एक महीना ऐसा भी...

एक महीना ऐसा भी...

समय की, संवत्सर वर्ष की, सौर और चाँद गणनाद पद्धति में समानता लाने के लिए किसी महीने में दो तिथियों के एक, जैसे कभी चौथ-पंचमी, कभी एकादशी-द्वादशी एक हो जाती हैं, इस तरह होने से बचे तीन वर्ष की तिथियों के समय को मिलाकर खगोल और ज्योतिष शास्त्रियों ने बारह महीनों की रचना से बचे समय को एकत्र कर वर्ष में तीन वर्ष के अंतराल से एक १३वें अतिरिक्त मास—‘अधिक मास’, ‘मलमास’, ‘पुरुषोत्तम मास’, ‘लोंद का महीना’ की रचना की है।

तीन वर्ष के अंतराल से पड़ते वर्ष के इस अधिकमास की खगोलीय ज्योतिषीय अवधारणा पर श्री पी.बी. काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ ग्रंथ में अत्यंत विस्तार से विचार किया गया है और अधिकमास की इस अवधारणा के सूत्र वैदिक युग में भी विवेचित हैं।

गौरतलब यह भी है कि अंग्रेजी काल गणना में जो ‘लीप ईयर’ का समय लीप ईयर में फरवरी माह में एक दिन बढ़ता है, जो २८ की जगह फरवरी २९ दिन की होती है, भारतीय काल गणना में वह ३ वर्ष में बढ़कर एक माह, ‘अधिक मास’ हो जाता है।

तीन वर्ष बाद का यह १३वाँ महीना देश के विभिन्न प्रांतों में इसके ‘मलमास’, ‘अधिक मास’, ‘पुरुषोत्तम मास’ ‘खलमास’, ‘डोंडामास’ (महाराष्ट्र) ‘लोंद का महीना’ कई नामों से जाना जाता है। पर देश भर में तीन वर्ष बाद पड़नेवाले इस अतिरिक्त माह की पहचान ‘अधिकमास’ और ‘पुरुषोत्तम मास’ से है। ‘लोंद का महीना’ यह तो सिर्फ पश्चिमी उत्तर भारत, विशेषतः ब्रजक्षेत्र में कहा जाता है। ठेठ ग्रामीण लोक में तो यह ‘मलमास’, ‘लोंद का महीना’ ही कहा और जाना जाता है। पर लोंद का महीना अधिक मास का ही नाम है, कोशों में ‘लोंद’ का अर्थ अधिक मास दिया है।

लोकजीवन में लोक परंपरित अवधारणाओं की संरचना का सुस्थापित तथ्य यह है कि उनके निर्माण में शास्त्र, पुराण और लोक प्रचलित कथा-कहानियों-किंवदंतियों का न्यूनाधिक योग रहता है और वे मूल अवधारणा की संरचना में लोकजीवन में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया-मिथकीय अर्थ लिये बहुआयामी विस्तार पाती हैं। अधिक मास, मलमास की अवधारणा-संरचना भी कोई अपवाद नहीं है। तीन वर्ष बाद आते ज्योतिष, खगोलीय शास्त्र सम्मत अवधारणा लिये इस माह के पौराणिक संदर्भों के अनुसार वर्ष के इस १३वें माह की रचना स्वयं भगवान् ने हिरण्यकशिपु के वध के लिए की थी, क्योंकि उसे १२ महीनों में न मरने का वरदान मिला हुआ था।

जैसा कि पौराणिक संदर्भ है कि भगवान् ने वर्ष के १२ महीनों के अलावा हिरण्यकशिपु को मारने के लिए इसकी रचना की तो ‘अधिक मास’ नाम तो ठीक है, पर इसे ‘मलमास’ क्यों कहा जाता है? मलमास नाम कैसे पड़ा? जब नाम की शोध में खोजबीन हुई, विद्वानों से चर्चा हुई तो दो मत सामने आए।

कुछ विद्वानों का मत है कि यह १३वाँ महीना ३ वर्ष के १२ महीनों के बचे समय का, काल का मल है, मलिन है, इसलिए इसका नाम मलमास है।

