दादा की भीनी-भीनी यादें

दादा चले गए, ऐसे तो कभी नहीं जाते थे! गली के नुक्कड़ पर लगे लाल डिब्बे में चिट्ठी डालने जाएँ, नरसु! नरसु, सेठ की दुकान पर पान खाने जाएँ? पास की रामजीलाल हलवाई की दुकान से बच्चों के लिए गरम जलेबी लेने जाएँ, यानी घर से चार कदम भी दूर जाना हो तो कहकर जाते थे। कहते थे, ‘हाऊँ आयो, अब्भी आयो या हाऊँ अऊँजऽऽऽ।’ लेकिन इस बार दादा बिना बताए इतनी लंबी दूरी पर कैसे चले गए? उसके बाद वे कभी नहीं आए। दिन-पर-दिन बीते, महीने-पर-महीने, साल-पर-साल बीते जा रहे हैं, पर यह कहकर ही नहीं गए कि कब आऊँगा। वे कैसे आएँगे, अब तो दादा की सिर्फ याद आएगी। ज्येष्ठ की अंधड़ लू-लपट जैसी झुलसाने वाली नहीं, माघ-पौष कही गुनगुनी धूप जैसे मन को सहलाने वाली। घर में रखे दादा के पेन की स्याही सूख गई। एक पैर आगे और एक पैर पीछे की स्थिति में बेतरतीब उतारे गए जूते अब जोड़ी से रखे हैं। उनके कपड़े, कागज आदि सब सामग्री काँच की अलमारी में रख दिए गए हैं। आज दोपहर में डाली गई चिट्ठी का जवाब आया, पर उसे रजिस्टर में चढ़ाकर रख दिया। उत्तर कौन पढ़ पाएगा दादा के लिखे पत्र का? कोई व्यक्ति भूल से आकर दरवाजे पर सिसकियाँ भरकर रो रहा था—हम कालमुखी से इस आशा में आए थे कि जातू भाई हमारा काम करवा देंगे।’

जातू भाई गाँव कालमुखी के प्रतिष्ठित मालगुजार पंडित सिद्धनाथ उपाध्याय की तीन पुत्रोंवाली संतान में बीच के थे। बड़े पुरुषोत्तम (बाबू भाई), दूसरे रामनारायण (जातू भाई), तीसरे शिवनारायण (शिवा भाई)। बड़े भाई पिता की मालगुजारी में हाथ बँटाते थे। छोटे भाई खेती-बाड़ी का काम-धंधा देखते थे और जातू भाई इन सब से परे अपनी दुनिया, लिखना-पढ़ना एवं स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में सहभागी होते थे। एक बार की घटना स्वयं दादा सुनाते हैं कि उन्होंने अपने गाँव के पटेल की चावड़ी पर एक सभा की, जिसमें तुलसीकृत रामायण की चौपाई अंग्रेजी शासन के खिलाफ गाई—‘जाके राज ना प्रजा सुखारी...’। इस बात की शिकायत खंडवा जिले के धनगाँव थाने में जंगल की आग की तरह पहुँच गई। थानेदार धनगाँव से घोड़े पर सवार होकर कालमुखी पहुँचे, उनकी भुजा पकड़ी और उन्हें मालगुजारजी के सामने खड़ा कर दिया और बोले, ‘महाराज! हम आपका आदर करते हैं, वरना आपके बेटे को जेल की कोठरी में ठूँस देते, इसे समझाओ कि अंग्रेजों और अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों को न भड़काया करे!’ इसी प्रकार एक बार और स्वतंत्रता आंदोलन में जाने के लिए गाँव से दूर बने अतर (ड्डह्लड्डह्म्) रेलवे स्टेशन चले गए थे। उन्हें वहाँ से पकड़कर लाया गया। दादा ने ही हमें बतलाया था कि मैं गांधीजी से वर्धा में मिला। गांधीजी ने मुझे सूत्र दिया—‘गाँव की सेवा करो’। तब से वे गाँव में रहकर सबके सुख-दुःख के साथी बनकर अपनी कलम चलाते रहे। दादा को अपने पिताजी ने आंदोलन में जाने से इसलिए रोक दिया कि वे सदा बहुत बीमार रहते थे। एक बार उनके कष्ट को देखकर उन्होंने कह दिया—‘जा तू’, तभी से उनका गाँव का नाम ‘जातू’ ही रहा।

