एक इतिहास-पुरुष का महाप्रयाण

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से भारत के स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत के राजनीतिक जगत् से एक विशिष्ट देदीप्यमान नक्षत्र विलुप्त हो गया। पिछले दशक से वे अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति से अलग थे, किंतु उनकी उपस्थिति मात्र से ही राजनीति में सहजता का आभास होता था। अटलजी ने जो भी स्थान राजनीति में प्राप्त किया, वह अपनी योग्यता, परिश्रम और ध्येय की स्पष्टता से किया। उनका व्यक्तित्व अप्रतिम था। वे एक साधारण परिवार में जनमे। उनको बहुमुखी प्रेरणा अपने पिताश्री से प्राप्त हुई। उनकी उच्च शिक्षा डी.ए.वी. कॉलेज, कानुपर में हुई। १९४२ के आंदोलन में उन्होंने भाग लिया और जेलयात्रा की। कुछ समय उपरांत ग्वालियर में अपने एक शिक्षक से प्रभावित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सम्मिलित हुए। बाद की कहानी इतिहास है। वे जनसंघ के अध्यक्ष बने, भाजपा के अध्यक्ष बने और भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी।

उनके सहयोगियों ने, जो उनके साथ पार्टी में रहे और विभिन्न दलों के नेताओं ने, जो उनके विरोधी रहे, अपने-अपने अनुभव एवं संस्मरण व्यक्त किए हैं। एक बात, जो प्रायः सभी ने कही है, वह यह है कि अटलजी सबको साथ लेकर चलने की चेष्टा करते थे। विरोध पक्ष को वे उभय पक्ष कहते थे। राजनीति के वे शिखर पुरुष बने, किंतु उनका पदार्पण जनजीवन में पत्रकारिता के माध्यम से हुआ। वे कवि थे, कवि हृदय थे। वे अकसर कहते थे कि राजनीति ने उनको कविता के क्षेत्र में कार्य करने से वंचित कर दिया। जनसंघ की स्थापना के उपरांत वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के निजी सचिव बने। डॉ. मुकर्जी की जम्मू में गिरफ्तारी के समय तक वे उनके साथ थे और डॉ. मुकर्जी के आदेशानुसार वे जम्मू-कश्मीर के हालात देश को बताने के लिए दिल्ली वापस आए। उनके जीवन के अनेक पन्ने धीरे-धीरे खुलेंगे।

अटलजी की ख्याति एक प्रखर, ओजस्वी वक्ता की थी। उनके शब्दों का चयन अद्भुत था। बोलते हुए वे रुक जाते थे तो श्रोताओं की उत्सुकता बढ़ती रहती कि देखें वे क्या कहते हैं; और फिर अपने शब्दजाल एवं विषय प्रस्तुतीकरण से वे श्रोताओं को मोह लेते थे। उनको सुनने के लिए लोग घंटों इंतजार करते और दूर-दूर से चलकर आते थे। उनके भाषण में कहीं रोष, कहीं जोश एवं फिर हँसी-मजाक और अंत में पुनः गंभीर विश्लेषण। अटलजी की विशेषता थी कि उनकी भाषा में कभी किसी प्रकार के अपशब्दों का प्रयोग नहीं होता था। चाहे संसद् हो या राजनीतिक मंच, वे किसी पर व्यक्तिगत आक्रमण नहीं करते थे। दूसरों के आक्रामक शब्दों को वे व्यंग्यात्मक ढंग से टाल जाते। यदि उन्हें यह आभास होता कि कुछ अनर्गल आक्रमण हुआ है तो वे अपना रोष संतुलित ढंग से प्रकट करते। स्वयं व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करते, वरन् जो अनुचित शब्द किसी ने इस्तेमाल किए होते तो वे उनकी ऐसी व्याख्या करते कि प्रयोग करनेवाले को भी छठी का दूध याद आ जाए। यही नहीं, वे अपनी गलती महसूस करने लगते। एक बार ऐसा प्रसंग सोनिया गांधी के भाषण के विषय में आया था, पर उन्होंने कोई व्यक्तिगत आक्षेप नहीं किया। अटलजी ने बांग्लादेश बनने के बाद इंदिराजी को ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था। अच्छे काम की वे सदैव सराहना करते थे। उनकी मुसकान सबका दिल जीत लेती थी।

