गडे़ मुरदे मत उखाड़ो...

गडे़ मुरदे मत उखाड़ो...

गडे़ मुर्दों को दफन ही रहने दो

इतिहास की, मजबूर बेजुबान धरोहरों से

गडे़ मुर्दे मत उखाड़ो!

इसके बजाय मृत, अर्धमृत

और जो जीवन में आ रहे उन्हें

ठिकाने लगाने, बचाने और

उन्हें जिलाने की तजबीज सोचो

पुरजोर कोशिशें करो

कि विश्व-इतिहास की ये धरोहरें

जीवनयात्रा में कभी किसी के बनाए

पड़ाव थे और हैं...

चलते रहने, आगे बढ़ने की गति

शक्ति और ऊर्जा देने के स्रोत

इन्हें इसने नहीं उसने...

नहीं-नहीं उन्होंने बनाया था,

इस व्यर्थ की खोज-बहस में

वक्त और शक्ति की बरबादी क्यों?

क्योंकि बीता वक्त

किसी नाम की खोज के साथ

वापस नहीं आएगा

हाँ, मन में एक फिजूल का

रोमांच जरूर जगा जाएगा।

कोई हो, कोई तो हो

भावनाओं के मानव-विश्व में

‘कोई’ हो अपना ‘कोई’ तो हो

किसी के अपना होने की प्रतीक्षा

यह चाह सनातन जरूरत है

जिंदगी के कुछ क्षणों में

दुख में आँसू पोंछने के लिए

हर्ष में बाँहों में भर गले लगाने को

सफलता पर पीठ थपथपाने को

कठिनाइयों, दुःचिंताओं में साझेदारी को

संदेशे देने, भेजने को

कोई हो...

‘समवन’ ‘समबडी’ तो सभी को मालूम हैं

पर अपना तो यह पक्का विश्वास है

कि हर भाषा में कोई के लिए शब्द होगा

इस भरी दुनिया में जब अपना कोई

नहीं मिलता है तो

प्रकृति के उपादान चाँद, सूरज, हवा, बादल,

पंखी-पखेरुओं का संसार

‘कोई’ बनते हैं

नल-दमयंती की प्रेम-कहानी नैषध चरित्र

मेघदूत पवनदूत भ्रमरगीत रचे जाते हैं

आज जब मोबाइल गूगल पर

संदेश और संदेशा देने-लेनेवाले मिलते हैं

‘कोई’ की दरकार अपनी जगह बनी जरूरत है

कभी-कभी किसी की उम्र ही कोई अपना

होने की प्रतीक्षा में निकल जाती है

और कभी-कभी जो किसी को कोई मिलता भी है

वह मन के जैसा नहीं होता, कहाँ होता है?

‘कोई’ कि अपना कोई तो होने की

चाहत की व्यथा विश्वव्यापी है।

इस व्यथा से थोड़ी राहत मिल सकती है

कि कोई न मिलनेवाला मनुष्य यह सोचे कि

वह स्वयं खुद के जीवन में किस-किसका

और कब-कब ‘कोई’ बना है? यह सोचना...

कोई न मिलने, न होने के तथ्य से साक्षात् होगा।

कौवों की शोकसभा

आज

मेरे बगल के ब्लॉक में

सृष्टि का युग्मराग

एक कौवे को अपने से

बाहर निकाल चला गया

कौवे चिल्ला रहे थे—ध्यान टूटा

‘क्या हुआ?’ देखने को कहा

स्नेह ने बताया—‘एक कौवा मर गया है

बहुत सारे कौवे मरने पर रो रहे हैं।’

मैं उठी तो देखी, अभी तक न देखी

कौवों की शोकसभा

कार पार्किंग के पास कौवा मरा पड़ा था

उसके चारों ओर जोर-जोर से

कौवे चिल्ला रहे थे

शायद किसी आदमजात को बुला रहे थे?

पर सारे फ्लैट खाली थे और चुप

अब असहनीय हो उठा था कागारोर

स्नेह ने पूछा, ‘इन्हें कुछ खाने को दूँ क्या?’

‘हाँ दो, पर ये खाएँगे नहीं।

डालकर तो देखो, एक रोटी है और ब्रेड ले लो

स्नेह! टुकडे़ कर डाल दो।’

स्नेह ने यही किया

थोड़ी देर में शोर शांत था...

अब न वहाँ रोटी-ब्रेड के टुकडे़ थे

न कौवे-पेट की भूख अंतिम सत्य

तभी वहाँ दो बिल्लियाँ आईं

मुझे लगा ये कौवे को खा लेंगी,

पर एक पास जाकर

दूसरी थोड़ी दूर से ही चली गई

शायद भरे पेट थीं?

वैसे भी सृष्टि के युग्मराग से

छूटे में क्या रहता, कौन साथ रहता है?

—मालती शर्मा
१०३४/१ मॉडल कॉलोनी, कैनाल रोड,
पुणे-४११०१६
दूरभाष : ०२०-२५६६३३१६

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