विश्वप्रसिद्ध जंतुविज्ञानी डॉ. रामेश बेदी : कुछ संस्मरण

विश्वप्रसिद्ध जंतुविज्ञानी डॉ. रामेश बेदी : कुछ संस्मरण

संस्मरण भी कम मधुर नहीं होते हैं। बात बहुत पुरानी भी नहीं है, वर्ष कौन सा था, यह मैं निश्चित तौर पर नहीं जानता। हाँ, इतना अच्छी तरह से याद है कि महीना सितंबर का था और उन दिनों गुजरात के सूरत में भयंकर रूप से प्लेग फैल गया था, उसकी दस्तक राजधानी दिल्ली तक भी सुनाई पड़ रही थी। पूरे देश में इस महामारी का भय व्याप्त था। अपने चार-छह शोध-सहायकों के साथ जंतु-विज्ञानी एवं आयुर्वेदाचार्य श्री रामेश बेदी साधनारत रहकर ‘बेदी वनस्पति कोश’ का प्रणयन कर रहे थे। उन्हीं दिनों मैं एक प्रूफ-रीडर केनाते उनसे जुड़ा।

प्रथम साक्षात्कार में मुझे बेदी साहब स्पष्टवादी, अत्यंत मेहनती, सिद्धांतप्रिय तथा कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति लगे। हल्की कद-काठी के बेदी साहब अस्सी पार कर चुके थे। मेरी शिक्षा-दीक्षा के बारे में भूपसिंह (ऑफिस असिस्टेंट) से उन्होंने पहले ही जान लिया था, तो उन्होंने गलती से स्नातकोत्तर की जगह स्नातक बता दिया था या बेदी साहब ने ही ऐसा समझ लिया था, सो उनके सामने पहुँचते ही उन्होंने पुकारा, ‘‘आइए स्नातकजी!’’ और फिर बड़े ही साफ शब्दों में कहा, ‘‘मैंने अस्पताल से आने के बाद आपका टेस्ट तथा बायोडाटा देखा। मेरी अनुपस्थिति में मेरे सहायकों ने आपके साथ बड़ा अन्याय किया। क्या अब आप मेरे साथ काम करना चाहेंगे?’’ मेरे ‘हाँ’ कहने पर बोले, ‘‘आपको एक सप्ताह का ट्रायल देना होगा। और एक विशेष बात यह कि मैं यह सब कार्य अपनी जेब से कर रहा हूँ। अपनी सरकारी सेवा का सारा फंड इस कार्य में लगा दिया है। मेरी दूसरी कोई आमदनी नहीं है। मैं ज्यादा कुछ दे नहीं पाता हूँ। यहाँ तो सरस्वती यज्ञ हो रहा है। आप भी अपनी श्रम-आहुति डालिए, जो दक्षिणा बन पडे़गी, मैं अवश्य दूँगा।’’ आखिरकार यह दक्षिणा २२०० रुपया मासिक निश्चित हुई।

बेदी शोध संस्थान में कार्य का समय प्रातः नौ बजे से सायं साढ़े पाँच बजे तक था। घर-बाहर तथा संस्थान में सब बेदी साहब को ‘पापाजी’ कहते थे। बेदी साहब पू्रफ-शुद्धि के मामले में बड़े बेरहम थे, एक नुक्ते की गलती भी उन्हें बरदाश्त न थी। दिनभर जो प्रूफ पढ़ा जाता, रात्रि में वे उसकी बारीकी से जाँच करते थे। कार्य करते हुए मुझे अभी तीन-चार दिन ही बीते थे कि उन्होंने मुझे १०-१२ पृष्ठों की एक भूमिका पढ़ने को दी और कहा कि आप इसे शुद्ध कर दीजिए तो आपका ट्रायल आज ही पूरा हो जाएगा। मैंने इसे मनोयोगपूर्वक पढ़कर शुद्ध कर दिया। जाँचने पर बेदी साहब को कोई गलती हाथ न लगी तो वे बेहद खुश होकर बोले, ‘‘शर्माजी, तुम हमारे काम के व्यक्ति हो, मुझे तुम्हारा काम पसंद है। पर मेरी इच्छा है कि आप कुछ दिन संस्थान को और दें।’’

बेदी शोध संस्थान में उस समय चार शोध सहायक थे—इनमें भूपसिंह, जो हिंदी में एम.ए. और अमर उजाला दैनिक में काम कर चुके थे; वे बेदी साहब के सचिव के रूप में, ऑफिस असिस्टेंट, फोटो, टी.पी. सँभालना तथा बाहर के सभी काम किया करते थे। निशि त्यागी, जो संस्कृत में एम.फिल. थीं और संस्कृत ग्रंथों से संदर्भ आदि ढूँढ़कर देना उनका काम था। इमामुम रहमान, जो बॉटनी में एम.एस-सी. थे और बेदी साहब के लिखे को री-राइट कर उसे संबंधित फाइलों में पहुँचाते थे। अरविंद शुक्ला, जो बी.ए. पास थे और प्रविष्टियों को री-राइट के साथ-साथ प्रविष्टियों की पर्चियों को अकारादि क्रम में छाँटना, फिर उन्हें पिनिंग करना तथा बाद में फाइनल चैकिंग हो जाने के बाद प्लेन कागज पर चिपकाकर पांडुलिपि तैयार करते थे।

न थकने का फॉर्मूला

बेदी साहब इस आयु में भी कठोर परिश्रम करते थे। प्रातः नौ बजे जब हम संस्थान में पहुँचते तो बेदी साहब को पहले से ही लेखन-कार्य में जुटा पाते और सायं साढ़े पाँच बजे जब छुट्टी करते तो उन्हें काम करते हुए ही छोड़कर जाते। जाने से पूर्व दिनभर के कार्य की रिपोर्टिंग होती और अगले दिन क्या करना है, यह भी तय होता। गरमी में भी हमने उन्हें कभी बार-बार पानी पीते हुए नहीं देखा, दस बजे नाश्ता जरूर करते थे, दिनभर में एक-दो बार ही बाथरूम जाते थे। इतना ही नहीं, वे रात को भी पू्रफ की जाँच और लेखन कार्य करते थे। अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा जुनून था कि काम करते हुए वे थकते ही न थे। पहले मैं बड़ी थकान महसूस किया करता था, मैंने देखा कि अस्सी पार का यह व्यक्ति जब इतना परिश्रम करने के बाद भी नहीं थकता तो मैं क्यों थकने लगा? सच में, अब मुझे कभी थकान महसूस नहीं होती है। बेदी साहब ने एक बार बताया भी था कि थकान तो मन के सोचने से होती है। आप जब सोचते हैं कि मैं बहुत थक गया हूँ, तो शरीर भी थकान महसूस करने लगता है और शिथिल हो जाता है। किसी भी महान् कार्य को सिरे चढ़ाने के लिए कार्य के प्रति ऐसे ही जुनून की दरकार होती है, यह मैंने बेदी साहब से सीखा।

