ककड़ी प्रदेश में शिशु-जन्म

ककड़ी प्रदेश में एक मुसीबत आ खड़ी हुई। ककड़ी प्रदेश आर्कटिक सागर में स्थित एक दूरवर्ती सुनसान उपद्वीप है। इस उपद्वीप की खोज कुछ ही दिनों पूर्व हुई है। खोजी दल के प्रमुख में नव अन्वेषित उपद्वीप का सर्वेक्षण करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह उपद्वीप ककड़ी की आकृति का है। बस बेतार-चालकों ने आर्कटिक द्वीप-समूह के इस नए उपद्वीप का नाम ‘ककड़ी प्रदेश’ रख दिया।

ककड़ी प्रदेश धीरे-धीरे बसाया जाने लगा। उसकी अछूती भूमि पर मानव पद-चिह्नों की आकृतियाँ उभरने लगीं। मकान बनाए जाने लगे। बर्फ के टीलों पर जिंदगी प्रारंभ हुई। वहाँ के लोगों का दैनिक जीवन व्यवस्थित होने लगा। वे अपने ताँबे के बरतनों में कॉफी बनाते, खुशियाँ बटोरते, शाम को मनोरंजन के नाम पर शतरंज खेलते, पर इस समय वे मुसीबत में थे। बात यह थी कि एक औरत बड़ी ही मर्मभेदी आवाज में चीख रही थी और एक उदास मोटा आदमी उसके समीप खड़ा था। उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे और उसके माथे पर पसीने की बड़ी-बड़ी बूँदें झलक रही थीं।

आम लोगों की यह धारणा कि सोवियत क्षेत्र के निवासी अपने निकट के प्रतिवासियों से अनभिज्ञ दूरवर्ती प्रायद्वीपों में अलग-थलग रहते हैं, निराधार है। यह सच है कि एक प्रायद्वीप से दूसरे प्रायद्वीप की दूरी कहीं-कहीं हजारों किलोमीटर है, लेकिन वहाँ बेतार चालक है। गनीमत है कि संपूर्ण ध्रुवीय क्षेत्र इस बात से अवगत था कि दूरवर्ती ककड़ी प्रदेश में प्रसव-पीड़ा से विह्वल एक स्त्री नए नागरिक को जन्म दे रही है। समस्त आर्कटिक निवासी साँस रोके नवजात शिशु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे।

सभी ध्रुवीय स्टेशनों से लोगों की जिज्ञासा जारी थी—‘प्रसूता कैसी है? अब कैसी है वह? उसकी हालत ठीक तो है? बच तो जाएगी न?’

लेकिन प्रसूता चीख रही थी, उसकी चीख समस्त आर्कटिक क्षेत्र में सुनी जा सकती थी। उसका पति बुरी तरह रो रहा था और डॉक्टर परेशान था। वह बेचारा प्रसूति-विशेषज्ञ नहीं था और मरीज की हालत चिंताजनक थी।

उस दिन रेडियो-केंद्र पर ककड़ी प्रदेश से एक निराशाजनक संदेश प्राप्त हुआ, जो प्रसूता के पति ने प्रसारित किया, ‘‘सहायता कीजिए! सहायता कीजिए! माता और शिशु की जीवन-रक्षा कीजिए!’’

बेतार-संचालक घबराया। उसने अपना ईयरफोन निकालकर रखा और सीधे अपने उच्चाधिकारी के पास जाकर सूचना दी—‘‘देखिए न! एक औरत...एक बच्चा...।’’

उच्चाधिकारी और पार्टी-सचिव चिंतित हो उठे कि प्रसूता की सहायता कैसे की जाए? धु्रवीय क्षेत्र की जाडे़ की रात थी। वहाँ तक किसी भी हालत में पहुँचना असंभव था। पार्टी-सचिव अस्पताल में डॉक्टर सिरगियेव मातवियेइच के पास गए।

