भगवान् श्रीबदरीनाथजी की आरती

भगवान् श्रीबदरीनाथजी की आरती

आप-हम जब भी श्री चार धाम यात्रा और दर्शन की बात करते हैं तो अमूमन हमारे दिमाग में भारत के चारों सीमा क्षेत्र में आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित परम पावन एवं पूज्य तीर्थ श्री बदरीनाथजी उत्तर में हिमालय शृंखला की चोटी पर, फिर पश्चिम में अरब सागर की गोद गुजराम में पूजित दर्शनीय व पूजनीय मंदिर श्री द्वारिकाधीशजी, उसके बाद धुर दक्षिण में हिंद महासागर में रचे-बसे परम पूज्य तीर्थ रामेश्वरम् और पूर्व में बंगाल सागर की लहरों एवं रेतीले टीलों पर विश्वपूजित तीर्थ श्री जगन्नाथजी के ही नाम आते हैं। उड़ीसा स्थित यह पावन धाम विश्व पर्यटन का केंद्र भी है। इन चारों तीर्थों की धाम धारणा में हमारे ऋषियों, तपस्वियों और मनीषियों ने चार धाम और भी जोड़ दिए। उन्हें भी धर्मभक्त भारतीय चार धमा की यात्रा ही मानते और तीर्थपूजा करते हैं। ये चारों धाम विशाल हिमालय में भारत के ठेठ उत्तर में स्थित हैं। चारों हैं—(१) श्रीबदरीनाथ (२) श्रीकेदारनाथ (३) जमुना नदी का उद्गम स्थल जमुनोत्तरी या यमुनोत्तरी और (४) विश्व पावनी माँ गंगा नदी का गोमुख या उद्गम स्थल गंगोत्तरी। इन्हें भी चार धाम मानकर इनका दर्शन व पूजन सारे भारत और विश्व में बसे भारतीयों द्वारा समय-समय पर किया जाता है। इस तरह दोनों चार धामों में परम पावन श्रीबदरीनाथ ही वह एक धाम है, जो दोनों समूहों में पूजा जाता है।

श्रीबदरीनाथ धाम के बारे में हम समय-समय पर कुछ विवादास्पद बातें सुनते हैं। उन बातों में मुख्य विमर्श यह सामने आता है कि श्रीबदरीनाथ मूलतः भारतीय जैन मंदिर था और भगवान् श्रीआदिनाथजी या ऋषभदेवजी की मूर्ति ही श्रीबदरीनाथजी की प्रतिमा है, जो पूजी जा रही है। भारत के हिंदू समाज ने एक जैन मंदिर को अपना मंदिर जैसे-तैसे बना लिया है। अपने जैन मित्रों से यह बात आजकल भी यदा-कदा मैं सुनता हूँ। इन पंक्तियों में यह बिंदु न तो विचार का है, न विमर्श का और न ही बहस का है। इस आलेख में मैं दूसरा बिंदु प्रस्तुत कर रहा हूँ। सौभाग्य से और प्रभु की कृपा से मैं स्वयं सपत्नीक एवं सपरिवार दो-तीन बार हिमालय वाले चारों धामों का दर्शन कर चुका हूँ। वहाँ के पंडों, पुजारियों, बस्तीजनों और अन्य निवासियों तथा गाइडों से तरह-तरह की जानकारियाँ सदैव मिलती रही हैं। कैसी भी प्राकृतिक तबाहियाँ आईं, पर चारों धामों के मूल स्वरूप को व्यवस्था और व्यवस्थापकों ने सुरक्षित रखा, बचाया तथा सोच-समझकर सँवारा-सजाया, यह गर्व की बात है। छोटे-बडे़ सामयिक बदलाव और निर्माण होते रहते हैं, पर मूल जस-का-तस है। जो भी जाता है श्रद्धा और भक्ति से, पुण्य कमाकर आता है। किंवदंतियाँ हजारों, पर मूल कथानक हजारों वर्षों से वही चला आ रहा है।