बेदी शोध संस्थान में अनुशासन बड़ा सख्त था। संस्थान में आवाज केवल पक्षियों की सुनाई देती थी। किसी की कलम अगर टेबल से नीचे गिर जाती तो बेदी साहब पूछ बैठते कि यह आवाज कैसी थी? टेबल के इर्द-गिर्द एक आलपिन या साफ कागज का एक टुकड़ा भी नजर आ जाता तो यह भी अक्षम्य अपराध होता था। सायं को कार्य करने के बाद छुट्टी के समय सबको अपनी-अपनी फाइलें, संदर्भ-ग्रंथ, शब्दकोश आदि यथास्थान रखना जरूरी होता था। प्रातः आने में विलंब होने पर पाँच मिनट का आधा घंटा कटता था। लेकिन संस्थान की छुट्टी का समय भी अटल था। साढ़े पाँच बजे वे निश्चित ही हम सबको विदा कर देते थे। समय व नियम-पालन के मामले में ‘न ऊधो का लेना, न माधो का देना’ नियम के पाबंद थे।

मित्रों की सलाह

अब तक मैं अपने लगभग सभी साथियों का विश्वासभाजक और सम्मान का पात्र बन गया था। एक दिन मेरे साथियों ने मुझे समझाया कि शर्माजी, आप बड़े भोले हैं। बेदी साहब को आप नहीं जानते। यहाँ पर कोई भी गलती अक्षम्य है। बेदी साहब अपनी सफाई का कोई मौका भी नहीं देते हैं। पू्रफ-रीडर विशेष रूप से उनकी हिंसा के शिकार होते हैं। उनकी सबसे ज्यादा मार प्रूफ-रीडर पर ही पड़ती है। अब तक बारह-तेरह प्रूफ-रीडर इनके हाथों अपनी नौकरी गँवा चुके हैं। अधिकतम तीन महीने से ज्यादा यहाँ कोई चल नहीं पाया, लिहाजा आप पहले जहाँ काम कर रहे थे, वहाँ से रिजाइन अभी न दें। साथियों ने जो कहा, वह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी, या मुझे डराने की नीयत से नहीं कहा था। बाद में मुझे वहाँ काम करते हुए पता चला था कि बेदी साहब चेक-बुक अपने कुरते की जेब में रखते थे। एक-दो उदाहरण ऐसे देखे कि व्यक्ति नियत समय पर अपने काम पर आया और बेदी साहब ने सुबह-ही-सुबह उसे चेक थमाकर बैरंग लौटा दिया। खैर, मेरे लिए इधर कुआँ, उधर खाईवाली बात थी, इसलिए कोई डर नहीं था। मेरी सबसे बड़ी हसरत थी कि मैं डिक्शनरी-वर्क करूँ, भले ही एक महीना ही सही!

बेदी साहब के रौद्र रूप के दर्शन

उन्हीं दिनों बेदी साहब को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग से व्याख्यान देने के लिए निमंत्रण मिला, विषय था, ‘चरक संहिता के जीव-जंतु’। यह व्याख्यान लगभग ५०० पृष्ठों का बन गया था। इसकी प्रूफ-रीडिंग का कार्य द्रुति गति से चल रहा था, समय लगभग करीब आ चुका था। फाइनल प्रूफ-रीडिंग के बाद इसे जिल्द भी कराना था। लगभग ६० पृष्ठ पू्रफ-रीडिंग के लिए बचे थे। आज इस कार्य को समाप्त करना जरूरी था। काम को नियंत्रण में लाने के लिए भूपसिंहजी ने कहा कि शर्माजी, लाओ कुछ पृष्ठ मैं पढ़ देता हूँ। इस तरह लगभग २५-३० पेज उन्होंने पढ़े और सायं तक काम पूरा हो गया। वह सब बेदी साहब को सौंपकर हम सब चले गए।

अगले दिन प्रातः जब मैं काम पर आया तो बेदी साहब ने मुझे ऊपर अपनी सीट पर न जाने देते हुए नीचे ही रोक लिया और अत्यंत क्रोध में तमतमाते हुए बोले, ‘‘अरे शर्मा, तुम तो बड़े धोखेबाज निकले। पहले अच्छा माल दिखाकर फिर चालू माल देते हो, तुम्हें मेरे साथ धोखा नहीं करना चाहिए था।’’ आदि-आदि और भी बहुत कुछ सुनाया। बेदी साहब का चेहरा तमतमा रहा था, मुँह से लार और झाग निकल रहे तथा आँखों से पानी! उनका ऐसा रौद्र रूप मैं पहली बार देख रहा था। मैं तो हतप्रभ रह गया। आश्चर्यचकित हो साहस बटोरते हुए मैं इतना ही कह पाया, ‘‘आखिर बात क्या है, पापाजी? क्या हो गया?’’ बेदी साहब गुस्से में ही बोले, ‘‘अभी दिखाता हूँ तुम्हारी...।’’ और पेंसिल से गोला लगाए हुए पृष्ठों को दिखाने लगे कि कितनी घटिया प्रूफ-रीडिंग की है। मैं लापरवाही से बोला, ‘‘इन्हें मैंने नहीं पढ़ा है।’’ बेदी साहब गुस्से में तमतमाए, ‘‘तब किसने पढ़े हैं? हमारे यहाँ तो तुम्हारे अलावा कोई और पढ़ता नहीं है?’’ मैंने थोड़ा हँसते हुए कहा, ‘‘भूपसिंहजी ने।’’

