कर्नाटक विधानसभा चुनाव

कर्नाटक विधानसभा चुनाव ने देश में एक नया रंग दिखाया। पंजाब के अतिरिक्त वही एक बड़ा राज्य है, जहाँ कांग्रेसी शासन था। भाजपा उसको अपने लिए दक्षिण का एक मुख्य द्वार मान रही थी। कांग्रेस का गुजरात में अच्छा प्रदर्शन रहा था; बाद में राजस्थान में लोकसभा के उपचुनाव में दो सीटें और विधानसभा की एक सीट जीतने के बाद कांग्रेस में एक नई आशा का संचार हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भी तेवर बदले। उन्हें उम्मीद होने लगी कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, जहाँ इस वर्ष के अंत तक चुनाव होने हैं, वे सत्ता हासिल कर सकेंगे। इस सबका असर २०१९ के आम चुनाव पर होगा और यह आशा पनपने लगी कि राहुल गांधी के नेतृत्व में और विरोधी दलों की सहायता से केंद्र में सत्ता-परिवर्तन संभव है। कर्नाटक चुनाव पर सभी की आँखें लगी थीं कि वहाँ की जीत या हार २०१९ के आम चुनावों के संभावित नतीजों की ओर इशारा करेगी। कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तरह-तरह की कोशिशें कीं कि कांग्रेस की सरकार पुनः सत्ता में आए। उधर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी वहाँ डेरा डाल दिया और कांग्रेस को अपदस्थ करने की रणनीति निर्मित की। तीनों दल अपनी-अपनी जीत का दावा करते रहे। कांग्रेस अपनी सरकार न बचा सकी और भाजपा की १०४ सीटों की जीत के बाद बढ़त पर विराम लग गया। कांग्रेस केपास ७८ और जे.डी.एस. के ३७ सदस्य हैं। ऐसे में जनता दल (सेकुलर) की चाँदी है, वह यह मानकर चल रही थी कि दोनों ही उसका समर्थन माँगेंगे।

पहले भी २००४ में ऐसी त्रिशंकु विधानसभा बनी थी और जे.डी.एस. ने कांग्रेस व भाजपा केसाथ मिलकर सरकार बनाई। उस समय सिद्धरमैया, जो अब तक कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, जे.डी.एस. की ओर से उपमुख्यमंत्री नियुक्त हुए थे। देवगौड़ा और कुमारस्वामी से अनबन हो जाने पर सिद्धरमैया हटा दिए गए और वे कांग्रेस में चले गए। इस समय उसके विवेचन की जरूरत नहीं है। देवगौड़ा कब क्या रुख अपनाएँगे, कहा नहीं जा सकता। अब स्थिति यह पैदा हुई कि कांग्रेस ने बिना शर्त जे.डी.एस. के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाना स्वीकार कर लिया, ताकि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा किसी भी तरह सरकार न बना सके। भाजपा और कांग्रेस-जे.डी.एस. गठबंधन ने राज्यपाल के पास अपने-अपने दावे पेश किए; भाजपा का दावा सबसे बड़ी पार्टी होने और कांग्रेस-जेडीएस संगठन ने विजयी सदस्यों की संख्या भाजपा से ज्यादा होने के आधार पर। कांग्रेस ने सोचा कि अपनी नाक भले कटे, कोई बात नहीं, पर दूसरे का अपशकुन तो हो। अपने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को बलि का बकरा बना दिया। राज्यपाल ने भाजपा के दावे को मानकर उसके नेता येदुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। कांग्रेस तथा जनता दल (सेकुलर) के मुख्यमंत्री के प्रत्याशी एच.डी. कुमारस्वामी तथा कांग्रेस ने शीर्ष न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

वैसे न्यायमूर्ति सरकारिया कमीशन, मुंशी कमीशन, जो केंद्र व राज्यों के संबंधों के विषय में नियुक्त हुए थे, उन्होंने कहा था कि सबसे बड़े दल के रूप में उभरनेवाले को सरकार बनाने का पहला मौका मिलना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यपालों की समिति की भी यही राय थी। अधिकतर संविधान विज्ञों की यही राय रही है। वाजपेई सरकार के समय न्यायमूर्ति वेंकटचलैया की अध्यक्षता में संविधान पुनरावलोकन समिति बनाई थी, उसका भी यही सुझाव था। अगर चुनाव के पहले गठबंधन हो जाता है और उसकी संख्या अधिक है तो उसे बुलाया जाना चाहिए। चुनाव के बाद बने गठबंधन को तभी बुलाया जाना चाहिए, यदि सबसे अधिक सदस्यों वाली पार्टी विधानसभा में विश्वास प्राप्त नहीं कर सके या किन्हीं कारणों से सरकार बनाने के आमंत्रण को नकार दे। लेकिन पिछले दिनों गोवा के उदाहरण को देखते हुए जब कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, किंतु भाजपा ने गठबंधन कर सरकार बनाने का अपना दावा पेश किया और राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने तब तक अपना दावा पेश नहीं किया था, न सूचित किया था कि उसके सदस्यों की संख्या क्या है। शीर्ष न्यायालय ने गोवा के राज्यपाल के निर्णय को, जो उन्होंने अपने विवेक से लिया, उचित करार दिया था। गोवा में जो उस समय स्थिति पैदा हुई थी, शीर्ष न्यायालय का फैसला केवल उसी के संदर्भ में था अथवा उसका प्रभाव आगे भी पड़ सकती है और यह नया दृष्टांत बन सकता है, यह तो शीर्ष न्यायालय ही तय कर सकता है। इसके अतिरिक्त बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने एन.डी.ए. की सरकार न बन सके, विधानसभा भंग कर दी थी, उसके विरुद्ध शीर्ष न्यायालय ने अपना फैसला दिया था, हालाँकि विधानसभा पुनर्जीवित नहीं की गई थी। शीर्ष न्यायालय शायद अब इस संबंध में दिए गए अपने सभी निर्णयों पर पुनः विचार करे, ताकि त्रिशंकु विधानसभा बनने की स्थिति में राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग किस प्रकार करें, यह स्पष्ट हो सके।