अटलजी के नेतृत्व के गुणों का बखान करना मुश्किल है। वे समय की नब्ज पहचानते थे। समय के साथ क्या परिवर्तन होना चाहिए, वे अच्छी तरह जानते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उन्होंने अपनी आत्मा कहा। हिंदुत्व में उनका अटूट विश्वास था। समय आने पर वे अपने को व्यक्त करने में नहीं झिझकते थे। संघ परिवार के विचारों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में नरसिंह राव के समय के डॉ. मनमोहन सिंह (वित्तमंत्री) की उदारीकरण योजना को आगे बढ़ाया। वे नरसिंह राव और चंद्रशेखर से कभी-कभी विचार-विमर्श करते थे। अपनी राय बनाने के पहले उनका प्रयास रहता था कि मतिभिन्नता में जहाँ तक मतैक्य खोजा जा सके, खोजा जाना चाहिए। वे देश की भाँति-भाँति की विविधता को बड़ी संवेदनशीलता से देखते थे। यह उनकी सार्वजनिक लोकप्रियता का एक रहस्य था, ऐसे लोगों में जो उनकी भाषा नहीं समझते थे। सत्ता में बने रहने के लिए कोई अनैतिक कदम उठाया जाए, इसके वे सख्त विरोधी थे। एक वोट से उनकी सरकार गिर जाए, पर वे खरीद-फरोख्त में विश्वास नहीं करते थे। कैसे अलग-अलग विचारवालों को देशहित के मुद्दों पर एकजुट किया जाए, इस विषय पर वे गंभीरता से विचार करते थे। साझा सरकार कैसे चलाई जाए, उसका उदाहरण वाजपेयीजी ने प्रस्तुत किया। इसीलिए आज भी कई दल वाले कहते हैं कि हमें अटल बिहारी वाजपेयी चाहिए।

अटलजी दूर की सोचते थे। दूसरों से परामर्श करने में विश्वास करते थे। उनकी सरकार की उपलब्धियों या उठाए गए कदमों की चर्चा आसान नहीं है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम सड़कों द्वारा देश को जोड़ने का जो कार्य ‘प्रधानमंत्री सड़क योजना’ से प्रारंभ हुआ, वह अभूतपूर्व है, जिसे ‘गोल्डन ट्रायंगल’ कहा जाता है। यही नहीं, वे एक-एक गाँव को ‘प्रधानमंत्री सड़क योजना’ के द्वारा जोड़ना चाहते थे। वे हिंदी प्रेमी थे और सर्वप्रथम यू.एन.ओ. में हिंदी में भाषण देकर उन्होंने देश की राष्ट्रीय अस्मिता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया। विदेश नीति में कई कदम उठाए, जिससे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी। जब विश्व में सभ्यताओं के टकराव की बातचीत हो रही थी, तब उन्होंने यूनेस्को के सहयोग से दिलों में सभ्यताओं के आपसी संवाद पर सम्मेलन आयोजित करवाया। ‘भारतीय प्रवासी दिवस’ की योजना अटलजी की थी। इतिहास इन सबका आकलन धीरे-धीरे करेगा।

अटलजी की मेधा और उनके भविष्य की संभावनाओं का आकलन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को हो गया था, जब अटलजी संसद् में आए ही थे। श्रीमती मेनन, जो नेहरूजी की सरकार में राज्यमंत्री थीं। उन्होंने लिखा है कि नेहरूजी एक बार संसद् में हो रही बहस के दौरान बैठे-बैठे थकान महसूस करने लगे और घर जाने की इच्छा प्रकट की। फिर नेहरूजी ने यकायक पूछा कि कितने और वक्ता बाकी हैं? श्रीमती मेनन ने कहा कि तीन-चार और, जिनमें अटलजी का नाम था।  नेहरूजी ने अटलजी का नाम सुनकर कहा कि फिर तो वे इस युवा सांसद को सुनकर ही जाएँगे। वह हमारे खिलाफ बोलता है, किंतु इतना अच्छा बोलता है, तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात कहता है। उसके (अटलजी) भाषण के बाद ही वे संसद् से जाएँगे। यही नहीं, एक डेलीगेशन विदेश से भारत आया था। उसमें चेगुवेरा भी थे। अटलजी का परिचय कराते हुए नेहरूजी ने कहा कि आगे कभी-न-कभी यह हमारा युवा सांसद देश का प्रधानमंत्री बनेगा।

डॉ. मनमोहन सिंह ने, जो उनके बाद प्रधानमंत्री बने, उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा है। अटलजी मानवतावादी थे। वे हर प्रकार के अहंकार से सदैव दूर रहे, पर आत्मसम्मान के प्रति सदैव सचेत। उनका सबसे बड़ा गुण था—अपनत्व की भावना। सभी उनके अपने। वे अत्यंत उदारमना थे, संकीर्णता से दूर। इसी कारण वे जन-जन के प्यारे थे। साधारण-से-साधारण कार्यकर्ता उन्हें अपना मानता था। जिससे वे मिलते, ऐसी आत्मीयता से मिलते कि वह उनका हो जाता। हमें भी उनके साथ पार्टी और संसद् में कार्य करने अवसर मिला। प्रधानमंत्री काल में जब भी उनको फोन किया, यदि वे नहीं होते तो रात को या प्रातः उनका फोन आता कि किस विषय के बारे में फोन किया। जब वे विदेश मंत्रालय की स्थायी समिति के अध्यक्ष थे, तो उभय पक्ष में थे। कभी यदि समिति की बैठक में कोई विदेशी डेलीगेशन आया या कोई अहम/महत्त्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श होना होता तो वे परेशान या चिंतित नहीं होते थे। उनकी भद्रता, शिष्टता अद्भुत थी। कभी उनको जल्दी-जल्दी चलते नहीं देखा। प्रधानमंत्री काल में भी खरामा-खरामा चलते हुए, सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए सदन में प्रवेश करते। कभी जल्दबाजी नहीं, उत्तेजना नहीं, एक विचित्र संतुलन और आत्मविश्वास के वे धनी थे। यह ठीक है कि भाजपा के विस्तार का श्रेय अटलजी और उनके पुराने मित्र आडवाणीजी को है। आडवाणीजी ने संगठन में अभूतपूर्व योगदान दिया। अटलजी ने उसके आधार पर भाजपा की विचारधारा को देश के जन-जन में प्रचारित किया। दोनों के सम्मिलित प्रयास से भाजपा में समर्पित कार्यकर्ताओं के समूह-के-समूह तैयार हो गए। यह एक बहुत बड़ी देन है। उनके राजनीतिक जीवन में उनको भाँति-भाँति से बदनाम करने की चेष्टाएँ समय-समय पर की गईं, पर उसकी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। हाथी अपने रास्ते चलता रहा। आज अटलजी देश के नहीं, पूरे विश्व के लीजेंड या चर्चापुरुष हैं।

