श्री घोड़ीवाला का चुनाव अभियान

श्री घोड़ीवाला का चुनाव अभियान

श्री घोड़ीवाला का विधायक का चुनाव हारने का घाव अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था कि मैंने उन्हें नगरपालिका का चुनाव लड़ने की फूँक मारकर मैदान में खड़ा कर दिया। पहले तो घोड़ीवाला इस चुनाव के लिए तैयार ही नहीं हुए। उनका कहना था कि एक आदमी जो एम.एल.ए. का चुनाव हार चुका है, वह अब पंचायत और नगरपालिका का चुनाव लड़े, यह भयंकर तौहीन की बात है। पर मैंने उन्हें समझाया कि देखिए, आप अपना कॅरियर यहीं से शुरू कीजिए। आगे आपका राजनीतिक जीवन सफल और उज्ज्वल होगा।

मैंने उनसे कहा कि मुझे ही देखिए। पहले जब मैंने लिखना-पढ़ना शुरू ही किया था, बड़े-बड़े पत्रों में रचनाएँ भेजता था। सारी रचनाएँ संपादक सखेद, अभिवादन सहित लौटा देते थे। उस समय मुझे कम पीड़ा नहीं थी। एक बुजुर्ग ने मेरा दर्दे दिल जाना और राय दी कि लल्लू छोटे-छोटे साप्ताहिक, दैनिक पत्रों में लिखो-पढ़ो। रेडियो पर फरमाइश भेजो। सफलता आपके चरण चूमेगी। सच मानिए, वही सीख मैंने मानी। आज स्थिति यह है कि मैं सब जगह छपता हूँ। वे बुजुर्ग तो दिवंगत हो गए, लेकिन आज उनकी वह बात ज्यों-की-त्यों जीवित है। जानते हो, आज मैं कितना बड़ा लेखक हूँ!

मेरी यह बात सुनकर उन्होंने मुझे आँकना चाहा। लेकिन जिस सोदाहरण वार्त्ता से मैंने उन्हें बात समझाई और बताई, वह पूरी तरह उनके गले उतर गई तथा इस प्रकार वे चुनाव लड़ने को तैयार हो गए। श्री घोड़ीवाला का चुनाव हारने का इतिहास बताने से पूर्व उनका नाम घोड़ीवाला कैसे पड़ा, यह भी जान लेने में कोई बुराई नहीं है। श्री घोड़ीवाला पिछले चार आम चुनाव में खड़े होकर हारते रहे हैं। इन चुनावों में जो सबसे महत्त्वपूर्ण करतब वे दिखाते हैं, वह यह कि चुनाव प्रचार अपनी पिद्द घोड़ी पर चढ़कर करते हैं।

घोड़ी पर सवार होकर वे प्रत्येक घर के सामने जाकर अपने हाथ की चाबुक से मकान का दरवाजा बजाते हैं। उस आवाज से जो भी स्त्री-पुरुष उनके सामने उपस्थित होता है, वे उसे आदेश देते हैं कि अबकी बार वोट उनको ही देना है। सब लोग उन्हें वोट देने का पक्का वचन देते हैं। घोड़ी पर बैठे-बैठे ही वे लोगों से बातचीत करते हैं।

एक दिन मैंने उनसे पूछा भी कि यह तो बताइए, श्री घोड़ीवाला, कि आप घोड़ी पर बैठे-बैठे ही चुनाव प्रचार का काम क्यों निबटाते हैं। यह शिष्टता के खिलाफ  है। इस पर उनका उत्तर था कि क्या मात्र ऐसा मैं ही करता हूँ? अपने एम.पी. साहब को नहीं देखे हैं, जब देखो कार में। चुनाव प्रचार कार में, लोगों से बातचीत कार में। इतना कहकर घोड़ीवाला अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर बोले, ‘सच! चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाऊँगा तो मैं यह घोड़ी बेचकर कार खरीद लूँगा। इससे मुझे बहुत शर्म आती है।’ उनकी यह बात सुनकर मुझे घोड़ी पर दया उमड़ आई। मैं बोला, ‘श्री घोड़ीवाला सुनिए, आप कार जरूर खरीद लेना, लेकिन घोड़ी मत बेचना।’

