नींद भर सोए

नींद भर सोए

‘‘मैनेजर साहब! नमस्ते!’’

‘‘नमस्ते भाई, नमस्ते, बोलो क्या कहना है?’’

‘‘हुजूर! हमारे भाई का बिरधा पेंशन साल भर से खाता में नहीं आवत है, का बात हौ?’’

‘‘तुमने आधार कार्ड का कॉपी बैंक में जमा किया था क्या?’’

‘‘नाहीं, आधार कार्ड कहाँ बा।’’

‘‘क्यों, प्रधानजी बताए नहीं थे क्या?’’

‘‘बताया था साहब, भला अधार कार्ड बनावेवाला आदमी पीछे सौ रुपया जमा करावत रहा, हम सात सौ रुपया कहाँ पाता?’’

‘‘तौने से हमके अधार कार्ड नहीं मिला।’’

‘‘तो मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता। बिना आधार कार्ड के पैसा खाता में जमा नहीं होगा।’’

खन्नू घर आते समय मन में सोचा कि पंडित बाबा के घर चलकर कुछ पैसा माँग ले।

‘‘चच्चा, ए चच्चा!’’

‘‘क्या है खन्नू? चाचा नहीं हैं।’’

‘‘चाची कुछ काम करे के हो त बता दिहल जाए!’’

‘‘क्यों, आज बाजार में काम नहीं मिला क्या? तभी इधर दर्शन दिए हो।’’ चाची ने कहा।

‘‘हाँ चाची, बालू, मिट्टी के महँगाई से जियादातर मालिक काम बंद कर दिया है। दस दिन हो गयल, काम नाहीं मिला, ठेकेदार पैसा नाहीं देता है। कहता है कि मालिक काम बंद किया है तो पैसा कहाँ से देगा!’’

‘‘अच्छा, जाओ गोशाला साफ कर दो, भैंस को पोखरी में नहलाकर छाँए में बाँध दो।’’

चाची मन में बड़बड़ाई, ‘जब आवश्यकता होती है, तब नहीं आता है। पैसे की जरूरत होगी, तभी आया है।’

आजी बीच में टोकी, ‘‘अरे, उसे कुछ पानी पीने को दे दो!’’

‘‘अरे, काम करके आएगा तो देंगे। आपको तो बस देने की पड़ी रहती है।’’

आजी चुप हो गईं।

कुछ देर बाद खन्नू लौटा।

‘‘चाची भईस नहला दिहली, सफाई कर दिहली।’’

‘‘अच्छा ठीक है, लो पानी पी लो।’’

चार रोटी खन्नू चार कौर में चट कर गया।

‘‘खन्नू, अब जाओ, चाचा आएँगे, तब आना।’’

‘‘चाची! कुछ पइसा चाहत रहा।’’

‘‘हाँ, मैं जानती थी, तुम बिना अपने मतलब के दर्शन नहीं देते, काम पर बुलाओ तो बहाना मार देते हो।’’

‘‘नाहीं चाची, बहुत अड़से पड़ा हई, तब आवा है। दू दिन से लइका कुछ खाय नहीं है। ओहर गेहूँ कटाई में कुछ अनाज मिला रहा, तब खर्ची चलत रहा। लइका अउर सुमनी मिल के कुछ कटल आलू बिनले रहलन, कुल करीब डेढ़ मन आलू इकट्ठा कइले रहलन। अब त आलू कोई आदमी से खोदावत नाहीं बा, टै्रक्टर हो गयल हौ, ओसे आलू बहुत कटेला। अधिया पर किसान बिनावेलन। अइसहीं बाल बिन के तीन पसेरी दाना इकट्ठा कइले रहलन। एही सब से तीन महीना खर्ची चलल है। पैखाना बनावे बदे परधानजी छह हजार रुपया दिहले रहलन। ओही से लइकन के, सुमनी के, भाई के, हमके जाड़ा क कपड़ा खरीदा।’’

‘‘तो पैखाना तुम्हारा नहीं बना?’’

‘‘नाहीं चाची, हमारा नाहीं, कई लोगन का नाहीं बना। खाली पोखरी के किनारे गड़हा खोदा गया, ओही का फोटो खींच के ब्लॉक में सिकरेटरी साहब भेज दिया है।’’

‘‘पोखरी के किनारे क्यों?’’ चाची ने उत्कंठा बस पूछा।

‘‘त घरे जगाहाँ कहाँ बा चाची!’’

‘‘तो पोखरी तो सूख गई है, उसमें पानी कहाँ है? पैखाना में पानी कहाँ से डालोगे?’’

‘‘चाची, पैखाना बना कहाँ बा, गाँव में भिनसहरा, अउर साँझी के मर-मैदान करे में सिटी बजाएवाले आफत किया है।’’

चाची हँसकर रह गईं। ‘‘देखो मोदीजी, योगीजी, क्या कर पाते हैं। यहाँ के लोगों को सुधारना इतना आसान नहीं है। भ्रष्टाचार समाप्त करना बहुत कठिन है। नस-नस में भ्रष्टाचार समाया है। बडे़-बडे़ अफसर भ्रष्ट, विधायक, मंत्री भ्रष्ट, गुंडा-बदमाश हैं तो देश कैसे सुधरेगा?’’

