पुस्तक-प्रेमी

पुस्तक-प्रेमी

पड़ोस में वर्माजी ने एक बहुत बड़ा मकान बनवाया। गृह प्रवेश के दिन उन्होंने हवन-पूजन कराया और शाम को भव्य पार्टी आयोजित की। उनका शानदार भवन और विशाल भोज का आयोजन देखकर मन प्रसन्न हो गया। वे उत्साह में मुझे अपना घर दिखाने भीतर ले गए। वहाँ सबकुछ सुंदर और भव्य था। बैठक में आते ही मेरी निगाह सामने अलमारी में रखी हुई किताबों पर गई। वहाँ संस्कृत, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी की कुछ प्रसिद्ध किताबें रखी हुई थीं। किताबें देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैंने झट वर्माजी से पूछा, ‘‘ये प्रसिद्ध किताबें आप पढ़ते हैं?’’ उन्होंने खुश होकर मुझसे ही पूछा, ‘‘क्या ये किताबें बहुत खास हैं?’’ अब मेरे चौंकने की बारी थी। मैंने कहा, ‘‘हाँ, ये बहुत प्रसिद्ध किताबें हैं।’’ वे बोले, ‘‘अच्छा-अच्छा, इंटीरियर डेकोरेटर ने लाकर यहाँ सजा दीं और कहा था कि इससे लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। लोग आपको सुरुचि-संपन्न और साहित्य प्रेमी समझेंगे। ऐसा समझने से लोगों में आपकी इज्जत बढ़ेगी। इंटीरियर डेकोरेटर की बात सही निकली। आपको ये किताबें यहाँ देखकर अच्छा लगा, और लोगों को भी लगेगा। इंटीरियर डेकोरेटर की सूझ-बूझ काम आई। बहुत अच्छा बंदा है वो। पैसे जरूर उसने मेरे अनुमान से ज्यादा लिये। पत्नी ने मुझसे कहा भी था कि ये डेकोरेटर बहुत महँगा है, कोई दूसरा कर लें? परंतु मुझे उसकी बातों ने प्रभावित किया। जब उसने बैठकवाली इस रैक में कुछ किताबें सजाने की बात कही, तब मुझे अटपटा जरूर लगा था। मेरे पास दोस्तों के दिए हुए कई महँगे गिफ्ट हैं, मैं उन्हें यहाँ सजाना चाहता था। अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मैं कई प्रकार के महँगे सजावटी सामान लाया था, वह सब सामान तो उसने लगाया ही, परंतु ये किताबें स्वयं लाकर इस रैक में सजाईं। उस समय मुझे लगा कि व्यर्थ ही उसने इन किताबों में मेरे पैसे बरबाद किए। पर अब समझ में आया, वह ठीक कहता है। उसने सही जगह पर सही चीजें सजाईं।’’

मेरे पास अब पूछने और कहने के लिए कुछ न था। मैं चुपचाप उस महाभोज में सम्मिलित होकर घर आ गया। टी.वी. खोला तो प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के निधन का समाचार सुनकर मन उदास हो गया। कई राजनेताओं के श्रद्धांजलि वक्तव्य प्रसारित हो रहे हैं। एक ने कहा कि महाश्वेताजी हिंदी की महान् कवयित्री थीं। उनके निधन से हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा नुकसान हो गया है। दूसरे ने उन्हें महान् लेखिका बताते हुए कहा कि उनके कई उपन्यासों पर लोकप्रिय फिल्में बन चुकी हैं, इस प्रकार फिल्म-जगत् में उनके निधन से जो शून्य व्याप्त हुआ है, उसे कभी नहीं भरा जा सकता। एक मंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि उनकी प्रसिद्ध कृति ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ मैंने पढ़ी है, इतनी दिलचस्प किताब मैंने फिर नहीं पढ़ी। काश, हमारे मंत्री महोदय को कोई बताता कि ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ महाश्वेता देवी की नहीं, आशापूर्ण देवी की प्रसिद्ध रचना है। सारे देश ने हमारे राजनेताओं के ये प्रभावशाली वक्तव्य टी.वी. पर देखे-सुने और अपने जनप्रतिनिधियों के साहित्यिक ज्ञान पर बहुत गर्व किया।