तुरत-फुरत भूपसिंहजी को बुलाया गया। उन्होंने अपनी सफाई में कहा, ‘‘पापाजी, वो जल्दी की वजह से ये कुछ पृष्ठ मैंने देखे हैं।’’ इतना सुनते ही बेदी साहब का रौद्र रूप शांत हो गया। फिर अपने को संयत बनाते हुए सहज मुसकान के साथ बोले, ‘‘मैं भी सोच रहा था कि शर्माजी ने उतने ही पृष्ठों में गलती क्यों छोड़ी? खैर, चलो हमसे चूक हो गई।’’ पर इस अप्रत्याशित हमले से मैं तो हिल गया था। मित्रों द्वारा दी गई सलाह अभी-अभी साकार होते-होते रह गई। मैंने थोड़ा रुष्ट होते हुए कहा, ‘‘पापाजी, मेरे साथ यह आपका पहला वाकया है। भविष्य में यदि सच्चाई को जाने बिना आपने ऐसा व्यवहार किया तो मैं आपके साथ काम नहीं कर पाऊँगा और आपको मेरे मान-सम्मान का भी ध्यान रखना होगा।’’ फिर तो हम दोनों की ऐसी पटी कि उनके घरवाले भी अचंभित! और वर्षों बाद भी बेदी साहब मुझे छोड़ने के लिए तैयार न थे।

पापाजी, चूक हो गई

बेदी साहब क्षमाशील भी गजब के थे। बेदी शोध संस्थान में कोई कर्मचारी कितनी बड़ी गलती कर दे या पू्रफ-रीडर से कोई भारी भूल हो जाए तो बेदी साहब के सामने पेशी होने पर ‘पापाजी, चूक हो गई’ कहने भर से सबका परिमार्जन हो जाता था। सफाई देने या बहस करने का परिणाम भयंकर होता था। लिखते समय जब उनसे भी कोई भूल हो जाती और वह हमारी पकड़ में आ जाती तो हम जान-बूझकर उनसे पूछने जाते कि पापाजी, यह समझ नहीं आ रहा है, तो उसे ठीक करते हुए वे कहते कि ‘अरे, मेरे से भी चूक हो गई है।’ जब हममें से किसी एक से कोई भूल हो जाती थी तो वे डाँटने-डपटने या गुस्सा होने के बजाय हम सबको अपने कमरे में बुलाकर अर्धवृत्त में खड़ा कर लेते और फिर एक कहानी सुनाते थे। पहले तो कुछ पता न चलता था कि आखिर पापाजी सबका समय क्यों बरबाद कर रहे हैं। लेकिन जब कहानी का अंत होता तो यह सबके लिए एक सबक होता कि यह भूल दोबारा नहीं होनी चाहिए। वह भूल दोबारा होती भी नहीं थी। उनका कहानी सुनाने का मकसद भी यही होता था। गलतियों को जड़-मूल से मिटाने का यह उनका बहुत ही कारगर तरीका था।

बेहद मितव्ययी इनसान

बेदी साहब जैसा मितव्ययी व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा। गरीबी तथा साधनहीनता में मितव्ययी होना एक बात है, लेकिन धनी और साधन-संपन्न व्यक्ति की मितव्ययता के कुछ मायने होते हैं। मितव्ययता बेदी साहब की मजबूरी नहीं, उनके संस्कार और आदत में शामिल थी। कागज के मामले में वे अत्यधिक मितव्ययी थे। मेरी जानकारी में उन्होंने छोटी-बड़ी शताधिक पुस्तकें लिखीं, लगभग एक टैंपों में आ पाएँ, इतनी उनकी हस्तलिखित फाइलें थीं, पर उन्होंने लिखने के लिए कागज कभी नहीं खरीदा। उन्होंने सिगरेट की डिब्बी के कागज, पैंफलेट्स, बच्चों की पुरानी किताब-कॉपियों के रद्दी पन्नों, छपे अखबार के एक-डेढ़ इंची खाली हाशिए, कपड़े-जूतों आदि की पैकिंग आदि को सीधा कर सब पर लिख डाला। अखबार में आनेवाले वन साइड पेपर को उन्होंने कभी बेकार नहीं जाने दिया। कागज केवल फाइनल पांडुलिपि के लिए रिम लेकर ए-फोर साइज में कटवा लिया जाता था।

इस बार कागज की जरूरत पड़ी तो मुझे ही यह काम दिया गया। वास्तव में बेदी साहब बहुत झंझट करते थे और चीजों के दाम अपने जमाने के दाम से आँकते थे। राजा गार्डन चौराहे के पास कागज की दो-चार दुकानें हुआ करती थीं। पहले कागज का सैंपल लेकर आओ, फिर बेदी साहब से सैंपल पास कराओ। इसमें भी यह नहीं तो वो वाला लेकर आओ! फाइनल होने पर कागज को बाइंडर के पास ले जाकर ए-फॉर साइज में कटवाकर लाओ। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद अंततः कागज कटवाने के लिए मैं उसे साइकिल पर लादकर बसई-दारापुर में अपने एक परिचित बाइंडर के पास ले गया। तेईस-छत्तीस-सोलह साइज की ये २५० सीट, यानी आधा रिम कागज था। ए-फॉर साइज में काटने पर दोनों ओर ढाई इंची की पट्टियाँ निकल सकती थीं, मगर इसके लिए दो-तीन छुरी का दाम ज्यादा देना पड़ता।

मैंने बाइंडर से कहा कि कोई बात नहीं, आप पट्टी निकाल दो, पर कागज छोटा नहीं होना चाहिए। उसने कहा कि कागज क्योंकर छोटा होगा! और उसने कागज काट दिया, मैंने बेदी साहब द्वारा दिए गए सैंपल कागज से अच्छी तरह नाप लिया। ए-फॉर साइज का कागज तथा पट्टियाँ लेकर मैं संस्थान लौट आया। बेदी साहब ने पुराने कागज से नएवाले कागज का साइज नापा तो संतुष्ट हो गए। फिर मैंने कागज की लंबी पट्टियाँ उनकी टेबल पर रख दीं। बेदी साहब चौंककर बोले, ‘‘इन्हें कहाँ से ले आए, शर्माजी?’’ मैंने कहा, ‘‘पापाजी, ये इन्हीं सीट में से निकली हैं। आपके लिखने के काम आएँगी।’’ बेदी साहब खुशी के मारे गद्गद हो गए और आँखों की दोनों कोर में आँसू छलक आए। सबको अपने कमरे में बुलाकर बोले, ‘‘देखो, मेरे लिखने के लिए छह महीने का कागज मिल गया। शर्माजी तो गांधीजी के प्यारेलाल हैं। इससे पहले भूपसिंह ही कागज कटवाकर लाते थे तो पूरा दिन ही लगा देते थे, पर ऐसी पट्टियाँ कभी नहीं लाए।’’ वन साइड कागज के प्रति तो उनका ऐसा मोह था कि रास्ते में कोई परचे या पैंफलेट बाँट रहा होता था तो मैं उससे यह कहकर बहुत सारे परचे ले आया करता था कि मैं इन्हें आगे बाँट दूँगा, और वे सब लाकर बेदी साहब को दे दिया करता था, इससे बेदी साहब बड़े खुश होते थे। हम दोनों जुनून की हद तक काम में रम गए थे।

