पत्थर फेंको, सुखी रहो

पत्थर फेंको, सुखी रहो

कहना कठिन है कि दुनिया में कौन सुखी है? निर्धन रोटी के सपने देखता है, धनवान और धन के। असंतुष्ट दोनों हैं। किसी को भूख का दुःख है, किसी को खाना न पचने का। कुछ ऐसे भी हैं, जो परिवार से पीडि़त हैं। अब वे प्रेमिकाओं से भयभीत हैं। किसी ने शिकायत कर दी तो जेल-यात्रा की नौबत न आ जाए! कवि भविष्यदर्शी होते हैं। ‘नानक दुखिया सब संसार’ कितना सार्वभौमिक सच है! बेकार रोजगार के अभाव से त्रस्त है, नौकरी-पेशा अपने अधिकारी से। ऊपरवाले का कैसा अजीबो-गरीब सृजन है यह अफसर? इसके कान क्या शरीर से अलग हो जाते हैं? सुनता है तो सिर्फ चाटुकारों की। बाकी वक्त क्या कान मेज की दराज में रख लेता है?

यों अफसर नामक इस अजूबे का कोई ठिकाना नहीं है कि निलंबन से कब किसी की नाक काट ले या अच्छी रिपोर्ट देकर जाने-माने करप्ट को पुरस्कृत कर दे? यों ईमानदार आजकल ऐसी प्रजाति के जीव हैं, जिन्हें सरकारी संरक्षण की आवश्यकता है। कार्यालय के ‘जू’ में एकाध तो हैं, जिनको इंगित कर कहा जा सके कि ‘‘यह जो मरियल, दुर्बल शख्स अपने साथियों से बहिष्कृत, कागजों से घिरा, अकेला बैठा है, इसे ‘ईमानदार’ कहते हैं। इसके विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच चल रही है, कौन जाने कि कब निकाल दिया जाए?’’ सच है कि सदाचारी से सब त्रस्त हैं। कार्यालय के संपर्क में आनेवालों से लेकर उसके सहयोगी तक। काम का रेट तै होने से फायदा है। गरजू आते हैं, मुसकराकर बाबू के सिर पर पैसा मारते हैं, मन-ही-मन उसे कोसते हुए विदा हो जाते हैं, इस विश्वास के साथ कि काम तो हो ही जाएगा! इससे उलट, यह ईमानदार है। लेन-देन के प्रचलित तरीकों से हटकर नियमों के जंगल में बसता है। इससे बड़ा दुराचरण क्या होगा कि निजी हित का न सोचकर जनहित का सोचता है। ऐसे सजा के पात्र न होंगे तो अन्य कौन होंगे?

फिर भी एकाध अपवाद न हो तो नियम कैसा? इस दुखिया संसार में कुछ सुखी भी हैं। इनमें दूसरों पर पत्थर फेंकने की जन्मजात प्रतिभा है। जब ये माँ की कोख में थे तो विवश थे उस पर पत्थर न फेंक पाने से। रोते थे। जन्म लेने के कुछ समय बाद ही इन्होंने इस कमी को भी सुधार लिया। हुआ यों कि वे एक दिन सड़क के लैंप-पोस्ट, सार्वजनिक पार्क की रोशनी के खंबों की आँख फोड़ने के प्रयासों से थककर लौट रहे थे कि उन्हें अपना एक नन्हा सा दुश्मन, जो घर के पास की बालकनी में नजर आया। उन्होंने उस पर निशाना साधा। निशाना चूका और पत्थर सीधा जाकर उनकी माँ को लगा। वे दोपहर के खाने पर अपने लाड़ले का इंतजार कर रही थीं। गनीमत है कि उनकी आँख बच गई, चोट माथे पर लगी। पड़ोस के एक डॉक्टर ने उनकी मरहम-पट्टी की, पर पत्थरफेंकू खाने में व्यस्त रहे। उन्हें माँ की चोट का दुःख नहीं था। वे निशाना चूकने पर दुःखी थे।