अंततः न्यायालय ने विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए दिए गए समय में कटौती कर दी। यदुरप्पा ने समयपूर्व पद से स्तीफा दे दिया तो राज्यपाल ने कांग्रेस-जे.डी.एस. को पंद्रह दिन में बहुमत सिद्ध करने को कहा है। राज्यपाल के विवेक में हस्तक्षेप या निर्णय को निरस्त करने का प्रश्न तभी उठ सकता है, यदि कोई बदनीयती अथवा कानून के उल्लंघन का प्रथम दृष्टया दिखाई दे। यदि जनता का मत भारतीय जनता पार्टी को १०४ सीटें जीतने पर भी नहीं माना जाए, तो यह कहना भी सही होगा कि जनता का मैंडेट कांग्रेस को ६७ सीटों पर विजयी होने केकारण नहीं कहा जा सकता है। मजे की बात यह है कि कांग्रेस चुनाव के दौरान जे.डी.एस. को बी.जे.पी. की बी टीम कहकर आलोचना करती थी। जब कांग्रेस को अपने बहुमत की आशा टूट गई तो उसे एक ही रास्ता सूझा कि वह देवगौड़ा की जे.डी.एस. के प्रति आत्मसमर्पण कर दे। उसे खुली छूट है, क्योंकि कांग्रेस का एकमात्र यही उद्देश्य रह गया कि भाजपा को किसी तरह सत्ता में न आने देना।

कांग्रेस को लिंगायत विवाद उठाने पर भी कुछ खास हाथ नहीं आया। हिंदी और उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत केप्रश्न उठाकर भी कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी ने दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया। त्रिशंकु विधान सभा में जो भी सरकार बनाने की चेष्टा करेगा, उसको न केवल प्रारंभ में जनता का विश्वास प्राप्त करना होगा बल्कि आगे भी राज्यपाल और बजट पेश करने केबाद बहुमत साबित करना होगा। विपक्षी एकता की बात कि २०१९ के आम चुनाव में भाजपा को टक्कर दे सके, बड़ी अनिश्चितता की स्थिति में है, क्योंकि विपक्षी दलों के नेताओं की सबकी अपनी प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षाएँ हैं। चाहे कर्नाटक चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर न भी रही हो, राजनीति के पर्यवेक्षक और टिप्पणीकार यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी देश में लोकप्रियता में सबसे आगे हैं, और उन्हें आम जनता का विश्वास प्राप्त है। इस समय यह अवश्य है कि कर्नाटक में राज्यपाल की भूमिका विवाद का विषय बन गई है। कुछ मुद्दे फिर उठे हैं, जिनपर शीर्ष न्यायालय को स्पष्टता प्रदान करनी होगी।

भारत और वैश्विक परिदृश्य

भारत के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को समय-समय पर संक्षेप में देखना आवश्यक है। भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और एक उभरती आर्थिक व राजनीतिक शक्ति के कारण कुछ के लिए कुतूहल तथा कुछ के लिए ईर्ष्या का विषय रहा है। भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को संवेदनशीलता और सतर्कता का एहसास इससे होता है कि भारत सब देशों से, विशेषतया पड़ोसी देशों से मित्रता एवं पारस्परिक सहयोग चाहता है, ताकि उसके विकास की गति धीमी न पड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं का मंतव्य यही मालूम देता है, यद्यपि विरोधी नेता कभी-कभी उनका उपहास भी करते हैं, हँसी उड़ाते हैं। सरकार के लिए एक कठिनाई यह भी होती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संबंधों का पूरा खुलासा भी मुश्किल होता है कि क्या बातें आपस में हुईं, क्या मुद्दे उठाए गए, उनमें कुछ गोपनीयता भी आवश्यक हो जाती है तथा दूसरी पार्टी के मिजाज को भी देखना जरूरी हो जाता है। आज अमेरिका आर्थिक और सैनिक शक्ति की दृष्टि से सबसे अधिक बलशाली है, किंतु अमेरिका का राष्ट्रपति क्या सोचता है और आगे क्या करेगा, इसके कारण बड़ी चिंता रहती है। जिस प्रकार इस छोटे समय में ही उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों की तब्दीलियाँ की हैं, उससे भी लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर सबसे बलशाली राष्ट्र की मंशा क्या है? उसकी नीतियाँ क्या हैं? उधर चुनाव के पहले और चुनाव के समय रूस से उनके सहयोगियों, उनके दामाद और पुत्री के किस प्रकार के संबंध रहे, इसकी जाँच अलग-अलग स्तर पर हो रही है।

राष्ट्रपति टं्रप केविरुद्ध व्यक्तिगत रूप से तरह-तरह के आरोप हैं। उनकी विश्वसनीयता, कार्यकुशलता और कार्यप्रणाली के प्रति भी गंभीर संदेह प्रकट किए गए हैं। इस समय अमेरिका में राजनीति बहुत विभाजित है और तरह-तरह के भ्रम बने हुए हैं। अधिक विवरण में जाना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति स्वयं तरह-तरह के व्यक्तिगत और राजनीतिक विवादों में बुरी तरह ग्रस्त हैं। चुनाव के समय उन्होंने तरह-तरह की घोषणाएँ की थीं, लोग समझते थे कि ये चुनावी माहौल की बातें हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने उनमें से कुछ पर कार्य शुरू कर दिया है, जिससे वातावरण और भी अनिश्चित होता जा रहा है, जैसे एच.बी.वन. वीजा में परिवर्तन आदि। यही नहीं अमेरिका और चीन के बीच एक प्रकार टैरिफ या ड्यूटी लगाने की होड़ चल रही है। अमेरिका जितना टैरिफ जितनी वस्तुओं पर लगाएगा, उसका उत्तर चीन उसी प्रकार देता है। जिस वैश्वीकरण की बात हो रही थी, वह सिकुड़ता जा रहा है। माल आयात पर रोक, कुशल कार्यकर्ताओं के काम करने की सुविधा पर रोक। पिछली सदी के तीसरे दशक में जैसा वातावरण ग्रेट डिप्रेशन के समय बना था, विश्व उस तरफ बढ़ता हुआ दीख रहा है। इसे अर्थशास्त्री संरक्षण या प्रोटेक्शनिज्म कहते हैं, जो खुले बाजार के विरुद्ध है। खुले बाजार और वैश्वीकरण का विरोध भी मुखर हो रहा है। यूरोप के कई देशों में चुनाव इसी आधार पर लड़े जा रहे हैं।