पर मलमास नाम पर मेरी जिज्ञासा के उत्तर में लोककला साहित्य-विज्ञ डी. महेंद्र भानावत ने अपने १६ जनवरी, २०१५ के पत्र में लिखा है—‘‘दरअसल यह ‘मल्ल मास’ है, मासों का मास, बारह मासों से सवाया, अधिक बलशाली, बलधारी। उच्चारण की सहजता से ‘मल्ल’ का ‘मल’ रहकर ‘मलमास’ बन गया। भाषा वैज्ञानिक भी इससे सहमत हैं।’’

भानावतजी का यह मत समीचीन जान पड़ता है। युद्धशास्त्र भी ‘मल्लमास’ नाम के पक्ष में जाता है।

इस नए बने बिना नाम के माह में पूरे माह भगवान् का राक्षस से युद्ध होता रहा। युद्ध के एक प्रकार ‘मल्ल युद्ध’ में युद्ध करनेवाले वीर योद्धा को ‘मल्ल’ कहा जाता है। यह मास शुरू में वीर योद्धा मल्लमास कहलाया, बाद में जैसी कि भाषा वैज्ञानिक प्रवृत्ति है—उच्चारण सुख में शब्दलोप होने की, मल्लमास में से एक ‘ल्’ का लोप होने से वह ‘मलमास’ कहा जाने लगा और आज सर्वत्र यही नाम प्रचलित है। महाराष्ट्र में कसरत का एक रूप मल्लखंभ, मलखंभ है। डॉ. भानावत ने इस प्रक्रिया का बहुत विस्तार से विवेचन करते हुए अपने परिवार का उदाहरण दिया कि कैसे उनके दादाजी, पिताजी जीत मल्ल, प्रताप मल्ल से जीतमल, प्रतापमल हो गए। और पत्र पढ़ते हुए मेरे ध्यान में तुरंत संविधान वेत्ता लक्ष्मीमल सिंघवी आए जो कि पहले लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ही थे।

किंतु वास्तविक नाम ‘मल्लमास’ ही रहा हो, लोकजीवन में १३ संख्या अधिक मास से जुड़ी हिरण्यकशिपु के वध, १२ महीनों के मल से बनी मलिनता की अपवित्रता की अवधारणा के कारण यह मलमास मलिनमास खलमास बना, ब्याज मास बना। इस पूरे मास में कोई भी शुभ कार्य नहीं होता था, सब इस महीने को दुरदुराते, यह संवत्सर से बाहर भटकता फिरता, लोकजीवन की उपेक्षा सहता रहा, तब लोक परंपरा कहती है कि यह भगवान् के पास गया और उनसे अपनी व्यथा कही। रोया कि आपने मुझे कैसा बना दिया! सब महीनों के अपने-अपने स्वामी-देवता हैं, पर मेरा कोई स्वामी-देवता नहीं, सब मुझसे नफरत करते हैं। अधिक मास का दुःख सुनकर भगवान् ने उसे हृदय से लगाकर कहा, ‘‘चल, मैं तुझे अपना नाम देता हूँ, अब तू मेरे नाम से ‘पुरुषोत्तम मास’ कहलाएगा। तू वर्ष का सबसे पवित्र माह होगा। तुझमें जो दान-पुण्य जप-तप, पूजा-पाठ किया जाएगा, उसका पूज्य देवता मैं होऊँगा और उसका सौ गुना फल मिलेगा।’’

भगवान् ने अधिक मास, मलमास के पुरुषोत्तम मास होने और स्वयं का नाम उसको देने, उस माह का देवता बनने की घोषणा गीता में ‘मासानामं पुरुषोत्तम मास’ कहकर की, पर भगवान् का नाम और स्वामित्व, अपरिमित महत्त्व पाकर भी मलमास के मलिन, अशुभ और अशौच होने के पक्ष लोकजीवन से तिरोहित नहीं हुए। आज भी देश भर में अधिक मास में कोई भी मंगलकार्य नहीं होता है। अधिक मास का यह पक्ष भारतव्यापी है और पुरुषोत्तम मास का सौ गुना पुण्यप्रदायी पक्ष भी।

