न्याय की आस लिये एक लोकनृत्य नाग-सैला

न्याय की आस लिये एक लोकनृत्य नाग-सैला

लोक संस्कृति, लोकजीवन, लोकनृत्य, लोक साहित्य, ये सभी हमारे मस्तिष्क में आदिकाल के निवासियों की ऐसी छवि अंकित करते हैं, जिनका जीवन प्रकृति के आस-पास, उसके उपादानों के मर्यादित उपयोगों के साथ, आत्मिक अन्विति स्थापित करता है। सदियों से शब्द-शिल्पियों ने अपनी-अपनी विधा में इनके शब्द-बिंब उकेरे हैं। यदा-कदा इन्हें प्रशासनिक सांत्वना भी प्राप्त हो ही जाती है। ‘सांत्वना’ इसलीए कहा कि यदि परिणामोन्मुखी कार्ययोजनाओं का निष्पक्ष क्रियान्वयन होता तो ‘नाग-सैला’ जैसे लोकप्रचलित, अद्भुत नृत्य पर विलुप्ति की कुदृष्टि नहीं पड़ती। दोष किसे दें? मानव स्वभाव का विहंगावलोकन करें तो पाएँगे कि कभी भी संपन्नों ने विपन्नों के दारिद्र्यहरण के स्थायी प्रयास नहीं किए। तथाकथित नगरीय सभ्यता ने भी ग्रामीण जीवन के उन्नयन के लिए प्रश्नचिह्नित प्रयास ही किए हैं, जो हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय मननशीलता पर गंभीर चिंतन-दायित्व उत्पन्न करता है! यह रिपोर्ताज उन आम जनों की ओर से, जो अपने दैहिक-दैविक-भौतिक दुःखों; अर्थात् ‘दुःखत्रय’ को भुलाकर इस प्राचीन लोकनृत्य ‘नाग-सैला’ को जिंदा रखे हुए हैं, इस सुअभिलाषा के साथ ‘जनार्पण’ है कि इसे समुचित संरक्षण प्राप्त हो!

भाद्रपद-शुक्लपक्ष-पंचमी, अर्थात् ‘ऋषि पंचमी’। इस बात का स्मरण मुझे तब हुआ, जब कलेंडर में कुछ आवश्यक कार्य चिह्नित कर रहा था। ऋषि पंचमी ऐसा त्योहार है, जिसमें हम सभ्यता और संस्कृति के पोषक ‘सप्तर्षियों’ की आराधना करते हैं, जिससे षड्रिपुओं से विनिर्मुक्ति तथा सुख-सौभाग्य की प्राप्ति हो। सर्पदंश झाड़नेवालों के लिए तो यह एक अति महत्त्वपूर्ण दिवस है, जो नाग-सैला की पीठिका है। आज मौसम साफ है, इस बात का साक्षात् प्रमाण चमकते नभोमणि के स्पष्ट दर्शन हैं। वैसे भोर की पूर्व वेला में मेघज बूँदों ने मेदनी से आलिंगन कर अपना नाभिनाल संबंध जता दिया है। संभवतः इसीलिए यत्र-तत्र नम धरती की सोंधी सुगंध फैली है। इसके स्वागत में पंछियों का कलरव एक अहम भूमिका निर्वहन कर रहा है। मैं तो इस सोंधी सुगंध को ‘प्रकृति प्रदत्त इत्र’ की उपमा दूँगा। खेती-किसानी के दृष्टिकोण से यह वक्त बड़ा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस समय फसलों को खरपतवार से बचाना होता है। कुछ यों समझें कि जैसे युवा होते बच्चों को उनके पथभ्रष्ट, उद्दंड नए मित्रों से बचाना। कह सकते हैं कि कृषि-पालन और संतान-पालन समान महत्त्व के हैं। इन्हीं कार्यों के अवलोकनार्थ मैं अपने कृषि-ग्राम ‘टिकारी’ के लिए निकला। गाँव के प्रवेश चौक पर भीड़ देखकर प्रथम भाव अशुभ के प्रति गया, पर परमात्मा की कृपा से ऐसा कुछ हुआ नहीं। क्या करें! हमारी सोच परिस्थितिजन्य होती है, जो वर्तमान में बहुत चिंतनीय है। अभी किसी से पूछने जा ही रहा था, तभी सरपंचजी हाथों में धतूरा लिये तेजी से आते दिखे। मैंने परिहास किया, ‘‘क्यों सरपंचजी! ये धतूरे का शौक कब से हो गया, आप तो रगड़ा तंबाकू के कद्रदान हो!’’ मुसकराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘भैयाजी, ऐसी बात नहीं है, आज नाग-सैला होगा, ये शिवजी के चढ़ावन हैं।’’ मेरा मन उत्फुल्ल-प्रसन्न हो गया। लंबे समय से प्रयासरत था; इस मन आह्लादन नृत्य का चक्षु-साक्षी बनने के लिए। धीरे-धीरे जन पारावार बढ़ रहा है, आन-गाँव के लोगों का हुजूम भी पान-गुटखा खाता अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