कुछ हमदर्द सुझाते कि लड़के का भविष्य उज्ज्वल है। यह फौज में जाकर अपने हुनर का प्रदर्शन करने में समर्थ है। उनके माँ-बाप इस सुझाव से सहमत तो थे, पर दोनों को एक ही आशंका थी। घर का यह निशानेबाज होनहार पढ़ाई कैसे पूरी करेगा? स्कूल के सहपाठियों से लेकर प्राध्यापक तक उससे आक्रांत थे। कभी वह किसी सहपाठी का टिफिन-बॉक्स दूसरे पर फेंक देते तो कभी प्राध्यापक की पीठ दिखी नहीं कि उस पर चॉक-पेंसिल। स्कूल के प्राधानाध्यापक ने एक दिन उनके माता-पिता को बुलाकर चेतावनी दी—‘‘लख्ते-जिगर को समझाएँ। यदि उसका व्यवहार ऐसा ही रहा तो उसे स्कूल से निष्कासित करना पड़ेगा।’’ हुआ भी यही। निशाना साधने से बाज न आने पर स्कूल भी उनको बरदाश्त न कर सका। कई स्कूल बदलकर और परीक्षा में नकल करके पास होते वे कॉलेज तक जा पहुँचे।

जानकार बताते हैं कि यहाँ पत्थर फेंकते-फेंकते वे छात्र-यूनियन के पदाधिकारी बन गए। एक बार यही हरकत उन्होंने छात्र संघर्ष को नियंत्रित करने आए पुलिसकर्मियों से की। वे भला इन्हें क्यों बख्शते? लाठी-डंडों से पिटकर उन्हें एहसास हुआ कि व्यवस्था के पास संगठित व प्रशिक्षित साधन हैं मार-पीट के तथा उनके व्यक्तिगत शौर्य से निबटने के। उसके सामने पत्थर फेंकने का पराक्रम कारगर नहीं है। अस्पताल में कराहते-काँखते उन्होंने निर्णय लिया कि भौतिक के स्थान पर शाब्दिक पत्थर फेंकना एक सुरक्षित विकल्प है। तब से उनके व्यक्तित्व में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। ईंट-पत्थर गुम्मे को देखकर अब उनकी बाँहें नहीं फड़कती हैं, न मुट्ठियाँ तनती हैं उसे फेंकने को। यदि कोई भूल से भी किसी स्थानीय या राष्ट्रीय हस्ती की प्रशंसा कर दे तो उनकी जुबान लपलपाती है। वे उसकी आँखों में आँखें डालकर कहते हैं, ‘‘आप जानते भी हैं...?’’ इसके बाद उस हस्ती का ऐसा चारित्रिक चीर-हरण होता है कि द्रौपदी का क्या हुआ होगा?

पत्थरफेंकू का सौभाग्य है कि आज उनके काल्पनिक या वास्तविक शाब्दिक प्रहार से सार्वजनिक हस्ती का बचाव करनेवाला कोई कृष्ण भी नहीं है। उलटे सबकी मानसिकता भीड़ की है। अगर किसी असहाय की ‘चोर-चोर’ के शोर के साथ पिटाई हो रही है तो अंतर की छिपी हिंसा का प्रयोग उस निर्बल पर करना क्या बुरा है? चलते-चलते हर आने-जानेवाला व्यक्ति इस सामूहिक यज्ञ में एक-दो थप्पड़ों की व्यक्तिगत आहुति डालता चला जाता है। उस पत्थरफेंकू का सुखद अनुभव है कि शाब्दिक पत्थर फेंकना लोकतंत्र के निजी अभियान—‘सबके साथ सबकी आलोचना’ का एक नायाब नमूना है। इसमें न विरोध के स्वर हैं, न किसी महापुरुष के बचाव के। मंच से जिनकी प्रशंसा के महाकाव्य पढ़े जाते हैं, पान की दुकान पर पत्थर-फेंकूँ का अनुकरण कर सब उन्हें दुतकार की शरशय्या का भीष्म पितामह बनाने पर उतारू हैं। पान की दुकान हो या कॉफी हाउस, स्थान परिवर्तन से आलोचना की मानसिकता नहीं बदलती है। यदि आज तुलसीदासजी होते तो वे भी शायद यही लिखते कि ‘पर निंदा जस कोई सुख नाहीं।’