‘घोड़ी तो मैं हर हाल में बेच दूँगा। इस स्याली ने बहुत जलील किया है मुझे। कभी भी तो नहीं जिताया मुझे इसने। वह तो कार नहीं है मेरे पास, वरना मैं इसे सूँघता तक नहीं।’ श्री घोड़ीवाला की वितृष्णा इतनी गहरी थी कि मेरे नयन उनके परास्त होने की बात पर सजल हो गए। मैंने उन्हें धीरज दिया और कहा, ‘अबकी बार आप ही जीतेंगे, घोड़ीवाला।’

खैर, घोड़ीवाला चुनाव के दिनों में ऐसे हिनहिनाते फिरे, जैसे गाय ऋतुकाल में रँभाती है। परीक्षाफल निकला तो घोड़ीवाला गिरते-गिरते बचे। वह तो अच्छा हुआ कि वे इस समय घोड़ी पर बैठे थे। मैं दुखी मन से घोड़ीवाला के पास हिम्मत करके पहुँचा और घोड़ी की लगाम पकड़ उनके घर की ओर मोड़ते हुए बोला, ‘चलो घोड़ीवाला, तुम्हारे नसीब में सत्ता की घोड़ी नहीं है।’

मेरी बात सुनकर घोड़ीवाला ने हाथ का चाबुक हवा में लहराया। मैं डर गया। मुझे लगा, जैसे सनसनाता चाबुक मेरी कनपटियों पर पड़ेगा और मैं वहीं ढेर हो जाऊँगा। पर घोड़ीवाला का चाबुक घोड़ी पर ही पड़ा और घोड़ी रेंकने लगी। थोड़ी देर के मौन के बाद घोड़ीवाला बोले, ‘मैंने तुमसे कहा नहीं था, जादूगर। यह घोड़ी मुझे कभी नहीं जीतने देगी। मालूम है, मेरे विरोधी के पास कार थी!’ यह कहकर घोड़ीवाला ने पाँच-सात चाबुक गुस्से में घोड़ी पर मार दिए। घोड़ीवाला को उनके घर में धकेलकर मैं अपने घर लौट आया। मुझे याद आया कि अपनी पहचान वाले प्रेस से मैंने उनके पोस्टर छपवाए थे। उसका पेमेंट अभी तक नहीं हुआ है। माइकवाला भी पैसा लेगा।

मुझे सारी रात नींद नहीं आई। लग रहा था कि प्रेस तथा माइकवाला पैसा माँगकर मेरा जीना दूभर कर देगा। सुबह जल्दी उठकर सीधा घोड़ीवाला के मकान पर पहुँचा। उस समय घोड़ीवाला पिछवाड़े में खड़ा घोड़ी से ही बातें कर रहा था। चुनाव में हारने का सारा दोष वह उसके सिर मढ़ रहा था। बेचारी घोड़ी निरुत्तर खड़ी उसकी बातें सुन रही थी। उसके हाथ में चाबुक था। बीच-बीच में वह घोड़ी पर चाबुक इतनी जोर से मारता था कि मरियल घोड़ी कब दम तोड़ देगी, कहना मुश्किल था। मैंने छूटते ही कहा, ‘श्री घोड़ीवाला, आप घोड़ी कब बेच रहे हैं?’

‘अजी, ऐसी घोड़ी को बेचने से क्या? जो घोड़ी मुझे निहाल नहीं कर सकी, यह भला और किसे निहाल करेगी?’ घोड़ीवाला दुःखी स्वर में बोला। ‘मेरे विचार से अब घोड़ी को बेचकर प्रेसवाले और माइकवाले का हिसाब चुकता कर लेना चाहिए।’

मेरी यह बात सुनकर घोड़ीवाला लपककर घोड़ी पर जा चढ़ा। लगाम पकड़ते हुए बोला, ‘अभी कैसा हिसाब-किताब! अभी तो मैं इस पर चढ़कर एक चुनाव और लड़ूँगा।’ इतना कहकर उसने चाबुक घोड़ी की पीठ पर जमाया और सरपट बाहर दौड़ने लगा। मैंने रोकना चाहा तो मुझे चाबुक दिखाकर चुप रहने को कहा।

मैंने उसी दिन अगले चुनाव में घोड़ीवाला का प्रचार व समर्थन न करने की कसम खाई। लेकिन आज भी मेरी सहानुभूति घोड़ी के प्रति ज्यों-की-त्यों है। पता नहीं बेचारी घोड़ी को इस राजनीति से कब मुक्ति मिलेगी?

पूरन सरमा
१२४/६१-६२, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०
(राजस्थान)
दूरभाष : ०९८२८०२४५००

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