को पत्थर कर दे,

ऐसी ऊँचाई,

जिसका दरस हीन भाव भर दे,

अभिनंदन की अधिकारी है,

आरोहियों के लिए आमंत्रण है,

उस पर झंडे़ जा सकते हैं,

किंतु कोई गौरैया,

वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,

न कोई थका-माँदा बटोही,

उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि

केवल ऊँचाई ही काफी नहीं होती,

सबसे अलग-थलग

परिवेश से पृथक्,

अपनों से कटा-बँटा,

शून्य में अकेला खड़ा होना,

पहाड़ की महानता नहीं,

मजबूरी है।

ऊँचाई और गहराई में

आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,

उतना ही एकाकी होता है,

हर भार को स्वयं ही ढोता है,

चेहरे पर मुसकानें चिपका,

मन-ही-मन रोता है।

जरूरी यह है कि

ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,

जिससे मनुष्य

ठूँठ-सा खड़ा न रहे,

औरों से घुले-मिले,

किसी को साथ ले,

किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,

यादों में डूब जाना,

स्वयं को भूल जाना,

अस्तित्व को अर्थ,

जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,

ऊँचे कद के इनसानों की जरूरत है।

इतने ऊँचे कि आसमान को छू लें,

नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें,

किंतु इतने ऊँचे भी नहीं,

कि पाँव तले दूब ही न जमे,

कोई काँटा न चुभे,

कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,

हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,

मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना

गैरों को गले न लगा सकूँ

इतनी रूखाई कभी मत देना।

 

न दैन्यं न पलायनम्

कर्तव्य के पुनीत पथ को

हमने स्वेद से सींचा है,

कभी-कभी अपने अश्रु और—

प्राणों का अर्घ्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—

हम कभी रुके नहीं हैं,

किसी चुनौती के सम्मुख

कभी झुके नहीं हैं।

आज,

जबकि राष्ट्र-जीवन की

समस्त निधियाँ

दाँव पर लगी हैं,

और

एक घनीभूत अँधेरा—

हमारे जीवन के

सारे आलोक को

निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए

जीने, जूझने और

आवश्यकता पड़ने पर—

मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की

इस घड़ी में—

आइए, अर्जुन की तरह

उद्घोष करें—

‘न दैन्यं न पलायनम्।’

 

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर,

पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,

झरे सब पीले पात,

कोयल की कुहुक रात,

प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ।

गीत नया गाता हूँ।

टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी?

अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।

हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ।

गीत नया गाता हूँ।

 

गगन में लहरता है भगवा हमारा

: एक :

घिरे घोर घन दासता के भयंकर

गँवा बैठे सर्वस्व आपस में लड़कर

बुझे दीप घर-घर

हुआ शून्य अंबर

निराशा निशा ने जो डेरा जमाया

ये जयचंद के द्रोह का दुष्ट फल है

जो अब तक अँधेरा, सबेरा न आया।

मगर घोर तम में

पराजय के गम में

विजय की विभा ले

अँधेरे गगन में

उषा के वसन

दुश्मनों के नयन में

चमकता रहा पूज्य भगवा हमारा।

गगन में लहरता है भगवा हमारा।

: दो :

भगवा है पद्मिनि के जौहर की ज्वाला,

मिटाती अमावस

लुटाती उजाला

नया एक इतिहास क्या रच न डाला

चिता एक, जलने

हजारों खड़ी थीं।

पुरुष तो मिटे,

नारियाँ सब हवन की

समिधि बन अनल के पगों पर चढ़ी थीं।

मगर जौहरों में,

घिरे कोहरों में

धुएँ के घनों में,

कि बलि के क्षणों में

धधकता रहा पूज्य भगवा हमारा।

गगन में लहरता है भगवा हमारा।

मिटे देवता,

मिट गए शुभ्र मंदिर

लुटी देवियाँ,

लुट गए सब नगर घर

स्वयं फूट की अग्नि में घर जलाकर

पुरस्कार हाथों में लोहे की कडि़याँ

कपूतों की माता

खड़ी आज भी है

भरे अपनी आँखों में आँसू की लडि़याँ।

मगर दासता के भयानक भँवर में

पराजय समर में

अंतिम क्षणों तक

शुभाशा बँधाता,

कि इच्छा जगाता

कि सबकुछ लुटाकर ही सबकुछ दिलाने

बुलाता रहा प्राण भगवा हमारा।

गगन में लहरता है भगवा हमारा।

: तीन :

कभी थे अकेले हुए आज इतने,

नहीं तब डरे तो भला अब डरेंगे?

विरोधों के सागर में

चट्टान हैं हम,

जो टकराएँगे

मौत अपनी मरेंगे।

लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा,

कदम बढ़ रहा है कभी न रुकेगा।

न सूरज के सम्मुख अँधेरा टिकेगा,

निडर हैं सभी हम

अमर हैं सभी हम।

कि सर पर हमारे वरद हस्त करता,

गगन में लहरता है भगवा हमारा।

 

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