एक प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी पिछले दिनों मेरे शहर में आए। वे आए तो अपने किसी निजी कार्यक्रम में थे, परंतु युवा पीढ़ी उनकी दीवानी। पत्रकारों के लिए कुछ नया मसाला। इत्तफाक से मैं भी उस दिन उस होटल में ठहरे हुए अपने एक मित्र से मिलने गया था। होटल के हॉल में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। लड़के-लड़कियाँ उन खिलाड़ी महोदय की एक झलक पाने के लिए बेचैन थे। पत्रकार अपने-अपने माइक थामे उनसे कुछ भी पूछ लेने के लिए पूरी तरह मुस्तैद। कुछ इंतजार के बाद वे अपनी विशिष्ट अदाओं सहित हॉल में प्रकट हुए। वे अपने हाथ में क्रिकेट का बल्ला थामे हुए थे, जैसे क्रीज पर उतरे हों। उन्होंने बल्ला हवा में लहराते हुए अपने प्रशंसकों का अभिवादन किया। हवा में सैकड़ों हाथ लहराए। पत्रकार उनकी ओर लपके और पहला प्रश्न उछला, ‘‘आपकी प्रेरणा?’’ दर्शक सोचते थे कि वे भावुक अंदाज में अपनी पत्नी या किसी गर्लफ्रेंड का नाम लेंगे। या जैसा कि चलन है, अपने माता-पिता का नाम लें, भले ही उनके माता-पिता उनकी फैमिली में एडजस्ट न हो पाने के कारण अलग किसी फ्लैट में रहते हों। उन्होंने इन पारंपरिक जवाबों से हटकर स्वामी विवेकानंद का नाम लिया और कहा, ‘‘मैंने उनका पूरा साहित्य पढ़ा है और मुझे उनकी किताब ‘योगी कथामृत’ बहुत पसंद है।’’ अब इन्हें कौन बताए कि ‘योगी कथामृत’ विवेकानंद की नहीं, परमहंस योगनंदजी की प्रसिद्ध कृति है। दरअसल विवेकानंद से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने विवेकानंद का सिर्फ  नाम सुना है और शहर में उनके स्टैच्यू देखे हैं। वे एक महान् योगी थे, ऐसा उन्होंने सुन रखा है, उनके विषय में उन्होंने पढ़ा कुछ भी नहीं। उनका नाम लेने से अपनी महानता बढ़ जाती है। अहा! इन्होंने स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा ली। कितने महान् व्यक्ति हैं ये! जबकि रात में इनके लिए बढि़या दारू-मुरगे का यहाँ आयोजन है। आगे उन्होंने कहा कि विवेकानंद खेलों को पसंद करते थे और अपने जीवन में सदा हर खेल में अव्वल आते थे, मानो वे बहुत बड़े खिलाड़ी रहे हों। आगे कुछ सुनना मुझे गवारा नहीं हुआ। मैं अपने मित्र से मिलकर झटपट वहाँ से आ गया।

दूसरे दिन अखबारों में छपा कि हमारे शहर में पधारे लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ी ने अपने जीवन में क्रिकेट खेलने की प्रेरणा स्वामी विवेकानंद से ली। एक बार फुटबॉल खेलने की बात होती, तब भी गले उतर जाती, क्योंकि विवेकानंद बच्चों के फुटबॉल खेलने का समर्थन करते थे। बहरहाल विवेकानंद का नाम उनकी लोकप्रियता के लिए जरूरी है। विवेकानंद के आदर्शों का अनुसरण करके महान् बनना तो कठिन है। हाँ, उनका नाम अपने साथ जोड़कर जरूर महानता का भ्रम पैदा किया जा सकता है। प्रेरणा के पुराने स्रोत माता-पिता, गुरुजन, भाई, पत्नी या प्रेमिका, ये अब पुराने हुए। इनका नाम लेने से कोई ज्यादा प्रभावित नहीं होता। ये तो सबके जीवन के प्रेरणास्रोत होते हैं। इसमें नया क्या? वैसे आजकल माता-पिता, गुरुजन आदि, जिनकी आपके जीवन में कितनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, उन्हें उपेक्षित करने का चलन ज्यादा है। कोई ऐसा नाम प्रेरणा के लिए लो, जो जग-प्रसिद्ध है, उससे जुड़कर हमें ज्यादा प्रसिद्धि मिल सकती है। भले ही हम उस महान् व्यक्ति के विषय में कुछ न जानते हों। जानने की जरूरत क्या है! हमें तो उनका नाम भर चाहिए, सो हमने ले लिया और उन्हें अपना प्रेरणास्रोत बना लिया, बस।