अटलजी अब हमारे बीच पार्थिव शरीर में नहीं हैं, किंतु उनका यश, उनकी शक्ति, उनकी विचारधारा, उनके आदर्श, उनकी कार्यशैली, उनके व्यक्तिगत मनमोहक गुण सतत प्रेरणा के स्रोत रहेंगे। ऐसे अप्रतिम इतिहास-पुरुष एवं प्रेरणा-पुरुष को हमारा शत-शत प्रणाम!

स्वतंत्रता दिवस की विरासत

पंद्रह अगस्त को देश ने ७२वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह लेखा-जोखा प्रतिवर्ष होता है और होता रहेगा। आयोजन एक रस्म बनकर रह जाता है। उसकी आत्मा निवाक् दिखाई देती है। आखिर स्वतंत्रता संग्राम की विरासत क्या है? कौन सी धरोहर है, जिसकी रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है। हमारी मान्यता है कि हमें चार मूल तत्त्व स्वतंत्रता संग्राम की विरासत के रूप में प्राप्त हुए। कहा जाए तो स्वतंत्रता संग्राम के ये प्रेरणादायी अभिप्रेरक भी थे। प्रथम था—नागरिक अधिकारों को प्राप्त करना और उनका संरक्षण। उस समय आज जैसी स्थिति तो थी नहीं, जहाँ संविधान में नागरिक अधिकार रेखांकित हैं और जिनमें न्यायिक व्याख्यानुसार समय-समय पर वृद्धि ही होती है। अंग्रेजी शासन के समय पढ़े-लिखे लोग मैग्ना कार्टा की बात करते अथवा १८५७ के उपरांत तत्कालीन ब्रिटिश सम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा का सहारा लेते। १९३६ में सिविल लिबर्टीज यूनियन भी बना, जिसके अध्यक्ष थे रवींद्रनाथ टैगोर और सचिव जवाहर लाल नेहरू। उस समय तक कराची कांग्रेस में नागरिक अधिकारों से संबंधित एक प्रस्ताव भी पारित हो चुका था। लेकिन बहुत पहले अदालत के सामने लोकमान्य तिलक की घोषणा कि ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम उसे लेकर रहेंगे’ ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया था। जहाँ तक नागरिक अधिकारों का सवाल है, नरम दल और गरम दल दोनों में कोई मतभेद नहीं था। नागरिक अधिकारों में एक मुख्य अधिकार है—अभिव्यक्ति की आजादी। इतिहास गवाह है कि इस माँग के लिए लोकमान्य तिलक और अनेक पत्रकारों को कालेपानी या देश निकाले की सजा भुगतनी पड़ी। सरकार या किसी भी व्यवस्था की आलोचना कर सकते हैं, अपना भिन्न मत प्रकट करना हमारा मौलिक अधिकार है। आज इसकी भी सीमाएँ संविधान में निर्धारित की हैं।

