सामाजिकता

बूढ़ी-बूढ़ी साथ रहते थे निसंतान, दोनों अल्पभाषी और गैर-मिलनसार। उनकी इमारत के अन्य फ्लैटवाले उन्हें आते-जाते आदर से नमस्कार करते। वे जवाब देकर चुप ही रह जाते। न किसी से अधिक बोलते, न ही कोई संबंध रखते। फिर भी कुछ उनकी उम्र का लिहाज कर तो कुछ उनके कम बोलने की वजह से ही उनकी ज्यादा इज्जत करते।

बूढ़ा सत्तर का था, पर बासठ की बुढि़या का भरपूर खयाल रखता। बूढ़ी अकसर बीमार रहती, ठीक से चल-फिर भी नहीं पाती। बूढ़ा हमेशा तत्पर उसे डॉक्टर के पास ले जाने और इलाज करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। पेंशन अच्छी-खासी थी, इसलिए किसी प्रकार का आर्थिक संकट भी नहीं था।

लेकिन आपदा आ गई। इस बार बूढ़ा अस्वस्थ हो गया। अस्वस्थ ही नहीं, चक्कर खाकर गिर गया और बेहोश हो गया। बूढ़ी परेशान कि किसे मदद को बुलाए? खुद तो कुछ कर नहीं सकती थी। औरों से हरदम अलगाव ही बनाए रखा था।

अंततः वही हुआ। जोर-जोर से रोने लगी। तुरंत ऊपर-नीचे के फ्लैटवाले दौड़े-भागे आए। मुँह पर पानी के छींटे मारे। बूढ़ा था कि फिर भी अचेत। किसी ने कोई उपाय किया, किसी ने कोई। फायदा नहीं हो पा रहा था।

तभी नीचे के फ्लैटवाले ने आकर फूली साँस को काबू करते हुए कहा, ‘‘ले चलो इन्हें, मैंने कार निकाल ली है। डॉक्टर के पास ले चलते हैं।’’

बूढ़े को हॉस्पिटल ले गए। उनका बी.पी. बढ़ गया था। डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया। वे होश में आ गए थे। दवाइयाँ लिख दीं, जो उनके ऊपर के फ्लैटवाला खरीद लाया और फिर घर ले आए।

लगभग दस दिनों में बूढ़ा चंगा हो गया। बूढ़ी ने बड़े संकोच से अपने मन की बात कही, ‘‘देखा, हम सबसे रूखा व्यवहार करते रहे, पर समय आने पर वे ही काम आए।’’

बूढ़े के होंठों पर मुसकान थी और आँख में आँसू।

अशोक गुजराती
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