आजकल साहित्योत्सवों में फिल्म स्टारों को बुलाने का चलन बढ़ गया है। हमारे यहाँ फिल्म स्टार माने खुदा। कभी-कभी लगता है, खुदा से भी ज्यादा सर्वगुण-संपन्न, सर्वज्ञाता, विशिष्ट, वगैरह-वगैरह। किसी भी क्षेत्र की कोई घटना हो, जिसके विषय में हमारे फिल्म स्टार महोदय को कुछ नहीं मालूम, परंतु अखबार में उनका वक्तव्य प्रमुखता से छापा जाएगा। वे सर्वज्ञाता जो ठहरे। वे अपने बयानों में प्रधानमंत्री को सलाह देते हुए पाए जाएँगे, जैसे राजनीति के विशेषज्ञ हों। सामाजिक सुधार के आंदोलन में नेतृत्व करने पहुँच जाएँगे। धार्मिक कार्यों में उनका पूरा हस्तक्षेप रहेगा। उनका बस चले तो वे वैज्ञानिकों को भी सलाह देने से न चूकें। हर क्षेत्र में उनके बेसिर-पैर वाले वक्तव्य हाजिर होते हैं। इधर साहित्य-उत्सवों में उनको साहित्य पर तकरीरें झाड़ते हुए देखा जा सकता है। मानो उनसे ज्यादा पुस्तक-प्रेमी कोई है ही नहीं। हर फिल्म स्टार कुछ हो न हो, एक अदद लेखक जरूर होता है। इन दिनों आत्मकथाएँ लिखने का फैशन चल निकला है। हर अदना फिल्म कलाकार जुटा है अपनी आत्मकथा लिखने में। वह अपने भाषणों में फख्र से बताता है कि उसने निराला, पंत, महादेवी और प्रेमचंद से लेकर कुशवाहाकांत तक, सबको पढ़ा है। फिल्मों में न आता तो आज वह देश का सबसे बड़ा लेखक होता। साहित्य-उत्सवों के आयोजक खुशी-खुशी हमारे फिल्म स्टारों को अपने आयोजन में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष बनाते हैं। मंच पर ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक बैठे हैं। साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत साहित्यकार मौजूद हैं, उनके बीच में हमारे फिल्म स्टार महोदय अपनी आभा बिखेरते हुए विराजमान हैं। कितना मनोरम और गौरवशाली दृश्य होता है यह! फिर हमारे फिल्म स्टार महोदय उस मंच से अपनी खिचड़ी भाषा में भाषण बघारते हैं, जिसमें वे कई नामी साहित्यकारों और उनकी प्रसिद्ध किताबों का नाम लेना नहीं भूलते, हालाँकि वे किताबें उन्होंने देखी तक नहीं होतीं। अब नेट से भाषण लायक जानकारी तो आसानी से निकाली ही जा सकती है। उन्होंने निकाल ली और अपना भाषण अपने अभिनयवाले अंदाज में खूब झाड़ा। आयोजक धन्य हुए और दर्शक खुश। साहित्यिक आयोजन स्थल के मुख्य द्वार पर साहित्यकारों के नहीं, फिल्म स्टारों के पोस्टर ही प्रमुखता से लगाए गए थे। वे सेलीब्रिट्रीज जो ठहरे, युवा पीढ़ी पागल है उनकी एक झलक पाने के लिए। इस प्रकार साहित्य और साहित्यकारों की महत्ता, ऐसे आयोजन भलीभाँति स्थापित कर रहे हैं। आयोजकों को साधुवाद!

पुस्तकें पढ़ने से ज्यादा अपने आपको पुस्तकों का प्रेमी साबित करना बड़ी बात है। हमारे एक मित्र हैं—अंग्रेजी भाषा के जानकार। न उन्होंने हिंदी साहित्य पढ़ा और न अंग्रेजी साहित्य, मगर वे साहित्य के विशेषज्ञ माने जाते हैं। यह अंग्रेजी भाषा का चमत्कार है। उनका मानना है कि दुनिया में जो कुछ अच्छा लिखा-पढ़ा गया है, वह सब अंग्रेजी में।