हर प्रांत की पुरुषोत्तम मास की दान-पुण्य, पूजा-पाठ की संरचना के अपने-अपने पक्ष हैं; सौ गुना पुण्य लाभ के अपने-अपने रूप हैं। पर दो पक्ष सभी प्रांतों के पुरुषोत्तम मास की अवधारणा के सभी प्रांतों में किंचित् अंतर लिये समान ही हैं, पवित्र स्थलों, तीर्थों में स्नान और परिक्रमा करना तथा ३२ अपूप (संस्कृत) मालपुए, पुए, छेदवाले विशेष लोक व्यंजन ‘अनरसे’, ‘हिस्से’, छेद की मिठाइयाँ म्है सूर पाग, घेवर दान करना। इतना न संभव हो तो बताशे ही, जिनमें खूब छेद होते हैं, दान करना।

मेरी छोटी बहिन माधुरी तिक्खा ने बताया कि उनकी सास, श्यामल प्यारी तिक्खा माईथान ‘आगरा’ पुरुषोत्तम मास में ३२ मालपुए, ३० महीने के ३० दिन के लिए और २ अपने और भगवान् के लिए लाल कपड़े में बाँध काँसे या ताँबे के थाली-कटोरा, जो भी बरतन मिल जाए, उसमें रखकर दामाद को दान करती थीं। महाराष्ट्र में ३२ अनरसे लाल कपड़े में बाँध कभी चाँदी के पात्र में या फिर ताँबे-काँसे के पात्र में रखकर दामाद को दान किया जाता है। अब तो ये थाली-कटोरा स्टील के होने लगे हैं।

दामाद को दान करने के पीछे वासंती सालवेकर ने बताया कि उनके घर में अपनी लड़की होती है, पर लोक का विश्वास है कि दामाद को दान करने का पुण्य २१ ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर मिलता है। दामाद को दान करने की रीति गुजरात में भी है।

भारतीय लोक परंपरा, लोकजीवन में पुरुषोत्तम मास की दान, पुण्य, धर्म की संरचना के तीन आयाम और उनके प्रांतभेद से विस्तार हैं। दान-पुण्य, पूजा-पाठ, पहले क्रम पर, व्रत और परिक्रमा क्रमशः इनमें से यथासाध्य जो जितना कर सकता है।

मलमास, अधिक मास के पुरुषोत्तम मास और लोंद का महीना, इन दोनों रूपों की प्रामाणिक संरचना की जानकारी इंद्रवती साराचत, गाँव तारापुर, जिला मथुरा और मंजनी शर्मा, गाँव गोपी की नगरिया, जिला मथुरा ने दी है। इंद्रवती ने पुरुषोत्तम मास के दान-पुण्य, पूजा-पाठ, व्रत-परिक्रमा के तीनों आयामों की संरचना की विस्तार से व्याख्या के साथ ‘लोंद का महीना’ की लोकाभिमुख लोकजीवन की छवि प्रस्तुत की है।

इंद्रवती बुआ का कहना है कि पुरुषोत्तम मास में जलेबी के दान और उनसे तुलसी की परिक्रमा लगाना बहुत ज्यादा, यानी सबसे ज्यादा पुण्यप्रद है। इसका कारण छेद है। पर छेदों की इतनी महत्ता का कोई भी कारण वे नहीं बता सकीं। जैसा कि पहले उल्लेख किया कि दान में छेदों के कारण ही मालपुए, पुए, अनरसे और छेदवाली अन्य मिठाइयों, वस्तुओं का भी महत्त्व है।

