राजनेताओं की नैतिकता?

१५ अगस्त प्रतिवर्ष पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के  रूप में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ आयोजित होता है। इस पावन अवसर की हम गद्गद हृदय से स्वतंत्रता सेनानियों, हुतात्माओं, स्थल और समुद्री सीमाओं की रक्षा करते हुए आत्माहुति देनेवाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अनेक धाराएँ रहीं, स्वतंत्रता प्राप्त करने के  ढंग के विषय में मतभेद भी रहे, पर उन सबका लक्ष्य एक ही रहा कि देश आजाद हो। सभी विचारधाराओं केस्वतंत्रता सेनानी हमारे आदर के पात्र हैं। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं और जिस स्वराज्य संघर्ष में उन्होंने अपना बलिदान दिया, उसके आदर्शों की रक्षा के लिए प्रण करते हैं। स्वतंत्रता की लड़ाई के नेतृत्व को नमन करते हैं, साथ-ही-साथ लाखों अनजान, अनकहे शहीद भाई-बहनों को भी कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं, जिन्होंने नेताआें का अनुसरण किया। सब कठिनाइयों को झेलते हुए आज भी जो रात-दिन हर प्रकार की परिस्थितियों में सीमाओं की सुरक्षा में कर्तव्यरत हैं, उनकी सराहना करते हैं और आश्वस्त करते हैं कि देश उनके परिवारों की पूरी तरह से देखभाल करेगा। आंतरिक सुरक्षा में रत अन्य के असैन्य दल भी इसी प्रकार हमारी कृतज्ञता के पात्र हैं। बाह्य और आंतरिक सुरक्षा में ही देश प्रगति कर सकता है। विदेशियों का राजसमाप्त होने के उपरांत ही राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति के द्वार खुल सके। स्वतंत्रता, भाईचारा, समता तथा मानव की गरिमा के लिए हम क्या कुछ कर सके, यह दिन हम सबके आत्मावलोकन का अवसर भी प्रदान करता है। इस दिन लालकिले से प्रधानमंत्री भारतवासियों को संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री का संबोधन विश्व के अन्य देशों को भारत की नीतियों से परिचित कराता है। भारत की प्राचीन काल से सांस्कृतिक आस्था और नीतियाँ विश्वबंधुत्व की पृष्ठभूमि पर आधारित रही हैं। अगले वर्ष भारत के आम चुनाव होनेवाले हैं, अतएव अवश्य ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल की सफलताओं और भविष्य की संभावनाओं की चर्चा करेंगे। उस आकलन को सुनने के लिए देश आतुर है। स्वतंत्रता दिवस के पुण्य दिवस पर देशवासियों को हमारी शुभकामनाएँ।

‘साहित्य अमृत’ का अगस्त माह का ‘वैश्विक हिंदी विशेषांक’ विश्व में हिंदी की स्थिति पर केंद्रित है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा बड़ा देश है। भारत की महत्त्वपूर्ण राजनीतिक स्थिति और एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था, जिसका आज विश्व में छठा स्थान है, यह स्वाभाविक है कि विभिन्न देशों में हिंदी के प्रति सम्मान, हिंदी शिक्षण की स्थिति तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार में संलग्न संस्थाओं की क्या भूमिका है, यह जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इस प्रकार की जानकारी प्राप्त करने का यह एक प्रयास है। विदेश में रह रहे भारतीय नागरिकों और भारतवंशी, दोनों का ही निरंतर हिंदी साहित्य को उल्लेखनीय अवदान हो रहा है। हिंदी के इतिहास लेखकों को भी शीघ्र ही इस अवदान की ओर ध्यान देना होगा। हिंदी पत्रिकाएँ निकल रही हैं, साहित्य सृजन हो रहा है। इसका सर्वेक्षण और आकलन कभी-न-कभी तो करना ही होगा। हिंदी के साथ भारतीय संस्कृति भी जुड़ी है। उसकी भी जानकारी हिंदी लेखन के द्वारा विदेशी भाइयों को होती है। भारत से बाहर रहनेवाले भारतीय नागरिकों और भारतवंशियों की भी अपनी संस्कृति के प्रति रुचि बनी रहती है। भारत की जनसंख्या को देखते हुए व्यापारिक दृष्टि से भारत एक बड़ा बाजार है, उसका लाभ उठाने के लिए चीन, रूस, जापान आदि अनेक देशों को हिंदी को जानना फायदेमंद लगता है। इससे विदेशों में भारतीय इतिहास, संस्कृति, प्राचीन उपलब्धियाँ जानने की भी उत्सुकता पैदा हो रही है। इस दिशा में शोध के प्रति कई देशों में रुचि पैदा हो रही है। इससे साहित्यिक शोध को बल मिलता है। विदेश में रहनेवालों को हिंदी के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य के बारे में भी जानकारी सुलभ हो सकती है। ‘साहित्य अमृत’ की आकांक्षा है कि क्षेत्रीय भाषाओं से हिंदी का आदान-प्रदान निरंतर बढ़ता रहे तथा वे और अधिक समर्थ बनती रहें। यह एक गतिशील प्रक्रिया है। अतएव एक प्रकार से समग्र भारतीय संस्कृति की संवाहिका हिंदी बन जाती है। यह ध्यातव्य है कि जिन विद्वान् लेखकों ने अपने लेख प्रेषित किए हैं, उन्हें व्यक्तिगत रूप से विषय की जानकारी है। हम उनका धन्यवाद करना चाहेंगे। हम यह भी आशा करते हैं कि इस विषय में समय-समय पर अन्य विद्वान् भी हमें अपने विचारों और नई-नई सूचनाओं से अवगत कराते रहेंगे।