मातवियेइच एक साधारण डॉक्टर थे, जिनके शरीर से सदैव कारबोलिक और दवाइयों की बू आती थी। दरअसल वे शोध-डॉक्टर थे। उनकी खासियत यह थी कि वे स्वार्थी नहीं थे। उनके मरीज, मरीजों का दुःख-दर्द और उनका अस्पताल ही उनकी दुनिया थी। इसी कारण वे आर्कटिक उपद्वीप में किसी शोधकार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते थे।

एक चुंबकशास्त्री, जिसका नाम भोदोरोव था, एक दिन डॉक्टर मातवियेइच के पास आया और मुसकराते हुए उसने कहा, ‘‘मैं आपको समझता हूँ तथा हम ध्रुवीय प्रदेश के वासियों के प्रति आपके रुख को भी। आप हमें बेशक ‘गिनी-पिग’ समझिए। आप हमारा अध्ययन करेंगे, ठीक है न? आपातकाल में हमारी नब्ज टटोलेंगे, हमारे हृदय की धड़कन सुनेंगे और तब एक वैज्ञानिक प्रपत्र तैयार करेंगे। क्या ऐसा नहीं है? मुझे खुशी है डॉक्टर, कि मैं आपके लिए एक गिनी-पिग हूँ?’’

डॉक्टर ने उसकी ओर भयभीत दृष्टि से देखा। वे विचलित हुए और कहा कि हाँ, इस तरह का कुछ इरादा तो है मेरा, लेकिन उन्होंने इतनी अनिश्चितता दिखाई कि कालांतर में किसी ने भी उनसे उनके वैज्ञानिक प्रपत्र के बारे में नहीं पूछा। ऐसा लगा कि वे केवल एक ही उद्देश्य से यहाँ आए हैं और वह उद्देश्य है—बीमार लोगों का इलाज करना, औरतों की प्रसूति कराना, दाँत निकालना और अपेंडिक्स की शल्य-क्रिया करना। इस कार्य के लिए वहाँ के निवासियों ने एक छोटा सा पाँच बिस्तर वाला अस्पताल बनवा दिया।

एक बार चुंबकशास्त्री ने डॉक्टर से पूछा, ‘‘आप आर्कटिक क्यों आए?’’ उन्होंने कहा, ‘‘लोग आर्कटिक के बारे में बात करते थे। मैंने सोचा, मैं क्यों न वहाँ जाऊँ? यहाँ पैसा भी अच्छा है। दो शीतऋतु यहाँ बिता लूँ तो अच्छा पैसा जमा हो जाएगा। मैं सोचता हूँ कि मॉस्को में एक मकान खरीदूँगा, उसमें एक बगीचा होगा, एक झूला होगा, फूलों की क्यारी होगी। मुझे जलकुंभी का बड़ा शौक है और खिड़कियों के नीचे फलोद्यान भी।

लोग सोचने लगे कि डॉक्टर नीरस और उबाऊ है, लेकिन उस क्षेत्र में और कोई डॉक्टर नहीं था, जो ककड़ी प्रदेश में प्रसूता की सहायता कर सकता था।

पार्टी-सचिव अस्पताल में डॉक्टर मालवियेइच के पास गए और प्रसूता की हालत कह सुनाई। उन्होंने सारी बातें ध्यान से सुनीं। फिर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहते हैं कि मैं प्रसूता की सहायता करूँ। आप मरीज को यहाँ ले आइए। मैं उस औरत की प्रसूति कैसे करवा सकता हूँ, जो एक तरह से आकाश में है।’’

‘‘हमें उसकी सहायता करनी ही होगी।’’

‘‘ओह! आश्चर्य है।’’ डॉक्टर को हँसी आ गई, ‘‘आप मुझे एक हजार किलोमीटर लंबा हाथ दीजिए, जिससे मैं..., मुझे ऐसी दूरबीनी आँखें दीजिए, जिससे मैं हजार किलोमीटर दूर देख सकूँ। फिर मैं तैयार हूँ।’’

‘‘डॉक्टर! हम आपको ऐसे हाथ और ऐसी आँखें देंगे।’’

‘‘मैं समझा नहीं। कैसे हाथ? कैसी आँखें?’’