हमारे यानी दादू साहब के पारिवारिक देवी मंदिर के सामने बने खिरियान में गाँववालों ने बिना छत की एक नाग-नागिन मढि़या बनवाई है। इसी मढि़या में आज नाग-मंत्र का सिद्ध व्यक्ति पुजारी की भूमिका में है। उसके सहयोग के लिए तीन आदमी साथ खडे हैं। ये चारों सामान्य से विरत भाव-भंगिमाओं के साथ सिंदूर, चावल, नीबू, धतूरा, विल्बपत्र, दोना, करेला, दूध, धूप, दीप, घंटे इत्यादि के साथ नागदेव के रूप में पूजित ‘बासंग देव’ की पूजार्चना कर रहे हैं। उनकी भाषा भी ग्रामीण हिंदी मिश्रित लोकभाषा है, जो बाहरवालों को अटपटी सी प्रतीत हो सकती है। सहसा मैं यह सोचकर रोमांचित हो उठा कि अचानक ये नागदेव अनुप्राणित हो जाएँ तो क्या दृश्य निर्मित होगा? नाग हमारी धारणाओं में वैज्ञानिक, तकनीकी तर्कों को परास्त कर अलौकिक दृश्य चित्रित करता है। बाल्यकाल से मणिधारी नाग, इच्छाधारी नाग अपने नेत्रों में रिपुछवि को अंकित करनेवाली प्रतिशोधी नागिन और न जाने क्या-क्या सुनते आए हैं। ये मान्यताएँ अखिल भारत में एक रूप से प्रचलित हैं। समीप खड़े युवक शुभम साहू से मैंने उन अन्य तीन युवकों के बारे में पूछा तो उसने बताया, ‘‘ये लोग यादव काका (प्रधान मंत्र साधक) के शिष्य हैं, जो सर्पदंश झाड़ने का मंत्र सिद्ध कर रहे हैं। ये तीनों एक माह से बड़ा संयमित जीवन जी रहे हैं। ये भूमि पर सोते हैं, करेला, कुंदरू, भटा, पान, मिर्च, दूधवाली चाय का सेवन नहीं करते।’’ उसके विश्वास के समक्ष मैं अनुरंजित था। तभी समीप खड़े एक वृद्ध बीच में बोल उठे, ‘‘भैयाजी! बीते बरस जिन लोगों को कीड़े काटे के विष को झाड़कर अभिमंत्रित पानी से कलाई में बंधन बाँधे गए थे, आसो पंचमी में उन्हें खोला गया है।’’ गाँव में साँप या नाग के संबोधन के लिए ‘कीड़े’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इनका मानना है कि बखत-बेबखत उसका नाम नहीं लेना चाहिए।