एक विस्मृत इतिहासकार

सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली द्वारा तीन खंडों में ‘काशी प्रसाद जायसवाल संचयन’  प्रकाशित हुआ है। यह एक स्वागत योग्य प्रयास है। डॉ. रतनलाल ने, जो हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोशिएट प्रोफेसर हैं, तीनों खंडों का संकलन और संपादन किया है। काशी प्रसाद जायसवाल कौन थे, आज की पीढ़ी उनके नाम और कृतित्व से अपरिचित ही है। जायसवाल, जैसाकि प्रकाशकीय में कहा गया है कि हिंदी नवजागरण काल के एक बहुआयामी प्रतिभासंपन्न लेखक थे। उनका जन्म २७ नवंबर, १८८१ में तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के झालदा नगर में हुआ, जहाँ उनके पिता लाख का व्यापार करते थे। बाल्यकाल में ही उनके पिता उन्हें अपने गृह जिला मिर्जापुर ले आए और उनकी शिक्षा मिर्जापुर, तदुपरांत क्वीन्स कॉलेज बनारस में हुई। पिता ने उन्हें अपने बढ़ते हुए व्यापार में सहयोग देने के लिए अपने पास बुला लिया। व्यापार में सहयोग देने के साथ वे अपने लिखने-पढ़ने के काम में भी व्यस्त रहे। यही नहीं, उन्होंने प्रयास किया कि विदेशी प्रतिस्पर्धा में किस प्रकार छोटे व्यापारियों के आर्थिक हितों की रक्षा की जा सकती है! उनके पिता अपने पिछड़े समुदाय कलवार के उत्थान के लिए प्रयत्नशील थे। यह युग देश में ऐसा था, जब स्थान-स्थान पर जाति आधारित संगठन बन रहे थे और उनके द्वारा समाजानुसार, शिक्षा प्रचार, विधवा विवाह आदि के कार्यों में क्रियाशील थे। अतः उसमें वे भी सक्रिय हुए। उन्होंने नागरी प्रचारणी पत्रिका, ‘हिंदी’, ‘प्रदीप’ और  ‘सरस्वती’ में लिखना प्रारंभ किया। वर्ष १९०६ के करीब वे ‘कलवार गजेट’ के संपादक बने, किंतु इसी समय के.पी. जायसवाल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने और बैरिस्टरी पास करने के लिए इंग्लैंड जाना निश्चित किया। जीसस कॉलेज ऑक्सफोर्ड से उन्होंने स्नातक की डिग्री और चीनी भाषा सीखने का उन्होंने पारितोषिक प्राप्त किया। इतिहास में एम.ए. किया और लिंकन इंस से बैरिस्टर बने। विद्यालय में रहते हुए वे वी.डी. सावरकर, हरदयाल, वी.वी.एस. अय्यर, मदनलाल धींगरा आदि क्रांति में विश्वास रखने वाले भारतीय विद्यार्थियों के संपर्क में आए। कहा जाता है कि लंदन में १८५७ के स्वातंत्र्य संग्राम की पचासवीं जयंती के आयोजन में वे वीर सावरकर के निकट सहयोगी रहे। पोस्टर पैंफलेट आदि तैयार करने का बौद्धिक काम उन्होंने किया, अतएव वे ब्रिटिश खुफिया पुलिस की निगाह में आ गए। पुलिस दस्तावेजों में लिखा है कि सावरकर की गिरफ्तारी के बाद जब लंदन में मुकदमा चल रहा था तो जायसवाल वहाँ देखे गए। उसके बाद वे पुलिस की निगरानी में बराबर रहे। यह लंबी कहानी है। भारत में वापस आने के बाद उनका क्रांतिकारी आंदोलन से कोई संपर्क नहीं रहा। शायद उनको महसूस हुआ कि अब गांधी युग का प्रारंभ हो गया है और जनता को क्रांतिकारियों के प्रति आदर और सहानुभूति है, पर सहयोग नहीं, क्योंकि क्रांतिकारी ब्रिटिश सैन्यशक्ति का मुकाबला करने में असमर्थ हैं। यह एक लंबी कहानी है। पर सावरकर और लंदन के क्रांतिकारियों के संपर्क के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार का कोप सदैव भुगतना पड़ा।

