दाढ़ी, बुद्धिजीवी और बादल

दाढ़ी, बुद्धिजीवी और बादल

हमें भी हाल में बुद्धिजीवी बनने और दिखने का शौक चर्राया है। कुछ अक्ल के जीव साधु संतों सी दाढ़ी पाल लेते हैं। उन्हें मुगालता है कि इससे उनकी बुद्धिजीवी की छवि बनेगी। वे भूल जाते हैं कि इससे वे बुद्धिजीवी कम, अक्ल के बैताल अधिक लगते हैं। यों भी इधर साधु-संतों की साख गिरी है। पारंपरिक विक्रम-वैताल की कथा के विपरीत भ्रम होता है कि दाढ़ी ऐसे बुद्धिजीवियों पर सवार है। इसका एक लाभ जरूर है कि जब कहीं चर्चा में कोई गंभीर विषय उठता है तो उनका दाढ़ी सहलाने का कार्यक्रम चल निकलता है। स्वाभाविक है कि इससे जुबान पर ताला जड़े, लिहाजा वह हर विवाद से परे हैं। ये भव्य मुद्रा के चुप्पे बुद्धिजीवी हैं। इनकी पहचान कोई वैचारिक उपलब्धि न होकर केवल इनकी लहलहाती दाढ़ी है। कुछ का आरोप है कि ये चिंतन के वशीभूत होकर दाढ़ी पर हाथ नहीं फेरते, इसका सीधा-सादा कारण उसमें जुओं की पूरी कॉलोनी का वास होना है।

हमें इस टैगोरी दाढ़ी की उपयोगिता पर शक हुआ। दूसरों के मजाक का पात्र बनने का क्या फायदा है? हमने मित्रों से चर्चा के दौरान खोज की कि इधर अज्ञेय फैशन में हैं। यानी उन जैसी दाढ़ी लोकप्रिय है; अध्ययन-लेखन से किसका वास्ता है? आजकल फैशन ही साहित्य है। वैसे भी अब लिखने-पढ़ने का जमाना न होकर, दिखने-दिखाने का है। बहुत दिनों से आँखों को आराम देने का चलन है। किताबों का ‘फ्लैप’ पढ़ लिया, यही क्या कम है? देखने को टी.वी. है, उसमें समाचार भी है, चैनल के आका के विचार भी और सबसे महत्त्वपूर्ण मनोरंजन भी। आँखों पर भार है, पर दिमाग पर नहीं। पढ़ने में दोनों की सक्रियता आवश्यक है। बाजार के भौतिकवाद में लाभ-हानि महत्त्वपूर्ण है। किताब पढ़ने का लाभ क्या है? ‘पढ़ाकू श्रेष्ठ’ का कोई सम्मान तक नहीं है? मेरा सुझाव है कि झूठी-सच्ची समाज-सेवा या लेखन में श्रेष्ठता की बजाय सरकार को पढ़ाकू-प्रतिभा को बढ़ावा देने के नेक इरादे से ऐसे लोगों को ‘फ्लैप-पद्मश्री’ से अलंकृत करना चाहिए। फ्लैप अध्ययन का कुछ लाभ तो हो? यह महान् सम्मान किसी विश्वविद्यालय के कुलपति के प्रमाण-पत्र और राज्य के मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर दिया जाए। पूरी निर्णय प्रक्रिया का खाका है मेरे दिमाग में। यदि सरकार ने इस विषय में कोई कमेटी गठित की और हमें उसमें सम्मानजनक स्थान दिया, तभी हम उसका खुलासा करेंगे।

हम जानते हैं कि अध्ययन-लेखन में अज्ञेय बनने की अपनी कूवत नहीं है, पर दाढ़ी का अनुकरण तो आसान है। बुद्धिजीवी दिखने केलिए कइयों ने ऐसा कार्य किया है। कुछ ने ऐसा करके पुरस्कार-सम्मान भी हथियाए हैं। क्या पता, अपनी किस्मत भी चेते? वैसे तो दाढ़ी रखकर हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इसे रखना तो आसान है, पर इसका रख-रखाव कठिन है। एकाध बार हमने शेव करने की प्रक्रिया में दाढ़ी-स्थल से बिना छेड़-छाड़ किए पाया कि संतुलन बराबर नहीं है। दाढ़ी कुछ दक्षिणपंथी हो चली है, यानी बाईं ओर की फसल कुछ अधिक कट गई है। हमें शीशे में अपना चेहरा कुछ हास्यास्पद सा दिखता है। वैचारिक झुकाव से हमें शिकायत नहीं है, पर दाढ़ी देखकर प्रतीत होता है कि चेहरा सीधा न होकर जैसे दाईं ओर कुछ लटक सा गया है। संभव है कि यह केवल मन का भ्रम हो?

