प्रिया

प्रिया

बेलमार के लंबे और विस्तृत समुद्र तट के पूर्वी और उत्तरी प्रांतों में, गोरे धनपतियों के आलीशान बँगले एक छोर से दूरे छोर तक फैले हुए थे। सरकारी जमीन पर अधिकार पाने का यह सिलसिला देश की स्वतंत्रता से बहुत पहले शुरू हो गया था। शायद ही कोई ऐसा तट रहा हो जो इन धनपतियों की बपौती न बना। और बहुत बाद में जहाँ-तहाँ भारतीय वंश के लोगों ने भी छोटे-बड़े बँगले समुद्री इलाके में बनाने शुरू किए। देश की आजादी को भारतीय मूल के लोगों का राज्य माने बैठे कई गोरे लोग अपनी फैक्टरी, जमीन-जायदाद और बँगले तक बेचकर ऑस्टे्रलिया तथा अन्य देशों की ओर जाने लगे थे। इसी दौरान भारतीय वंश के कुछ खुशहाल लोगों ने इस मौके का फायदा उठाकर उनके बँगले खरीद पाने की हिम्मत की थी।

इतना बड़ा साहस और इतनी औकात न तो प्रिया का बाप कर पाया और न ही अविनाश का दादा। फिर भी कुछ कदम आगे बढ़ाने की कोशिश दोनों परिवारों ने जरूर की। दादा-दादी की बनाई झोंपडि़यों की जगह उन लोगों ने उससे बेहतर मकान बनाने के प्रयत्न किए। उन दिनों यह दोनों परिवार बेलमार से कोई किलोमीटर भर के फासले पर मारलाशो गाँव में रहते थे।

समय ने करवट ली और आजादी के बीस साल बाद प्रिया और अविनाश के परिवार बेलमार के समुद्रतट के सामने रास्ते पार जमीन खरीद पाए और वक्त के साथ बँगले न सही पर घर बना पाए। प्रिया का बाप अविनाश के बाप की तरह सीमेंट का घर तो नहीं बना पाया, फिर भी टीन की छाजन वाला मारलाशो वाले घर से बेहतर घर बना पाया था।

घर के पिछवाड़े में प्रिया के बाप ने खेती-बारी भी शुरू की थी, जो इन दिनों जंगली घास-फूस से भरी हुई रहती है। अविनाश के घर पिछवाती वाले भाग में उसके बाप ने फलों के जो पेड़ लगाए थे, वे आज भी फलों से लदे रहते हैं।

अविनाश की दोनों बहनों के साथ प्रिया ने भी आम के पेड़ से लटके झूले में झूलकर बचपन को पार किया और आज भी कभी-कभार सहेलियों के साथ झूले का आनंद लेना नहीं चुकती।

देविका आँगन बुहार रही थी जब उसने प्रिया को दोनों हाथों में एक-एक डोल लिए आते हुआ देखा। अपनी कमर को सीधा करके उसने प्रिया को करीब आ जाने दिया। वह जब एकदम उसकी बगल में आ खड़ी हुई तो देविका ने हैरत के साथ पूछा—

— सुबह-सुबह डोल लिए कहाँ जा रही हो?

— तुम्हारे नल से पानी भरना है।

चेहरे पर कुछ अधिक ही हैरत का भाव लाकर देविका ने कहा—

— तुम्हारे नल को क्या हुआ?

— बंद कर दिया गया है।

— बात समझ में नहीं आ रही।

— जल विभाग के कमर्चारी कल शाम हमारे नल के मीटर में ताला लगा गए।

— ओह! समझी। इसका मतलब है कि लोचन भैया ने फिर...।

— माँ ने रुपए दिए थे पर भैया बिल न चुकाकर उस पैसे से गाँजे...।

— ऐसा तो वह पहले भी...।

— हाँ देवी। उसने ऐसा तीसरी बार किया है। अब जब तक पानी विभाग के दफ्तर में जाकर बिल नहीं भरेंगे तब तक उसकी इस हरकत का परिणाम तो भोगना ही पड़ेगा। बुढ़ापे का भत्ता माँ को तीन दिन बाद ही मिलेगा तब तक यह सजा झेलनी पड़ेगी।

दोनों में बातें हो ही रही थीं कि अविनाश रात की नौकरी के बाद मोटर साइकिल पर सामने आ गया। अपनी मोटरसाइकिल से उतरते हुए उसने कहा—

— प्रिया! प्लीज यह मत कहना कि लोचन ने फिर से...।

प्रिया हामी भर पाती कि उससे पहले देविका बोल गई—

— तीन दिन तक प्रिया के घर पानी नहीं आएगा।

मोटरसाइकिल स्टैंड के सहारे खड़ी करके उसने प्रिया से कहा—

— पर तीन दिन काहे को? आज ही वाटर अथॉरिटी के दफ्तर जाकर अदायगी करके आज ही पानी खुलवा सकते हैं। अभी इस वक्त तो दफ्तर खुला भी नहीं होगा।

— लेकिन भैया, यह काम तुम ही को करना होगा।

— ठीक है। ऐसा करते हैं कि तुम बिल और रुपए ले आओ। मैं झटपट नहाकर बिल चुका आता हूँ।

— लेकिन!