भारत वापस आकर जायसवाल शिक्षा और शोध के क्षेत्र में कार्य करना चाहते थे। विलायत से भी वे  ‘सरस्वती’ के लिए आलेख भेजते रहते थे। अंगे्रजी में ‘मॉडर्न रिव्यू’ के लिए भी लिखते थे। इंग्लैंड में उनका परिचय एक सिंधाली इंडोलॉजी के विद्वान् डॉन मार्टिनी डिसिल्वा विक्रमसिंह से हुआ और उनके संपर्क एवं निर्देशन में के.पी. जायसवाल की रुचि भारत के प्राचीन इतिहास, उसके विभिन्न अंगों, पुरातत्त्व, शिलालेख, पुरालेख के शोध की ओर मुड़ गई। उसी का सुखद फल उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदू पोलिटी’ है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के अत्यंत प्रभावी वाइस चांसलर श्री आशुतोष मुकर्जी के बहुत प्रयत्नों के बाद भी तत्कालीन ब्र्रिटिश सरकार ने जायसवाल को विश्वविद्यालय में लैक्चरर नियुक्त नहीं होने दिया, उनकी लंदन में क्रांतिकारियों के संपर्क की पृष्ठभूमि के कारण। बैरिस्टर की डिग्री तो थी ही, के.पी. जायसवाल ने कानून की पै्रक्टिस कलकत्ता में शुरू कर दी। अच्छी सफलता मिली। कालांतर में उन्होंने पटना उच्च न्यायालय को अपने कार्यक्षेत्र के लिए चुना। उनको धन और यश दोनों ही प्राप्त हुए, किंतु उनकी रुचि इतिहास, प्राचीन भारत के शोध, हिंदी भाषा और साहित्य में कोई कमी नहीं आई। कलकत्ता में अपनी वकालत के साथ-साथ उनके ऐतिहासिक महत्त्व के कई आलेख ‘इंडियन एंटीक्योरी’ और  ‘मॉडर्न रिव्यू’ में प्रकाशित हुए। हाथी गुफा कारमाइकेल इनस्क्रिमशन या आलेख, जो अनेक कोशिशों के बावजूद अभी तक पढ़े न जा सके थे, जायसवाल ने राखलदास बनर्जी के सहयोग से दस वर्ष कार्य कर पटना में उसकी सही व्याख्या करने में सफलता पाई। बिहार के गवर्नर और बिहार-ओडिशा रिसर्च सोसाइटी के अध्यक्ष सर एडवर्ड गेट ने १९२० की वार्षिक रिपोर्ट में उनकी प्रशंसा की और कहा कि इस विषय में वे यूरोप में भी ख्याति अर्जित कर रहे हैं। प्रशासक और इतिहासकार बिनसेंट स्मिथ ने भी उनकी इस उपलब्धि को उल्लेखनीय कहा। सर आशुतोष मुकर्जी सदैव योग्य व्यक्तियों को अपने विश्वविद्यालय में लाना चाहते थे अथवा संबद्ध करना चाहते थे। उन्होंने प्रतिष्ठित टैगोर लॉ भाषणों के लिए उन्हें आमंत्रित किया। जब कारमाइकेल पीठ कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्थापित हो गई, तो सर आशुतोष ने उसके प्रोफेसर के पद उनको आमंत्रित किया, किंतु उनकी वकालत पटना में इतनी अच्छी जम चुकी थी कि जायसवाल ने असमर्थता प्रकट की। जायसवाल बड़ी उदार प्रवृत्ति के थे और शोधार्थियों आदि की सहायता खुले हाथ करते थे, इस प्रकार विद्वत्ता जगत् में उन्होंने एक विशेष स्थान बना लिया। जगह-जगह से विद्वत् आयोजनों के निमंत्रण आने लगे। भारतीय इतिहास परिषद् की स्थापना में उनका प्रमुख हाथ रहा। उनकी जन्मशती पर भारत सरकार ने एक डाक टिकट निकाली थी। बिहार सरकार ने उनकी स्मृति में डॉ. के.पी. जायसवाल शोध संस्थान की स्थापना की। वहाँ मूल्यवान शोध करने की उचित व्यवस्था की आवश्यकता है।

इतिहास परिषद् के द्वारा एक योजना बनाई गई थी कि भारत का एक विशद संपूर्ण इतिहास लिखवाने की व्यवस्था की जाए। डॉ. जायसवाल ने शासन केप्रति वफादारी दिखाने की कोशिश की, ताकि पुलिस निगरानी उठा ली जाए। उन्होंने ‘पाटलिपुत्र’ के संपादक होने के नाते प्रथम विश्वयुद्ध में पूर्ण समर्थन देने की अपील की। गदर आंदोलन, जिसके प्रणेता उनके लंदन के मित्र लाला हरदायल थे और कामागाटा मारू जहाज प्रसंग की आलोचना की। उच्च इंटेलीजेंस के अधिकारियों से संपर्क हुआ, पर अंत तक अंगे्रज सरकार शंकालु ही बनी रही और उन पर पूरा विश्वास कभी नहीं किया कि अब उनके कोई संबंध क्रांतिकारियों और उग्रवादियों से नहीं हैं।