दूसरा तत्त्व है—राष्ट्र निर्माण या नेशन बिल्डिंग का एवं राष्ट्रीय एकता का। राष्ट्रीय आंदोलन के पुरोधा सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने अपने आत्मचरित का नाम रखा है—‘ए नेशन इन मेकिंग’। राष्ट्रीय आंदोलन के सभी पुरोधा इस बात से परिचित थे, उन्हें जानकारी थी कि यह देश अनेक मत-मतांतरों का देश है, अलग-अलग तरह के खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज हैं, भारत बहुभाषाई देश है, जातीय विभिन्नताएँ हैं और इनको ध्यान में रखते हुए राष्ट्र का निर्माण करना है। इसीलिए समाज सुधार के विवाद से उस समय उन्होंने कांग्रेस को अलग रखा। आकांक्षा थी कि भारत की एक कल्पना, जो जनता के हृदय में है, उसका एक हलका सा प्रस्फुटन आभास लोगों में है, पर उसका स्पष्टीकरण होना चाहिए। इसीलिए सदैव सामंजस्य और समन्वय पर जोर रहा, ताकि सब देशवासी एकजुट रहें एवं राष्ट्रीय एकता सुदृढ बने। भाँति-भाँति की विभिन्नताओं और देश के विशाल फैलाव में आवश्यक है कि मतभेद बातचीत द्वारा शांतिपूर्वक दूर किए जाएँ। संवाद ही मतभेदों को दूर करने का एक रास्ता है। कानून को हाथ में लेना अनुचित है और संविधान विरोधी भी। दूसरों को अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, चाहे वह हमें पसंद न हो। तर्क के साथ उत्तर देना चाहिए। यही लोकतांत्रिक रास्ता है। चाहे गौ अथवा अन्य पशुओं की तस्करी हो, चाहे किसी महिला पर चुडै़ल होने का शक हो या बच्चों के अपहरण का शक हो, हमें उनको कानून-व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारियों को सौंपना चाहिए, न कि मार-पीट शुरू कर दें और हत्या ही कर डालें। हम गाय को माता रूप में पूजा करते हैं। कुछ राज्यों में गो वध कानूनन मना है, जिसका पालन होना चाहिए। यह शासन का दायित्व है। इसके माने यह नहीं कि कोई गाय को ले जा रहा है, जब खरीद-फरोख्त पर मनाही नहीं है, तब तथाकथित गौ रक्षकों को यह अधिकार नहीं है कि वे कानून हाथ में लेकर गौ ले जानेवाले की मार-मारकर हत्या कर दें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह पहले भी स्पष्ट किया है। भीड़ के द्वारा हत्या, जिसे अंग्रेजी में लिपिंग कहा जाता है, प्रजातंत्रात्मक व्यवस्था स्वीकार नहीं कर सकती। शीर्ष न्यायालय ने इसकी रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाने को सरकार से कहा है। इसकी अवश्यकता नहीं होती, यदि अधिकारी वर्ग सतर्क रहें।

दूसरी तरफ हमें गौरक्षा के मामले को सकारात्मक रूप से देखना चाहिए। कानपुर और जयपुर के गौशालाओं की दुर्वव्यवस्था चाहिए। कानपुर और जयपुर की गौशालाओं की दुर्वव्यवस्था देखकर हमें शर्म आनी चाहिए। आखिर सरकारी पैसे का दुरुपयोग क्यों? हिंसा का कोई स्थान नहीं है, यदि हम समाज में एकता बनाए रखना चाहते हैं। विनोबा भावे ने ठीक ही कहा है, ‘‘जिस देश के लोग अपने पर काबू नहीं रख सकते, वहाँ पर स्वतंत्रता नहीं रह सकती।’’ नरेंद्र मोदी ने १५ अगस्त को लालकिले के अपने भाषण में श्रीअरविंद को उद्धृत किया था। प्रजातंत्र शांति और सौहार्द में फलता-फूलता है। वह नागरिकों से आत्मानुशासन और आत्मनियंत्रण की अपेक्षा करता है। श्रीअरविंद को उद्धृत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्र की अवधारणा केवल भूखंड केरूप में नहीं है, वरन् देश में रहनेवाले समस्त जन से है। प्रधानमंत्री ने यह ध्यान भी दिलाया कि १५ अगस्त श्रीअरविंद का जन्मदिवस भी है। प्रधानमंत्री का समावेशी मूलमंत्र ‘सबका साथ, सबका विकास’ इस धारणा से ही निसृत हुआ है। राष्ट्रीय आंदोलन के प्रणेताओं ने सभी की संवेदनाओं को ध्यान में रखने की जरूरत महसूस की। श्रीअरविंद के एक और संदेश, जो उन्होंने १५ अगस्त, १९४७ को तत्कालीन ऑल इंडिया रेडियो के लिए दिया था, उसकी ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे। उसमें श्रीअरविंद ने उन समस्याओं का विश्लेषण किया, जिससे आज देश जूझ रहा है। श्रीअरविंद का वह कथन आज भी काफी हद तक प्रासंगिक है।

