रहस्यमयी पुस्तक चोर

रहस्यमयी पुस्तक चोर

‘‘अरे, मेरी गणित की किताब कहाँ गई?’’ यशवी अपनी किताब को मेज पर न पाकर चीखते हुए बोली। गेम्स के पीरियड में जाते समय वह गणित की किताब को मेज पर ही छोड़ गई थी। अगला पीरियड गणित का ही था। गणित की कॉपी अपनी जगह पर थी, लेकिन केवल किताब वहाँ नहीं थी। कुछ ही देर में गणित की आयत मैडम हाथ में कॉपियाँ लिये हुए आईं। आज उन्हें छठी कक्षा का टेस्ट लेना था, इसलिए वे आठवीं कक्षा की गणित की कॉपियों को भी यहीं ले आई थीं कि बच्चों को टेस्ट पेपर देकर वे कुछ कॉपी जाँच लेंगी। आते ही शोरगुल सुनकर आयत मैडम बोलीं, ‘‘ये क्या, तुम सबको तो शांति से गणित की तैयारी करनी चाहिए और तुम सब शोर मचा रहे हो!’’ इस पर प्रतीक बोला, ‘‘मैडम, किसी ने यशवी की गणित की पुस्तक चुरा ली है।’’ कक्षा में चोरी की बात सुनकर आयत मैडम चौंक गईं। अभी तक चोरी जैसी घटना इस कक्षा में नहीं हुई थी। यशवी अपनी किताब के खो जाने से रो रही थी। आयत मैडम ने यशवी को चुप कराया और क्लास मॉनीटर अवनि से सबके स्कूल बैग चैक करने को कहा। अवनि ने मैडम की सहायता से सभी बच्चों के स्कूल बैग चैक किए, लेकिन कहीं भी गणित की पुस्तक नजर नहीं आई।

उस दिन टेस्ट नहीं हो पाया और पीरियड की घंटी बज गई। आयत मैडम बोलीं, ‘‘अब मैं कल क्लास टेस्ट लूँगी। हाँ, इसी बीच आप सभी बच्चों से मेरा निवेदन है कि यदि किसी ने यशवी की पुस्तक ली हो तो वह उसे वापिस कर दे या मुझे लौटा दे। मैं प्रॉमिस करती हूँ कि उस बच्चे को कोई सजा नहीं मिलेगी।’’ पर कक्षा के बच्चों के पास पुस्तक होती, तब तो मिलती।

अगले दिन आयत मैडम आठवीं कक्षा में पहँुची तो वहाँ पर भी खलबली मची हुई थी। आज किसी ने आठवीं कक्षा के धैर्य की अंग्रेजी की पुस्तक चुरा ली थी। उस दिन भी पूरी कक्षा में पुस्तक ढूँढ़ी गई, लेकिन कहीं कोई पुस्तक नहीं मिली।

इसके बाद पाँचवीं कक्षा से भी साइंस एवं हिंदी की पुस्तकें गायब हुईं। यह बात प्रिंसीपल मैडम तक भी पहुँची। सभी बच्चों के पास अपनी-अपनी पुस्तकें थीं। ऐसे में आखिर कौन था चोर, जो केवल पुस्तकें चुराता था?

हर कक्षा की मैडम ने गुप्त तरीके से चोर को पकड़ने के प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। कई कक्षाओं के बच्चों ने जासूसी नीति को अपनाते हुए स्वयं को कक्षा में इस तरह छिपा लिया कि कोई उन्हें देख न पाए, लेकिन तब भी चोर पकड़ में नहीं आया। एक दिन छठी कक्षा में जब आयत मैडम पहँुचीं तो फिर शोरगुल सुनकर बोलीं, ‘‘क्या हुआ? अब कौन सी पुस्तक चोरी हुई?’’ इस पर सब बच्चे एक साथ चिल्लाकर बोले, ‘‘मैडम, इस बार तो कमाल हो गया, पुस्तक चोरी नहीं हुई, बल्कि यशवी की पुस्तक आज उसी की टेबल पर रखी हुई मिल गई। यह कक्षा के साथ-साथ आयत मैडम के लिए भी हैरानी की बात थी। आखिर चोर को जब पुस्तक लौटानी ही थी तो फिर उसने चुराई क्यों? यदि लौटानी ही थी तो माँगकर भी ली जा सकती थी, फिर अन्य कक्षाओं में भी ऐसा ही हुआ। जिन-जिन की जो पुस्तकें चोरी हुई थीं, वे उनकी जगह पर मिलती गईं। आखिर यह कैसा चोर था, जो पुस्तकें चुराता है और फिर उन्हें वापस भी लौटा देता है।