इसी समय एक और हादसा हो गया, जिससे ब्रिटेन और रूस में तनातनी हो गई। ब्रिटेन की प्रधामंत्री थेरेसा मे का आरोप कि रासायनिक जहरीले पदार्थ द्वारा सेरमी स्किरपाल एक डबल एजेंट, जो पहले रूसी नागरिक था, ने ब्रिटेन में शरण ली थी, उसकी मृत्यु हो गई। रूस की सरकार उसके लिए जिम्मेदार है। अब चिकित्सा के बाद उसकी लड़की यूलिना बच गई। थेरेसा मे के अनुसार यह रासायनिक जहर रूस ने अपने एक शोध केंद्र में विकसित किया। दरवाजे के हैंडल पर लगाने से विष दरवाजा खोलने पर शरीर में फैल गया। रूस ने इनकार किया कि न इस तरह का पदार्थ उसने ईजाद किया है और न ही उसका सेरमी स्किरपाल की मृत्यु से कोई संबंध है। जाँच की प्रक्रिया के बारे में दो बड़े देशों में कोई समझौता नहीं हो सका। ब्रिटेन ने रूस के ६० राजनयिकों को ब्रिटेन से जाने के आदेश दिए, रूस ने भी ब्रिटेन के उतने ही अधिकारियों को रूस छोड़ने के आदेश दिए। दबाव का यह खेल चलता रहा। यूरोपीय यूनियन के कुछ अन्य देशों ने भी ब्रिटेन से सहमति प्रकट कर राजनायिकों को रूस वापस जाने के आदेश दे दिए। अमेरिका ने भी रूस का साथ दिया। अब यह मामला कुछ ठंडा पड़ गया है, पर कटुता तो पैदा हो ही गई। ऐसी स्थिति में भारत रूस से और यूरोपियन यूनियन के देशों तथा ब्रिटेन से अच्छे संबंध रखना चाहता है, अतः उसे फूँक-फूँककर कदम रखना पड़ता है। वैसे ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन छोड़ने का निर्णय पहले ही कर लिया था और उसके अलग संभावित नतीजे हैं।

एक मुद्दा है, जिसके कारण अमेरिका ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय यूनियन के सदस्यों से अलग-थलग हो गया है। राष्ट्रपति ट्रंप का चुनाव के समय से यह कहना था कि ओबामा ने ईरान से जो न्यूक्लियर समझौता किया था, उसमें गलतियाँ हैं और वे उसे नकार देंगे। यूरोप के कई देशों के प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्रपति ट्रंप को समझाने की बहुत कोशिश की, पर वे नहीं माने। आखिर वे ईरान से हुए करार से मुकर गए। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि ईरान से हुए समझौते के साथ हैं। ईरान के राष्ट्रपति ने कहा है कि समझौते को नकारना अमेरिका के लिए महँगा पड़ेगा। मजे की बात यह है कि इस मामले में रूस, ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन के देशों के साथ है। अमेरिका का यह कहना कि जो ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखेगा, उस पर वह प्रतिबंध लगाएगा, यह अन्य देशों को स्वीकार नहीं है।

सद्दाम के पतन के बाद से इराक में राजनीतिक स्थिरता नहीं आई है। इसलामिक स्टेट की समाप्ति हो चुकी है। इस विषय में रूस, अमेरिका पश्चिमी देशों के साथ थे। इसलामिक स्टेट ने जो जहर के बीज बोए, वे अपना असर दिखा रहे हैं। इडोनेशिया में तीन चर्चों पर आत्मघाती हमले में ग्यारह से अधिक लोग मारे गए। अफगानिस्तान में आतंकवादियों के हमले में भी नौ लोग मारे गए। लिखते समय समाचार देखा कि पेरिस में अल्लाहो अकबर का नारा लगाते हुए, चाकू लिये हमलावर आतंकवादी समेत दो की मृत्यु हो गई और चार घायल हो गए। अब कोई भी देश सुरक्षित नहीं है। अफगानिस्तान और बगदाद में गाहे-बगाहे हादसे होते रहते हैं। अतिवादियों के हमले रोज का काम हो गया है। पाकिस्तान भी अछूता नहीं रहा, हालाँकि वहाँ की सैन्य खुफिया संस्था जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों को निरंतर भेज रही है और स्थानीय युवकों को गुमराह और उनको शह देने का काम कर रही है। अपदस्य पूर्व प्रधानमंत्री शरीफ ने यह स्वीकार किया है। इसलामिक स्टेट के गुर्गे अन्य देशों में भी सक्रिय हैं। उसके द्वारा प्रशिक्षित आतंकवादी जगह-जगह वारदात करते हैं, खौफ फैलाते हैं और युवकों को अपने में शामिल करने की कोशिश करते हैं। भारत में भी यह हो रहा है। उसके सुषुप्त सेल हैं, जो समय-समय पर किसी के इशारे पर जाग्रत् हो जाते हैं। भारत में केरल का ‘पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ इन सबका सरगना है, यद्यपि उसे अभी तक गैर-कानूनी घोषित नहीं किया है। इसलामिक स्टेट ऑफ सीरिया इराक के अतिरिक्त नाइजेरिया में बोले हराम तथा अलकायदा, अलशंवाव सोमालिया में सक्रिय हैं। इसलामिक स्टेट का तथाकथित राष्ट्रपति और स्वयंभू खलीफा का पता नहीं चल सका है। उसके नाम पर उसके अनुयायी स्थान-स्थान पर वज्रपात करते रहेंगे, ऐसा जनून उसने फैलाया है। सीरिया के मामले में रूस, तुर्की आदि आज राष्ट्रपति असद के पक्ष में हैं, उनका समर्थन करते हैं। अमेरिका, फ्रांस आदि उसको उखाड़ फेंकना चाहते हैं। दोनों पक्ष जिन्हें दुश्मन समझते हैं, उनके स्थानों पर गोलाबारी करते हैं, इससे नागरिक तबाह हो रहे हैं।