देश की अखंडता को बड़ा आघात लगा, जब १९४७ में देश का विभाजन हुआ। उस समय भारत दो भागों में बँटा था—एक ब्रिटिश शासित भारत और दूसरा राजा-रजवाड़ों का भारत। उस समय की एटलसों में ब्रिटिश शासित हिस्सा लाल रंग में रँगा होता था और प्रिंसली इंडिया, यानी राजाओं का भारत पीले रंग में। ये रियासतें छोटी-बड़ी चेचक की तरह फैली हुई थीं। सरदार पटेल ने उनका एकीकरण कर चमत्कार कर दिखाया। यह सरल काम नहीं था। विभाजन के समय देश में ऐसी उथल-पुथल मची थी कि भारत की राजनीतिक स्थिरता के संबंध में लोगों को संदेह होने लगा था। एक तरफ सरदार पटेल और दूसरी तरफ सरकार के राजनीतिक विभाग के सचिव सर जान कोरफील्ड, भोपाल के नवाब हबीबुल्ला, जो उस समय चैंबर ऑफ प्रिंसेज के अध्यक्ष थे, के षड्यंत्र और कुछ बड़े हिंदू रजवाड़ों को भारत के विरुद्ध उकसाने की उनकी तिकड़म। हैदराबाद के निजाम हथियार आयात कर रहे थे। हर तरह की सहायता इस षड्यंत्र को सफल बनाने केलिए उपलब्ध की जा रही थी। सरदार पटेल ने धैर्य और कुशलता से इस कुचक्र को असफल कर दिया। आज हम सरदार पटेल की भूमिका का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं। आज की पीढ़ी उस समय भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की, बालकलाइजेशन की चाल की गंभीरता से अपरचित हैं। वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक ‘इंटीग्रेशन ऑफ इंडियन स्टेटस’ में जो देखा और किया, उसका वर्णन किया है। अब और भी शोध हुए हैं। एक नई पुस्तक ‘सरदार पटेल यूनीफाइर ऑफ इंडियन स्टेटस’ ए.एन.पी. सिंह लिखित पुस्तक वितस्ता, अंसारी रोड, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। अच्छी जानकारी देती है। बलराज कृष्णा की सरदार पटेल की जीवनी है, (प्रकाशक रूपा, दिल्ली) जो अत्यंत उपयोगी है। आज की पीढ़ी को इस इतिहास को जानना जरूरी है। आज ऐसे लोग भी हैं, न केवल जे.एन.यू. में, बल्कि अन्यत्र भी, जो देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करते हैं। सरदार पटेल ने केवल राज्यों का एकीकरण ही नहीं किया, बल्कि विभाजन से पहले के ब्रिटिश राज्य से बड़े भारत का निर्माण किया; जिसकी रक्षा आज हमारा दायित्व है। देश के विभाजन, यानी पाकिस्तान बनने के समय भारत ने ३.६ वर्ग मील की जमीन और ८१.५ मिलियन आबादी को खोया था। सरदार पटेल के अथक प्रयासों से राज्यों के एकीकरण और उनके भारत में सम्मिलित होने के उपरांत उन्होंने ५ लाख वर्ग भू-भाग और ८६.५ मिलियन आबादी प्राप्त कराई। आज का भारत ब्रिटिश राज्य के भारत से बड़ा है। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के इस भारत की सुरक्षा और विकास का दायित्व आज हम सब पर है। ३१ अक्तूबर उनकी जन्मतिथि है।

तीसरा तत्त्व है जनसाधारण से संपर्क, तादात्म्य और उनका विश्वास प्राप्त करना। किसी भी बडे़ कार्य या आंदोलन के लिए आवश्यक है कि जनता जनार्दन से कैसे संबंध जोड़ा जाए, ताकि पारस्परिक विश्वास का वातावरण पैदा हो। इसके बगैर कोई सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। एक नेता योग्यता और विचारों की दृष्टि से चाहे जितना महान् हो, किंतु जनता में यदि उसकी विश्वसनीयता नहीं है तो वह सफल नहीं हो सकता। कहावत है ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।’ द्वितीय युद्ध के प्रारंभ में सुभाष चंद्र बोस का गांधीजी से आग्रह था कि वे अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दें, पर गांधीजी का कहना था कि अभी जनता तैयार नहीं है। सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि गांधीजी का व्यक्तित्व ऐसा है कि जनता, मासेज उनका अनुसरण करेंगे। गांधीजी ने कहा, “My prestige does not count. It has no independent value of its own. India will rise or fall by the quality of the sum total of the acts of her many millions, Individuals however high they may be, are of no account except in so for as they represent many millions.” वास्तव में कोई आंदोलन जन साधारण की अपनी क्रियाशीलता और रचनात्मकता पर बहुत कुछ निर्भर करता है। इसके लिए आवश्यक है—पारस्परिक विश्वास। नेता में विश्वास और नेता की जनता से तादात्मिकता सफलता की कुंजी है। कालांतर में सुभाष बाबू ने आई.एन.ए. के दिनों में जनता में यह अटूट विश्वास पैदा कर दिया, जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक नया इतिहास लिख गया।

विरासत का चौथा तत्त्व है कि भविष्य की क्या तसवीर है। स्वतंत्रता केवल साध्य नहीं, साधन भी है। किस दिशा में हम आगे बढेंगे, ताकि जनता का हित सर्वोपरि हो सके। जनता की क्या आशाएँ हैं, अपेक्षाएँ हैं, क्या वे पूरी हो सकीं? यहाँ फिर वही प्रश्न आपसी विश्वास का उठता है।