दान, पुरुषोत्तम मास के व्रत, पूजा-पाठ, कथा-भागवत परिक्रमा की संरचना में भी जुड़ा है। पुरुषोत्तम मास के पाँच व्रत मुख्य हैं।  पूर्णिमा, दोनों पक्षों की एकादशी और चार या पाँच, जितने पड़ें—रविवार। ये व्रत पूर्णिमा को पूरे होते हैं। रूमाल, टोपी समेत लोकपरंपरा में पाँचों कपड़े होना जरूरी है। लोकसाहित्य में भी ये मिलते हैं। कुछ लोग पूरे अधिक मास एकासना, एक समय भोजन का व्रत लेते हैं।

डॉ. विद्याबिंदु के अनुसार पूर्वी उत्तर भारत में पुरुषोत्तम मास में शिवलिंग पर चंदन-रोली, हल्दी किसी से भी बिल्वपत्र पर रामनाम लिखकर चढ़ाते हैं। बिल्वपत्रों की संख्या ११, २१, ५१, १०८ श्रद्धानुसार रहती है। लिखे हुए ये बिल्वपत्र शिवलिंग पर नित्य पूजा के साथ ही चढ़ाए जाते हैं। कितने दिन तक, यह भी व्रत लेनेवाले की इच्छा पर निर्भर होता है, पर ११ से कम नहीं।

अधिक मास पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य की वस्तुओं पूजा-पाठ, परिक्रमा आदि की संरचना में देश भर में सभी प्रांतों में काफी समानता है। अधिक मास में दान की प्रमुख वस्तु है—‘अपूप’ संस्कृत, जिसने देश भर में लोकजीवन में अनरसे, हिस्से, पुए, मालपुए अनेक नाम ग्रहण किए हैं। महाराष्ट्र अनरसे, पश्चिमी-पूर्वी उत्तर भारत के गाँवों में पुए, हिस्से और शहरों में मालपुए दान किए जाते हैं, गुजरात में भी। मिठाइयों में घेवर, खुरमी, म्है सूर पाग, जलेबी, जिनमें जितने ज्यादा छेद हों, उनका दान करना उतना ही ज्यादा पुण्यप्रद है। पर अधिक छेदों की वस्तुओं के दान करने के समर्थन में कोई लोककथा या किंवदंती नहीं मिलती है। संभावना तो मिलने की है। लोक परंपरा की प्रवृत्ति है ही ऐसी।

अधिक मास, पुरुषोत्तम मास में परिक्रमा लगाना भी बहुत पुण्यदायी है। परिक्रमा, जिस क्षेत्र में, जिस प्रांत में जिस तीर्थ की श्रेष्ठता की मान्यता है, लोक में उसी की परिक्रमा करते हैं। काशी में पंचकोशी की, इलाहाबाद में चित्रकूट की, ब्रजक्षेत्र मथुरा-वृंदावन में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। पुरुषोत्तम मास में किसी भी फल-मेवे, यथा किशमिश, बादाम, मखाने, बताशे, मूँगफली लड्डू, मठरी, शकरपारे, पुए से प्रतिदिन तुलसी की १०८ परिक्रमा की जाती है। तुलसी की परिक्रमा तीर्थों की परिक्रमा से ज्यादा पुण्यदायी मानी जाती है। ठीक भी है, तुलसी पुरुषोत्तम प्रिया, विष्णुप्रिया जो ठहरीं! आजकल भक्त लोग परिक्रमा चॉकलेटों से भी लगाते हैं।

पंचकोशी, चित्रकूट, गोवर्धन आदि की परिक्रमा कुछ लोग पाँच पुरुषोत्तम मास लगाने का व्रत भी कर लेते हैं। कुछ एक बार ही लगाते हैं। कुछ, जब तक सामर्थ्य रहती है, लगाते रहते हैं, जब भी अधिक मास पड़े। अधिक मास पुरुषोत्तम मास केवल वैयक्तिक रूप से ही नहीं, सार्वजनिक रूप से भी अत्यंत पवित्र माह मानकर पूजा-पाठ कराने का महीना है। इस महीने में धनी-मानी लोग श्रीमद्भागवत की कथा, अखंड रामायण-पाठ और भजन, कीर्तन कराते हैं। प्रवचन होते हैं। गायों को चारा दिया जाता है। धर्मग्रंथों, पुराणों का पठन-पाठन होता है।