नृत्य ने हमारी सांस्कृतिक भावनाओं पर बड़ा गहरा प्रभाव छोड़ा है। नौ रस भी नृत्य के माध्यम से बेहतर अभिव्यक्त होते हैं। संस्कृति-जनक महादेव शिव एवं योग-योगेश्वर कृष्ण, दोनों ही नृत्य के सनातन देव हैं। भारत जैसे धरोहर-धरणी राष्ट्र में एक से बढ़ के एक लोकनृत्यों का खजाना छिपा है, जिनमें से कइयों को तो सरकारी संरक्षण भी प्राप्त है; जैसे बहुरूपिया, गरबा, बिहू, करमा, पांडव-नृत्य, घूमर, राउत, कालबेलिया, चेरी, अहीरी, गौंडी, भगोरिया, सुआ, सैला इत्यादि। इन सभी नृत्यों की बहुरंगी विविधताओं के बावजूद एक समानता भी है कि ये सभी लोकनृत्य किसी-न-किसी जाति, वर्ग, स्थान अथवा पंथ के लोगों द्वारा किए जाते हैं; परंतु इनके विपरीत ‘नाग-सैला’ एकमात्र ऐसा नृत्य है, जो सभी पंथ, जाति, समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है। इसमें किसी प्रकार का उपरोक्त उल्लेखित बंधन नहीं है। आज भी यहाँ यादव, चौरसिया, साहू, कुम्हार, नामदेव एवं अन्य बिरादरियों के इच्छुक लोगों द्वारा नृत्य किया जा रहा है। अतः मेरा मानना है कि ‘नाग-सैला’ नृत्य ‘पंथनिरपेक्ष-लोकतंत्रात्मक लोकनृत्य’ के रूप में अंगीकार किया जाना न्यायोचित होगा। नाग का आदिकाल से मानव के साथ दैवीय संबंध रहा है, फिर चाहे वह घटनाक्रम समुद्र-मंथन का हो, कृष्णलीला का हो, विष-विद्या का हो अथवा अन्य कोई हो। पौराणिक काल में तो मानव ने अपनी प्रजाति ही नागों के आश्रित कर ली थी, जिसका लघु अंश आज भी ‘नाग’ उपनाम के रूप में दिखता है। इसी अनुक्रम में आज का वातावरण बहुत कौतूहलपूर्ण है। नीले गगन के तले जनसमूह की हर्ष-लहर इतनी तीव्र है कि घड़ी भर पूर्व जिस मेघगर्जना से गगन गुंजायमान हो गया था, उसे लोगों ने अनसुना कर दिया। पूर्ण संभावना है कि लोगों की इस नजरंदाजगी से रुष्ट हो ये वर्षा मेघ नहीं बरसे, अन्यथा उनके आँचल से जलकण तो खूब छलक रहे थे। सामने टोला पार से कुछ लड़के साइकिल के निकले पुराने टायर को चलाते हुए भारत के भविष्य होने की उपमा के भावों से कोसों दूर इधर ही आ रहे हैं। यह चाक इनकी अल्पवय धींगड़-मस्ती का आपत्तिशून्य साथी है। दूसरी ओर यहाँ इस दुकान की पट्टी पर, जहाँ मैं खड़ा हूँ, मूलतः पान की दुकान है; परंतु संचालक ने व्यापारिक कौशल दिखाते हुए चाय-नाश्ते और जनरल स्टोर को भी समुचित स्थान दिया है। कह सकते हैं कि यह ग्रामीण मल्टी स्टोर है। यहीं से फुटाने खरीदकर रूखे-उलझे बालोंवाली, शालेय गणवेश में ग्राम बालिकाएँ भी नृत्यारंभ की प्रतीक्षा में अप्रतिद्वंद्वी निश्चिंतता से खड़ी हैं। मुझे ऐसा आभासित हुआ कि ये बालिकाएँ उन लोगों को मुँह चिड़ा रही हैं, जो वातानुकूलित कक्ष में बैठकर नारी-विमर्श पर ऊल-जलूल टिप्पणियाँ करते रहते हैं। लीजिए नाग मढि़या से पूजा पूर्ण करने के पश्चात् अब विधिवत् पाठ प्रारंभ हो रहा है। बीचोबीच सैला-पट मढ़ा है, जिसमें नाग-नागिन एवं शिव का चित्र अंकित है। यहाँ पुनः इनकी पूजा हुई। इसी के साथ शुरू हो रहा है मानव का नाग के प्रतीकात्मक रूप में परिवर्तन का एक अविश्वसनीय, अकल्पित, अद्भुत नृत्य ‘नाग-सैला’। सभी नर्तक एक के पीछे एक, पंक्तिबद्ध, एक-दूसरे की कमर में बँधे गमछे को पकड़ के खड़े हैं। सबसे आगे एक युवक नागफन के प्रतीक रूप में ‘सूपा’ पकड़ा है, जबकि सबसे पीछेवाले के हाथ में एक झाड़ू है, जो नाग की पूँछ का प्रतिनिधित्व कर रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सामने एक विशाल नाग फन उठाए खड़ा है। ये लोग नाग को शिव का जनेऊ मानते हैं, इसलिए शिव परिक्रमा के साथ नृत्यारंभ हुआ। बहुश्रुति है कि पटपूजा के साथ सूपे में स्वतः भार आ जाता है। इस नृत्य के नियमों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दो विधान हैं—प्रथम, जहाँ से सूपा निकलेगा, वहीं से सारे लोग निकलेंगे। द्वितीय, जैसे ही सूपा झाड़ू से मिलेगा, नृत्य समाप्त हो जाएगा। लेकिन व्यावहारिक रूप में नृत्यांत में ही दोनों मिलते हैं। सुनिए डुगडुगी की आवाज! इसकी थाप पर इन लोगों के पाँव और धड़ थिरक उठे। देखते-देखते पंद्रह-बीस लोगों की टोली ऐसे झूमने लगी, मानो कोई विशाल नाग यहाँ-वहाँ लहराते हुए दौड़ रहा हो। चित्त को आनंदित करनेवाला दृश्य मेरे सम्मुख है और मैं अपने पाठकों के लिए संजयदृष्टि रखे हुए हूँ। हम सभी इस मानव निर्मित नाग लहरों में खोए थे कि अचानक एक स्त्री को जोर से भाव आ गए, उसके बँधे केश खुल गए, बेसुध-सी वह दो बार गिर भी गई, इसीलिए सुरक्षार्थ अब तीन-चार महिलाएँ उसके साथ चल रही हैं। भाव आस्था मिश्रित आनंद की वह चरम स्थिति है, जिसमें व्यक्ति सुध-विहीन हो जाता है, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं इस स्त्री को करीब से देख ही रहा था कि आभास हुआ, कोई मेरे नजदीक से पैर पटकते हुए निकला। मैं चौंक गया, देखा कि सूपा लिये मुँह से फुफकार की आवाज निकालते नाग-सैला टोली बाजू से निकली। मुझे सच स्वीकार है कि घड़ी भर के लिए मैं थोड़ा डर गया था।