राजनैतिक स्वाधीनता सर्वतोमुखी विकास के अवरुद्ध मार्ग को खोलती है। आगे जनता की आकांक्षाओं और आशाओं को मूर्तरूप देने के लिए नेतृत्व को नीतियाँ व कार्यक्रम बनाने होते हैं और यह भी देखना होता है कि उनका अनुपालन तथा क्रियान्वयन कैसे हो रहा है! सन् १९४७ के बाद जनता में आशाएँ बढ़ना स्वाभाविक था। एक गरीब देश कैसे विकसित हो। रोटी, कपड़ा, मकान और स्वास्थ्य की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। बिना किसी जाति-पाँति, धर्म, रंग, क्षेत्र अथवा लिंग भेद के ये सबको उपलब्ध होने चाहिए। सबके साथ समान व्यवहार होना चाहिए। यह एहसान नहीं, नेतृत्व का कर्तव्य हो जाता है। इसके साथ शिक्षा जुड़ी है, ताकि जनता को अपने कर्तव्यों और अधिकारों का भान हो सके। शिक्षा अगली पीढ़ी के विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। हाशिए पर पडे़ या अभी तक उपेक्षित समुदायों केलिए शिक्षा एक बहुत बड़ी समतल भूमि तैयार करती है। तभी समानता और भ्रातृभाव की भावना जनमती है। बराबरी व समानता का वातावरण तभी बनता है। शिक्षा को लोकतंत्र का एक महान् Leveller एवं Equaliser कहा गया है। शिक्षा सभी को उन्नति का अवसर प्रदान करती है। पूरी शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर प्राथमिक और माध्यमिक हर एक को सहज उपलब्ध होनी चाहिए। तभी लोकतंत्र की भित्ति मजबूत होगी और समता, समरसता, सामाजिक न्याय का माहौल बनेगा। प्रत्येक नागरिक की गरिमा का सम्मान ही लोकतंत्र का सच्चा मानक है, मापदंड है। इसीलिए उसकी गुणवत्ता का प्रश्न उठता है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान समान रूप से होने की अपेक्षा है। नेतृत्व कितनी ईमानदारी और नेकनीयति से इस दिशा में काम करता है, यह देखना आवश्यक हो जाता है। ऊपरवाले जो कहते हैं, वह जमीन पर दिखाई देना चाहिए। कथनी और करनी में एकरूपता दिखाई देती है। १९४७ का आश्वासन एक धरोहर है, जिसको पूरा करना है। इसके अभाव में देश में आशंका और असंतोष का वातावरण बनता है। योजनाओं का लाभ, जिनके लिए वे बनती हैं, उनको न मिलकर मगरमच्छ खा जाते हैं, तब जनता में रोष उभरता है। १५ अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चिकित्सा सुविधा की बहुत बड़ी घोषणा की, जो सितंबर माह से प्रारंभ होगी। इसके कार्यन्वयन में राज्य सरकारों और केंद्र दोनों का सहयोग होना जरूरी है। हमारी जन स्वास्थ व्यवस्था कितनी लचर है, यह सर्वविदित है।

पहले भी जनता को चिकित्सा सुविधाएँ पहुँचाने के नाम पर बड़े-बड़े घोटाले हो चुके हैं। वे सीएजी की ऑडिट रिपोर्टों में दर्ज हैं, पर उनपर कोई प्रभावी काररवाई नहीं हुई। इक्के-दुक्के अधिकारियों को भले दंडित किया गया हो, किंतु जो बड़े-बड़े लोग इन घोटालों के पीछे हैं, उनका बालबाँका भी नहीं हुआ। कहने का तात्पर्य है कि जब आयुष जैसी बड़ी योजना चालू होगी तो और भी सावधानी रखनी होगी। पिछले अनुभव से आगे के लिए कुछ तो नसीहत लेनी है। हर सुधार न्यायपालिका करेगी, यह अव्यावहारिक है। यह केवल एक उदाहरण मात्र है। सर्वत्र सतर्कता अनिवार्य है। जनता के अभावों और आशाओं की पूर्ति स्वतंत्रता संग्राम का आश्वासन एक विरासत है, जिसे नेतृत्व को पूरा करना है। ये चार कसौटियाँ—नागरिक अधिकारों को देश की एकता और आपसी सौहार्द, तीसरी नेतृत्व और जनता जनार्दन का पारस्परिक विश्वास, और चौथी स्वतंत्रता-सम्मान की आशाओं व आश्वासन की ईमानदारी तथा बिना किसी भेदभाव के पूर्ति, यही निश्चित करेंगी लोकतंत्र का भविष्य। यह एक बड़ी चुनौती है, जिसके प्रति जनता एवं संपूर्ण राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था को जागरूक रहना होगा।