संकलनकर्ता एवं संपादक रतनलाल ने काशी प्रसाद जायसवाल संचयन को तीन खंडों में विभाजित किया है। प्रथम खंड में उनके साहित्यिक लेख, कविताएँ, जीवन-चरित, यात्रा-वृत्तांत संकलित हैं। दूसरे खंड में उनके  ‘पाटिलपुत्र’ के संपादकीय लेख कुछ अन्य विषयों पर तथा अशोक की धर्मलिपि पर लेख एवं कुछ व्याख्यान शामिल किए गए हैं। ऐतिहासिक लेख के संदर्भ में यह खंड महत्त्वपूर्ण है। तीसरे खंड में ऐतिहासिक लेख, विविध लेख एवं पत्र सम्मिलित किए गए हैं, प्रत्येक खंड के प्रारंभ में अपनी भूमिका में विवेचन किया है, जो सामग्री उन्होंने उस खंड में संकलित की है। संकलनक र्ता बधाई के  पात्र हैं कि उन्होंने अपनी डॉक्टरेट के लिए एकत्रत की गई सामग्री के कुछ भाग को पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए सुगमता से उपलब्ध करा दिया है। संकेत भी किया है, जो सामग्री वे प्राप्त नहीं कर सके, उसके लिए भविष्य में खोज की जा सकती है। सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित तीनों खंड कॉलेजों और सार्वजनिक पुस्तकालयों में अवश्य होने चाहिए।

लेखक-संपादक के परिचय से पता चला कि उनका अंगे्रजी शोध-ग्रंथ ‘काशी प्रसाद जायसवाल : द मेकिंग ऑफ नेशनलिस्ट हिस्टोरियन’ प्रकाशित हो गया। यह डॉ. के.पी. जायसवाल पर लिखी प्रथम पुस्तक है, हमने प्रकाशक आकार बुक्स, दिल्ली से तुरंत मँगवाने की व्यवस्था की। इसके दो दशक पहले पटना से जो कमोमेटेशन वॉल्यूम (स्मरण ग्रंथ) छपा था, उसको पटना यात्रा में ले लिया था। वहीं एक ग्रंथ तब तक उनके विषय में उपलब्ध हुआ था। उसका उपयोग भी लेखक ने भलीभाँति किया है। डॉ. रतनलाल की पुस्तक उनके परिश्रम और विशद अध्ययन की परिचायक है। लेखक के विश्लेषण में कहीं-कहीं उनके अपने दृष्टिकोण का पता चलता है, जो स्वाभाविक है। यह संभव है कि पाठक की राय कुछ भिन्न भी हो सकती है। काशी प्रसाद जायसवाल पर यह पुस्तक लेखक की काफी खोज के बाद आई है, यह महत्त्व की बात है। हम अपने प्राचीन और पूर्व के इस लेखक को भूल-सा गए थे। हमारा विचार है कि पुस्तक और उत्तम होती, यदि प्रकाशक किसी योग्य संपादक से संपादन करा लेता। जब एक डिजर्टेशन एक अच्छे एडीटर के पास में पहुँचती है, तो वह परिमार्जित होकर लेखक और पाठक दोनों को परस्पर समझने में सहायक होती है। लेखक के अनुसार काशी प्रसाद जायसवाल पर दो डिजर्टेशन हुए हैं, पर वे अप्रकाशित रहे। अतएव रतनलाल की पुस्तक भारतीय इतिहास लेखन के एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है। समग्र रूप से डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल के कृतित्व और व्यक्तित्व को समझने में सहायक है। लेखक बधाई के पात्र हैं।