गोष्ठियों में अच्छा वक्ता वही माना जाता है, जो आठ-दस अंग्रेजी लेखकों के नाम ले और उनकी पुस्तकों की सूची गिनवाए। लोग वाह-वाह कर उठते हैं ऐसा विद्वत्तापूर्ण भाषण सुनके। अहा! कितने विद्वान् हैं ये। कितना विशाल अध्ययन है इनका। अद्भुत! विचार, दर्शन और साहित्य उनके भाषण में सिरे से नदारत होता है। कुछ संस्मरण, बड़े लेखकों से अपने संपर्क-संबंध, कुछ प्रसिद्ध किताबों के नाम और अंग्रेजी के महान् लेखकों का जरूरी जिक्र, इस प्रकार उनका भाषण विशिष्ट, उल्लेखनीय और नए लेखकों के लिए आदर्श व अनुकरणीय टाइप कुछ।

आजकल यह फैशन है कि कहीं भी आप भाषण दे रहे हों तो कुछ बड़े लेखकों के नाम जरूर लें और उनसे संबंधित सच्चे-झूठे संस्मरण भी सुनाएँ। प्रसिद्ध किताबों का जिक्र भी करें। अब वे किताबें तो आपने पढ़ी नहीं, बस उनके नाम भर सुने हैं, इसलिए उन किताबों में क्या लिखा है, यह बता पाना तो आपके लिए कठिन होगा। यहाँ सिर्फ नामोल्लेख करके आप अपना काम चला सकते हैं। कुछ नोबल प्राइज विनर लेखकों और उनकी किताबों के नाम आपको याद हों तो बहुत अच्छा रहेगा। उनका उल्लेख करने से आपका भाषण उच्च स्तरीय हो जाएगा। बस यही तो आप चाहते हैं। इस प्रकार एक सफल वक्ता को प्रसिद्ध किताबें पढ़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। उसे कुछ प्रसिद्ध लेखकों के नाम और उनकी किताबों के विषय में भाषण देने के पूर्व नेट से कुछ सामान्य जानकारी भर मालूम कर लेना ठीक होगा। बस! अतः अच्छा भाषण देने के लिए आपको अच्छी पुस्तकें पढ़ना कतई जरूरी नहीं है। हाँ, अच्छी और प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम आपको जरूर मालूम होने चाहिए। इस प्रकार विद्वान् और पुस्तक-प्रेमी के रूप में आपकी छवि बरकरार रहेगी।

एक कार्यक्रम में किसी युवा लेखक ने अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखकों का खूब जिक्र किया। उसने बड़े-बड़े नाम लिये और उनकी कृतियाँ गिनाईं। उस युवा लेखक को अपने अंग्रेजी ज्ञान पर बड़ा गर्व था। कार्यक्रम के पश्चात् ये युवा किसी बुजुर्ग लेखक से खीझते हुए कह रहे थे, ‘‘आपने शेक्सपियर, बड्सवर्थ और यीट्स को नहीं पढ़ा।’’ बुजुर्गवार लेखक तुरंत बोले, ‘‘आपने भी वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति को नहीं पढ़ा!’’ अब ये युवा लेखक बगलें झाँकने लगे। आगे उन बुजुर्ग लेखक ने उन्हें आत्मीयतापूर्वक समझाया, ‘‘जिस प्रकार तुम्हें अपने अंग्रेजी भाषा के जानने पर गर्व है, उसी प्रकार मुझे संस्कृत जानने-समझने पर गर्व है। इससे किसी भाषा का साहित्य छोटा या बड़ा नहीं हो जाता। सभी भाषाओं के साहित्य की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं।’’ वे युवा लेखक समझदार थे, इसलिए उस दिन बहुत शर्मिंदा हुए।

नेता, अभिनेता और समाज के अन्य प्रतिष्ठित लोग सिर्फ किताबों के नाम लेकर सफलतापूर्वक अपना काम चला रहे हैं। यह तरीका अत्यंत लोकप्रिय है। आप भी इस स्टाइल को अपना सकते हैं, लेकिन यह जान लीजिए कि पुस्तकें पढ़ना और सिर्फ पुस्तक-प्रेमी कहलाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। चुनाव आपके हाथ में है। किसी कवि ने लिखा है—‘महाकाव्य के ओ क्रेताओ/ओ प्रबंध के विक्रेताओ/ ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो!’

अश्विनी कुमार दुबे
५२५-आर., महालक्ष्मी नगर, इंदौर-१० (म.प्र.)
दूरभाष : ०९४२५१६७००३

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