फिर भी हमने स्थिति में सुधार के लिए ‘कन्हैया केश कर्तनालय’ का तत्काल रुख किया। यहाँ यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि कृष्ण का इस दुकान से उतना ही संबंध है, जितना मथुरा-वृंदावन की गोपियों का महाभारत से। दुकान के स्वामी कन्हैया राम हैं और उन्होंने अपना नाम केश कर्तनालय से जोड़कर अपने अहं को तो संतुष्ट किया ही है, साथ ही हजामत की कला को देवत्व से भी जोड़ा है। उन्होंने एक बार हमारे लटके हुए चेहरे का शीशे में अध्ययन किया, फिर हमें सलाह दी, ‘‘पंडितजी! जब हम हैं तो आप अपने चेहरे के साथ ऐसी अवांछित भौगोलिक हरकत क्यों करते हैं? हमारे हाथ बालों में कंघी फँसाकर, कैची से नपाई के अभ्यस्त हैं। मजाल है कि दाएँ-बाएँ कटाई में रत्ती भर का भी अंतर आ जाए! यह जो आपने ठुड्डी से होंठों तक चौथाई दाढ़ी का खूबसूरत नक्शा उकेरा है, इसमें शक्ल के भूगोल के साथ गणित का ज्ञान भी होना-ही-होना। इसके अभाव में कहीं रेजर ज्यादा चला है, कहीं कम। मेहरबानी करके ऐसा प्रयोग करने का हमें मौका दीजिए, वरना आप कहीं ‘बंदर के हाथ उस्तरा’ की मसल सच न कर बैठें, वह भी स्वयं के साथ।’’

इस भूमिका के साथ कन्हैया ने हमारे चेहरे के संतुलन को सँवार तो दिया, पर पूरे पचास रुपए धरवाकर। उन्होंने भविष्य के लिए अनुरोध के स्वर में निर्देश भी दिया, ‘‘आगे से जब भी इस दिलकश दाढ़ी में कतर-ब्योंत की जरूरत पड़े तो सीधे हमारे सैलून की ओर आएँ, नहीं तो ऐसा दुर्घटना होती ही रहेंगी। आपका काम हम रियायती दर पर कर देंगे। बस शर्त यही है कि कृपया दुर्घटना के बाद न पधारें।’’

उनकी चर्चा से यह तथ्य तो स्पष्ट हो गया कि बुद्धिजीवी दिखना भी सबके बस की बात नहीं है। इसमें भी हुनरमंद लोग बाजी मार लेते हैं। हमारे लिए तो यह एक खर्चीला सौदा है। इसमें अपनी सफलता कलाकार-हज्जाम कन्हैया पर निर्भर है। हर हफ्ते में एक बार उसके केश कर्तनालय में नियमित हाजरी दें, तभी सफलता संभावित है। यों तो दाढ़ीवालों में बुद्धि का बुलडॉग दिखने की भयंकर प्रतियोगिता है। यह भी तय नहीं है कि कब कोई नया फैशन चल निकले? उसे अपनाने वाले दूसरों से बाजी न मार लें? वाकई जहाँ बुद्धिजीवी होने से कहीं अधिक महत्त्व बुद्धिजीवी दिखने का है, वहाँ कुछ भी संभव है। हमें लगने लगा कि दाढ़ी-दौड़ में आगे निकलना मुश्किल है।

इसी बीच हमें एक आशा की किरण नजर आई। हमने एक आयोजन में देखा कि दाढ़ीवालों के बीच बैठे एक सज्जन आस-पास की चर्चा से उदासीन होकर ठुड्डी कभी दाईं तो कभी बाईं हथेली पर टिकाए, छत के शून्य को ताक रहे हैं। हमने भी छत पर नजर डाली। वहाँ मकड़ी के जालों के अलावा कुछ और नहीं था। हमें चिंतन के मकड़जाल में उनका खोना अनुकरणीय लगा। आस-पास के बुद्धिजीवी संवाद से बेखबर उनका मौन-चिंतन आकर्षक है। इसको अपनाने में क्या हर्ज है? इस बुद्धिजीवी मुद्रा में न मुँह खोलना आवश्यक है, न दाढ़ी रखना। जुबान हिलाने की भी बचत है और जेब में डाका पड़ने की भी। हमें एहसास हुआ कि बुद्धिजीवी दिखने के लिए इस शानदार नुसखे पर अमल करना क्या बुरा है?