एक दिन लाइब्रेरियन नमिता पाहूजा मैडम टेबल पर कुछ अंग्रेजी एवं हिंदी की नई पुस्तकों को रखकर प्रिंसीपल मैडम के पास कोई अनिवार्य जानकारी देने के लिए गईं। जब वे वापस लौटीं तो टेबल से तीन पुस्तकें गायब थीं। इनमें एक हिंदी का उपन्यास और दो अंग्रेजी की कहानियों की पुस्तक थी। आखिर पुस्तकें कहाँ चली गईं। वे भी समझ गईं कि पुस्तकों को पुस्तक चोर ही चुरा ले गया है। प्रिंसीपल मैडम तक यह सूचना पहँुची तो वे परेशान होकर बोलीं, ‘‘अब बहुत हो गया। ऐसे नहीं चलेगा। हमें उस चोर को ढूँढ़ना ही होगा। पी.टी.एम. में माता-पिता इस बात की शिकायत कर चुके हैं कि बच्चे की पुस्तक चोरी हो जाती है और जब हम उसे दूसरी दिला देते हैं तो वह मिल जाती हैं। यह क्या चक्कर है? उन्होंने चोर की तलाश करने के लिए एक जासूस मीरा पंडित से बात की। मीरा पंडित पच्चीस साल की नवयुवती थी और वह इसी स्कूल की विद्यार्थी थी। मीरा को जब यह जानकारी ज्ञात हुई तो वह प्रिंसीपल से बोली, ‘‘मैडम, आप चिंता मत कीजिए। अब उस चोर को ढूँढ़कर आप तक पहुँचाना मेरी जिम्मेदारी है।’’

मीरा चोर की तलाश में लग गई। उसने हर उस कक्षा की छानबीन की, जहाँ से पुस्तकें चोरी हुई थीं। लाइब्रेरी की पुस्तकें अभी तक नहीं मिल पाई थीं। जाँच-पड़ताल और छानबीन से मीरा इस तह तक तो पहुँच चुकी थी कि यह काम किसी स्कूल के बच्चे का नहीं, बल्कि बाहर के बच्चे का है और वह भी किसी किशोर वय के लड़के का। सब बातों तक पहुँचते-पहुँचते मीरा प्रिंसीपल से बोली, ‘‘यह चोर अलग तरह का है। यह पूरी तरह चोर नहीं लगता। मुझे ऐसा लगता है कि इस चोर को पुस्तकें पढ़ने का शौक है। इसे पुस्तकें नहीं मिल पातीं, इसलिए वह इस स्कूल के बच्चों और लाइब्रेरी की पुस्तकें चुराकर पढ़ता है और जब इन्हें पढ़ लेता है तो वह वापस उनके स्थान पर छोड़ जाता है।’’ मीरा की इन बातों से प्रिंसीपल ने भी सहमति जताई। मीरा बोली, ‘‘मैडम, बस एक सप्ताह के अंदर चोर पकड़ लिया जाएगा।’’ मीरा को कुछ और भी काम थे। वह वहाँ से निकलकर अपने अन्य कामों को करने के लिए चल पड़ी। एक-दो जगह पर उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो, लेकिन जब भी वह पलटकर देखती तो वहाँ पर किसी की छाया तक नजर न आती।

मीरा अब अपने घर लौट रही थी, वह अभी एक किराए के घर में अकेली ही रहती थी। जब उसने अपने घर का ताला खोला तो उसे फिर ऐसा महसूस हुआ कि एक जोड़ी नजरे उसका पीछा कर रही है। मीरा ने सतर्कता से इधर-उधर देखा, लेकिन किसी को न पाकर वह चुपचाप अपने घर में घुस गई। उसने जान-बूझकर घर की कुंडी बंद नहीं की और होशियारी से दो मिनट तक वहीं खड़ी रही। तभी एक पंद्रह सोलह साल की लड़की ने वहाँ प्रवेश किया। लड़की दुबली-पतली लग रही थी। मीरा को देखते ही वह रोते हुए उसके पैरों पर गिर पड़ी और बोली, ‘‘मैडम, वह पुस्तक चोर मैं ही हूँ। आप मुझे सजा दे दीजिए, लेकिन मुझे प्रिंसीपल मैडम के पास मत लेकर जाइएगा। मेरे माता-पिता वहाँ पर मजदूरी करते हैं और स्कूल के पीछे के ग्राउंड में हम तिरपाल की झोंपड़ी बनाकर रहते हैं। मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है। किताबें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। मैं स्कूल जाना चाहती हूँ, लेकिन स्कूल जाने के लिए स्कूलवाले घर का पता पूछते हैं। हमारा तो कोई ठिकाना ही नहीं है। ऐसे में मेरे माता-पिता यदि किसी सरकारी स्कूल में मुझे भरती करा भी देते हैं तो वे घर का पता कहाँ का देंगे? काम की तलाश में हमें इधर-से-उधर घूमना पड़ता है। मुझे अपने माता-पिता का घर-घर मजदूरी करना बिल्कुल पसंद नहीं। मैं चाहती हूँ कि मैं पढ़-लिखकर एक अच्छे पद पर जाऊँ और अपने माता-पिता की मजदूरी करना छुड़वा दूँ। मेरे पिता टी.बी. रोग के भी शिकार हो गए हैं। अगर उन्हें यह बात पता चलेगी तो वे बुरी तरह टूट जाएँगे। प्लीज, अब आप ही मेरी सहायता कर सकती हैं। मैंने आज तक किसी भी पुस्तक की चोरी नहीं की। मैं उन्हें पढ़ने के बाद वापस लौटा देती हूँ।’’ इसके बाद उसने लाइब्रेरी की पुस्तकों को मीरा के सामने निकालकर रख दिया। रोते-रोते रुँधे गले से वह इतना सब बोल गई। सारी बात जानकर मीरा ने उसका नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘मेरा नाम पूजा है।’’ यह सुनकर मीरा ने एक लंबी साँस ली और बोली, ‘‘नाम पूजा और काम ऐसा। पर तुम्हें यह कैसे पता चला कि मैं चोर को ढूँढ़ रही हूँ?’’