कुछ दिन पहले तक ऐसा लग रहा था कि अमेरिका और उत्तरी कोरिया में आणविक युद्ध न छिड़ जाए। माहौल इस तरह का बन रहा था, जब क्यूबा में मिसाइल लगाने के मामले में क्रूशेव और केनेडी के समय रूस और अमेरिका आमने-सामने थे। किसी प्रकार सद्बुद्धि आई। क्रूशेव ने अपने जहाज वापस बुला लिये और मिसाइलों के लिए जो ढाँचा क्यूबा में बनाया गया था, उसको समाप्त कर दिया गया। अमेरिका ने क्यूबा पर आक्रमण करने का इरादा छोड़ दिया। विश्व आणविक युद्ध की भयानकता से बच गया। उत्तर कोरिया नए अणु मिसाइलों का परीक्षण कर रहा था और अमरीका तक मारक मिसाइलों से हमले की धमकी दे रहा था। पड़ोसी जापान और दक्षिण कोरिया दहशत में थे। उत्तर कोरिया के विरुद्ध अमरीका नए-नए प्रतिबंध लगा रहा था। इस तनातनी का अंत क्या होगा, कहा नहीं जा सकता था। वातावरण को ठंडा करने में चीन ने भी कुछ भूमिका अदा की। सिओल (दक्षिण कोरिया) में जो ओलंपिक हो रहे थे, उसमें राष्ट्र्रपति जॉन की बहन आई तथा दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से मिली, और बर्फ पिघलने लगी। परदे के पीछे भी कुछ संपर्क तथा बातचीत अमरीका से हो रही थी। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति सीमा पर मिले एवं प्रतीक रूप में उन्होंने उत्तर कोरिया के क्षेत्र में पैर रखे तथा उस समय दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति उनका हाथ थामे हुऐ थे। पाठक जानते हैं कि द्वितीय युद्ध के बाद १२ पैरलल की सीमा का जब जनरल मैकार्थर की सेना ने उल्लंघन किया तो युद्ध और भड़क उठा। उत्तर कोरिया के समर्थन में चीन था और दक्षिण कोरिया के समर्थन में अमेरिका आदि। अभी भी दोनों देशों (दोनों कोरिया) के बीच युद्ध विराम चल रहा है। जनरल थिमैया के नेतृत्व में एक टीम भारत से शांति बनाए रखने के लिए भेजी गई थी। अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच लगातार बातचीत आणविक शस्त्रों का विनाश और जो केंद्र वहाँ स्थापित हैं, उन्हें समाप्त किया जाए, ऐसा करने पर अमरीका उत्तर कोरिया की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे रहा है। अब राष्ट्र्रपति ट्रंप और राष्ट्र्रपति जोंग का १२ जून को सिंगापुर में वार्त्तालाप के लिए मिलना निश्चित हो गया है। आशा है कि इस बड़ी समस्या का कोई हल निकलेगा। आणविक निशस्त्रीकरण के बाद उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के एकीकरण की संभावना भी हो सकती है। इस समय दक्षिण कोरिया समृद्ध है और तेजी से विकास कर रहा है। उत्तर कोरिया कम्युनिस्ट सरकार के अंतर्गत अविकसित है और जनसाधारण गरीबी के शिकार हैं। भारत के राजनैतिक संबंध दोनों से हैं। विश्व में जो भी राजनैतिक अथवा आर्थिक संकट उठ रहे हैं, उसमें राष्ट्र्रसंघ तथा उससे संबंधित संस्थाएँ, आई.एन.एफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार ऑरगनाइजेशन उसी प्रकार अप्रभावी साबित हो रहे हैं, जैसा द्वितीय युद्ध के पहले लीग ऑफ नेशंस तथा उससे संबंधित संस्थाएँ हो गई थीं। इसलिए विश्व के देश क्षेत्रीय तथा आपसी संबंध बढ़ाने को तत्पर हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप क्या कर बैठे, इससे सब देश चिंतत हैं। ट्रंप के अमेरिकी दूतावास यरूसलम में भेजने के अपने निर्णय के कार्यान्वयन के समय गाजा में पैलेस्टेनियनों ने विरोध किया और उसके कारण ५५ पैलेसटाइनियन मारे गए। अब सारे विश्व में मुसलमान विरोध कर रहे हैं। भारत भी अछूता नहीं है। जम्मू-कश्मीर में तो अलगाववादी पार्टियों ने विरोध शुरू कर दिया है। ट्रंप की आर्थिक और सुरक्षा नीतियों के परिवर्तन से सुदूर पूर्व के देशों में बेचैनी पैदा होती है। जापान भी साउथ चाइना में चीन की नीति से सशंकित है। छोटे-छोटे टापुओं के बारे में विवाद है। फिलीपींस और चीन का विवाद अंतरराष्ट्रीय अदालत में गया, जिसने फिलीपींस के हक में फैसला किया। पर चीन अपने स्थान पर अडिग है। तथाकथित वैश्विक दुनिया में भी ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ ही चरितार्थ है। प्रधानमंत्री मोदी की चीन की यकायक यात्रा और भूटान में चीनी राष्ट्र्रपति शी जिंयपिंग से अनौपचारिक बातचीत को इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। इसे अनौपचारिक शीर्ष बैठक कहा जाता है, वह यकायक नहीं होती है, उसके पीछे काफी तैयारी होती है। चीन और भारत एशिया की दो बड़ी सैन्य और आर्थिक शाक्तियाँ हैं। जापान भी एक अन्य बड़ा विकसित देश है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्षों में वहाँ के प्रधानमंत्री से निकटता के संबंध बनाने की कोशिश की है। अब दुनिया एक धु्रवी नहीं है। अमरीका के अतिरिक्त यूरोपीय यूनियन है, चीन है, रूस है, सबको मिलकर काम करने की आवश्यकता है। बिना एजेंडे के दो दिन के अनौपचारिक वार्त्तालाप में न केवल चीन और भारत के बीच समस्याओं पर बातचीत हुई वरन् दोनों देश मिलकर बहुत सी वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग कर सकते हैं। दोनों मिलकर अपनी-अपनी आर्थिक व्यवस्थाओं को और चुस्त कर सकते हैं। डोकलाम में दो महीने के आमने-सामने वाली स्थिति से बचा जा सकता है। सीमा विवाद पर अलग से बातचीत चलती रह सकती है। इस प्रकार मिलने-जुलने से एक-दूसरे को समझने में सहूलियत होती है, क्या कठिनाइयाँ हैं, उनका एक-दूसरे को एहसास हो सकता है। इसलिए चीन और भारत में ही इस प्रयास की सराहना नहीं हुई है और लोग भी चाहते हैं कि इस प्रकार के आपसी अनौपचारिक संबंध गति पकड़ते रहें। ‘वूहान’ जहाँ यह औपचारिक बैठक हुई, वह एक ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ १९११ में यकायक क्रांति प्रारंभ हुई, जिसे सनयात सेन का नेतृत्व प्राप्त हो सका।