राजनेताओं की नैतिकता

आशा है कि हमारे राजनेता हमारे मार्गदर्शक समाज के लिए, आज की पीढ़ी के लिए अपने व्यवहार और विचार द्वारा आदर्श प्रस्तुत करेंगे, उन्हें नई पीढ़ी द्वारा रोल मॉडल की मान्यता प्राप्त होगी। गीता में कहा है कि जैसा बड़े लोग करते हैं, उसका अनुसरण जनसाधारण करेगा। जिन जीवन-मूल्यों की हम दुहाई देते हैं, जिस नैतिकता पर हमें एक सांस्कृतिक धरोहर की तरह गर्व है, वे सब आज क्षार-क्षार होती दिखती हैं। यह विडंबना है कि जिनसे हम पथ-प्रदर्शन की अपेक्षा करते हैं, उन्हीं का नैतिक मार्गसूचक, मॉरल कंपास दूषित पाते हैं। राजनेताओं को हम हमाम में नंगा पाते हैं। उदाहरणस्वरूप हाल की एक घटना की चर्चा करना चाहेंगे। उत्तर प्रदेश में किसी समय सरकार ने निर्णय लिया कि जो भी मुख्यमंत्री रहेगा, थोड़े या अधिक समय के लिए, वह अपने चुनिंदा सरकारी आवास का अधिकारी आजीवन रहेगा यानी पद छोड़ने के उपरांत भी उनके पास लखनऊ में मकान हो या न हो, वे संपन्न हैं या नहीं और अपने रहने का प्रबंध करने में समर्थ हैं, ये सब बातें निरर्थक हैं। एक बार मुख्यमंत्री बने तो उसकी भनक जीवनपर्यंत रहेगी। अतएव विशेष सुविधाएँ चाहिए। जनसाधारण में इस नीति का हमेशा से घोर विरोध होता रहा है। जनता को घर-मकान के चुनावी आश्वासन देनेवाले चुनाव की इस परिपाटी केविरोध में ‘जनप्रहरी’ नामक जनता की एक एन.जी.ओ. ने शीर्ष न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। बहुत दिनों मामला लटका रहा। राज्य सरकार ने औचित्य बताया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों का एक अपना रुतवा होता है, सदैव जनता अपनी समस्याएँ लेकर उनके पास आती है, सुरक्षा की आवश्यकता होती, आदि-आदि। अतएव यह प्रथा बनी रहनी चाहिए। ‘चोर-चोर मौसरे भाई’। पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी बड़े-बड़े वकील रखकर अपना पक्ष रखा, किंतु शीर्ष न्यायालय ने उनकी गुहार पर ध्यान न देकर निर्णय सुनाया कि पूर्व मुख्यमंत्री केवल साधारण नागरिक हैं, इनको आजीवन सरकारी आवास में रहने का कोई अधिकार नहीं और ऐसे लोगों से शीघ्र सरकारी मकान खाली करा लिये जाएँ। अब जब कोई उपाय न रहा तो राजनीतिक स्तर पर तिकड़में शुरू हुईं। मजे की बात है कि ऐसे लोग अन्य पदों पर हैं अथवा संसद् में, और उनके पास उस हैसियत से सरकारी मकान है, किंतु इनकी हवस का अंत नहीं। शीर्ष न्यायालय के निर्णय के बाद कुछ ने आदेशानुसार समय-सीमा में लखनऊ में सरकारी मकान खाली कर दिए। एक पूर्व युवा मुख्यमंत्री, जिनकी पत्नी संसद् सदस्य हैं और दिल्ली में सरकारी आवास की अधिकारी हैं, वे स्वयं विधान परिषद् के सदस्य हैं, और उसके कारण उनको उस हैसियत का निवास स्थान मिल सकता है, को यह बात पची नहीं; तोते की जान तो लखनऊ की बड़ी-बड़ी कोठियों में है और उनको कैसे खाली किया जाए, कहर टूट जाएगा। मुख्यमंत्री ने निवेदन किया कि उनको उसी मकान में रहने दिया जाए, उनके पास अपना कोई आवास नहीं है। यह अलग बात है कि उनकी सांसद पत्नी ने लखनऊ में एक आलीशान होटल बनाने की आवश्यक स्वीकृति का अधिकारियों से आवेदन किया है। साधारण जन का यह भी कहना है कि पता नहीं पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास कितने बेनामी आवास हैं। जनता का मुँह बंद करना मुश्किल है। एक और वरिष्ठ पूर्व मुख्यमंत्री, जो स्वयं सांसद हैं, और उनके पास सरकारी कोठी है, प्रस्ताव किया कि विधानसभा और विधान परिषद् में उनके दल के प्रतिपक्ष के नेता हैं, अतएव एक के नाम उनका आवास आवंटित कर दिया जाए और पूर्व युवा मंत्री का आवास दूसरे को आवंटित कर दिया जाए। मतलब यह कि यथास्थिति बनी रहे। आवास सिर्फ नाम के लिए विधानसभा और विधान परिषद् के विरोधी दल के नेताओं के नाम रहेंगे। किंतु पूर्व के मुख्यमंत्री ने शीर्ष न्यायालय के आदेश के उल्लंघन के भय से यह प्रस्ताव स्वीकार किया। नतीजन दोनों को सरकारी आवास खाली करने पडे़। जुगाड़ चली नहीं। मीडिया में समाचार और तसवीरें आईं कि पूर्व युवा मुख्यमंत्री के घर को खाली करने के पहले खूब तोड़फोड़ हुई। उसकी भरपाई का उन्होंने आश्वासन दिया है। यह अलग मामला है। अगर नाक सीधी नहीं पकड़ी जा सकती है तो उलटी ही सही। कानून कहता है कि जो सीधे रास्ते से वाजिब नहीं है, वह परोक्ष रूप से भी अस्वीकार्य है। गांधीजी अच्छे उद्देश्य के लिए भी गलत माध्यम अपनाने को अनैतिक मानते थे। एक रचनाकार और विचारक एलडस हक्स्ले की एक प्रसिद्ध पुस्तक है (Ends and Means) ‘साध्य और साधन’। यहाँ हमारे नेताओं की सोच साध्य और साधन, दोनों केविषय में ही अनुचित है। यह है आज की राजनीतिक नैतिकता का चेहरा।