— लेकिन क्या देवी?

— चाची को अपनी पेंशन गुरुवार को मिलेगी।

— क्यों प्रिया, बिल कितने का है?

— तीन महीने का है। चार सौ पच्चीस रुपए।

माथे पर हथेली मारकर अविनाश ने कहा—

— हद कर दी इस लोचन के बच्चे ने। खैर, तुम बिल ला दो प्रिया। मैं चुका देता हूँ। बाद में चाची से ले लेंगे। उधर से लौटकर मैं लोचन की खबर लेता हूँ। चाची एकदम सही कहती रहती हैं कि उग्रसेन के कुल में कंस पैदा हो गईल।

मोटरसाइकिल को आँगन में ही छोड़कर अविनाश घर के भीतर चला गया। अपने हाथ के झाड़ू को अमरूद के पेड़ के सहारे रखकर देविका ने प्रिया के हाथ से एक डोल खुद ले लिया। दोनों नल के पास पहुँचीं। देविका ने पहले प्रिया को अपने हाथ के डोल को भरने दिया, फिर अपने हाथ के डोल को भर चुकने के बाद कहा—

—चलो।

दो चार कदम चलने के बाद देविका ने पूछा—

—लोचन भैया घर ही पर हैं?

—बस चाय पी और घर से बाहर हो गया।

: दो :

सुबह की ब्रिफिंग के दौरान चीफ इंस्पेक्टर ने कमरे में मौजूद स्टाफ के
सदस्यों से पूछा—

—हमारे बीच के लोगों में आज एक व्यक्ति का जन्मदिन है। कौन बता सकता है किसका?

एक से अधिक स्वर एक साथ गूँज उठे—

—अविनाश का।

फिर तो लोग एक-एक करके अविनाश को बधाई देते रहे। यह तय हुआ कि रात में पार्टी तो होनी ही है। उस अफसर का घर चुना गया जो पुलिस स्टेशन के सब से करीब था। यह प्रस्ताव भी मान लिया गया कि घरवाले पर सारा बोझ न छोड़कर सभी मित्र अपनी-अपनी ओर से कुछ लेकर ही पहुँचें।

    मीटिंग के खत्म होने से पहले चीफ ने अविनाश से कहा—

— यार तुमने यह तो बताया ही नहीं कि आज तुम कितने साल के हो गए।

अविनाश बताने ही वाला था कि उससे पहले एक कांस्टेबल बोल उठा—

— लड़कियों की तरह तीस का बीस मत कर जाना।

सभी हँस पड़े। अविनाश भी हँस पड़ा और बोला—

— सत्ताईस।

सभी से सात बजे कांस्टेबल हेमराज के यहाँ पहुँच जाने को कहा गया।  पर लोग पहुँचते रहे आठ बजे तक।

जिस तरह विविध प्रकार के व्यंजन मेज पर सज गए थे, उसी तरह बोतलें भी भिन्न-भिन्न तरह की थीं। किसी ने व्हीस्की चुनी तो किसी ने बीयर और कुछ दूसरे लोगों ने देशी रम की माँग की। दो-तीन दौर तो बड़े शांत वातावरण में चलते रहे। इसके बाद खाने-पीने से कहीं अधिक बातें होने लगीं और चूँकि उन पंद्रह लोगों में कोई भी पुलिस की वरदी में नहीं था, इसलिए बड़े खुले ढंग से बातें चलती रहीं। शुरू-शुरू में फुटबाल पर बहस होती रही, फिर बात राजनीति तक आकर ही रही।

कोई एक राजनीति के नेताओं के बारे में अपनी नापसंदी जताता रहा तो कई उनके पक्ष में गुनगान कर उठा। जिस व्यक्ति को कुछ ज्यादा चढ़ गया उसने बड़े साहस के साथ बोलना शुरू किया—

...ये सभी हरामी हैं। वोट माँगते समय तो हाथ जोड़े हुए आते हैं और जब मिनिस्टर बन जाते हैं तो भेड़ से शेर बन जाते हैं। डटकर खाने-पीने वाला एक मंत्री हमसे कहता है कि देश की हालत खराब हो रही है। ओसटिरिटी की जरूरत है। उसके बगल वाले ने पूछा—

— यह ओसटिरिटी क्या होता है?