दादा की स्कूली पढ़ाई की बात करें तो वे सिर्फ कक्षा सात तक ही पढ़ पाए। गाँव में साधन नहीं था, तब खंडवा में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए उनके पिताजी ने खंडवा में एक घर खरीदकर नौकर रख दिया। दोनों भाई आगे नहीं पढ़ पाए। वे अपने गाँव कालमुखी लौट आए। प्रमुख कारण बीमारी ही रही। कालमुखी में ही रहकर दादाजी ने लिखना-पढ़ना और गाँव की सेवा-सहयोग में अपना समय लगा दिया।  दादा का जीवन अप्रतिम सादगी से भरा था। उनके स्वभाव व प्रकृति में गाँव का भोलापन था। सबसे भुज भर भेंटना। आते को नमन करना, जाते को ‘अरु आव जो’ कहकर सत्कार करना। यह उनके पूर्वजों और परिवार की संस्कृति रही। दादा के पास खादी की तीन धोतियाँ और दो कुरतों से ज्यादा कुछ नहीं रहा। दादा को बहुत दम चलता था। यह अस्थमा रोग बरसात शुरू होते ही उन पर घात करता और चार-पाँच महीने बहुत सताता था। जब हम लोग बड़े हो गए, तब रात को सोते समय उनकी पीठ पर तेल मालिश करते थे, तभी दादा बहुत सारी बचपन की बातें हमें सुनाया करते थे। हम पूछा करते थे, ‘‘दादा, आप ने निमाड़ी के गीत, निमाड़ी साहित्य पर कैसे काम करने लगे?’’ दादा ने बताया, ‘‘एक बार गणगौर पर्व के अवसर पर रात के समय महिलाएँ बड़े मधुर भाव से टोल में गीत गाती जा रही थीं, मैं दहलीज पर बैठा सुन रहा था। गीत था—शुक्र को तारो रे ईश्वर, ऊँघी रह्यो, तेऽऽऽ की मखऽऽऽ टीकी गाढ़ाओ।

‘‘भीई (माँ) से पूछा कि भाभी यह क्या गीत गा रही हैं? जब उन्होंने वह गीत गाकर बताया तो मैं अचंभित रह गया। गाँव की अनपढ़, भोली-भाली महिलाओं की कितनी अद्भुत कल्पना है। निमाड़ी लोक गीतों में तो मोती की खान है। अतः मैंने लोकगीतों और लोक साहित्य पर काम करना शुरू कर दिया।’’ दादा कहते थे कि मेरे इस गीत के लेखों को पढ़कर वासुदेव शरण अग्रवालजी ने ही कहा था कि निमाड़ी के इस लोकगीत पर लाखों-लाख लोकगीत न्योछावर हैं। लोकसाहित्य के मूल से जुड़े दादा लोक से भी कभी विलग नहीं हुए। लोकगीतों की उनकी पहली पुस्तक कालमुखी में आई। जब पुस्तकों के उस बड़े बंडल को खोला तो देखा कि उसके आवरण पृष्ठ पर पलाश के फूलों से लदी टहनी के साथ लिखा था—‘जब निमाड़ गाता है।’

गाँव के कई लोग आ गए, भीड़ लग गई। सबने देखा कि पुस्तक कैसी होती है? हाथ में पकड़कर शीश से लगाया और कहा, ‘‘जातू भाई, हमारे लेखे तो कालो अक्खर भैंसी बराबर, अब रात को चावड़ी पर पढ़कर सुनाना, सब सुन लेंगे।’’ गाँव के लोग जो पढ़ सकते थे, वे पढ़ते थे, वरना वे पढ़वा लेते थे। दादा के विषय में गांधीवादी चिंतक और मूर्धन्य साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकरजी ने कहा था, ‘‘प्रेमचंद के लेखन को कितने होरियो ने पढ़ा, नहीं जानता, किंतु राम नारायण भाई के साहित्य को उनके गाँव के लोग प्रेम से पढ़ते हैं। परिवार के लोग, बच्चा-बच्चा पढ़ता है। यह उनके लेखन की सार्थकता है।’’ दादा की दिनचर्या में कुछ बदलाव आया। हम भाई-बहनों को पढ़ाने के लिए उन्हें खंडवा आना पड़ा। कालमुखी में चार कक्षा पास कर सबको एक के बाद एक बड़ी कक्षा में जाना था। दादा भाई हमें पढ़ाने खंडवा आ गए। कालमुखी में सुबह जल्दी उठते ही दादा गाँव में घूम-घूमकर सबकी खैर-खबर लेते थे। अब वे खंडवा में सुबह ही दादा माखनलालजी चतुर्वेदी के यहाँ ताजा अखबार लेकर जाते और उन्हें समाचार पढ़कर सुनाते थे। उसके बाद कई विषयों पर चर्चा करते और दो-ढाई घंटे बाद घर आते थे, फिर लेखन कार्य में लगे रहते थे।