एक और पूर्व मंत्री-मुंख्यमंत्री के पास दो सरकारी आवास थे। जब शीर्ष न्यायालय के आदेश के कारण उन्हें वह छोड़ना पड़ा तो उन्होंने एक आवास यह कहकर छोड़ दिया कि वह उन्हें मुख्यमंत्री की हैसियत से आवंटित हुआ था। मीडिया के लोगों को लेकर उसकी सैर करवाई। उसकी चाबियाँ संबंधित विभाग को डाक द्वारा भिजवा दीं। दूसरे आवास के बारे में उन्होंने कहा कि यह तो बसपा के संस्थापक कांशीरामजी का मेमोरियल है, और उसके लिए एक प्रस्ताव उनके कार्यकाल में कैबिनेट ने पारित किया था। यह सूचना उन्होंने राज्य सरकार को भेज दी। कांशीरामजी उसमें आकर ठहरते थे। उनकी एक मूर्ति भी वहाँ स्थापित कर दी गई। वे स्वयं तो केवल एक कमरे का इस्तेमाल करती थीं, यह निगरानी रखने के लिए कि मेमोरियल का रख-रखाव ठीक से हो रहा है? उनकी एक धमकी भी थी कि यदि मेमोरियल के साथ कोई छेड़खानी की गई तो उससे देश भर में एक आंदोलन उठ खड़ा होगा। यही नहीं, उसके साथ ही तथाकथित मेमोरियलवाले आवास के बाहर मेमोरियल का नाम अंकित कर दिया गया। राज्य सरकार की कैबिनेट ने कब प्रस्ताव पारित किया था, यह सब जानकारी सरकारी विभाग इकट्ठी करेगा। यह आश्चर्य की बात है कि यदि मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया गया था तो उसे तभी तुरंत सार्वजनिक क्यों नहीं किया था? कांशीरामजी मेमोरियल की प्लेट तभी क्यों नहीं लगाई गई थी? जब शीर्ष न्यायालय के निर्णय के अनुपालन का सवाल उठा, तभी यह सब काररवाई आनन-फानन में क्यों हुई? जनता इन सब प्रश्नों का उत्तर जनना चाहेगी। आखिर फैसला तो अंत में शीर्ष न्यायालय को करना है। यहाँ पर भी वही राजनैतिक तिकड़म, निजी आवास को मेमोरियल का रूप दे देना, ताकि जन-भावनाओं को उभारा जा सके। जो कानून सीधे रास्ते से पालन नहीं किया जा सकता था, उसको गोलमोल तरीके से करने की कोशिश की गई। यह है हमारे कुछ राजनेताओं की नैतिकता। धीरे-धीर लोकतंत्र एक चोरतंत्र, किप्टोक्रेसी बनता दिखाई पड़ रहा है। इससे हमारी भावी पीढि़याँ कैसी शिक्षा ग्रहण करेंगी! भला हो शीर्ष न्यायालय का, जिसको दायित्व लेना पड़ रहा है कि किसको सरकारी आवास मिले या न मिले, जो एक मामूली प्रशासनिक अधिकारी का साधारण दायित्व है। हम अनुचित और अवैध काम स्वार्थवश करते हैं और साथ-साथ न्यायपालिका को कोसते हैं कि वह कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है। पाठकों को जानकारी है कि इंग्लैंड में मंत्रियों को कोई सरकारी घर नहीं मिलता—केवल प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के अतिरिक्त। अपना कार्यकाल समाप्त होते ही वे तुरंत आवास खाली कर देते हैं। अमेरिका में भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के अतिरिक्त वहाँ के मंत्रिमंडल के सदस्य अपने निजी निवास में ही रहते हैं।

डॉ. सत्येंद्र चतुर्वेदी अनुभूति और अभिव्यक्ति की वैचारिक पत्रिका ‘लोक शिक्षक’ का संपादन-प्रकाशन पिछले चार दशकों से अधिक समय से कर रहे हैं। यह उनकी नैतिक मूल्यों को समर्पित व्यक्तित्व का प्रतीक है। इस कठिन दायित्व का भार बिना किसी प्रकार की सरकारी अथवा संस्थानीय सहायता के बगैर वे स्वयं वहन कर रहे हैं। वे राजस्थान के स्वयंशासी स्नातकोत्तर राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य रहे हैं और हिंदी भाषा एवं साहित्य विषयक समितियों से संबंधित भी रहे हैं। उनके अनेक प्रकाशन हैं। रचनाकार हैं। चिंतक हैं। उनकी कहानियों का भी एक संकलन प्रकाशित हो चुका है। उनकी अधिकतर कहानियाँ उद्देश्य प्रेरित होती हैं। मूलतः वे चिंतक हैं। देश और समाज की विकृतियाँ उनको बेचैन करती हैं। उनके आलेख और निबंध समाज की दिशाहीनता, राजनीतिक कुटिलता, अपसंस्कृति, बाजारवाद, अवसरवाद, अंधविश्वास आदि समस्याओं का निर्भीकता के साथ विश्लेषण करते हैं और इंगित करने का प्रयास करते हैं कि इस उथल-पुथल के युग में हम कैसे भटक गए हैं! उनकी दृष्टि भारतीय संस्कार और संस्कृति पर सदैव केंद्रित रहती है। उनके विचार दकियानूसी नहीं हैं। वे भलीभाँति समझते हैं कि परंपरा का एक गुण गतिशीलता है, किंतु दिशाभ्रम नहीं होना चाहिए। उनके स्मरण भी अतीव सुंदर और सजीव होते हैं। पिछले दिनों उनकी रचनाओं के दो संकलन देखने का अवसर मिला। एक है ‘लोक समाज, राजनीति मूल्यों के निकष पर’। समय-समय पर उनके कुछ आलेख, ‘लोक शिक्षक’ के संपादकीय और संस्मरण उसमें शामिल हैं। विषयों की विविधता चमत्कृत करती है। यह उनकी विशद समाजोन्मुखी दृष्टि और लोकहित सर्वोपरि रखने की प्रवृत्ति की परिचायक है। किस प्रकार हम स्वराज्य के आदर्शों को भूल गए और स्वार्थपरता की ओर बढ़ रहे हैं, यह बात उनको अत्यंत पीड़ा पहुँचाती है, जिसकी झलक देखने को मिलती है। ‘अनुभूति और अभिव्यक्ति’ उनकी दूसरी पुस्तक है। यह भी उनके विचारों की अभिव्यक्ति की एक और कड़ी है। उनके ‘साहित्य का मर्म और धर्म’ तथा ‘साहित्य का स्वरूप’ आलेख साहित्य के कई अनछुए पक्षों के गंभीर विवेचन प्रस्तुत करते हैं। तुलसी की ‘कवितावली’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘उसने कहा था’ कहानी की भावयात्रा पठनीय है। आचार्य रामकृष्ण शुक्ल ‘शिलोमुख’ और रांगेय राघव, जिनको हम बिल्कुल विस्मृत कर चुके हैं, सत्येंद्र चतुर्वेदी ने उनको भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। वे गांधीवादी विचारधारा से ओतप्रोत हैं, अतएव उसका उदाहरण उनका आलेख है—‘गांधीजी का दर्शन और साहित्य’, जो गांधीजी की वैचारिक सरणी को समग्रता से प्रस्तुत करता है। सत्येंद्रजी के आलेख में उनके विचारों की परिपक्वता और ऊर्जा, दोनों परिलक्षित होती हैं। उनके दोनों संकलन जन-पुस्तकालयों और कॉलेजों में रखे जाने चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी अपने संस्कार निर्मित करने में लाभान्वित हो सके।