फिर उन्होंने हम सबको गांधीजी के प्यारेलाल का किस्सा सुनाया कि देश-दुनिया से गांधीजी के पास बहुत से पत्र आया करते थे। गांधीजी सब पत्रों को न तो पढ़ पाते थे और न ही सबके उत्तर दे सकते थे, अतः गांधीजी की डाक का काम उनके सहायक प्यारेलालजी देखा करते थे। वे सब पत्रों को इतमीनान से पढ़ते और गांधीजी इसका क्या उत्तर देंगे, अपने अनुमान से वैसा उत्तर लिख दिया करते थे, गांधीजी के पास तो बस पत्रों पर उनके हस्ताक्षर कराने जाते थे। तब गांधीजी उन पत्रों को पढ़ते तो उनकी सराहना किए बिना न रहते कि ‘भाई प्यारेलाल, कमाल है, तुमने तो मेरे मन को पढ़ लिया है, मैं भी इन पत्रों का बिल्कुल यही जबाव लिखता।’ मुझे भी शर्माजी के रूप में एक प्यारेलाल मिल गया है। इन्होंने मेरे मन को पढ़ लिया है। मैं जो और जैसा चाहता हूँ, ये बिल्कुल वैसा ही करते हैं।

कुछ भी बेकार नहीं होता

बेदी साहब के लिए कोई चीज कभी बेकार नहीं होती थी। घर में कोई सामान आता तो उसके डिब्बे, लिफाफे, गत्ते आदि सब बेदी साहब के पास आ जाते। यहाँ मोटे गत्तों को काटकर सीधा कर लिया जाता और उनके फाइल-कवर बना लिए जाते। दीपावली पर पटाखों के छोटे-बड़े डिब्बों का ढेर लग जाता। उन सबको बड़े धैर्य के साथ काटकर संस्थान के कार्यों में उपयोग किया जाता। यहाँ तक डाक में जो लिफाफे आते थे, उनको बड़ी तरतीब से उलटकर पुनः चिपकाकर संस्थान की डाक भेजने में उपयोग कर लिया जाता। मेरी जानकारी में डाक के लिए नए लिफाफे उन्होंने कभी नहीं खरीदे। यह विद्या उन्होंने हम सबको भी सिखा दी थी।

एक बार ऐसा ही एक मजेदार वाकया पेश आया। बेदी साहब अपने छोटे पोते अजय बेदी को लेकर राजौरी गार्डन के पार्क में कुछ वनस्पनियों के फोटो खींचने के लिए गए। जून की भरी दोपहरी में फोटो शूट करते हुए पोता और हमारा एक चित्रकार साथी धूप से व्याकुल हो गए तो पोते ने कहा, ‘‘पापाजी, गरमी बहुत है, आइसक्रीम खाते हैं।’’ और पोता सड़क पर जाकर आइसक्रीम की कटोरियाँ ले आया। आइसक्रीम खाई गई। पोते ने आइसक्रीम खाकर प्लास्टिक की कटोरी फेंक दी और जूते से दबाकर वह उसे तोड़ना ही चाहता था कि बेदी साहब ने रोक दिया, ‘‘रुको बेटा!’’ और कटोरी उठाकर अपने कुरते की जेब में रख ली, फिर अपनी भी रख ली। इस पर पोता थोड़ा बिगड़ते हुए बोला, ‘‘पापाजी, इस पर लिखा है कि आइसक्रीम खाने के बाद इसे क्रश कर दें। यह बेकार है।’’ ‘‘नहीं बेटा’’, बेदी साहब बोले, ‘‘कोई चीज बेकार नहीं होती। हम इन्हें धोकर इनमें आलपिन रख लेंगे।’’ और ऐसा ही हुआ, वहाँ से आकर उन्हें धो-सुखाकर उनमें आलपिन भर ली गईं। वे डिब्बियाँ भी संस्थान का हिस्सा बन गईं।

सेवा के बदले सेवा

बेदी शोध संस्थान मैं साइकिल से ही आया-जाया करता था। मेरी साइकिल भी बिल्कुल खटारा थी, बस चक्के सही-सलामत थे, ब्रेक नहीं थे। संस्थान के बाहर के कामकाज, जैसे बाजार से स्टेशनरी लेने जाना, पोस्ट ऑफिस, बैंक इत्यादि के लिए रिक्शा से जाना होता था, रिक्शा का भाड़ा संस्थान के दैनिक खर्च में जोड़ा जाता था। कोठीवाला पॉश इलाका होने के कारण रिक्शा जल्दी मिलता नहीं था, काफी-काफी देर इंतजार करना पड़ता था, सो इन कामों में भूपसिंहजी मेरी साइकिल का उपयोग कर लिया करते थे। दो महीने जब दैनिक खर्च में रिक्शा-भाड़ा नहीं लिखा गया तो बेदी साहब का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने भूपसिंहजी से पूछा, ‘‘आजकल बाजार जाना नहीं होता क्या?’’

भूपसिंह ने बताया, ‘‘हाँ पापाजी, बाजार जाना होता है।’’

‘‘परंतु तुमने रिक्शा-भाड़ा तो लिखा ही नहीं है, फिर कैसे जाते हो?’’