कालमुखी में एकांत वातावरण में पढ़ना-लिखना और खंडवा के शोरगुल में वही क्रम जारी रखना दादा के लिए कठिन कार्य न था। दादा लिखने बैठते थे तो बड़े तन्मय भाव से, चाहे बच्चे उनके सिर पर आपड़ी-की-थापड़ी कर लें, गोल-गोल घूम लें, फिर भी वे अपने में एक चित्त होकर लिखते रहते थे। दादा का कहना था, ‘रचना एक बैठक में ही अच्छी बनती है।’ किंतु जब वे लिख रहे होते, तब कोई आ जाए तो वे अपनी तख्ती-कागज और पेन एक तरफ रख आगंतुक से बातें करने लगते थे। कोई कहता, भाई, हमारे आने से आपके लेखन का तारतम्य टूट गया।’’ इस पर वे कहते थे, ‘‘लेखन का तार तो फिर से जुड़ जाएगा, किंतु आप आएँ और मैं न बोलूँ तो आपके और मेरे मन का तार टूट जाएगा, जो कभी नहीं जुड़ेगा, मेरे लेखन को जड़ बना देगा।’’

दादा की मानवतावादी एवं उदारवादी सोच ही उनके लेखन को जीवंत बनाती थी। दादा कहा करते थे, ‘‘मैं क्यों लिखता हूँ, क्योंकि मैं लिखे बिना रह नहीं सकता और मैंने जो लिखा है, उसे दूसरे तक पहुँचाना मेरा दायित्व है। मुझे इसमें सुख मिलता है।’’ दादा कोई भी रचना लिखते थे तो पूरी होने पर आवाज देते थे—‘‘शिवा, नारायण और सुमन बुला लो अपनी बाई को भी।’’ रचना पाठ करते समय उनके चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव होता था। खंडवा में रहकर भी दादा अपने गाँव से कभी दूर नहीं रहे। खंडवा आने पर दादा के साहित्य-परिवार का दायरा बढ़ गया। एक तो माखनलाल दादा के पास जो भी साहित्यकार उनसे मिलने आता था, तब माखन दादा हमारे दादा को बुलवा लेते थे। वहाँ माखनलालजी से चर्चा के बाद दादा भोजन और ठहरने हेतु उन्हें अपने यहाँ ले आते थे। एक बार माखनलालजी के पास भोजपुरी लोक साहित्य के प्रकांड विद्वान् डॉ. कृष्णदेव उपाध्यायजी हमारे यहाँ एक दिन के लिए आए थे। किंतु हमारे परिवार में ऐसे रँग गए कि वे पाँच-छह दिन तक हमारे यहाँ रुके थे। चूल्हे के पास बैठकर बड़ी बाई (बड़ी माँ) के हाथ की गरमागरम चूल्हे की रोटी खाते जाते और लोक साहित्य की चर्चा करते जाते थे। दादा ने चिंता जताते हुए कहा, ‘‘पंडितजी, लोग तो शहर की ओर पलायन कर रहे हैं, तब लोक साहित्य का क्या होगा?’’ उपाध्यायजी ने कहा, ‘‘राम नारायण भाई, लोक की जड़ रसातल तक है, लोक तो व्यापक है, फैला हुआ है, चिंता की कोई बात नहीं।’’