ये लोग कभी बैठते-उठते, कभी किसी पत्थर पर चढ़कर उतर जाते। सहसा सूपा थामे व्यक्ति दौड़ता हुआ आया और पास पड़ी एक खटिया के नीचे से निकल गया, बस देखते-ही-देखते सारे लोग वहीं से निकलने लगे। इस दृश्य से जन-समूह में खासा कोलाहल मच गया। जरा इधर ध्यान दीजिए, जिस डुगडुगी ने अभी तक अकेले वाद्य-ध्वनि का दायित्व वहन किया था, अभी एक ग्रामीण के उत्साहपूर्वक ढोलक बजाने के कारण वह अकेलापन महसूस नहीं कर रही है। अब दो सखियाँ मिल नृत्य को ध्वनि प्रदान कर रही हैं। चारों ओर हर्ष-उल्लास के साथ मिलकर मुदितय वातावरण निर्मित कर रहा है। हर क्षण आनंद से भरा है। संभव है, इन्हीं क्षणों के लिए कन्हयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘क्षण बोले, कण मुसकाए’ जैसी पुस्तक की रचना की हो। मित्रो! ऊपर नीलगगन को देख ऐसा लग रहा है कि दोपहर विदा की सूचना लेकर साँझ-धूप आई है। मौसमी भंगिमाएँ भी सद्यस्नाता-सी हो रही हैं। आसमान के शुष्क कंठ की प्यास बुझाने के लिए मेघागम की बदली अभी-अभी वरुण देव छिटका गए हैं। हलकी श्यामल बदली के आगमन से अभी तक प्रकाशित मेदनी भी हलकी सी श्यामल हो चली है, मानो अँधियारा अपना स्थान सुरक्षित करना चाहता है। मौसम की इस चंचलता से अनभिज्ञ सभी कलाकार श्रद्धा के साथ नागभंगिमाओं के नृत्य में एक अलग ही लोक में मगन हैं। ये एक गीत भी गुनगुना रहे हैं, लोकभाषा में होने के कारण यह टूटा-फूटा समझ में आया। यथा—