चीन के बाद इसी प्रकार की अनौपचारिक बैठक रूस में राष्ट्रपति प्यूटिन से भी सोची में होगी। सोची में विंटर ओलंपिक होते हैं। वह सुंदर स्थान है, जहाँ स्टालिन तथा अन्य सोवियत नेता आराम के लिए जाया करते थे। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद रूस एक महाशक्ति के रूप में फिर उभरा  है। भारत के सैन्य आयुधों का रूस मुख्य स्रोत रहा है। सुरक्षा परिषद् में जम्मू-कश्मीर के मसले पर उसने सदैव भारत का पक्ष लिया। अमरीका से भारत की बढ़ती निकटता के कारण कुछ ऐसे आसार नजर आए हैं कि शायद रूस अपनी नीति बदल रहा है। पाकिस्तान और रूस की सेनाओं का संयुक्त सैन्य अभ्यास तिब्बत में हुआ। रूस ने इस आशंका को बेबुनियाद बताया कि चीन की कम्युनिस्ट क्रांति की सफलता और उसके बाद विकास में बहुत बड़ी भूमिका रही, पर कुछ गलतफैमियाँ भी हैं। उनका असर भारत पर भी पड़ सकता है। यही बात रूस और जापान के संबंधों के विषय में भी है। सोची में मोदी और प्यूटिन की अनौपचारिक बैठक लाभदायक होगी। एक-दूसरे को समझने में और अगर कोई भ्रम पैदा हुआ है तो उसको दूर करने में। इसके बाद इंडोनेशिया, जो सबसे अधिक मुसलिम आबादी वाला देश है और जो आतंकवाद का शिकार है, वहाँ भी मोदी महीने के अंत में जानेवाले हैं। प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया की यात्रा समुद्री भारतीय जहाज द्वारा होगी, सवांग के बंदरगाह में इसकी व्यवस्था हो रही है। प्रथम प्रधानमंत्री की यात्रा भी समुद्री जहाज द्वारा ही हुई थी। मोदी ने पश्चिम के मुसलिम देशों से संबंध बढ़ाने और मजबूत बनाने की कोशिश की है। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में तो भारत अग्रसर है ही, यद्यपि पाकिस्तान तरह-तरह के रोड़े अटकाता है। पड़ोस के देशों में श्रीलंका से संबंध सुधारने की कोशिश हुई है। तमिल समस्या का समाधान बाकी है। राष्ट्रपति सिरीसेन की सरकार से बहुत आशा है। प्रधानमंत्री विक्रमसिंह के मंत्रिमंडल में फूट पड़ गई थी, पर वह अब संसद् के परीक्षण में विजयी रहे हैं और उनसे उम्मीद है कि दो दलों की मिली-जुली सरकार एकजुट होकर प्रभावी ढंग से कार्य करेगी। म्याँमार (बर्मा) और बँगलादेश सरकारें भारत से अच्छे संबंध बनाने का प्रयास कर रही हैं। बहुत से करार हुए। इस समय रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों की समस्या पैदा हो गई है। म्याँमार से उन्होंने बँगलादेश में शरण ली है। भारत में भी आए हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हाल ही में म्याँमार गईं और वहाँ के राष्ट्रपति, विदेशमंत्री तथा अन्य अधिकारियों से मिलीं और भारत के सहयोग व सहायता से रोहिग्यों के पुनर्स्थापन के लिए आश्वास्त किया। कोशिश है कि म्याँमार और बँगलादेश की समस्या सभी के हित में हल हो सके। एक उपलब्धि है प्रधानमंत्री मोदी की तीसरी नेपाल की यात्रा। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा जनकपुर से शरू हुई। इस यात्रा में नेपाल-भारत के सांस्कृतिक संबंधों पर जोर रहा। नेपाल के बाद सरकिट और अन्य तीर्थस्थानों को जोड़ने का मंतव्य भी था। पिछले दिनों भारत-नेपाल संबंधों में कुछ खटास आ गई थी। खासकर जब कुछ दिनों तराई के निवासियों ने आवश्यक सामान ले जानेवाले ट्रकों पर टोक लगाई, और उनको काबू लाना में भारत के लिए कठिन था। नेपाल में समझा गया कि यह सब भारत की मदद से हो रहा है। प्रधानमंत्री ओली का रुझान चीन की ओर बताया गया, जब वे पहले नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे। उस समय प्रधानमंत्री ओली की पहली विदेश यात्रा चीन की थी। नए संविधान  के अंतर्गत चुनाव संसद्, प्रांतीय एसेंबलियों तथा स्थानीय निकाया के बाद श्री ओली पुनः नेपाल के प्रधानमंत्री बने। उनकी स्थिति काफी दृढ़ हो गई थी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडू उनको बधाई देने और भारत आने का निमंत्रण देने गईं। उन्होंने निमंत्रण स्वीकार किया। प्रधानमंत्री ओली भारत आए और बहुत से नए समझौते स्वीकार किए। रुकी हुई परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करना तय हुआ। नेपाल और भारत के बीच कनेकटिविटी बढ़ाने की योजनाओं पर विशेष जोर रहा रेल, हवाई जहाज और सड़कों द्वारा। सौहार्द के वातावरण में बातचीत हुई और दोनों देशों ने श्री ओली की इस यात्रा की सफलता की सराहना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह तीसरी यात्रा थी। इसको काफी पुराने सांस्कृतिक संबंधों के रूप में प्रस्तुत किया। नेपाली प्रधानमंत्री ओली ने जनकपुर में प्रधानमंत्री मोदी की आवभगत की। एक बिजली परियोजना का संयुक्त उद्घाटन किया गया। मोदी काठमांडू भी गए। नेपाल के राष्ट्र्रपति और उपराष्ट्र्रपति से भी मिलने गए। उन्होंने वहाँ सरकार और जनता को आश्वस्त किया कि बिना किसी प्रकार के हस्तक्षेप के भारत नेपाल के विकास और समृद्धि के प्रयासों में सदैव भागीदार रहेगा। प्रधानमंत्री ओली ने भी कहा कि नेपाल की भूमि से भारत विरोधी किसी प्रकार की कररवाई पर कड़ा प्रतिबंध रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी की नेपाल यात्रा नेपाल-भारत के पुराने संबंध पुनः पटरी पर आ सकेंगे। विदेश से संबंध का हर एक मसला विस्तार का है, किंतु यहाँ संक्षेप में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की भूमिका के दिग्दर्शन का प्रयास किया गया है। आवश्यकतानुसार अलग मुद्दों पर पुनः चर्चा संभव होगी।

महात्मा गांधी १५०वीं जयंती आयोजन

महात्मा गांधी की १५०वीं जयंती के  आयोजन की तैयारियां प्रारंभ हो गई हैं। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संस्कृति मंत्रालय द्वारा २५० सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया है। सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य हस्तियाँ, राजनैतिक एवं प्रतिनिधि, गांधी विचारधारा के विशेषज्ञ आदि हैं। श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्र्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सदस्य हैं। शीर्ष न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी सदस्य हैं। २ मई को समिति की पहली बैठक नई दिल्ली में हुई। कर्नाटक के चुनाव के कारण राहुल और सोनिया तथा कुछ कांगे्रस राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री इसमें नहीं सम्मिलित हो सके। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सम्मिलित हुईं। सदस्यों की राय ली गई कि किस प्रकार के कार्यक्रम किए जाएँ। लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल डॉ. सुभाष कश्यप ने सुझाव दिया कि एक सुंदर सुविचारित संस्मरणात्मक गं्रथ इस अवसर पर प्रकाशित होना चाहिए। बैठक के पूरे विवरण की जानकारी नहीं है कि क्या सुझाव आए। प्रधानमंत्री ने कहा कि गांधी जयंती को एक वैश्विक रूप दिया जाना चाहिए। यह उचित ही है। गांधीजी की वैश्विक मान्यता है। यू.एन.ओ. ने २ अक्तूबर को ‘अहिंसा दिवस’ की संज्ञा दी है। स्वच्छ भारत का जो अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छेड़ा है, उसको और अधिक गहन एवं सार्थक बनाया जाना चाहिए। गांधीजी की शती बड़ी धूमधाम से मनाई गई थी, हालाँकि १२५वें जन्मदिवस के आयोजन उतने सफल नहीं रहे। प्रतिवर्ष गांधीजी पर अन्य देशों में, खासकर अमरीका, इंग्लैंड, ऑस्टे्रलिया आदि से अच्छी पुस्तकें प्रकाशित होकर आ रही हैं। इस स्तंभ में उनके विषय में चर्चा भी होती रहती है। कभी-कभार एक-दो अच्छी पुस्तकें भारत में प्रकाशित होती हैं, जो गांधीजी पर एक नई रोशनी डालती हैं। समग्र गांधी साहित्य के १०० वॉल्यूम भारत सरकार ने प्रकाशित किए हैं, जिन्हें डिजिटिलाइज भी किया गया है। गांधीजी के जीवन का कोई पक्ष अछूता नहीं रहा है। अलग-अलग विषयों और समस्याओं पर गांधीजी के विचार पुस्तकाकार उपलब्ध हैं। आवश्यकता इस बात की है कि आज के भोगवादी युग में जब हर जगह अशांति है, वैश्विक और सामाजिक स्तरों पर, उनके संदेश जनसाधारण तक कैसे पहुँचें। गांधीजी ने तीन पुस्तकें  लिखीं—‘हिंद स्वराज’, ‘सत्य के प्रयोग’ (आत्मकथा) एवं दक्षिण अफ्रीका में ‘सत्याग्रह’। लेकिन लोग उनसे हर प्रकार के प्रश्न करते, अपनी दिक्कतें बताते, पत्र लिखते और गांधीजी अपनी पत्रिकाओं में उनका समाधान करते। उनको चिट्ठी-पत्री विशाल हैं। गांधीजी से हुए वार्त्तालाप भी बहुत से व्यक्तियों ने प्रस्तुत किए हैं। वे सब अब इन पुस्तकों द्वारा उपलब्ध हैं।