तुलसी जयंती के अवसर पर खंडवा में साहित्यकारों का महाकुंभ होता था। पाँच दिन माणिक वाचनालय में विशिष्ट विषयों पर साहित्यिक चर्चा, संवाद, परिसंवाद, फिर रात्रि में भव्य-विशाल कवि-सम्मेलन होता था। भवानी दादा (श्री भवानी प्रसाद मिश्र) तो सदा हम लोगों के साथ ही आकर रहते थे। कार्यक्रम के व्यवस्थापकों की शिकायत ही रहती थी कि हमने आपके ठहरने का अच्छा इंतजाम किया है, आप वहीं सर्किट हाउस में रुकिएगा। तब भवानी दादा कहते, ‘‘मैं घर में रहूँगा, सर्किट हाउस में नहीं।’’ उन दिनों हमारे घर में भी साहित्य सरोवर लहराता था। एक बार पंडित विद्यानिवास मिश्रजी हमारे परिवार में बैठे थे। बात चली तो वे दादा से कहने लगे, ‘‘भाई, गाँव के तुम भी हो, गाँव का मैं भी। ललित तुम भी लिखते हो, मैं भी लिखता हूँ, किंतु मैं गाँव छोड़ शहर आया तो शहर का हो गया और तुम शहर में रहकर भी गाँव की सरलता को अपनी गाँठ में बाँधे हो, यही वजह है कि तुम्हारा ललित अधिक ललित है।’’ फिर इस टिप्पणी पर दादा बोले,  ‘‘अरे पंडितजी, क्या बात करते हैं आप, ‘कहाँ आप और कहाँ मैं’।’’ विद्वानों की यही विनम्रता होती है। यह गाँव की प्रेमगली दादा को राष्ट्रपति भवन तक ले गई। ‘पद्मश्री’ का हकदार बना दिया। दादा का लेखन भी उनके व्यक्तित्व की तरह बहुआयामी था। लोकसाहित्य के साथ वे व्यंग्य भी बहुत तीखा लिखते रहे। वे एक व्यंग्य सुनाते थे—शेर ने कहा, ‘रे बकरी! तू मांस खाएगी’, बकरी ने कहा, ‘मेरा ही बच जाए तो बहुत है।’ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी दादा की बड़ी घनिष्ठ मित्रता रही। जब कभी बिना कोई विशेष राष्ट्रीय पर्व और बिना तीज-त्योहार के हमारी गली की नाली पर चूना डले, सड़क-नाली की विशेष साफ-सफाई की जाए, तब हम भाई-बहन एक-दूसरे से पूछते थे, ‘‘क्यों, आज कौन आ रहा है? नए कलेक्टर आए हैं या नए पुलिस अधिकारी?’’ और सच में शाम के समय कोई अफसर-अधिकारी आकर चरण छूकर कहता, ‘‘दादा, मैंने यहाँ पर पदभार ग्रहण किया है। पूर्व कलेक्टर साहब ने कहा था, ज्वॉइन करते ही उनसे मिलना।’’ सच में जिन अफसरों के होंठों पर डेढ़ इंच मुसकान भी कभी नहीं आती थी, वे यहाँ ऐसे ठहाके लगाते थे कि घर के टीन-टप्पर हिल जाते थे। दादा उन्हीं अफसरों के विभाग की बातें करते थे कि जिस अधिकारी को देख लोग सहम जाते थे। वे यहाँ पेट पकड़-पकड़कर हँसते थे। इस अवसर पर एक घटना याद आती है, पर नाम नहीं लिखूँगी। वे खंडवा में कलेक्टर थे।  इंदौर स्थानांतरित होकर चले गए। उनकी बहुत गहरी मित्रता हो गई थी दादा से। वे इंदौर से मिलने आए तो गाड़ी को बड़े बम पर ठहराकर पैदल गली में आए। ड्राइवर से कहा कि एक घंटे में आता हूँ। जब दो-तीन घंटे हो गए तो ड्राइवर को चिंता हुई, वे साहब जिस ओर गली में गए थे, वह गया, फिर लौटा, फिर गया। घर के सामने ओटले पर पहारे दादा बैठे थे। ड्राइवर की बेचैनी देखकर उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है?’’ ड्राइवर ने कहा, ‘‘मेरे साहब इस गली में आए थे, अभी तक वापस नहीं आए।’’ पहारे दादा ने कहा, ‘‘तुम वहाँ पूछो, तुम्हारे साहब वहीं होंगे!’’ ड्राइवर ने कहा, ‘‘नहीं दादा, मेरे साहब तो बड़े अफसर हैं, वहाँ तो लोग खूब हँस रहे हैं।’’