विद्वानों की मान्यता है कि पत्थर फेंकना देश का इकलौता सैक्युलर कृत्य है। न इसमें किसी जाति की प्रमुखता है, न संप्रदाय की। जिसका मन चाहे और जिसमें भी योग्यता है, वह अपना नाम पत्थरफेंकुओं की फेहरिस्त में दर्ज करा सकता है। फिलहाल, इसमें न अगड़े-पिछड़े का अंतर है, न दलित और वंचित का। सब निष्ठा से एकजुट होकर जो सामने नहीं है, उस पर पत्थरों की बारिश में व्यस्त हैं। हमने एक सक्रिय पत्थरफेंकू से जानना चाहा कि ‘‘आपको इस नकारात्मक हरकत में क्या मजा आता है?’’ उन्होंने उलटे हम पर ही प्रश्न दागा—‘‘भाई मियाँ! आपने कभी पत्थर फेंके हैं?’’ यदि अन्य कोई प्रश्न होता, जैसे कि ‘मियाँ! आपने कभी कोई लड़की छेड़ी है या पत्नी के अलावा किसी और से प्रेम किया है।’ तो हम शायद झूठ बोल जाते। हमारा ही नहीं, कई दूसरों का भी सच-झूठ मानव निर्मित नैतिकता का मापदंड हमेशा लचीला रहा है, पर यहाँ सच का साथ हमें सुविधाजनक लगा। हमने उन्हें बिना हिचक उत्तर दिया—‘‘बिना पत्थर फेंके ही अपने बाल पके हैं।’’ वे आसानी से हार कैसे मानते? उन्होंने हमें चुप करने की गरज से कहा, ‘‘फिर तो, भाई मियाँ! हमें कहना पडे़गा कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद? एक बार अभी भी फेंककर देखिए। पहले सिर्फ शौक रहेगा, धीरे-धीरे लत बन जाएगा। उसके बाद आप खुद महसूस करेंगे कि इसका सुख गूँगे का गुड़ है, इसका आनंद अवर्णनीय है।’’

इसके पश्चात् इस पत्थर-फेंकू पहलवान से मौखिक दंगल अर्थहीन था। कुछ के जीवन का एक ही लक्ष्य होता है—पत्थर फेंकना। उनसे इस बारे में चर्चा या बहस बेकार है। हमसे पत्थर फेंकने के पक्ष में संवाद कर वे भी अपनी टोल के साथ इसी उपयोगी कर्म में लग गए।

हमने भी मुँह की खाकर घर का रास्ता पकड़ा, यह सोचते हुए कि पत्थर फेंकना किस क्षेत्र में अधिक लोकप्रिय है? घर पहुँचते-पहुँचते हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह जीवन के हर क्षेत्र में समान रूप से स्थान बना चुका है, चाहे साहित्य हो या सियासत अथवा समाज। नहीं तो यह कैसे संभव है कि अपने ही परिवार पर कोई उसी का सदस्य पत्थर उछाले? उमरदार माता-पिता से उन्हीं के घर में रहकर मार-पीट करे, भाई-बहनों से उनको न मिलने दे, न संपर्क करने दे। माँ-बाप का दोष सिर्फ इतना है कि उनका इरादा—अपनी खुद की कमाई दौलत को सब में बराबर बाँटना है।

यों बेटा अपना कर्तव्य निभाता है। कोई पुराना परिचित यदि बुजुर्ग से मिलने आता है तो उन्हें उसके सामने सम्मान देने का स्वाँग रचने में वह किसी से भी पीछे नहीं है। आपस में कितने भी मतभेद हों, इस ढोंग के नाटक में पति-पत्नी एक हैं। दोनों के मुँह से सिर्फ ‘जी बाबूजी’ और ‘जी माताजी’ ही सुनाई देता है। यह अस्थायी राग सिर्फ उतनी ही अवधि का है, जितनी देर मेहमानों का रुकना। उसके बाद का स्थायी स्वर सिर्फ माँ-बाप के अपमान का है।

बुढ़ापे का शृंगार तरह-तरह के रोग हैं, जो वृद्ध माँ-बाप को युवा बेटे पर निर्भर बना देते हैं। कार उनकी है, ड्राइवर भी; पर अस्पताल जाने के लिए कभी-कभार ही उपलब्ध होती है। बेटे को दफ्तर जाना है, पत्नी को सामाजिक संबंध निभाने हैं। नतीजतन, कहने को उनकी है, पर उपयोग के लिए नहीं। दीगर है कि उसकी खरीद, मरम्मत और चालक का वेतन ही उनका जिम्मा है। कहीं जाने के लिए पुत्र से इजाजत लेनी पड़ती है। कभी-कभी बुढ़े-बुढ़ऊ को खयाल आता हैं कि बेटे से अधिक सगा तो उनका ड्राइवर है, जो मैम की डाँट खाने के बावजूद मालिक की दवा वगैरह लाने का ध्यान रखता है। उन्हें आश्चर्य होता है कि मध्यवर्गीय परिवार में पुत्र की परवरिश में उनसे कहाँ चूक हो गई? बेटे से बेहतर संस्कार तो गरीबी में पले उस ड्राइवर के हैं। अपनी पीड़ा किससे बाँटें? उनके मुँह को आदत है, जब खुलता है तो बेटे की प्रशंसा के लिए ही खुलता है।