‘‘जी पापाजी, वो मैं शर्माजी की साइकिल ले जाता हूँ, वे मना नहीं करते।’’

‘‘देखो भूपसिंह, शर्माजी की अपनी व्यक्तिगत साइकिल है, उसे तुम संस्थान के कामों में इस्तेमाल करते हो। यह गलत है। क्या यह तुम्हारे लिए ज्यादा सुविधाजनक है? यदि ऐसा है तो हम उनकी साइकिल मुफ्त में इस्तेमाल नहीं करेंगे। हम हर महीने शर्माजी को ५० रुपए मेंटीनेंस के रूप में देंगे।’’ और फिर मेरे बहुत मना करने के बावजूद बेदी साहब ने उसी महीने से ५० रुपए मेरे वेतन में जोड़ दिए। निशुल्क कोई भी सेवा उन्हें स्वीकार्य नहीं थी।

दया-मया से परे

इस घटना से आप यह न समझ लें कि बेदी साहब बहुत दयालु थे। वे दया-मया से परे एक सिद्धांतप्रिय इनसान थे। भारत विभाजन के समय उन्होंने भी काफी परेशानियाँ झेली थीं। सरकारी सेवा में रहते हुए भी उन्हें अपना परिवार लेकर इधर-उधर भटकना पड़ा था। आजकल उनकी बड़ी पुत्रवधु यानी श्रीमान नरेश बेदी की पत्नी श्रीमती वंदना बेदीजी घर की संचालक थीं। वे बड़ी उदारमना, दयालु, दूसरों की मदद में तत्पर रहनेवाली एक कुशल मैनेजर थीं। घर का रसोइया रामू भी घरेलू सामान के लिए बाजार आता-जाता था, सो जल्दी के चक्कर में वह भी मेरी साइकिल का उपयोग कर लिया करता था। एक दिन वह बाजार गया तो रोकते-रोकते भी साइकिल किसी के ऊपर चढ़ गई, चूँकि साइकिल में ब्रेक ही नहीं थे। लोगों ने उसकी पिटाई कर दी। घर आकर गुस्से में उसने सारी घटना मैडम (वंदनाजी) को बताई। मैडम ने उसे दिलासा दी कि जो हुआ सो हुआ, मैं कुछ करती हूँ। उन्होंने भूपसिंहजी को बुलाकर कहा कि पापाजी (बेदी साहब) से कहो कि शर्माजी की साइकिल ठीक करवा दें। भूपसिंहजी ने पापाजी से कहा तो वे बोले, ‘‘वंदना से कहो, हम शर्माजी को ५० रुपया महीना देते हैं। साइकिल ठीक रखना शर्माजी की जिम्मेदारी है। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।’’

वंदनाजी ने सारी बात सुनी तो बोलीं कि शर्माजी क्यों ठीक कराने लगे? वे इस स्थिति में होते तो साइकिल को ऐसी रखते ही क्यों? भूपसिंह, आप ऐसा करो, अभी इसी समय इसे किसी मिस्त्री को देकर आओ, और कहना कि इसमें जो-जो खराब है, सब बदल दे, पर यह बात पापाजी को पता नहीं लगनी चाहिए। भूपसिंह उसी समय रमेश नगर में साइकिल एक मिस्त्री के पास डाल आए। उसने इसमें चार सौ रुपए का सामान डाल दिया, जबकि इतने रुपयों में एक अच्छी हालत की साइकिल आ जाती, लेकिन साइकिल नई के माफिक हो गई। वंदनाजी ने रुपए दे दिए। पर उन्होंने कभी ऐसा भाव नहीं दिखाया कि मेरे लिए कुछ किया है। वे बहुत परोपकारी हैं। पर बेदी साहब यों ही न किसी को कुछ देते और न लेते थे। एकदम व्यावहारिक और सिद्धांत पर अटल!

सरस्वती के एकनिष्ठ उपासक

बेदी साहब लगभग सोलह-सत्रह घंटे काम करते थे। सेवा-निवृत्ति के बाद जब से वे बेदी वनस्पति कोश के प्रणयन में जुटे, सरस्वती की उपासना में ही लीन रहते थे। घर में कोई हारी-बीमारी, शादी-समारोह में जाना-आना से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। यहाँ तक कि घर में कोई रिश्तेदार या मिलने-जुलनेवाला कोई आता था, तो उनसे दो मिनट से ज्यादा वार्त्तालाप नहीं करते थे। बल्कि बड़ी निष्ठुरता से कह दिया करते थे कि ‘अच्छा तो अब आप जाएँ, मुझे बहुत काम करना है।’ वे अपने कमरे या अध्ययन-कक्ष में लेखन में व्यस्त ही दिखाई पड़ते थे। हमारे साथ दिनभर काम करते, दोपहर में भोजन करने नीचे जाते और घंटाभर में वापस आ जाते। साल-दर-साल कोठी तो क्या, वे अपने कमरे से भी बाहर नहीं निकले थे। उनके बड़े बेटे नरेश बेदी उनकी बहुत फिक्र किया करते थे। जब कहीं शूटिंग नहीं हो रही होती और वे घर पर होते तो दिन में एक बार हमारे ऑफिस में पापाजी तथा हमारा हाल-चाल पूछने जरूर आया करते थे। वे बहुत कम बोलते थे, लेकिन उनका शारीरिक सौष्ठव और व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था। वन्य जीवों पर बनी उनकी अधिकतर डॉक्यूमेंटरी फिल्मों को बड़े-बड़े पुरस्कार मिले। लगे हाथ बता दूँ कि बेदी साहब केदोनों बेटे नरेश बेदी व राजेश बेदी अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फोटोग्राफर हैं तथा वाइल्ड लाइफ पर डॉक्यूमेंटरी फिल्में बनाते हैं। बी.बी.सी. का चैनल चार उनके लिए रिजर्व था। शूटिंग के चलते लंबे समय तक भारत से बाहर ही रहते थे। ‘बेदी फिल्म’ के नाम से राजौरी गार्डन में उनका अलग ऑफिस था।

मजदूरी समय पर देने के पाबंद

बेदी साहब ने अपने फंड आदि बचत का लाखों रुपया बेदी वनस्पति कोश के प्रणयन पर खर्च कर दिया। वे उसूल के पक्के थे। जब हम पहली तारीख को प्रातः उपस्थिति दर्ज करने के लिए रजिस्टर उठाते तो सबसे पहले उसमें हमें अपने वेतन के चेक रखे हुए मिलते। रात को चेक बनाकर वे प्रातः वहाँ रख दिया करते। जब वे बीमार होकर अस्पताल में होते तो भी वेतन के चेक ३० तारीख को ही भिजवा दिया करते। मेरे कार्य-काल में वेतन देने में कभी विलंब नहीं हुआ था। हाँ, बाद के दिनों में जब बेदी साहब के बैंक एकाउंट में पैसा खत्म हो गया तो नरेश बेदीजी ने हमारे वेतन तथा संस्थान के खर्च की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उनका वर्क-शिड्यूल बड़ा टाइट रहता था। उनकी व्यस्तता के चलते वेतन ५-६ तारीख को मिल पाता था, वह भी रिमाइंडर देने के बाद।