‘‘बेतार के तार। आपको प्रसूता और गर्भस्थ शिशु की हालत बताई जाएगी और आप निर्देश देंगे।’’

डॉक्टर मालवियेइच पार्टी सचिव की बातें सुनकर स्तब्ध रह गए। वे बोले, ‘‘क्या सचमुच आप ऐसा कह रहे हैं?’’

‘‘जी हाँ! और कोई उपाय नहीं है।’’

सिरगियेव मालवियेइच उठे। उन्होंने अपना कोट पहना और सधे हुए कदमों से आगे बढे़।

‘‘आइए, मरीज के पास चलें।’’ तभी वे रुके...कोट की क्या आवश्यकता! कोई बात नहीं। दुनिया में ऐसी विचित्र बातें भी होती हैं। इतनी दूरी से प्रसूति कराने का मेरा यह पहला अनुभव होगा...बेतार-संदेश द्वारा प्रसूति! मेरे साथियों को इससे कितना आश्चर्य होगा, इसकी मैं कल्पना कर सकता हूँ...‘‘कोई बात नहीं। आइए चलें।’’

ककड़ी प्रदेश से संपर्क स्थापित किया गया। बेतार-संचालक ने सभी ध्रुवीय स्टेशनों को सूचित किया कि जब तक शिशु का जन्म नहीं हो जाता, बेतार-यंत्र का संपर्क केवल ककड़ी प्रदेश से ही रहेगा। उस समय तक अन्य स्टेशनों के साथ संचार-व्यवस्था बंद रहेगी।

डॉक्टर ने तैयारी शुरू की। वे पूछने ही जा रहे थे, ‘‘अच्छा अब कैसी हो?’’ तभी ध्यान आया कि वास्तव में उनके सामने कोई मरीज है ही नहीं...है केवल शून्य!

निस्संदेह वे बेचैन थे। उनके सामने वह वातावरण नहीं था, जिसमें वे काम करने के अभ्यस्त थे। सामने प्रसूता का होना, उसकी कराह सुनना, उसका घिघियाना, उसकी पीड़ा में सहानुभूति व्यक्त करना, बेसिन में खून देखना, गर्भस्थ शिशु को टटोलना और बच्चे का नन्हा-चिकना शरीर।

वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। रेडियो स्टेशन पर वे समुद्र-किनारे पडे़ हुए श्वेत ह्वेल की भाँति थे। लैंप जल रहे थे, जिनसे पर्याप्त प्रकाश फैल रहा था। लाउडस्पीकर में चरचराहट होती और फिर निस्तब्धता! कोई मरीज नहीं, कोई चीत्कार नहीं, कोई छटपटाहट नहीं।

वहाँ कोई छटपटाहट नहीं थी, लेकिन प्रसूता वहाँ से दूर छटपटा रही थी और मदद के लिए इंतजार कर रही थी। क्या और लोग इंतजार कर रहे थे। ‘‘अच्छा डॉक्टर सिरगियेव मालवियेइच, अब आगे?’’

वे बेतार-चालक की ओर झुके और उन्होंने कहा—डॉक्टर से पूछा कि गर्भस्थ शिशु किस दशा में है।

कुछ ही मिनटों में उत्तर आया। सिरगियेव मातवियेइच ने उसे पढ़ा। गर्भस्थ शिशु टेढ़ा है। उनकी भौंहें टेढ़ी हुईं। ओफ! उन्होंने बेतार चालक से कहा, ‘‘मेरे साथी से पूछो कि क्या वह ‘ब्रॉक्स्टन हिक्स’ तरीके से गर्भस्थ शिशु को सीधा करने का तरीका जानता है?’’

उत्तर आया, ‘‘केवल सुना भर है, लेकिन मेरे सामने सशरीर उपस्थित न होने पर भी कृपया मुझे आवश्यक निर्देश दीजिए।’’

‘‘अपने हाथ अल्कोहल और आयोडीन से अच्छी तरह साफ कर लो।’’

ककड़ी प्रदेश के डॉक्टर ने सूचित किया कि उसने अपने हाथ साफ कर लिये।

डॉक्टर ने संतोषपूर्वक अपना सिर हिलाया, ‘‘बहुत अच्छा।’’ उन्होंने बेतार-चालक को कागज पर विस्तृत निर्देश लिखकर दिए। बेतार-चालक स्थिति की गंभीरता को अच्छी तरह समझता था। उसने सारी बातें शब्दशः प्रसारित कीं।

डॉक्टर ने कहा, ‘‘अब अंदरूनी जाँच करो!’’