साहित्य के मर्मज्ञों का विचार है कि लेखक को उसके लेखन से जानना ही उचित है। कुछ से व्यक्तिगत परिचय उनके साहित्य में रचे जीवन-मूल्यों को ध्वस्त करने में सफल है। उनके सृजित आदर्शों और उनके जीवन की वास्तविकता में जमीन-आसमान का फर्क है। वह महिला समानता और सम्मान के प्रबल पक्षधर हैं, पर यह गोष्ठी-सेमिनारों तक ही सीमित है। घर में उनकी पत्नी की हैसियत बिना वेतन की नौकरानी से अधिक नहीं है। कहने को वे लेखन को समर्पित हैं, पर हर पुरस्कार पर उनकी गिद्ध-दृष्टि रहती है। उसके लिए जोड़-तोड़ में उनकी सानी नहीं है, न पीठ पीछे हर प्रतिद्वंद्वी पर पत्थर फेंकने में। जो मानवीय मूल्य उनकी कविता की हर पंक्ति में झलकते हैं, वह उनके खुद के जीवन से कोसों दूर है। आलम यह है कि वे कवि-सम्मेलन में आने-जाने के लिए हवाई टिकट माँगवाते हैं और यदि कहीं और भुगतान अधिक हो तो टिकट ट्रेवल एजेंसी को बेचकर उसमें पधारते हैं। पत्थर फेंकने की उनकी योग्यता के लिए एक लेख काफी नहीं है, किसी प्रतिभा-संपन्न के लिए यह उपन्यास का विषय है। कथनी और करनी का अंतर हर सृजनधर्मी के लिए उसके चरित्र और व्यक्तित्व का आभूषण है।

सियासी हस्तियों का कहना ही क्या! वे तो एक-दूसरे पर पत्थर फेंकने में इतने सिद्धहस्त हैं कि निशानेबाजी में उनसे अर्जुन भी शरमाएँ। जैसे किसी-न-किसी द्रोणाचार्य की ‘पत्थरफेंक आधुनिक अकादमी’ में इन सबका प्रशिक्षण हुआ हो! कभी नेता जनता के लिए अनुकरण योग्य थे, आज ये उपहास और विद्रूप के पात्र हैं। यदि कोई शातिर और भयंकर अपराध-माफिया हो तो लोग मानकर चलते हैं कि यह किसी-न-किसी राज्य का गृहमंत्री बनकर रहेगा। यहाँ तक कि पुलिसवाले भी उसे हमेशा सलाम ही नहीं करते, बल्कि उससे खौफ  भी खाते हैं। जिस प्रकार नेता प्रजातंत्र को अपना पारिवारिक तंत्र बनाने को कृत-संकल्प हैं, उससे मन में संदेह उठता है कि क्या लोकतंत्र को वे अपना जेबी जनतंत्र समझते हैं? मुमकिन है कि उन्हें यकीन हो कि प्रधानमंत्री का पद उनकी खानदानी विरासत का अंग है? किसी दूसरे को इस कुरसी पर देखकर उनका खून खौलता है, आँखें अविश्वास से निहारती हैं कि यह नालायक कैसे विराजा उनकी पुश्तैनी कुरसी पर? वह हिंसक तो नहीं है, पर क्या करे? वह उस पर कभी चुप रहने, कभी हर समस्या के जन्मदाता होने का शाब्दिक पत्थर उछालता है, यह भलीभाँति जानते हुए कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर गलत निर्णय उनके परिवार का रहा है। पर जुबान का दोष है कि वह अकसर फिसल जाती है। ऐसे वे झूठ नहीं बोलते हैं। एक धर्मभीरु व्यक्ति होने के नाते उन्हें झूठ से परहेज है। पर विवशता है। उन्हें सच-झूठ बोलकर अपनी पारिवारिक कुरसी को पाना है, इस झपटू बागी से।

उन्होंने दुष्यंत को तो पढ़ा नहीं है, पर किसी ने उन्हें ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ के बारे में बताया है। तब से वे एक नहीं, सैकड़ों पत्थर इस अयोग्य की लोकप्रियता में छेद करने को उछालकर प्रफुल्लित हो लेते हैं। निष्काम कर्म की इस खुशी का कोई अंत नहीं है। शाब्दिक पत्थरबाजी उनके हर दुःख की दवा है।

देश में बाढ़ आए या सूखा पड़े, लड़कियों का अपहरण हो या बलात्कार, नेता हर पत्थर अपने दुश्मन पर फेंककर ऐसे खिलखिलाता है कि जैसे उसकी सत्ता की लॉटरी खुल गई हो। जीवन में उसका एक ही मिशन और उसूल—पत्थर फेंककर खुश रहना है।

गोपाल चतुर्वेदी
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