एक बार यह बात पापाजी को पता चल गई कि संस्थान के कर्मियों का वेतन समय पर नहीं मिल रहा है, तो उन्होंने कोई लिहाज न करते हुए अपने बेटे को फटकार लगाई, ‘‘नरेश, यह मैं क्या सुन रहा हूँ? मेरे बच्चों (यानी हम कर्मचारियों) को अभी तक वेतन नहीं मिला है। तुम्हारे ऑफिस में चाहे जो चलता हो, पर मेरे संस्थान में वेतन पहली तारीख को हर हालत में मिल जाना चाहिए। मेरे बच्चे वेतन के लिए तुम्हारे पीछे नहीं घूमेंगे। तुम ऐसा नहीं कर सकते हो तो कुछ लाख रुपए मेरे अकाउंट में डाल दो। बस, मैं कोई दलील सुनना नहीं चाहता।’’ उस दिन हम लोगों ने पहली बार देखा कि जिस बेटे को वे अतिशय प्यार करते थे, उस पर बेहिसाब बिगड़े।

अनन्य पशु-प्रेमी और हिमायती

बेदी साहब जड़ी-बूटी विशेषज्ञ होने के साथ-साथ जंतुप्रेमी भी कमाल के थे। इस कोठी का परिसर एक छोटा-सा चिडि़याघर ही था। इसमें झरना था, झील थी, जिसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ तथा कछुए किलोल करते थे। कोठी की पूरब दिशा में मैना, तोता आदि पक्षियों के प्राकृतिक आवास जैसे घोंसले थे। कोठी के एक ओर बने दड़बों में कई साँप तथा एक अजगर भी था। अजगर को लेकर घर का रसोइया रामू बड़ा दुखी रहता था, उसके भोजन के लिए उसे चूहे पकड़कर लाने पड़ते थे। पाँच-छह तरह के छोटे-बड़े कद के और अलग-अलग नस्ल के कुत्ते थे, जो भोंक-भोंककर रोज ही हमारा स्वागत करते थे। पहले तो तेंदुए का एक शावक भी पाला हुआ था। एक लोमड़ी भी थी, जिसकी शरारतों से आजिज आकर उसे बेदी फिल्म्स के ऑफिस में छोड़ दिया गया था। वहाँ भी वह अपनी हरकतों से बाज न आती थी। मौका मिलते ही वह चमड़े के बैग, जूते आदि उठा ले जाती थी। भोजनावकाश में हम अकसर मैना से बातें किया करते, हम जैसा और जो बोलते, वह वैसा ही बोलती थी।

इनके साथ-साथ कोठी के लॉन तथा चहारदीवारी के गिर्द अनेक तरह की जड़ी-बूटियों के पेड़-पौधे तथा लताएँ फैली थीं। जनवरी का महीना था, कड़ाके की ठंड तथा कुहरा पड़ रहा था। एक दिन प्रातः जब हम ऑफिस पहुँचे तो देखा, कोठी में शोक सा छाया हुआ है। पता चला कि रात अजगर चल बसा। बेदी साहब ने बड़े दुःखी मन से अपने आँखों की कोरों को पोंछते हुए बताया कि अभागे का रात पिंजड़ा खुला रह गया, वह लॉन में टहलने निकल आया, कड़ाके की ठंड में अपनी जान गँवा बैठा। अरे, अभी था ही कितने दिन का, बच्चा ही तो था! बेदी साहब बहुत दुखी थे। हमने देखा, लगभग दो मीटर लंबा और मेरी कलाई से भी मोटा अजगर उलटा पड़ा था, उसकी सफेद त्वचा धूप में चमक रही थी।

एक और वाकया है। लगभग जनवरी समाप्ति पर थी और अभी भी ठंड जवान थी। लगभग प्रातः के दस बजे मुलायम गुनगुनी धूप डरती-डरती सी फैल रही थी। सर्दियों में बेदी साहब कोठी के आगेवाले लॉन में बैठकर लिखा करते थे। मूढ़े तथा कुरसियाँ पास पड़ी रहतीं, लेकिन एक-दो कुत्ते उनके इर्दगिर्द जरूर बैठे रहते। एक दिन मुझे तथा भूपसिंह को फाइल लेकर वहीं बुला लिया। बेदी साहब टेबल के आगे कुरसी पर बैठे थे। दो मूढ़ा पड़े थे, एक पर लंबे कानोंवाला छोटा कुत्ता लेटा हुआ था। थोड़ा हटकर बरामदे में दो कुरसियाँ रखी थीं। मैं एक मूढ़े पर बैठ गया। भूपसिंह ने ‘किट-किट’ कर कुत्ते को भगा दिया और मूढ़े पर बैठना ही चाहते थे कि बेदी साहब ने लिखना रोककर गरदन ऊपर उठाई और भूपसिंह को खूब लताड़ा, ‘‘अरे, ये तुमने क्या किया, बच्चा कितने आराम से धूप सेंक रहा था, तुमने उसे क्यों भगाया? तुम दूसरी कुरसी नहीं ले सकते थे क्या? जानवरों को ऐसे सताता है कोई!’’ और भी बहुत कुछ कहा। यह सब सुनकर मैं तो सन्न रह गया और भूपसिंह को काटो तो खून नहीं।

इतना ही नहीं, जब वे ऊपर अपने ऑफिस में बैठे लिख रहे होते थे, तो एक-दो कुत्ते रोजाना वहाँ भी उनका हाल-चाल लेने जरूर आते। बेदी साहब हाथ रोककर उनसे बातें करते और कहते, ‘बच्चो, जाओ नीचे जाकर खेलो, अब मुझे काम करने दो।’ और वे पूँछ हिलाते इठलाते आज्ञाकारी बालक की तरह नीचे चले जाते। जानवरों से वे दिल से प्यार करते थे। अपनी किसी एक पुस्तक के समर्पण में उन्होंने लिखा भी है—

‘वे चाहे कितने ही हिंस्र और खूँखार हैं

खंजर सरीखे दाँतों से लैस हैं

फिर भी मैं उनकी कद्र करता हूँ।

कला (हुनर) के पारखी

बेदी साहब के मार्गदर्शन में लगन से कार्य करते हुए मैं शीघ्र ही संस्थान के कार्यों, कार्य-पद्धति, संदर्भ-ग्रंथों से परिचित हो गया। विगत आठ वर्षों से बेदी साहब और उनके सहायक अंधी सुरंग में काम कर रहे थे। किसी को नहीं पता था कि पुस्तक का स्वरूप क्या होगा और किस प्रकार सामने आएगा, बस फाइलों की संख्या-वृद्धि करते चले जा रहे थे, कोश-कार्य कोई फाइनल स्वरूप नहीं ले पा रहा था। आपको बताता चलूँ कि इनमें कोई भी व्यक्ति न तो प्रोफेशनल था और न ही इस कार्य से संबंधित, ज्यादातर अपनी सरकारी नौकरी लगने की प्रतीक्षा करते हुए केवल खर्च चलाने के लिए यह कार्य कर रहे थे। जैसा और जो बेदी साहब कहते, वैसा वे करते चले जा रहे थे, बिल्कुल लकीर के फकीर।