आगरा के पं. डॉ. दामोदर प्रसाद शास्त्रीजी ने ‘काल माधव’, ‘स्मृति कौस्तुभ’, ‘निर्णय सागर’ और कई ग्रंथों तथा ‘निर्णय सागर’ के १५० वर्षों के पंचांगों का अध्ययन करके अधिक मास की ज्योतिषीय और खगोलीय अवधारणा की कुछ विशेष जानकारी दी है, जो निम्न प्रकार है—

१. अधिक मास ३२ महीने १६ दिन ४ घड़ी बाद पड़ता है।

२. अधिक मास में कोई संक्रांति नहीं होती।

३. अगहन, पूस, माघ और फागुन के महीनों में अधिक मास नहीं पड़ता। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले १५० वर्षों के इतिहास में सन् १९८३ में फागुन में मलमास पड़ा था।

४. जब अधिक मास पूरा एक महीना, जैसे पूरा जेठ, पूरा आषाढ़ न पड़कर दो महीनों में आधा-आधा, जैसे आधा कुआर में और आधा कार्तिक में, एक महीने के पहले पक्ष में और दूसरे महीने के दूसरे पक्ष में पड़ता है तो उसे ‘संतर्षिमास’ कहते हैं, क्योंकि उसकी गति सर्प जैसी टेढ़ी-मेढ़ी होती है। दो माह में पड़नेवाले ऐसे अधिक मास को ‘क्षयमास’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें दो महीनों के दो पक्षों में भारतीय लोकजीवन में कोई भी शुभ कार्य नहीं होता।

जिस प्रकार इस १३वें महीने के मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास नामों से जुड़ी पौराणिक और लोक पारंपरिक कथा, कहानियाँ, किंवदंतियाँ मिलीं, वैसी इसे लोंद का महीना कहने, ‘लोंद’ का अर्थ व्यंजित करती कोई कहानी, जिन क्षेत्रों में यह नाम प्रचलित है, वहाँ से भी बहुत खोज करने पर भी नहीं मिल सकी। पर यह तत्सम, तद्भव नहीं, देशज शब्द है। अर्थ लोक से ही मिलेगा, जब भी मिले। पर ‘लोंद का महीना’ कहे जाते इस माह में लोंद की पूजा-अर्चना की पूरी संरचना ग्रामीण लोकजीवन में अभी भी मिलती है, शहरों में भी कहीं-कहीं। अवधारणा से जुड़े लोंद के इस पक्ष ने इस माह को मिथकीय अर्थ और रंगीनी दोनों दिए हैं। पर ब्रजक्षेत्र के बनियों और चौबों, चतुर्वेदी ब्राह्मणों में लोंद महीने में किए जाते सामाजिक रीति-रिवाज अभी भी चलन में हैं। महीने की अवधारणा का अंग संरचना है।

‘लोंद का महीना’ की अवधारणा के साथ जुड़ी इस माह के अँधेरे पाख में किसी कल्पित देवी-देवता का प्रतिरूप स्त्री-पुरुष की आकृति, लोंदरी-लोंदरा बनाना, मुख्य आधारबीज हैं। ग्रामीण लोकजीवन में लोंदरी-लोंदरा की पूजा की विशेष संरचना और शहरी लोकजीवन, विशेषतः ब्रज के बनियों और चौबों में सामाजिक रीति के रूप में उसका विस्तार है।