दूसरे कहा—

— संयम और सादगी।

लंबी मेज के दूसरे छोर से कोई कह गया।

— साले खुद खबोर की तरह खाते-भकोसते रहते हैं। हवाई जहाज से दुनिया के चक्कर काटते रहते हैं और हमें सादगी के साथ जीने को कहते हैं। एक अपने हाथ में गिलास थामे खड़ा हो गया।

— मेरे इलाके का मिनिस्टर कहता है कि अभाव की जिंदगी से बचने के लिए हमें अब मकई और कंद बोने और खाने चाहिए।

— और वे खुद बासमती खाते रहेंगे।

— हमारी आजादी के बीस साल से अधिक हो गए और...और...क्या बोल रहा था मैं?

अविनाश के ठीक सामने बैठे अफसर ने कहा—

— मैं तो राजनेताओं से कहीं अधिक गए-गुजरे कुछ पत्रकारों को मानता हूँ। ये लोग आज हमारी आजादी का फायदा उठा रहे हैं, जबकि आज से बीस साल पहले ये आजादी के खिलाफ थे। इनके संपादक तक आजादी को स्वीकारने को तैयार नहीं थे।

— आज ये ही लोग चौरंगे फहराते अपने को देशभक्त बताने लगे हैं। महफिल बारह बजे रात तक चलती रही। बीच में पुलिस स्टेशन से फोन आ गया कि सड़क पर एक भारी दुर्घटना हो गई है। चीफ का इशारा पाकर एक सार्जेंट ने छोटा सा उत्तर दिया—

— सँभाल लो यार।

: तीन :

प्रिया जब जनमी थी तो उसकी कलाई में दो इंच लंबे एक दाग को
देखकर उसकी माँ चकित हुई थी। उसने तत्काल आँखों में हैरानी का भाव लिए धाई से पूछा था—

— धाई माँ! यह दाग क्यों?

धाई ने मुसकराकर कहा था—

— यह एक निशान है।

— कैसा निशान?

— इसे तुम शुभ निशान मानो।

— क्या यह हमेशा बना रहेगा?

— कुछ निशान वक्त के साथ मिट जाते हैं, कुछ बने रहते हैं।

कई घंटे बाद जब सरोजा के पति ने भी उस निशान के बारे में अपनी माँ से सवाल किया था तो उसने कहा था—

— मेरी बहू की किसी इच्छा के न पूरा होने का चिह्न है।

— यह क्या बात हुई माँ?

— ऐसा होवे ला बेटा। जब लड़कियन माँ बनने के होवेली त ऊ लोगन के मन मेें कोई खास चीज के इच्छा जागेला। अरे हाँ अब बात एकाएक समझ में आ गईल।

— यह बात तो मुझसे भी कई बार कही थीं पर उस वक्त आम का मौसम होता तब तो।

— बस हये खातिर ओकर मन में इच्छा बनल रहल और लयका के हाथ में हमार पतोह के इच्छा न पूरा होय के निशान ह।

 बचपन में तो प्रिया ने अपनी हथेली के इस निशान को कोई खास अहमियत दी ही नहीं थी। लेकिन बड़ी हो जाने पर वह इस निशान को देखकर एक गहरी सोच मे डूब जाती थी।

और एक दिन —

समुद्र किनारे बालू पर देविका के साथ बैठी वह अपनी कलाई के उस दाग को देखती रही और अचानक अपनी जगह से खड़ी होकर बोल उठी थी—

— संकटमोचन मंदिर...।

उसकी इस अधूरी बात और उसकी खोई हुई सी हालत को देख देविका भी अपनी जगह से उठ खड़ी हुई थी। उसने प्रिया से पूछा—

— क्या सोचने लगी?

प्रिया अपनी हथेली के निशान चुपचाप देखती रही, फिर धीरे से बोली—

— संकटमोचन मंदिर के आँगन में...याद आ गई।

— संकटमोचन का मंदिर? क्या मतलब?

— मैं अपने डपता के साथ संकटमोचन का मंदिर देखने गई थी।

— कहाँ है यह संकटमोचन का मंदिर?

— बनारस, काशी में और कहाँ? मेरे बाप केले खरीदकर मंदिर के आँगन के बंदरों के झुंड को दे रहे थे। मैंने जब उनसे कहा कि मैं भी बंदरों को केले खिलाऊँगी तो मेरे बाप ने मेरे हाथ में दो केले थमा दिए थे। मैं केले बंदरों तक फेंकने ही वाली थी कि एक बंदर ने छलाँग लगाकर मेरे हाथ से दोनों केलों को हड़प लिया था। उसकी उस हरकत से मेरी कलाई उसके नाखून से खुरच गई थी।

देविका पूछ बैठी—

— सपना देखा था?

— नहीं तो।

देविका आँखों में हैरत लिये प्रिया को देखती रह गई थी।

—अभिमन्यु अनत

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