प्रसिद्ध फ्रैंक मोरेस ने लिखा है कि गांधीजी ने उन्हें एक बार मिलने के लिए तीन मिनट दिए, और उन्हें संशय था कि इतने अल्प समय में क्या बातचीत होगी। वे लिखते हैं कि इस मनोयोग से गांधीजी ने उनके प्रश्न सुने और उत्तर दिए, मानो उस समय गांधीजी की पूरी दुनिया उन्हीं पर केंद्रित थी। अपने साक्षात्कार से वे पूरी तरह संतुष्ट होकर निकले। आज जब विकास और पर्यावरण की समस्याएँ उग्र होती जा रही हैं, गांधीजी के विचार इन विषयों पर विचारणीय हैं। दो मई की बैठक में निश्चय हुआ कि उसको मूर्तरूप देने के लिए एक छोटी उपसमिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनाई जाए, जो पूरी परिकल्पना को रूपायित करे। इस उपसमिति की सेके्रटेरियट कैसी सूझ-बूझ की होगी, उसी पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। परिकल्पना और कार्यान्वयन दोनों वैचारिक धरातल पर समृद्ध होने चाहिए, तभी इस प्रकार का आयोजन सफल एवं प्रभावी होगा।

एक समाचार-पत्र से पता लगा है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों के रख-रखाव और पुनरोद्धार के लिए संस्कृति मंत्रालय ने ४० करोड़ का प्रावधान किया है। यह स्वागत योग्य है किंतु देश की आवश्यकताओं को देखते हुए अपर्याप्त है। आशा है, यह आगे ध्यान में रखा जाएगा। देश में सार्वजनिक पुस्तकालयों की बहुत दुर्दशा है। उनका पुनरुत्थान और आधुनीकरण बहुत आवश्यक है।

सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए प्रावधान

उन्नीसवीं शती के प्रारंभ और २०वीं शती के पाँच दशकों में कुछ जगह प्रबुद्ध व्यक्तियों ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ पुस्तकालयों की स्थापना की, ताकि लोगों में एक सामाजिक जागृति उत्पन्न हो। कुछ समृद्ध व्यक्तियों, जमींदारों, राजघरानों ने भी अपने यहाँ पुस्तकालय बनाने में रुचि ली, यद्यपि उनका उपयोग सीमित था। जम्मू में डॉ. करन सिंह का पैतृक पुस्तकालय दर्शनीय है, उसमें निरंतर वृद्धि हो रही है। देश में जगह-जगह कुछ व्यक्तियों के निजी पुस्तकालय भी सार्वजनिक हो गए हैं। आगे आनेवाली पीढि़यों की अपनी रुचि और सामर्थ्य पर उनका यह रख-रखाव निर्भर था, पर अब वे देश की धरोहर हैं और इनकी देखभाल जरूरी है, अब ये नागरिकों के लाभ के लिए उपलब्ध हैं। पुस्तकालयों की स्थापना भारतीय पुनर्जागरण का ही एक अंग था, जैसे कि पत्रिकाओं का प्रकाशन। रामकृष्ण ऐंड संस पुस्तकों की एक बहुत प्रसिद्ध दुकान दिल्ली के कनाट प्लेस (अब राजीव चौक) में थी। देश विभाजन के बाद वह लाहौर से दिल्ली में स्थानांतरित हुई थी। लाहौर में भी उसकी ख्याति थी। १९८०-८२ के अंत में संचालक की मृत्यु के बाद वह बंद हो गई। पुस्तक खरीदने हम भी वहाँ जाते थे, जब कभी दिल्ली आना होता था तो वहाँ आना-जाना अकसर होता ही था। उनसे पता चला कि डॉ. श्री कृष्ण सिन्हा, जो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे, बडे़ पुस्तक-प्रेमी हैं और दिल्ली में अपना काम-काज समाप्त कर रात को आठ बजे के बाद वे आते और पुस्तकों का चयन करते। एक बार हमें भी यह देखने का अवसर मिला। अब इस प्रकार के कितने मुख्यमंत्री या मंत्री हैं, हम कह नहीं सकते। सुना है कि उनके परिवार ने उनके संग्रह को एक पब्लिक लाइब्रेरी का रूप दे दिया है। एक बार ‘स्टेटसमैन’ समाचार-पत्र में पश्चिम बंगाल की पुरानी लाइब्रेरियों के बारे में एक शृंखला प्रकाशित की थी, जिनकी देखभाल की जरूरतहै।