एक दिन मैं अपने आप को रोक नहीं पाया तो टोक ही दिया, ‘‘पापाजी, आखिर इसको पुस्तक का आकार कब देंगे? इसका फॉण्ट साइज, पेज का साइज, उप-शीर्षक आदि का क्या साइज निश्चित किया है? जो प्रिंट निकलता है, अगले दिन उसमें आप नई प्रविष्टियाँ जोड़ देते हैं। ऐसे तो यह कार्य अनंतकाल तक चलता रहेगा।’’ हालाँकि उनके बेटे भी पहले यह सलाह दे चुके थे, पर बेदी साहब ने कभी कान नहीं दिए। पर मेरी बात उनकी समझ में आ गई, बोले, ‘‘ऐसा है तो आप जैसा चाहते हैं, वैसा एक पेज सेट करवाकर लाओ।’’ कंप्यूटर का कार्य ‘बेदी फिल्म्स’ के ऑफिस में होता था, जो पार्क के दूसरी ओर स्थित है। वहाँ जाकर मैंने पेज सेट कराया तो पुरानेवाले पाँच पृष्ठों का मेरा एक पेज बना। पौधों के लैटिन या बॉटेनिकल नाम लिखने की पद्धति मैं सीख चुका था। किसी भी वानस्पतिक नाम के तीन भाग होते हैं—पहला जीनस (गण), दूसरा स्पशीज (प्रजाति), तीसरा इन्वेंटर (खोजकर्ता)। पहले भाग का पहला अक्षर कैपिटल लैटर से, दूसरा भाग लोअर केस से, मगर दोनों बोल्ड तथा तीसरे भाग का पहला अक्षर कैपिटल तथा नाम लाइट टाइप में लिखने का नियम है। यह बॉटनी लिखने की अंतरराष्ट्रीय पद्धति है। मैंने उसी के अनुसार पेज बनवा दिए और प्रिंट लाकर बेदी साहब को दिखाया।

पेज देखते ही बेदी साहब तो अचरज में पड़ गए, खुशी के मारे आँखों में पानी झलमलाने लगा। सभी को अपने कमरे में बुलाकर बोले, ‘‘देखो, किताब तो बिल्कुल ऐसे ही बनती है। सुनो, अब से शर्माजी के निर्देशन में काम होगा। बिल्कुल इसी पैटर्न पर काम करेंगे।’’ मगर इस पैटर्न से ऑपरेटर दुःखी हो गया। पहले दिनभर के काम के उसके २५ पेज गिने जाते, वहीं अब ये पाँच पेज गिने जाते। इसके बाद दो ऑपरेटर और रखे गए। कार्य युद्ध-स्तर पर शुरू हुआ। ऑपरेटरों को लगातार काम देने के लिए मुझे महीने के चार इतवार भी लगाने पड़े। पूरे तीस दिन काम किया। इसके साथ प्रूफ-रीडिंग का काम भी निरंतर चलता रहा।

बेदी साहब की पारखी नजर का एक और उदाहरण आपको सुनाना चाहता हूँ। वे व्यक्ति के हुनर की कद्र करते थे। एक बार संस्थान में कागज आदि काटने के लिए मैं एक लड़का लेकर आया। इसका नाम था राजकुमार लोहिया। यह दिल्ली के रंजीत नगर में रहता था। गृह-क्लेश से परेशान था। घर में रोटी का सबाल सबसे बड़ा था। ज्यादा पढ़-लिख न पाने के कारण वह बेकार इधर-उधर घूमा करता था। लेकिन उसकी ड्राइंग बहुत अच्छी थी। यह कला उसे ऊपरवाले ने खुश होकर बख्शी थी कि बैठे हुए व्यक्ति की हूबहू तस्वीर बना देता था।

एक दिन उसने कागज काटते हुए कागज के उल्टी साइड पेन से एक पुष्पगुच्छ बनाया। वह किसी तरह बेदी साहब के हाथ लग गया। उन्होंने मुझे बुलाकर वह दिखाया और फिर बोले, ‘‘शर्माजी, इस लड़के का हाथ बड़ा साफ है, इसके लिए ड्राइंग का सामान मँगवा दीजिए, इससे कुछ चित्र बनवाकर देखते हैं।’’ उसी दिन ड्राइंग के पेन, फट्टा आदि उसे लाकर दे दिए गए। राजकुमार ने गजब के चित्र बनाए। बस उसी दिन से वह आर्टिस्ट यानी चित्रकार बन गया, उसकी दुनिया बदल गई। बेदी साहब की सब पुस्तकों में उसी के बनाए हुए रेखाचित्र छपे हैं। मेरा वह बहुत सम्मान करता था, बल्कि आज भी करता है। गुरुदक्षिणा-स्वरूप उसने मेरी पुस्तकों के लिए भी बहुत सारे रेखाचित्र बनाए, जो प्रकाशित हुए हैं। वहीं रहते उसकी मनचाही लड़की से उसका विवाह हुआ। बेदी साहब की पारखी दृष्टि से गुजरकर आज वह अपने बाल-बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा है।