जब पहारे दादाजी ड्राइवर को दरवाजे तक लेकर आए और सब बताया तो हँसी का रिकॉर्ड ही टूट गया। दादा बोले, ‘‘लो साहब, अफसर भी कोई हँसनेवाला जीव है क्या!’’ दादा को एक बहुत बड़ा शौक था—पत्र लेखन का। उन दिनों फोन आदि की इतनी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। दादा का मानना था कि पत्र के माध्यम से मन-से-मन की बात हो जाती है। सुबह उठकर दादा बहुत सारे कार्ड लिखते थे। उन दिनों डाक दो समय आती थी। डाकिया चिट्ठी लेकर घर आए तो उसके पहले ही वे पोस्ट ऑफिस पहुँचकर अपनी डाक लेकर आ जाते थे और पत्र पढ़कर तुरंत उत्तर लिखकर पोस्ट ऑफिस में डाल आते थे।

यही डाक-चिट्ठी मेरे मन को बहुत व्यथित कर देती है। दादा अपने परिवार से बहुत खुश थे, किंतु मुझसे कभी-कभी बड़े नाराज हो जाते थे और कहते थे, ‘‘तुमको क्यों पढ़ाया? चार लाइन चिट्ठी नहीं लिखते हो। मैं चिट्ठी लिखता हूँ तो जवाब नहीं देते हो?’’ मैं कहती, ‘‘दादा, बच्चे छोटे हैं, स्कूल भी जाना रहता है। घर के कामों से समय नहीं मिलता।’’ तो वे कहते, ‘‘मैं नहीं जानता। ये रखो, बीस कार्ड ला दिए हैं। हर सप्ताह मुझे चिट्ठी मिलनी चाहिए!’’ और फिर भी मैं नहीं लिख पाती थी। शायद आलस या लापरवाही! आज मेरे बच्चे बड़े हो गए। नौकरी से भी निवृत्त हो गई हूँ। दादा को चिट्ठी लिखने को मन विह्वल है, किंतु आज उनका पता नहीं मालूम! जिस किसी को उनका पता मालूम हो, पता जानता हो, मुझे बता देना, मैं कार्ड पोस्ट कर दूँगी!

दादा चले कहाँ गए? यादों में हमारे बीच यहीं हैं। याद आता है कि दादा जब ‘पद्मश्री’ से अलंकृत हुए थे तो ग्रामीणजनों ने उनका लोक समारोह किया। उस समारोह में उपस्थित ज्ञानपीठ सम्मान से पुरस्कृत साहित्यकार श्री नरेश मेहताजी भी थे। इस लोक सरोवर को देखकर वे बोले, ‘‘बिना किसी आमंत्रण-निमंत्रण, न सरकारी आदेश, फिर भी इतना बड़ा जनसैलाब, अपने खर्चे से समारोह में उत्साह से पहुँचे!’ मैं राम नारायण भाई के इस लोकानुराग के प्रति नतमस्तक हूँ। वे किसी लोक नायक से कम नहीं है। मेरा सिर बार-बार नतमस्तक हो रहा है।’’

दादा के एक ग्रामीण सखा ने निमाड़ी में कहा, ‘‘जातू भाई सिंगाजी जैसे गवलई, ओंकारजी जैसे भोला और निमाड़ी की माटी जसा सौंधी खुशबू वाला छे। उननेऽऽऽ निमाड़ी की सेवा करी, न निमाड़ सी उरिण हुया।’’

इसी बात को डॉ. शिवमंगल सिंहजी ने भी बड़े सूत्र में कहा, ‘‘रामनारायण भाई ने निमाड़ी की साधना की और निमाड़ को तीर्थ बना दिया।’’

दादा के शताब्दी वर्ष पर उन्हें बार-बार प्रणाम!

—सुमन चौरे
१३, समर्थ परिसर, ई-८ एक्सटेंशन,
बावडि़या कला, त्रिलंगा पोस्ट ऑफिस,
भोपाल-४६२०३९
दूरभाष : ०९४२४४४०३७७

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