निर्णायक घड़ी आ रही थी।

डॉक्टर को चिंता हुई, यदि कोई गड़बड़ी हुई तो...! ‘‘भले आदमी, जो कुछ मैं देख नहीं सकता, उसकी जिम्मेदारी कैसे ले सकता हूँ?’’ कहते हुए वे खिड़की के निकट आए और बाहर सड़क की ओर देखने लगे, जहाँ केवल बर्फ थी, दूर-दूर तक बर्फ के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

ककड़ी प्रदेश से सूचना आई। डॉक्टर ने पढ़ा, वे मुसकराए। ‘‘अच्छा मेरे प्यारे! अब ‘ब्रॉक्स्टन हिक्स’ तरीके से गर्भस्थ शिशु को सीधा करेंगे।’’

डॉक्टर बेतार-यंत्र के पास गए। किसी ने फुरती से उनके सामने कुरसी खिसका दी। सब लोग समझ गए कि निर्णायक क्षण आ गया है। बेतार-चालक घबराया हुआ था। सभी डॉक्टर की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे। डॉक्टर के मन में बिजली सी कौंधी, ‘‘मुझे यह साहस कहाँ से मिला। मैं यहाँ से आदेश दे रहा हूँ और वह वहाँ उसका पालन कर रहा है...संभवतः सब ठीक हो जाएगा।’’

उन्होंने अगला आदेश कागज पर लिखकर दिया, जो प्रसारित हुआ। वातावरण में खट्...खट्...खट्...खट्खट...की आवाज गूँजती रही। डॉक्टर अपने आसपास की सभी वस्तुओं से बेखबर बहुत दूर पहुँच गए थे। उन्होंने स्पष्ट देखा, प्रसूता उनके सामने है। उसकी चीख उनके कानों से टकराई, नहीं-नहीं वे हार नहीं मानेंगे...सहसा उन्होंने महसूस किया कि मासूम शिशु का पैर उनकी उँगलियों में आया...!

वे चिल्लाए, ‘‘ध्यान रहे, गलती न होने पाए, हाथ को पैर मत समझ लेना, एड़ी देखो, एड़ी, नहीं तो तुम हाथ पकड़ लोगे...ऐसा अकसर हो जाता है।’’

डॉक्टर मातवियेइच के पास संदेश पहुँचा, ‘‘पैर मिल गया।’’

‘‘आहा! पैर उसकी पकड़ में आ गया, शाबाश!’’

कमरे में खुशी की लहर दौड़ गई। सभी एक-दूसरे को बधाई देने को तत्पर, लेकिन डॉक्टर का चेहरा आतंकित था। सब चुप हो गए। सन्नाटा छा गया।

‘‘बहुत खूब। अब पैर को घुमा दो और अपने हाथ से बाहर की ओर...।’’

डॉक्टर मातवियेइच की नजरों के सामने की दूरी एकदम मिट गई थी। वे प्रसूता के पलंग के पास खडे़ थे और उनका सहयोगी उनके निर्देश का पालन कर रहा था।

कुछ ही मिनट बीते थे, परंतु वह समय बड़ा लंबा प्र्रतीत हुआ।

डॉक्टर बेतार-यंत्र की ओर एकटक देख रहे थे, मानो उन्हें उत्तर सुनाई देगा। शीघ्र ही उन्होंने खट्...खट्...खट् की ध्वनि सुनी, जो उनके लिए ग्रीक तुल्य थी। बेतार-चालक ने संदेश लिखा—‘‘अच्छी तरह सीधा कर लिया?’’