बहुमूल्य एवं उपयोगी नसीहतें

बेदी साहब के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से संबंधित संस्मरणों का मेरे पास अकूत खजाना है। इस पत्थर कोठी में अब भी बेदी साहब का जन्मदिन मनाया जाता था। घर के सब लोग, उनके मित्र तथा दोनों ऑफिस के सब लोग इसमें शामिल होते थे। एक बार उनकी जन्मदिन की पार्टी में गुरुकुल काँगड़ी के उनके हमउम्र पुराने मित्र भी आए हुए थे। पार्टी में समोसा, कचौड़ी, पकोड़े, गुलाबजामुन तथा कोल्ड ड्रिंक आदि सब था। बेदी शोध संस्थान की स्टाफ निशि त्यागी ने भोजन के प्रारंभ में ही गुलाबजामुन परोस दिए। बड़े जोशो-उल्लास से पार्टी संपन्न हुई, इसमें दोनों भाई नरेश बेदी और राजेश भी उपस्थित रहे। उस समय तो बेदी साहब ने कुछ नहीं कहा, लेकिन अगले दिन हम सबको अपने कमरे में बुलाकर समझाया कि भोजन की समाप्ति पर ही मिष्टान्न परोसा या खाया जाना चाहिए। चरक, सुश्रुत तथा अन्य निघंटुकारों ने भोजन के विषय में क्या-क्या कहा है, इस पर उन्होंने एक अच्छा-खासा व्याख्यान दिया। चरक संहिता के बोले गए एक श्लोक की याद रही यह अर्धाली मुझे आज भी नसीहत देती है, ‘...भोजने प्रथम कषाये मधु समाप्ते।’

बेदी साहब ऊँच-नीच को बिल्कुल नहीं मानते थे। जब वे भोजनावकाश में या अन्य कारण से नीचे जाते तो हम सबके चाय के जूठे गिलास खुद उठाकर ले जाते थे, जबकि इस कार्य के लिए कई-कई नौकर-नौकरानियाँ मौजूद होते थे। विश्वप्रसिद्ध व्यक्तित्व नरेश बेदी भी ऐसा ही करते थे, बल्कि कभी-कभी हम उन्हें मेन गेट की डस्टिंग करते हुए देख दंग रह जाते। बेदी साहब किसी कर्मचारी की टेबल पर जाकर ताका-झाँकी नहीं किया करते थे। छोटे से छोटा काम, यहाँ तक कि परची पर गोंद कितना और कैसे लगाना, यह भी सबको बताते थे।

पुस्तकों के नामकरण

‘बेदी वनस्पति कोश’ बेदी साहब की जीवन भर की तपस्या तथा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने अपना पूरा साहित्य हिंदी में लिखा। वे बॉटनी जैसे विषय को हिंदी में लेकर आए। रंगीन तथा श्याम-श्वेत चित्रों के साथ यह कोश छह खंडों में किताबघर प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। पुस्तकों को शीर्षक देने में बेदी साहब का कोई सानी नहीं था। बच्चों की पुस्तकों में ‘अमर हो गया मगर’, ‘तेंदुए ने इनसान के बच्चे को पाल लिया’, ‘हाथी के पैर का ऑपरेशन’, ‘लैला की उँगलियाँ, मजनू की पसलियाँ’, ‘प्रचंड धावक चीता’ आदि-आदि। उनकी पुस्तक ‘साँपों का संसार’ तो इस विषय का इनसाइक्लोपीडिया ही है, जिसको पढ़कर अनेक लोग साँप पकड़ना सीख गए। एक बार तो राजस्थान के बाड़मेर के पास का एक व्यक्ति जब किसी भी तरह के साँप पकड़ने में माहिर हो गया तो नारियल आदि लेकर बेदी साहब की गुरुपूजा करने के लिए वहाँ से चलकर पत्थर कोठी आ पहुँचा था।

अद्भुत जीवटता के धनी

वर्षों तक उनके साथ काम करते हुए मैंने उनके बहुत सारे रंग देखे, पर एक रंग उनका सबसे चटख है—अद्भुत जीवटता का। जब वे गंभीर रूप से बीमार हो जाते, अस्पताल में भरती के दौरान मरणासन्न स्थिति में पहुँच जाते, घरवाले भी उम्मीद छोड़ बैठते। हालत इतनी गंभीर हो जाती कि चेहरा सूजा हुआ, सूजी हुई आँखों से निरंतर पानी गिरता रहता, बीच-बीच में जब होश आ जाता, तो न जाने कब अखबार पढ़ लेते और काम की खबर काटकर रख लेते। जब भूपसिंहजी उनसे मिलने जाते तो अपने तकिए के नीचे से जीव-जंतु या वनस्पति से संबंधित अखबार की कोई कटिंग निकालते और टूटे-फूटे शब्दों में कहते, ‘इसे फाइल में जरूर लगा देना, आगे कभी काम आएगी।’ एक बार नहीं, कई बार उन्होंने मौत से दो-दो हाथ कर बेदी वनस्पति कोश के कार्य को पूरा किया।

जब एक-दो खंड ही प्रकाशित हुए थे तो उन्हें अपने सामने की अलमारी में रखे देखते हुए बड़े खुश होकर कहा करते थे—शर्माजी, जब सारे खंड छप जाएँगे तो यहाँ रखे कितने सुंदर लगेंगे! तब हम कहा करते, ‘पापाजी, तब तो वह नजारा देखने लायक होगा और इसमें अब ज्यादा समय नहीं लगेगा। वास्तव में आपने अद्वितीय काम किया है।’ यह सुनकर बेदी साहब की आँखों की कोर खुशी के आँसुओं से भीग जातीं। फिर और भी खुश होते हुए अपनी बॉटनी की साहित्यिक भाषा में कहते, ‘‘लेखक तो प्रशंसा के पादप होते हैं, उन्हें प्रशंसा के जल से जितना सींचा जाता है, उतने ही वे पुष्पित-पल्लवित होते हैं।’’

स्मृतियाँ बहुत हैं, कहाँ तक सुनाऊँ! बेदी वनस्पति कोश का प्रोजेक्ट पूरा होने पर मैं उन्हें बिना बताए ही संस्थान छोड़कर आया था, वे मुझे आने ही न देते थे। फोरेस्टरी पर एक ‘बेदी वानिकी कोश’ भी तैयार कर रहे थे, जो अधूरा ही रह गया। महीनों तक मेरा इंतजार करते रहे, भूपसिंह को मेरे घर दौड़ाते रहे। मेरे संस्थान छोड़ने के एक वर्ष बाद वे इस संसार को अलविदा कह गए। मैं उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ और बार-बार उनसे क्षमा माँगता रहा। विद्वान् लोगों ने ‘शिष्य’ शब्द के मायने बताए हैं—‘जो गुरु से प्राप्त विद्या को सहस्र गुना बढ़ाए, उसका प्रसार करे, वही है शिष्य।’ मैं आज भी बेदी साहब का शिष्य बनने की कोशिश कर रहा हूँ।

प्रेमपाल शर्मा
जी-३२६ अध्यापक नगर,
नांगलोई, नई दिल्ली-११००४१
दूरभाष : ९८६८५२५७४१

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