इस बार मेरे एक पत्राचारी सुपरिचित मित्र श्री केशव चंद्र एम. शर्मा (जिनका पता है—१/८ नीलम पार्क, बापू नगर, अहमदाबाद-२४ (गुजरात) दिनांक २५-१२-२००१ (यानी बड़ा दिन, त्योहार क्रिसमस) पर वहीं श्रीबदरीनाथ धाम में थे। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयीजी का जन्मदिन उन्होंने वहीं मनाया। श्री शर्माजी ने मुझे २५-१२-२०१७ वहीं से एक पत्र लिखा। उस पत्र में (जो मेरे पास सुरक्षित है) उन्होंने मुझे जो लिखा, वह मेरे लिए नई बात नहीं थी। यह बात मैं अपनी स्वयं की यात्राओं में सुन चुका हूँ। वे लिखते हैं कि भगवान् श्रीबदरीनाथ की आरती, जो वहाँ पूरी श्रद्धा से गाई जाती है, वह आरती एक मुसलमान भक्त द्वारा लिखी गई है। उस भक्त का मूलनाम फखरुद्दीन था, पर उसकी लिखी आरती जब मंदिर में गूँजने लगी, तब उसने अपना नाम बदलकर बदरुद्दीन कर लिया। फखरुद्दीन जब १८ वर्ष की उम्र में उत्तराखंड के चमोली जिले के नंद प्रयाग में पोस्ट मास्टर था। नंद प्रयाग में ही वह निवास करता था। उसने सन् १८६५ में मात्र १८ वर्ष की आयु में यह आरती लिखी। इस लिहाज से गणित कहता है कि फखरुद्दीन का जन्म सन् १८४७ होता है। श्री फखरुद्दीन का निधन पूरे १०४ वर्ष की उम्र में सन् १९५१ में हुआ। वे जब तक जिए, तब तक बदरी केदार समिति के सदस्य रहे। उनके परिवार वाले आज भी बदरीनाथ में रहते हैं। ‘बदरीनाथ माहात्म्य’ नामक पुस्तिका में इसका उल्लेख है। श्री बदरुद्दीन के पौत्र का कहना है कि पहले श्री बदरीनाथजी के मंदिर की दीवार पर यह आरती लिखी गई थी, ताकि लोगों को याद रहे। दीवार पर पढ़कर लोग इस आरती को गाते थे। गंगा-जमुनी संस्कृति का यह बेजोड़ उदाहरण है। यह सारी जानकारी गुजराती अखबारों में प्रकाशित हुई थी। भगवान् बदरीनाथ की यह आरती है—

श्रीबदरीनाथजी की आरती

पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम्।

निकट गंगा बहत निर्मल, श्रीबद्रीनाथ विश्वंभरम्॥ १॥

शेष सुमिरन करत निशिदिन, ध्यान धरत महेश्वरम्।

श्रीवेद ब्रह्मा करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वंभरम्॥ २॥

इंद्र चंद्र कुबेर दिनकर धूप दीप निवेदितम्।

सिद्धि मुनिजन करत जै जो, श्रीबद्रीनाथ विश्वंभरम्॥ ३॥

शक्ति गौरी गणेश शारद नारदमुनि उच्चारणम्।

योग ध्यान अपार लीला श्रीबद्रीनाथ विश्वंभरम्॥ ४॥

यक्ष किन्नर करत कौतुक गान गंधर्व प्रकाशितम्।

श्रीलक्ष्मी कमला चँवर डोलें श्रीबद्रीनाथ विशंभरम्॥ ५॥

कैलास में देव निरंजन शैल-शिखर महेश्वरम्।

राजा युधिष्ठिर करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वंभरम्॥ ६॥

श्रीबदरीनाथजी की परम स्तुति यह पढ़त पाप विनाशम्।

कोटि तीर्थ सुपुण्य सुंदर सहज अति फलदायकम्॥ ७॥

 

हमारे देश में यह कोई विचित्र प्रसंग नहीं लगता। महाकवि रसखान, कवि श्रेष्ठ रहीम, महाकाव्यकार मलिक मोहम्मद जायसी जैसे अनेक मुसलिम कवि-गीतकार हमारे मंदिरों, मठों, आश्रमों में गाए जाते हैं। इस सदी का एक जीवित नाम है—कवि भाई श्री अब्दुल जब्बार, जो चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) के निवासी हैं और पिछले ५० वर्षों से हिंदी कवि-सम्मेलनों के मंच पर सुसम्मानित हैं। उनका लिखा ‘गंगा-गीत’ ‘निर्मल नीर गंगा का’ आज भी हरिद्वार तीर्थ में हरकी पौढ़ी पर अकसर गाया-बजाया, सुना और सुनाया जाता है। हमारी संस्कृति में साहित्य का शिखर सर्वोपरि है। एक महाकवि ने ठीक ही लिखा है, ‘‘ऐसे मुसलमान पर कोटिन हिंदू बारिये।’’

जब कभी भी आप हिमालय के अपने चार धामों की यात्रा पर पधारें तो स्व. बदरुद्दीन (मूलतः स्व. फखरुद्दीन) के परिजनों से मिल सकते हैं।

भगवान् बदरीनाथ आपका मंगल करें। शुभम्!

बालकवि बैरागी
कविनगर, पोस्ट मनासा,
जिला-नीमच-४५७९९० (म.प्र.)
दूरभाष : ०९४२५१०६१३६

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