ईश्वर चरावे नाग कौन...

सौ अंडा फोड़ें...

लकड़ी समेटे...

सात अंडा फोड़ें...

एक अंडा फोड़ें...’’

प्रतीकों के माध्यम से प्रकृति के साथ जुड़ने का सुंदर माध्यम है—‘नाग-सैला’। हमारी संस्कृति की एक मूल विशेषता है कि सार्वजनिक आयोजनों में मेला-दर्शन अवश्य होता है। ऐसा यहाँ भी हुआ। एक रिक्त भूखंड में प्लास्टिक की दुकानें, लकड़ी के चर्र-चर्र घूर्णन ध्वनि करनेवाले झूले, हाथठेला में चलित चाय-नाश्ते की दुकानें इत्यादि लग गई हैं। ‘नाश्ता-चाय-पान’ तो ग्राम्य आयोजनों की शान हैं, इसी भावना के चलते मैंने एक समौसा, दो चाय और दो पान का स्वाद अपनी जिह्वा को लेने का अधिकार दे डाला। यह बात अलग है कि गृह वापसी पर उदर विकार मुक्ति चूर्ण के शरणागत होना पड़ा।

इन आनंददायी क्षणों के मध्य अचानक एक व्यक्ति के आगमन से लोगों का ध्यान बँटा। लखनादौन परिक्षेत्र से एक सपेरा आया, जिसने कहा कि वह इस गाँव के सारे सर्पों को एक स्थान में बुला सकता है। पर ग्रामवासियों द्वारा उसके दावे की सत्यता परीक्षण किए बिना ही यथोचित सम्मान दे विदा किया। शायद यह सही निर्णय था। लेकिन लोगों के मन से उसे विदा न कर सके, क्योंकि उसके जाने के देर बाद तक लोगों में चर्चाएँ होती रहीं। देखिए न, मैं खुद आप से उसी की बात कर रहा हूँ। कर्यक्रम अपनी गति से संपूर्णता की ओर अग्रसर है। लोक-नयन, लोक-चित्त में लोकनृत्य के अलौकिक बिंब सुरक्षित कर रहे हैं। भरनी से शुरू हुआ नृत्य नाग-सैला गान की समाप्ति के साथ पूर्ण हुआ। इसी समय सूपा-फन झाड़ू-पूँछ से जा मिला और नाग-सैला नृत्य का विधिवत् समापन हुआ। ठीक इसी समय जलकण समेटे समीर ने जोरदार दौड़ लगा दी। भाद्रपद की इस नैसर्गिक क्रिया को भी लोक आस्था ने दैवीय कृत्य से जोड़ लिया। ठीक ही तो है, इन विश्वासों से आस्था-दीप भी प्रज्वलित रहता है। भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी और पीछे छोड़ गई केवल यादें। नम मिट्टी में उछले लोगों के पैरों के निशान, फेंके हुए फूल-पत्ते, पैकेट्स, अबीर, इत्यादि। यहाँ एक गीत के बोल समाचीन जान पड़ते हैं—‘याद-याद-याद, बस याद रह जाती है।’