हर बडे़ शहर या कस्बे में एक-न-एक पुराने पुस्तकालय की जानकारी मिलती है और यह भी पता चलता है कि वह कितनी खस्ता हालत में है। पुस्तकालय विचार-विमर्श, गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों और किसी व्यक्ति विशेष के विचार सुनने का भी स्थान हुआ करता था। बाल-वृद्ध सभी आते थे। प्रबुद्ध नागरिकता की जननी पुस्तकालय हुआ करते थे। हमें स्मरण है कि राज्यसभा में कई बार सार्वजनिक पुस्तकालयों के बारे में चर्चा हुई, पर कोई विशेष नतीजा नहीं निकला। दिल्ली में ही मारवाड़ी पुस्तकालय के बारे में बहुत कुछ सुना, यद्यपि व्यक्तिगत जानकारी नहीं है। उसकी दशा भी अब अच्छी नहीं बताई जाती है, पुरानी किताबें गायब हैं। प्रबंधन समिति का कहना है कि पैसे की तंगी है। और तो और दिल्ली की हरदयाल लाइबे्ररी को ही ले लीजिए, यह पहले हॉर्डिंग लाइब्रेरी के नाम से जानी जाती थी। दिल्ली राजधानी बनने के बाद वाइसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया था, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। उनके नाम से दिल्ली के कुछ रइसों ने इस पुस्तकालय की स्थापना की। सन् २०१६ इस पुस्तकालय का शती स्थापना दिवस था। पुस्तकालय में दुर्लभ और अमूल्य दस्तावेज एवं पुस्तकें हैं। एक तरफ शती मानने का आयोजन था और साथ-साथ अखबारों में समाचार आ रहे थे वहाँ की अव्यवस्था के विषय में। स्टाफ की भारी कमी, बिजली-पानी के बिलों का भुगतान नहीं किया गया, अतएव उसके कारण दिक्कतें हैं। कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा आदि-आदि। चिराग तले अँधेरा। पता नहीं, केंद्र या दिल्ली सरकार कौन इसका संचालन करती है! दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की जब स्थापना हुई थी, पं. नेहरू और मौलाना आजाद को बड़ी आशाएँ थीं। उस पैमाने पर कितनी खरी उतरी है, देखने की बात है। इलाहाबाद की पब्लिक लाइब्रेरी के बारे में हम इस स्तंभ में एक बार चर्चा कर चुके हैं। इसकी गोथिक शैली में बनी इमारत में ही सबसे पहले जब संयुक्त प्रांत में लेजिस्लेटिव कौंसिल की स्थापना हुई, पहली बैठक यहीं हुई थी। संतोष इस बात का है कि कुछ प्रयत्न के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हमारे पत्राचार पर करीब ९० लाख रुपए इमारत के रखरखाव के लिए स्वीकृत किए। तात्पर्य यही है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का ध्यान जाना चाहिए। केंद्र सरकार समय-समय पर सहायता कर सकती है, किंतु मुख्यतः राज्य सरकारों का यह दायित्व है। अमरीका और इंग्लैंड में सार्वजनिक पुस्तकालयों, बडे़ शहरों में नहीं, छोटी-छोटी काउंटियों में, जो तहसील के बराबर होंगी, की इतनी सुविधाजनक व्यवस्था है कि देखकर आश्यर्च होता है। कुछ समय के लिए जानेवाले पर्यटक भी उनका पूरा लाभ उठा सकते हैं। हमारे सांसदों और विधानसभा सदस्यों तथा जिला परिषदों को इस विषय में रुचि लेनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में नए-नए जिले बन गए हैं। किंतु मुख्यालय में एक अच्छे सार्वजनिक पुस्तकालय का अभाव है। ये पुस्तकालय बालक-बालिकाओं और महिलाओं के मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन में सहायक हो सकते हैं। जिला परिषदों को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए। केंद्र सरकार को एक कमीशन बनाना चाहिए, जो देशव्यापी सार्वजनिक पुस्तकालयों को कैसे उपयोगी और समृद्ध बनाया जा सकता है, इस पर अपनी रिपोर्ट दे। आज की बदलती परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए सार्वजनिक पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण और इन्हें सशक्त बनाने की आवश्यकता है। उनके रख-रखाव और प्रबंधन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

भारतीय राष्ट्रीयता एक संकलन

एस. इरफान हबीब की संपादित पुस्तक ‘इंडियन नेशनलिज्म’ यानी ‘भारतीय राष्ट्रीयता’ रूपा पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुई। इसके संपादक डॉ. इरफान हबीब अलीगढ़ मार्किसिस्ट इतिहासकार नहीं हैं, जैसा कुछ लोगों को भ्रम हो गया। हबीब नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजूकेशनल प्लानिंग ऐंड एडमिनिस्टे्रशन में मौलाना आजाद पीठ के अध्यक्ष रहे हैं। वे विज्ञान के इतिहास एवं आधुनिक राजनीतिक इतिहास के विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। इतिहास संबंधी उनकी कई पुस्तकें हैं। उन्होंने सरदार भगत सिंह के संबंध में एक पुस्तक लिखी है, जिसकी बहुत प्रशंसा हुई। राष्ट्रीयता के संबंध में आजकल बहुत वाद-विवाद चल रहा है। राष्ट्रीयता का क्या स्वभाव है? क्या यह एक संकुचित अवधारणा है अथवा एक विशद् परिकल्पना? देश के प्रमुख विचारकों, राजनेताओं के आलेखों और भाषणों से उन्होंने उद्धरण संकलित किए हैं कि उनकी दृष्टि में राष्ट्रीयता एवं देशप्रेम क्या है। विचारकों की अपनी अवधारणाओं को उन्होंने बारह भागों में विभक्त किया है। महादेव गोविंद रानाडे से प्रारंभ कर जयप्रकाश नारायण तक के विचारों को संकलित करने की चेष्टा की है। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने अपनी आत्मकथा का नाम ‘ए नेशन इन मेकिंग’ रखा है। वर्गीकरण को जो संज्ञा डॉ. इरफान हबीब ने दी है, वह उनका अपना दृष्टिकोण है। संपादक ने सब विचारधाराओं को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, श्रीअरविंद, टैगोर, सरोजनी नायडू, प्रफुल्ल चंद्र रे, महात्मा गांधी, पटेल, नेहरू, डॉ. अंबेडकर, राजगोपालाचारी, बोस, भगतसिंह, मानवेंद्र नाथ राय, मो. हसन मदनी, अल्लमा इकबाल, मौलाना आजाद, खान अब्दुल गफार खाँ इत्यादि शामिल हैं। रचनाकार ख्वाजा अहमद अब्बास को भी शामिल किया गया है। सर सय्यद अहमद खाँ और जिन्ना को उन्होंने शामिल नहीं किया है, क्योंकि उनके विचारों में अतिवाद है। सर सय्यद के पहले की सोच और अंग्रेजों के प्रभाव के बाद की सोच में बहुत अंतर है। सावरकर को भी शामिल नहीं किया गया है। दीनदयाल उपाध्याय भी नहीं हैं। संकलन के प्रारंभ में उन्होंने अपनी लंबी टिप्पणी दी है, जो बताती है कि उन्होंने यह संकलन निकालने की क्यों सोची। यह ध्यान देने की जरूरत है कि जिन विचारकों को उद्धृत किया गया है, उन्होंने उस समय की समस्याओं की पृष्ठभूमि में ही अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। संपादक के अपने विचार, जो उन्होंने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में दिए, उनसे पाठक का कहीं-कहीं मतभेद संभव है। उसमें संपादक का अपना नजरिया या दृष्टिकोण परिलक्षित होता है। राष्ट्रवाद अथवा देशप्रेम की आधारशिला भारत में सहनशीलता, उदारता और विचार वैषम्य को समझने की रही है भारत का राष्ट्रवाद कभी संकीर्ण नहीं रहा। यह परंपरा जारी रहनी चाहिए। भारतीय राष्ट्रीयता विषयक प्रो. इरफान हबीब का संकलन सामयिक और आवश्यक है, जो हमें स्वयं इस विषय के विभिन्न पक्षों और विविधताओं के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है।