भविष्य में ‘आप’

आप की कार्यशैली के संबंध में हमने पिछले अंक में कुछ चर्चा की थी। राजनिवास में धरने पर बैठनेवाले दो मंत्री, उप मुख्यमंत्री सिसोदिया और सत्येंद्र जैन अस्वस्थ होकर अस्पताल में भरती हो गए। उपराज्यपाल ने मुख्यमंत्री केजरीवाल को मौका दिया कि वे अपना नाटक समाप्त करें। अधिकारियों से कहा कि वे मंत्रिमंडल को पूरा सहयोग दें, यद्यपि अधिकारियों का कहना था कि वे लगातार पूरा कार्य कर रहे हैं, केवल सुरक्षा केडर के कारण उनकी बैठकों में नहीं जा रहे हैं।उपराज्यपाल ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री अधिकारियों की बैठक बुलाएँ, बातचीत कर आश्वस्त करें कि अब कोई हादसा नहीं होगा, ताकि पारस्परिक विश्वास का माहौल बने; लेकिन केजरीवाल ने अधिकारियों से बातचीत के लिए बैठक नहीं बुलाई। वे अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए बंगलुरु चले गए। यही नहीं, उन्होंने इसे अपनी जीत की संज्ञा दी। यह कथन एक संकुचित मनोवृत्ति का परिचायक है। उनकी कोशिश होनी चाहिए थी कि बातचीत कर सद्भाव और सहकार का वातावरण बनाएँ। शीर्ष न्यायलय ने अब निर्णय दे दिया है कि कानून व्यवस्था, पुलिस और जमीन के अलावा मंत्रिमंडल अपने निर्णय ले सकता है और उपराज्यपाल को सूचित करता रहे। निर्णय में उपराज्यपाल को छूट है कि यदि कोई मामला ऐसा है, जो उचित नहीं है तो उसे राष्ट्रपति को प्रेषित कर सकते हैं। शीर्ष न्यायालय के निर्णय के बाद अब केजरीवाल के पास बहाना नहीं है कि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है। अब उन्होंने मामला उठाया है कि उपरोक्त निर्णय केसंदर्भ में सरकारी अधिकारियों की पोस्टिंग और स्थानांतरण उनके अधिकार में है, यद्यपि उपराज्यपाल के अनुसार यह अभी शीर्ष न्यायालय के विचाराधीन है। वे गृहमंत्री से भी मिले हैं। यह प्रश्न शीघ्र सुलझ जाए तो अच्छा होगा। कठिनाई यह है कि केजरीवाल का सकारात्मक और रचनात्मक कार्य करने का मन नहीं है। ‘हम जो चाहें वह कर सकते हैं’ वाली मनोवृत्ति उनकी है, इसलिए उनके विधायक भी उच्छृंखल हो जाते हैं। उनको समझना होगा कि कोई शासन केवल रोष से नहीं चलता है। अधिकारियों और मंत्रियों में परस्पर विश्वास का वातावरण होना चाहिए। अधिकारियों से परामर्श कर अपने लिखित आदेश नियमानुसार दें, ताकि आगे कोई भ्रांति न हो और अधिकारियों को उसका पालन करना चाहिए। खेद है कि एक अधिकारी रह चुकने के बाद भी वे यह बात नहीं समझ पा रहे हैं। उन्होंने उच्च अधिकारियों की बैठक अभी तक नहीं बुलाई है। इनका इरादा है कि ‘विभाजित करो और राज करो।’ उन्होंने सवॉर्डिनेट सेवाओं के लोगों की बैठक की और आश्वासन दिया कि उनकी दिक्कतों का निराकरण किया जाएगा। यह ठीक है कि यदि उनकी कुछ शिकायतें हैं तो उनको हल किया जाए, किंतु सुशासन की दृष्टि से विभाजित करने की नीति अंततोगत्वा आत्मघाती होती है। उन पर जनता के प्रतिनिधि होने का भूत इस प्रकार सवार है कि सुशासन की कुंजी क्या है, वे भूल गए हैं। अहं छोड़कर विनम्रता, संतुलित वाणी और धैर्य से नियमों के अनुसार कार्य करने की आवश्यकता है। हठ और दूसरों पर दोषारोपण तथा भाँति-भाँति के बहाने तलाशकर शासन में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। आखिर अरुण जेटली से बड़बोलेपन के कारण ही माफी माँगनी पड़ी थी। बेहतर होगा और जनहित में होगा, यदि वे अपनी कार्यशैली में सकारात्मकता को थोड़ा सा स्थान दे सकें।