‘‘अच्छी तरह सीधा कर लिया।’’ संचालक चिल्ला उठा।

‘अच्छी तरह...अच्छी तरह’ की एक तरंग सी फैल गई। डॉक्टर मातवियेइच ने कमाल कर दिया।

डॉक्टर गुस्से से चिल्लाए, ‘‘चुप।’’ उन्होंने बेतार-चालक की ओर देखते हुए कहा, ‘‘शिशु के दिल की घड़कन सुनो।’’ उसने खट्-खट् की ध्वनि के मार्फत संदेश भेजा। कमरे में बैठे सभी लोगों को डॉक्टर ने बताया कि अभी शिशु ने जन्म नहीं लिया है। सब लोग फिर शांत हो गए।

बेतार-चालक को बोलते हुए उन्होंने सुना, ‘‘दिल की धड़कन स्पष्ट सुनाई दे रही है।’’ नहीं, ये चालक के शब्द नहीं थे। डॉक्टर मातवियेइच ने स्वयं गर्भस्थ शिशु के हृदय की घड़कन सुनी। वह एक हृदय था, जो धरती पर आने से पहले धड़क रहा था। अभी एक इनसान प्रकट होगा, जो चीख-चीखकर अपने अधिकारों का ऐलान करेगा। उसका हृदय होगा कैसा? उसका हृदय होगा एक ऐसे इनसान का, जो अपनी पितृभूमि के प्रति समर्पित होगा। वह कृतज्ञ होगा बेतार-चालकों के प्रति, पार्टी सचिव के प्रति, अपने डॉक्टर के प्रति और डॉक्टर मातवियेइच के प्रति। डॉक्टर को हँसी आई, परंतु वह हँसी विजय की नहीं थी, गर्व की नहीं थी, संतोष की भी नहीं थी! वह ऐसी हँसी थी, जिसे वे स्वयं भी नहीं समझ सके।

प्रसूता की पीड़ा सहनशक्ति पार कर रही थी। बेतार-संदेश जल्दी-जल्दी आने लगे। डॉक्टर मातवियेइच लगातार तीन घंटे तक बेतार-यंत्र के पास बैठे रहे। उन्हें लगा कि वे बुरी तरह थक गए हैं। क्या यह असाधारण प्रसूति-प्रक्रिया पूरी भी होगी!

और अचानक उन्होंने संचालक को खुशी से चिल्लाते हुए सुना, ‘‘बेटा हुआ! बेटा हुआ! अरे देखा, बेटा हुआ! उसने सूचना डॉक्टर मातवियेइच के हाथ में पकड़ा दी। नवजात शिशु के पिता का संदेश था, ‘‘प्यारे डॉक्टर, साथियो और मेरे मित्रो! मेरे बेटा पैदा हुआ, बेटा! बहुत-बहुत शुक्रिया सिरगियेव मातवियेइच! शुक्रिया! मेरे परम प्यारे दोस्त, मैं किन शब्दों में आपका शुक्रिया अदा करूँ!’’

डॉक्टर मातवियेइच की ओर अनेक हाथ बढे़। मैत्रीपूर्ण हाथ...उन्होंने बधाई दी, धन्यवाद दिए। पार्टी सचिव ने बहुत देत तक डॉक्टर से हाथ मिलाया और वे बार-बार दुहराते रहे, ‘‘आह मातवियेइच! आप कितने महान् हैं, कितने चमत्कारी! बधाई! बधाई! बधाई!

और डॉक्टर मातवियेइच बैठ गए—थके-हारे संज्ञाशून्य। इतनी सारी बधाइयों की बौछार से अस्थिर हो उठे, किंकर्तव्यविमूढ़।

और सहसा उनके सामने एक नई रोशनी चमक उठी, जिसके उजाले में वे देख रहे थे अपनी जिंदगी, अपने विद्यार्थी जीवन के सुहाने सपने, अपना अतीत, अपना वर्तमान, अपना भविष्य।

और वे सोच रहे थे कि क्या वे वही व्यक्ति हैं, जो कल शाम तक अपने भावी जीवन के सपने बुना करते थे कि वे मॉस्को में एक सुंदर सा मकान बनवाएँगे और शांति से उनका बुढ़ापा कटेगा।

—बोरिस गरबातोव
३/१४९ नवयुग नगर
फोरजेट हिल रोड
मुंबई-४०००३६
दूरभाष : ९८७०७६३८७८

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