भ्रष्टाचार और हमारी शासन व्यवस्था

पिछले दिनों एक पुस्तक ‘Gods of Corruption’ हमारे देखने में आई। प्रकाशक हैं, मानस पब्लिकेशंस, नई दिल्ली। पुस्तक उत्तर प्रदेश काडर की एक सेनानिवृत्त IAS अधिकारी श्रीमती प्रमिला शंकर की है। १९७६ में उन्होंने आईएएस की सेवा प्रारंभ की। उनके पति भी उत्तर प्रदेश में आईएएस के अधिकारी थे। पुस्तक उत्सुकतावश पढ़ गए। उसमें चर्चित बहुत से अधिकारी हमारे प्रशिक्षु या प्रोबेशनर मसूरी अकादमी में रहे थे और कई ऐसे हैं, जो राज्य और भारत सरकार में उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। हम उन सबसे परिचित हैं। पुस्तक में प्रमिला शंकर ने अपने सेवा काल के अनुभवों को खुलकर रेखांकित किया है। पुस्तक पढ़कर मन खिन्न हुआ। सेवाकाल में उनके अनुभव शुरू से बहुत कटु रहे। उनके अनुसार सेवाकाल में तभी सफलता मिल सकती है, जब कोई चाटुकार हो, अपने वरिष्ठ अधिकारियों की हाँ में हाँ मिलाए। उन्होंने उच्चाधिकारियों के नाम लिए हैं, कुछ को बेईमान कहा है, एक को जातिवादी और अपनी जाति के अतिरिक्त दूसरी जातिवालों का विद्रोही। वरिष्ठ अधिकारी अपना दोष अपने जूनियर अधिकारियों पर थोपते हैं। बड़े यहाँ तक कि मुख्य सचिव उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने नाम लेकर यहाँ तक लिखा है कि एक मुख्य सचिव ने अपनी बात को रखने के लिए न्यायपालिका के अंग का दुरुपयोग किया। कानुपर जहाँ से उन्होंने अपनी सेवा प्रारंभ की, वहाँ उन्होंने देखा कि किस प्रकार कठिन परिस्थिति में उच्च अधिकारी बच निकलते हैं और कनिष्ठ अधिकारियों को फँसाने की कोशिश करते हैं। ३६ साल के अपने सेवाकाल में अनेक पदों पर रहीं, किंतु जल्दी-जल्दी स्थानांतरण होते रहे, क्योंकि उनके अनुसार वे हाँ में हाँ नहीं मिलाती हैं या उनके अनियमित कार्यों में साझेदार नहीं होती हैं। उच्चाधिकारी भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने में तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों की साँठगाँठ का भी जिक्र है। वे नाम लेकर चिह्नित करती हैं। मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार उन्हें निलंबित भी किया था। एक तरह से पूरी पुस्तक उनकी अपनी सर्विस के अनुभव और उनके अनुसार अधःपतन की कहानी है। पुस्तक दो भागों में है। दूसरे भाग में उन्होंने निष्कर्ष रूप में लिखा है कि उन्होंने सेवाकाल में क्या सीखा तथा कुछ आज की समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। हम न लेखिका को जानते हैं और न उन अधिकारियों की प्रतिक्रिया से परिचित हैं, जिनकी प्रमिला शंकर ने नाम लेकर कटुतम आलोचना की है।

पुस्तक के अवलोकन से हमें लगा कि प्रारंभिक सेवा काल में अधिकारियों को ऐसे जिलों में रखना चाहिए, जहाँ के अधिकारी उनके प्रशिक्षण में दिलचस्पी लें, उनकी कठिनाइयों को समझें, प्रशासनिक वातावरण का उनको सही परिचय दें, उनके व्यवहार और कार्यप्रणाली में उचित मार्गदर्शन दें, ताकि कालांतर में वे अच्छे और संतुलित अधिकारी बन सकें। पहले प्रशुक्षिओं की फील्ड ट्रेनिंग पर काफी ध्यान दिया जाता था, शायद अब इस विषय में कोताही बरती जा रही है। संवेदनशील अच्छे अधिकारी, जिनके जीवन-मूल्य सही हैं, वे ही भविष्य के लिए अच्छे अधिकारियों का निर्माण कर सकते हैं। यह अत्यावश्यक है। आज भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों की काफी चर्चा है। नोएडा में रहे एक निवर्तमान आई.ए.एस. अधिकारी के कारनामे प्रकाश में आए हैं। सरकार योजनाओं के लिए कौन सी भूमिग्रहण करेगी, इसकी जानकारी वे अपने  नाते-रिश्तेदारो को देते, कम मूल्य पर वह जमीन खरीदी जाती और फिर उसे भूमि अधिग्रहण के अंतर्गत ऊँची कीमत मिलती। इस तरह उन्होंने और उनके सहयोगियों ने करोड़ों रुपए कमाए।