पहले हमने इस नुसखे को कार्यालय में आजमाया। नतीजा कुछ संतोषप्रद नहीं रहा। वहाँ के कलीग, दोस्त कम, दुश्मन अधिक होते हैं। हमारे पड़ोसी ने हमारी चिंतन की मुद्रा की अफसर से शिकायत कर दी, ‘‘सर! लगता है कि पंडित का सिर फिर गया है। सामने फाइलों का ढेर है और उन्हें न निबटाकर वह ठुड्डी हथेली पर टिकाए छत ताक रहा है। हमने याद भी दिलाया कि दफ्तर छत ताकने को नहीं, काम निबटाने को है तो उसकी न मुद्रा बदली, न उसने कोई उत्तर दिया।’’ अफसर ने आव देखा न ताव, हमें कमरे में बुलाकर जी भर कर हड़काया। कौन कहे कि घर से वे प्यारे पप्पू से झाड़ खाकर चले हैं? हमें दुःख हुआ। यदि हम, यूनियन के लीडर होते तो वे ऐसा दुस्साहस न करते। हम लौटे तो पूरी तरह से बुद्धिजीवी से बाबू अवतार में आ चुका था। हमने पास बैठे सहयोगी को आग्नेय दृष्टि से घूरा। और कर ही क्या सकते थे? वह मुसकराया और जैसे अपनी जीत की खुशी में कैंटीन की सैर को निकल पड़ा। हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि दफ्तर में चिंतन ही क्यों, उसकी मुद्रा तक पागलपन का पर्याय है। यहाँ सिर्फ उन कवियों का सम्मान है, जो अफसरों के स्वागत और विदाई में ऊल-जलूल कविताएँ लिखते और गाते हैं। अकसर उनके खाने-कमाने के चक्कर में दफ्तर गोल करने की न शिकायत होती है, न काम-काज में उससे कोई फर्क पड़ता है। वे कार्यालयों के हाथी-दाँत अर्थात् शोभा की वस्तु हैं, जिन्हें सजावट के बतौर किसी अलग कोने में रख छोड़ा है।

हमने दफ्तर से निराश होकर फैसला किया कि चिंतन के नए अंदाज को फर पर क्यों न आजमाया जाए? वहाँ खतरा तो है, पर उसका दायरा सीमित है। कम-से-कम नौकरी गँवाने की आशंका तो नहीं है? बहुत हुआ तो पत्नी की झाड़ खानी पड़ेगी, पर यह तो बहुधा बिना बात भी मुमकिन है। हम इसे दहेज में बिके पति की अनिवार्य नियति मानकर स्वीकार करते हैं। शाम को बहुमंजिली इमारत के अपने फ्लैट की बालकनी में सूखते कपड़ों को खिसकाकर, हमने आसमान देखने की संध बनाई। फिर कुरसी लगाकर वहीं अपनी नई सीखी मुद्रा अपनाकर आकाश के शून्य को ध्यान से ताकने लगा। क्या पता, शून्य की प्रेरणा से कोई नया विचार हाथ लगे! जो अब तक गायब था, वह विचार तो क्या आता, पर पत्नी जरूर आ गई। उन्होंने हमारी प्रश्नचिह्न सी भाव-भंगिमा को देखकर सवाल दागा, ‘‘क्या इरादा है? फाके करने हैं क्या? न घर में आटा है, न सब्जी। कुछ लाना हो तो ले आओ!’’

दफ्तर में तो हम हार गए थे, घर की पराजय को कैसे बरदाश्त करते? हमने अनुभव से जाना है कि सौ मर्जों की एक अचूक दवा चुप्पी है। हम चुप रहे। पत्नी ने झुँझलाकर अपनी चेतावनी दोहराई। गांधीजी की सत्याग्रह की पावन परंपरा के अनुपालन में हम अपने मौन व्रत पर अडिग रहे। तंग आकर गृह स्वामिनी ने कुकर मैं खिचड़ी चढ़ा दी। खिचड़ी खाते समय हमने अपना मौन-व्रत तोड़कर उनका और उनकी पकाई खिचड़ी का गुणगान किया। उन्हें आश्वस्त किया कि सबेरे-सबेरे सरोजनी नगर से आटा-सब्जी हाजिर हो जाएगी। फर के अमन-चैन को उनकी तारीफ से स्थापित कर हम चैन की नींद सो गए।