इन्हीं यादों को शाब्दिक चित्र प्रदान करने के उद्देश्य के साथ मैंने प्रधान मंत्र साधक ‘लखन लाल यादव’ को अपने बाड़े में आमंत्रित किया। मेरे द्वारा पूछे गए बहूदेशीय प्रश्नों के उत्तर इन्होंने बहुत लघु रूप में देकर बात समाप्त करनी चाही। कारण पूछने पर वही जवाब आया, ‘‘भैयाजी ऊ की बात, बेबखत करना, ऊ को बुलाना है।’’ अतः मैंने यही सोचकर संतुष्टि कर ली कि लेखकीय-सिसृक्षा के लिए दो शब्द भी बहुत होते हैं। यह मेरी संतुष्टि की अनिवार्यता है; अन्यथा प्रश्न तो अभी बहुत शेष हैं। राजस्थान में कालबेलिया नृत्य, सपेरनों द्वारा काले घेरदार वस्त्र पहनकर गोल-गोल घूमकर किया जाता है। इसे सरकार द्वरा संरक्षण प्रदान किया गया है, ऐसा मेरे ज्ञान में है। लेकिन इसके विपरीत ‘नाग-सैला’ एक ऐसी गुम होती अद्भुत नृत्य-शैली है, जिसमें वेशभूषा, भाषा-शैली किसी प्रकार का कोई कठोर बंधन नहीं है। यह पूरी तरह नाग के जीवन-वृत्त का प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण है। इसे हर हाल में न केवल संरक्षण, अपितु धरोहरस्वरूप की स्वीकरोक्ति मिलनी चाहिए। हमारी विडंबना तो देखो कि भारतीय राजनीति धर्म, जाति, पंथ पर आश्रित है, जबकि यह पूर्णतः नागरिकों का व्यक्तिगत मामला है, न कि राजनैतिक। अपवादों को छोड़ दें तो आज जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के मंदिर में अल्प-शिक्षित रूप से अशुद्ध उच्चारणों एवं भाषा के साथ संकल्पविहीन निज उत्थान के लालच में दंभ से भरे सलाम साधकों से घिरे भाग्य द्वारा प्रदत्त कुरसी का संकीर्ण भाव से भोग मात्र करते प्रतीत होते हैं। परिणामतः नाग-सैला जैसी लोककलाएँ अश्रुधार बहाने के लिए विवश हैं।

गृह-वापसी के समय मैंने दो पल के लिए आँखें बंद कीं तो स्मृतिपटल में आज का पूरा दिवस-चित्र घूम गया। सत्य है, ‘मानव स्मृतिजीवी प्राणी है।’ हमे मुंसिफ मिजाज के साथ चिंतन करना होगा कि हम ‘नाग-सैला’ लोकनृत्य के साथ न्याय करें या धृतराष्ट्र की अन्याय सभा के पाषाणी हृदयवाले मूक-कुसदस्य बनें पर स्मरण रहे, सर्वशक्तिमान आश्चर्यों के जनक ‘समय’ द्वारा अवश्य ही न्याय किया जाएगा और उस समय हम निरुत्तर, निःशब्द, शर्मिंदा, निर्जीव से खड़े होंगे। वंदे!

अखिलेश सिंह श्रीवास्तव
दादू मोहल्ला-संजय वार्ड,
सिवनी-४८०६६१ (म.प्र.)
दूरभाष : ९४२५१७५८६१

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