उन्होंने गाजियाबाद मेें भी यही काम किया। मामला खुलने पर वे गायब हो गए, मध्य प्रदेश में एक प्रसिद्ध देवी के मंदिर में पकड़े गए। शायद उन्हें आशा थी कि उनकी आराध्य देवी उनके  आपराधिक कार्यों को अपने चमत्कार से संरक्षण प्रदान करेगी! दिल्ली में सी.बी.आई. ने पब्लिक सर्विसेज ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट (P.S.O.I.) में एक जाँच या सर्च के दौरान पाया कि वहाँ के कैटरर राकेश तिवारी की अलमारी में ३.६ करोड़ नकदी, २० रोलेक्स घडि़याँ, १६ करोड़ के जेवरात और कई आई.ए.एस. अधिकारियों के व्यक्तिगत दस्तावेज मिले। दो अधिकारी, जिनकी जाँच सी.बी.आई. कर रही है, उनमें से एक के विरुद्ध २००५ में सरकार ने मुकदमा दर्ज करने की स्वीकृति नहीं दी थी। एक आई.ए.एस. अधिकारी, जिसने समय से पूर्व ही सरकारी सेवा से निवृत्ति प्राप्त कर ली थी, उसके जायदाद के कागज भी वहाँ मिले। एक अधिकारी इस समय एक मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद पर नियुक्त है। विडंबना यह है कि सी.बी.आई. अपने पाँच अधिकारियों के खिलाफ भी जाँच कर रही है। उनकी इस मामले में तथाकथित भूमिका पर शक है कि ये अधिकारी, जिनके विरुद्ध आपराधिक मामला है, उन्हें जाँच की सूचना दे रहे थे और अपने स्वार्थपूर्ति के लिए मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे थे।

अनेक कठिनाइयों और कडे़ विरोध के बीच सरदार पटेल ने बड़ी आशाओं के साथ अखिल भारतीय सेवाओं की योजना को संविधान सभा में स्वीकार कराया था। उनसे एक आदर्श आचरण की अपेक्षा की थी। यदि आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अधिकारी ही अपने वांछनीय व्यवहार से विलग हो जाएँ, तो उनके मातहत कर्मचारियों का क्या हाल होगा। गंगाजी प्रदूषित हो जाती हैं तो फिर आगे स्वच्छ गंगा कहा से मिलेगी। न्यायालय के आदेश से सी.बी.आई. के अध्यक्ष रहे एक आई.पी.एस. अधिकारी जाँच के घेरे में हैं। एक अन्य अध्यक्ष रहे आई.पी.एस. अधिकारी, जो बाद को सूपीएसी के सदस्य हो गए, को इस्तीफा देना पड़ा कि उनके एक दागी उद्योगपति से कुछ व्यापारिक संबंध थे, और उनकी जाँच हो रही है। एक बाह्य खुफिया एजेंसी में रह चुके अध्यक्ष आई.पी.एस. अधिकारी के विरुद्ध संस्थान के गुप्त फंड के दुरुपयोग का और आय से अधिक जायदाद बनाने का शीर्ष न्यायालय में शिकायती मामला है, सच्चाई क्या है। यह न्यायालय तय करेगा, पर इन सबका जनमानस पर क्या असर होता है, यह विचारणीय है। अतएव यह प्रसंग दुखदायी है। इस प्रकार की सब संस्थाओं से देश की सुरक्षा और सुशासन की बहुत आशाएँ हैं। हर राज्य में इस तरह के मामले हैं। यह तो कुछ नए उदाहरण हैं। अपनी अनुमानित आय से अधिक खर्च करनेवालों के कई मामले न्यायालय में लटके हुए हैं। यही एक कारण है कि शासन की साख गिरती जा रही है। वह जनता का विश्वास खो रही है। इसी कारण जनता का सहयोग नहीं मिलता है। जनता का कहना है कि जब बड़े-बड़े अधिकारियों का यह हाल है तो छुटभैयों के बारे में क्या कहा जाए! आवश्यकता है कि ऐसे मामलों का निस्तारण न्यायिक तौर पर शीघ्रता से हो, तभी हम सुशासन की आशा कर सकते हैं।

स्वभाव से आशावादी हम नकारात्मक और निराशावाद से हम इस चर्चा को नहीं समाप्त करना चाहेंगे। संतोष की बात तो यह है कि इन सबके बावजूद ऐसे सैकड़ों अधिकारी और कर्मचारी हैं, जो चुपचाप ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वाहन कर रहे हैं। अंग्रेजी भाषा के प्रथम कोष निर्माता और विद्वान् रचनाकार डॉ. जानसन से उनके शागिर्द, प्रशंसक और जीवनीकार बासवेल ने पूछा कि क्या नर्क में भी अच्छे लोग हैं। डॉ. जानसन ने बडे़ आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया कि हाँ, वहाँ भी अच्छे लोग हैं। फिर विस्मित बासवेल ने प्रश्न किया कि किस आधार पर आप ऐसा कह रहे हैं। उनका तत्काल उत्तर था—तभी तो आज भी नर्क स्थित है। अस्तित्व में है।

इस समय केरल में बाढ़ के कारण प्रलय जैसी स्थिति है। केरलवासी, वहाँ की राज्य सरकार तथा केंद्रीय सरकार स्थिति का सामना करने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। जल, थल, नभ सेनाओं के जवान राहत कार्य में लगे हैं। प्रकृति का ऐसा कोप केरल ने पिछले सौ वर्षों में नहीं देखा है। धन-जन की हानि से सभी दुःखी हैं। पूरे देश की सहानुभूमि केरल के भाई-बहनों के साथ है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि जो भी सहायता (वित्तीय अथवा अन्य तरह की, की जा सकती है, करने का प्रयास करें। केरल की इस त्रासदी, संकट में पूरा देश केरल के भाई-बहनों के साथ है।


 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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