सवेरे देखा तो सूरज गायब था। पता नहीं कुदरत के कार्यालय में गुमशुदा की रिपोर्ट लिखी जाती है कि नहीं? या वहाँ भी धरती जैसा आलम है? बिना खर्चा-पानी के एफ.आई.आर. संभव नहीं है तो तफशीश का सवाल ही कैसे उठे? बहरहाल सूरज को बादलों ने ढक लिया था, वह भी ऐसे कि किसी को संदेह तक न हो कि यहाँ कभी जीवन दायिनी रोशनी का केंद्र रहा होगा! प्रकाश का श्रोत यदि छह-सात दिन इसी प्रकार अदृश्य रहे तो त्राहि-त्राहि मच जाए। वादे से मुकरना गृह-युद्ध का वायस बनता। हम छाते का रक्षा-कवच साथ लेकर बाजार गए और हमेशा की तरह ठगे जाकर आटा-सब्जी लेकर छुट्टी या विवाह की कीमत चुकाने घर लौट आए। हमारा  दृढ़ निश्चय था कि आज पूरे दिन चिंतन की मुद्रा का जाल उछालकर किसी-न-किसी वैचारिक पंछी को फाँसेंगे।

हम बालकनी में स्थापित होकर शून्य को ताकने में व्यस्त हो पाते कि हमारे दृष्टि-पथ पर बादल-ही-बादल आ घिरे। शून्य से वैचारिक अन्वेषण में हम अब तक भले असफल रहे हों, पर बादलों ने हमें नए सोच की सामग्री दे दी।

कितनी विविधता है इन बादलों में, कतई बुद्धिजीवियों की दाढ़ी के समान। कुछ बारिश का आश्वासन लेकर नेताओं की तरह आते हैं और बिना बरसे चले जाते हैं। कुछ ही बादल पानीदार हैं। अधिकतर सुविधा-भोगी हैं। आसमान की ऊँची कुरसी पर बैठकर केवल अपनी जनसेवा के जल का प्रचार ही उनका काम है। गरजते हैं, चमकते हैं, बस बरसते नहीं हैं। ज्यादातर बादल बारिश की आशा जगाकर पधारते हैं और किसी बजट-पर्यटक सा, बिना कुछ खरीदारी किए कहीं और सिधारते हैं। हमें यकीन है कि वहाँ भी कंजूसी का उनका यही रवैया बरकरार रहता होगा?

बादल पानीदार हो या न हो, उसका हमारे जीवन में उल्लेखनीय योगदान है। सामान्य व्यक्ति रोटी-सब्जी की जगह जमीन से सिर उठाकर आसमान देखें, यह कोई कम महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है क्या? यों तो जहाँ बादलों की कृपा होती है, वहीं बाढ़ का आगमन भी। जैसे जन्म के साथ मृत्यु एक अनिवार्य स्थिति है, वैसे ही बिना बारिश के सूखा पड़ना भी। कोई सोचे कि पूरी प्रांतीय सरकार कमर कसे रहती है, बाढ़ और सूखे से अपने सूबे को बचाने के लिए। सरकार की कमर केवल जनता से वसूल किए कर की कमाई को बरबाद करके कसी जाती है। इसके बावजूद वर्षा ऋतु के साथ कहीं-न-कहीं बाढ़ का आना और सूखा पड़ना वर्तमान की एक अनिवार्यता है। सरकार का एक वर्ग पहले कमर कसने में दोनों हाथों से पैसा कमाता है, फिर बाढ़ या सूखे से जूझने में। परिणामस्वरूप कई लड़कियों के हाथ पीले होने में और कई युवाओं के विदेश-गमन और अध्ययन में बाढ़ और सूखे का अहम योगदान है। जहाँ गरीबों के घर बाढ़ में बह जाते हैं, वहीं इस विशेष वर्ग के कोठी-महल भी बाढ़/सूखे की इनायत से ही खड़े होते हैं।

हमें ताकते-ताकते पान की दुकान के दार्शनिक का यह कथन भी ध्यान आया कि जीवन में हमेशा सकारात्मक नजरिया अपनाना चाहिए। यदि किसी का नुकसान होता है तो किसी और का फायदा भी। लाभ-हानि झेलनेवाले इनसान ही हैं। सुख और दुःख दोनों अस्थायी स्थितियाँ हैं। न सुख टिकता है, न दुःख। उनके दर्शन का सार है कि यदि किसी के घर चोरी हो तो उसे यह सोचकर जश्न मनाना चाहिए कि चोर का घर तो भरा। अब हम भी ठुड्डी कोहनी पर टिकाकर दिखाएँ बुद्धिजीवी हो गए हैं। गौर से देखें तो बादलों के बीच देखनेवालों को कई तरह की दाढि़याँ नजर आएँगी। यह भी आभास होगा कि जहाँ चेहरों पर छोटी, बड़ी फैशनेबल दाढि़यों की भरमार है, वहीं कइयों के पेट में अदृश्य दाढि़याँ भी हैं!

गोपाल चतुर्वेदी
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