आध्यात्मिक मनस्वी का निधन

दादा जे.पी. वासवानी का शुक्रवार १२ जुलाई को पुणे में साधु टी.एल. वासवानी मिशन में वृद्धावस्था संबंधित बीमारियों के कारण देहांत हो गया। ३० मई को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद का साधु इंटरनेशनल स्कूल के उद्घाटन समारोह में स्वागत किया था और उनके सफलता के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त की थीं। साधु वासवानी मिशन २ अगस्त को उनकी सौवीं वर्षगाँठ मनाने का भव्य आयोजन कर रहा था। प्रधानमंत्री आदि अनेक विशिष्ट व्यक्ति आयोजन में भाग लेनेवाले थे। उनका जन्म २ अगस्त, १९१८ को हैदराबाद (सिंध) में हुआ था। विधाता की कुछ और इच्छा थी, उन्हें पहले ही अपने पास बुला लिया। दादा जे.पी. वासवानी एक अत्यंत मेधावी छात्र थे और उन्होंने एम.एस-सी. तक की उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनकी एस.एस-सी. की थीसिस के परीक्षक नोबल पुरस्कार विजेता श्री सी.वी. रमन थे। अपने कॅरियर की परवाह न कर अपने चाचा साधू टी.एल. वासवानी के पदचिह्नों पर चलने का निश्चय किया। अपनी अध्यात्म में रुचि के कारण साधु वासवानी के शुरू किए मीरा शिक्षा मिशन में सम्मिलित हो गए। साधु वासवानी भारतीय नवोत्थान या पुनर्जागरण के पुरोधाओं में ही थे। उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) में उस समय का परिदृश्य देखा था और उससे प्रभावित थे। उनके बारे में आज कम ही जानकारी है। इस विषय में आगे कभी चर्चा करेंगे। भारत विभाजन के पहले ही साधु वासवानी ने मीरा एजुकेशन आंदोलन का हस्तांतरण पूना में कर लिया। दादा वासवानी लड़कियों केमीरा कॉलेज के प्रिंसिपल भी रहे और साधु वासवानी मिशन की पत्रिका ईस्ट-वेस्ट का रूपांतर कर दिया, ताकि वह आज के समय नवयुवकों और युवतियों में संस्कार निर्माण में सहायक हो सके। साधु वासवानी मिशन का बहुत विस्तार किया। उनकी मान्यता एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व और दार्शनिक के रूप में विश्व में फैल गई। यह कहना गलत होगा कि वे केवल सिंधियों के मार्गदर्शक या संत थे। हर धर्म और समुदाय के लोग उनसे मिलते थे, सुनते थे। उन्होंने बहुत सी पुस्तकें लिखीं एवं उनके भाषण भी संकलित हुए। उनकी वाणी और व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक थे। उनकी शिक्षाएँ मानवीय धर्म से ओतप्रोत हैं। गरीबों से सहानुभूति और उनकी सहायता उनकी शिक्षा के अंग हैं। वे जीव-जंतुओं के अधिकारों के हामी थे। वे शाकाहार का सदैव प्रचार करते थे। वे धर्म के मर्म को सीधे-सरल शब्दों में व्यक्त करते थे। वे सहिष्णुता, समताभाव और शिक्षा प्रसार पर जोर देते थे। शायद ही कोई ऐसा राजनेता हो, जो पूना जाने पर उनसे मिलने न जाता रहा हो। उन्होंने साधु वासवानी मिशन को विश्वव्यापी बना दिया। उनकी विनम्रता अद्भुत थी, बिल्कुल स्वाभाविक। हमें उनके दर्शन करने के कई अवसर दिल्ली, बेंगलुरु और पूना में मिले। उनके वार्त्तालाप और दर्शन से शांति महसूस होती थी। बिना किसी भेदभाव के वे सहिष्णुता, समता, न्याय और समन्वय के समर्थक थे। सबसे स्नेह, सौहार्द, प्रेम के संबंध बनें, यही उनका सीधा संदेश था। उनकी अपेक्षा थी कि वंचितों के लिए जो कुछ किया जा सकता है, हर एक को करना चाहिए। मानव सेवा ही भगवान् की सेवा है। उनके अंतिम संस्कार के समय पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री एल.के. आडवाणी और पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल भी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। दादा वासवानी भारतीय ऋषि परंपरा के एक जाज्वल्यमान नक्षत्र थे। उनके देहावसान से देश ने एक मार्गदर्शक खो दिया है। उनकी पुण्य स्मृति के प्रति सादर नमन।

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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