चाची के चुप होते ही खन्नू चालू हो गया।

‘‘एक महीना कचालू खायल गयल हौ, छेमी तोड़ाई में मटर मिल जात रहा चालीस रुपया लइकन के, साठ रुपया सूमनी के।’’

‘‘तुम्हारी माताजी को?’’

‘‘माई को लौकत नाहीं है, छेमी तोड़ नाहीं पाती है। रामजीत भइया के खेत में निरौनी कर देत है, जवने से टमाटर, भंटा, धनिया, मिरचा मुफत में मिल जात है। माई को दोपहर को दोपहर निमोना भात, चाहे रोटी तरकारी मिल जाता है। रात में माई नाहीं खाता है।’’

‘‘खन्नू, तुम भी तो कमाते हो?’’

‘‘हाँ चाची, तो हमारा भी तो खर्चा है, हित-नात, आना-जाना, शादी-बिआह, मरनी-करनी सबकुछ देखना पड़त है।’’

‘‘खन्नू, कोटा से भी तुमको गल्ला मिल जाता होगा?’’

‘‘अरे चाची, कोटा के गल्ला का हाल, कुछ मत पूछीं!’’

‘‘काहे, क्या बात है?’’ अनजान बन के चाची ने पूछा।

‘‘अरे, ऊ कभी पाँच किलो गेहूँ, पाँच किलो चावल देत है, कभी नाहीं देत है। कहत है कि गल्ला नाहीं मिला। गाँववाले मिल केतहसील पर शिकायत कइलन, दू महीना कोटा दूसरे को मिला, फिर साहब के रुपया-पइसा दे के अपने इहाँ करा लिया। अब केहू क हिम्मत नाहीं हौ। ऊ अपने मन से कभी देत है, कभी नाहीं देत। परधानो कुछ नाहीं कर पाया। कलेक्टर, मंत्री सबको दरखास दिया है। अब लोग हार मान गया है।

‘‘मखंचुआ पंजाब चले के कहत रहा, भला हमारे पास पैसा नाहीं था। जवने से हम नाहीं गया। ऊ छह हजार रुपया वहाँ से कमा कर लाया, ओका परधानजी को दे दिया। अब ओका घर खातिर पैसा मिलेगा। ओकरे पास अधार कार्ड है।’’

‘‘घर बनाने के लिए कितना पैसा मिलता है?’’ चाची ने जानना चाहा।

‘‘कुल एक लाख बीस हजार रुपया मिलता है। जवने में से बीस हजार सब अफसर लोग को देत है।’’

‘‘खाते में पूरा पैसा आता है, वह न दे तो?’’

‘‘कैसे नहीं देगा चाची! पहले कबुलवा लेत हैं।’’

‘‘पहिलका साठ हजार का किस्त आता है, उसमें सेमा, ईंटा, सीमेंट राँगा बालू परधान का होता है। लेबर घरवाले का।

‘‘बाद में दूसर किस्त आता है, उसमें स्लैब पड़ता है। न खिरकी न दरवाजा, न प्लास्टर, आधा-अधूरा  बनत-बनत परधान कहता है कि सब पैसा खर्च हो गया।’’

चाची ने खन्नू के ऊपर दया कर सौ रुपए का एक नोट पकड़ा दिया।

रुपया पाते ही खन्नू सीधे बाजार की ओर लपका। कुछ आटा, नमक, तेल, माचिस, सुरती और गाँजा खरीदा। शेष बीस रुपया का भट्ठा पर दारू पिया। पान खाया। सामान की गठरी लेकर लड़खड़ाते हुए घर आया। रास्ते भर ग्राम प्रधान को, कोटावाले को, आधार कार्ड वाले को, सरकार को गाली देता रहा। गिर जाता, फिर उठता और चल देता। सबको देख लेने की धमकी देता। इस तरह गिरते-परते घर आया। घर आते ही जोर से चिल्लाया, ‘‘ले रे सुमनी, गठरी पकड़ो, मुझको सोना चाहता है।’’

ऐसा कहकर नीम के पेड़ के नीचे झिलहगटी बसखट पर धड़ाम से घस गया।

राम मोहन भैया अपने खेत से टमाटर उखाड़कर मेंड़ पर रख दिए थे, उसी में से करीब एक पसेरी टमाटर तोड़कर सुमनी लाई थी। करीब-करीब आधा टमाटर बच्चा लोग कच्चा ही चट कर गए थे।

आधा बचा था। उसी का आलू के साथ तरकारी सुमनी ने बनाया।

कचालू खाते-खाते सब ऊब गए थे। कई दिन बाद तरकारी रोटी खाने को मिली। उस रात सब लोग नींद भर सोए।

विजयशंकर पांडेय
गुंजन कुटिया, नारायणी विहार कॉलोनी
चित्तईपुर, सुंदरपुर, वाराणसी-२२१००५
दूरभाष : ०९४५१८८११०९

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