इंद्रवती सारस्वत और मंजनी शर्मा ने बताया कि ग्रामीण लोकजीवन में अधिक मास के अँधेरे पाख, कृष्ण पक्ष में घरों में किसी भी दिन मीठे आटे के स्त्री-पुरुष की आकृति के ‘लोंदरी-लोंदरा’ और पुए सेंके जाते हैं। शाम को चार-पाँच बजे के करीब अँधेरा होने से पहले गृहिणी दरवाजे के दाएँ कोरे से पुरुष की आकृति ‘लोंदरा’ और बाएँ कोरे से स्त्री की आकृति ‘लोंदरी’ बनाकर चार-चार पुए रख देती हैं। गृहिणी जरा सी हल्दी और पुओं में से जरा-जरा सा तोड़कर लोंदरी-लोंदरा की पूजा करती, चारों ओर पानी घुमाती हैं। घर के लड़के-लड़कियों को पहले से बता दिया जाता है कि लड़के को सीधे कोरे पर रखे और लड़की को बाएँ कोरे पर रखे लोंदरी-लोंदरा और पुए लेकर भागना होता है। जब ये भागते हैं तो गृहिणी हाथ में लकड़ी-डंडा, कहीं-कहीं मूसल लेकर यह कहती हुई ‘लोंदरी-लोंदरा भाजि गए, भाजि गए’ थोड़ी दूर तक उनके पीछे भागती है। लड़का-लड़की उन पुओं और आकृतियों को खा लेते हैं। गाँवों के संयुक्त परिवारों में यह लोंदरी-लोंदरा लेकर भागने की प्रक्रिया मनोरंजक हुआ करती है।

अपने घर में बच्चे न हों तो आस-पड़ोस के बुला लिये जाते हैं। बच्चों की उम्र १० वर्ष के भीतर होनी चाहिए।

पर इस पूजा की सरंचना का मिथकीय अर्थ खुलने का कोई सूत्र हाथ नहीं लग सका। मीठे आटे के बने-सिंके, स्त्री-पुरुष आकृति के ये लोंदरी-लोंदरा कौन हैं? इनका कोई स्पष्ट मत नहीं मिला। ज्यादातर उत्तर ‘क्या मालूम’ में मिले! एक दो ने कहा, ‘‘गणेश-पार्वती हैं’’, ‘‘राधा-कृष्ण हैं।’’ पर अधिक संभव यही लगता है कि ये लोंदरा-लोंदरी लोंद के महीने का ही प्रतिरूप हैं।

ब्रजक्षेत्र के बनियों और चतुर्वेदी ब्राह्मणों में जिस लड़की की शादी हुई हो या शादी तय हो गई हो और अधिक मास, लोंद का महीना पड़े तो उसकी ससुराल ‘लोंद’ भेजा जाता है। लोंद में लोंदरी-लोंदरा के साथ सास-ससुर दामाद को कपड़े, फल, मेवे, मिठाई, धान्य भी देते हैं। इसमें मुख्य आकर्षण की वस्तु होती है—समधी-समधिन के रूप में कल्पित लोंदरी-लोंदरा की आकृति, जिनकी हास्य-व्यंग्यात्मक रूप में कौतूहलपूर्ण चुहुल भरी सजावट की जाती है। व्यंग्यात्मक कथन व कूटोक्तियाँ लिखी जाती हैं। यह सब करनेवाले कुछ विशिष्ट दक्ष लोग और शहर में रहते रिश्ते की महिलाएँ ‘लड़के की ससुराल से आया लोंद’ देखने आती हैं। लोंदी-लोंदरा जिसमें होते हैं, उसकी विचित्र सजावट, कटाक्षपूर्ण व्यंग्योक्तियाँ बड़ा हास-परिहास, चुहुलपूर्ण वातावरण बनाती हैं। उन्हें लेकर उपस्थित महिला समूह समधिन से छेड़छाड़-मजाक करता है।

पर आज भागदौड़ वाली सिमटती जिंदगी और एकल परिवार व्यवस्था में लोंद का यह रिवाज बहुत कम हो चला है। अभी भी कुछ परिवारों में यह रीति चलन में है। अंत में कहूँगी कि अधिकमास की लोक परंपरित अवधारणा संरचना पर अन्य भारतीय भाषाओं में खोज इस अपनी तरह के महीने के व्यक्तित्व को और उजागर करेगी। पर यह कार्य लोकजीवन में से जानकार पीढ़ी के चले जाने से पहले जल्दी-से-जल्दी होना चाहिए।

—मालती शर्मा
१०३४/१ मॉडल कॉलोनी
कैनाल रोड, पुणे-४११०१६
दूरभाष : ०२०-२५६६३३१६

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