‘‘मैडम, स्कूल और कक्षा में घूमते देखकर और आपकी व प्रिंसीपल मैडम की बातें सुनकर मैं समझ गई थी कि आप जल्दी ही मुझे ढूँढ़ लेंगी। प्लीज मैं आगे से किसी भी बच्चे की कोई पुस्तक चोरी नहीं करूँगी।’’ मीरा के सामने यह अनोखा केस आया था और इसे उसने कुशलता से सुलझाना था। उसने चतुराई से पूजा से ढेर सारी बातें कीं। बातें करते-करते वह उसके गणित, अंग्रेजी और साइंस के ज्ञान से बेहद प्रभावित हुई। वाकई पूजा ने स्कूल न जाते हुए भी स्कूल जानेवाले बच्चों को ज्ञान और बुद्धि में केवल स्वयं पुस्तकें पढ़कर पीछे छोड़ दिया था। उसकी बुद्धिमत्ता से मीरा बेहद प्रभावित हुई। उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि उसके माता-पिता को स्कूल के काम से नहीं निकाला जाएगा। फिर वह पूजा से बोली, ‘‘तुम हर जगह मेरा पीछा कर रही थी न। अब तुम घर कैसे जाओगी? यहाँ से स्कूल दूर है।’’ पूजा ने माफी माँगते हुए कहा, ‘‘इसके सिवा मेरे पास कोई रास्ता भी नहीं था।’’ उसकी सारी बातें सुनकर मीरा उसे स्कूल पहुँचाकर आई।

अगले दिन मीरा ने प्रिंसीपल के सामने लाइब्रेरी की पुस्तकों को रखते हुए उन्हें ये सारी बातें बताईं तो वे दंग रह गईं। पूजा को वहाँ बुलाया गया। प्रिंसीपल ने पहले उसे चोरी करने के लिए बहुत डाँटा। पूजा ने अपनी गलती पर पश्चात्ताप करते हुए हृदय से माफी माँगी। कुछ देर बाद प्रिंसीपल ने उससे कुछ सामान्य ज्ञान और गणित के प्रश्न किए। सबके जवाब पूजा ने सही बता दिए। एक मजदूर की बेटी, जो स्कूल न जा पाई थी, उसके कठिन जवाबों को सुनकर प्रिंसीपल भी उससे प्रभावित हुए बिना न रह सकीं। इसके बाद प्रिंसीपल बोलीं, ‘‘अब मैं तुम्हें सजा सुनाती हूँ।’’ यह सुनकर पूजा नीचे मुँह करके खड़ी रही। प्रिंसीपल बोलीं, ‘‘तुम कल से इसी स्कूल की विद्यार्थी बनकर स्कूल आओगी। तुम्हारे ज्ञान को देखते हुए मैंने तुम्हें आठवीं कक्षा में भरती करने का निश्चय किया है। स्कूल के कंस्ट्रक्शन का काम खत्म होने के बाद तुम्हारी माँ को मैं अपने घर काम पर रख लूँगी और रहने के लिए तुम्हें एक छोटा सा घर भी दे दिया जाएगा।’’

पूजा को प्रिंसीपल की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ। उसका रोआँ-रोआँ रोमांच से काँप रहा था। वह आँखों में आँसू लिये प्रिंसीपल के कदमों में झुक गई और बोली, ‘‘मैडम! आप मेरे लिए भगवान् हैं, जिन्होंने एक चोर को सजा न देकर जीवन का सर्वोत्तम उपहार दिया है।’’ प्रिंसीपल ने पूजा को गले लगा लिया। मीरा की आँखें भी नम थीं, लेकिन वह आज बहुत खुश थी, क्योंकि प्रिंसीपल मैडम ने आज पूजा को आसमान में उड़ने के लिए पंख दे दिए थे।

—रेनू सैनी
३, डी.डी.ए. फ्लैट्स, खिड़की गाँव, मालवीय नगर
नई दिल्ली-११००१७
दूरभाष : ०९९७११२५८५८

हमारे संकलन