गुरु नानक देव विषयक एक उल्लेखनीय पुस्तक

एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक, जिसके रचयिता हैं पाकिस्तान के हारुन खालिद और पुस्तक का नाम है ‘वॉकिंग विद नानक’ (प्रकाशक वेस्टलैंड पब्लिकेशंस), लेखक आंथ्रोपोलॉजी के विद्यार्थी रहे हैं। स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यटक लेखक के रूप में २००८ से कार्य कर रहे हैं। पाकिस्तान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के विभिन्न पक्षों के बारे में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में वे लिखते रहते हैं। यह लेखक की तीसरी पुस्तक है। दो अन्य पुस्तकें हैं—‘A White Trail : A journey into the heart of Pakistan’s Religious Minorities’ और दूसरी है—‘In Search of Shiva : A study of Folk Religions Practices in Pakistan.’ उनकी जो एकेडमिक पृष्ठभूमि है, उसके अनुकूल है। उनकी तीसरी पुस्तक—‘Walking with Nanak’ अपने आप में एक अनूठी पुस्तक है। लेखक लिखता है कि गुरु नानकदेव का अधिक समय, जो प्रदेश अब पाकिस्तान कहलाता है, वहाँ व्यतीत हुआ। सिक्ख मत के जन्मदाता के रूप में हारुन खालिद का रुझान गुरु नानकदेव के विषय में जानने का हुआ, जब उन्होंने उनकी बाबर वाणी एक मित्र के मुहँ से सुनी, उनसे वे बहुत प्रभावित हुए। बाबर वाणी की रचना गुरु नानकदेव ने बाबर के आक्रमण और तदुपरांत उसके अत्याचारों के विषय में की थी। वे स्वयं भी कैद में रहे थे। गुरु नानक और सिक्ख पंथ के विषय में लेखक को और जानने की उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने ‘जन्म साखी’ एवं अन्य साहित्य पढ़ा, किंतु संतोष नहीं हुआ। अपने मित्र इकबाल कौसर के साथ उन्होंने पाकिस्तान में गुरु नानक से संबंधित स्थानों और गुरुद्वारों को देखने का निश्चय किया। वे लिखते हैं—जहाँ भी उन गुरुद्वारों को देखने गए, जो गुरु नानक की स्मृति में स्थापित किए गए हैं, तो उन्हें हर जगह गुरु नानक की उपस्थिति का आभास हुआ। वे अपने मानसिक चक्षु से उन्हें देख सके अपने साथी मरदाना के साथ। उनको एहसास हुआ कि उनका अपने मित्र इकबाल कौसर के साथ सफर गुरु नानकदेव की यात्राओं का ही एक प्रकार से विस्तार और विवरण है। पुस्तक में न केवल गुरु नानक देव की यात्राओं और गुरुद्वारों का वर्णन है, वरन् उनका समग्र चित्र बड़े सुंदर शैली में रूपायित करने का प्रयास है। पुस्तक का दूसरा भाग अन्य गुरुओं के विषय में समुचित जानकारी प्रस्तुत करती है और इंगित करती है कि किस प्रकार तथा क्यों गुरु नानकदेव द्वारा स्थापित मत ने खालसा का रूप धारण कर लिया। पाकिस्तान में स्थित गुरुद्वारों के सुंदर रंगीन चित्र हैं। व्यक्तिगत जानकारी और पर्याप्त शोध के उपरांत हारुन खालिद ने अपनी पुस्तक का प्रणयन किया है। पुस्तक लेखन शैली आकर्षक, अत्यंत रोचक और पठनीय है। हमारे एक सिख मित्र ने पूछा कि हारुन खालिद की पुस्तक के विषय में हमें जानकारी है क्या, तो हमें प्रसन्नता हुई कि सिख समुदाय में पुस्तक सराही जा रही है। पुस्तक का अनुवाद हिंदी और गुरुमुखी में होना चाहिए। इस प्रकार के प्रयास स्तुत्य हैं।

भारतीय विद्या मंदिर की पत्रिका ‘वैचारिकी’ का जनवरी-फरवरी, २०१८ (भाग-३४, अंक-१) प्राप्त हुआ। शोध आधारित कई लेख तो हमेशा की भाँति पठनीय हैं ही, किंतु इस अंक की विशेषता है कि इसमें त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (५,६,७ जनवरी, २०१८) की काररवाई की अच्छी जानकारी प्रस्तुत की गई है। सम्मेलन का विषय था—‘हिंदी प्रांतों एवं विदेशों में हिंदी भाषा-साहित्य ः दशा-दिशा।’ इस प्रस्तावित सम्मेलन की चर्चा और सराहना इस स्तंभ में पहले की गई थी। सम्मेलन की परिकल्पना संस्था अध्यक्ष डॉ. विट्ठलदास मूँधड़ा की थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी ने आयोजन का उद्घाटन किया। मुख्य विषय के अंग-प्रत्यंग के बारे में विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किए और आलेख प्रस्तुत किए। डॉ. मूँधड़ा का संक्षिप्त स्वागत-संबोधन कई व्यावहारिक मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करता है, जिनपर विचार देने की आवश्यकता है। ‘वैचारिकी’ के संपादक डॉ. बाबूलाल शर्मा का संयोजकीय वक्तव्य अत्यंत विद्वत्तापूर्ण है एवं जिन बिंदुओं की ओर उन्होंने ध्यान दिलाया, उनको यदि कार्यान्वयन करने का प्रयास किया जाए तो हिंदी भाषा, साहित्य और राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। साथ-ही-साथ सब क्षेत्रीय भाषाओं और उनके साहित्य को और गति मिल सकती है। ऐसे सार्थक आयोजन की सफलता पर कोटिशः बधाई।

मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की द्विमासिक पात्रिका अब मासिक हो गई है। पिछले ३६ वर्षों से ‘अक्षरा’ साहित्य और भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्नशील है। ‘अक्षरा’ ऐसी साहित्यिक पत्रिका है, जो न केवल विद्वानों के लिए है, बल्कि सुरुचिपूर्ण साधारण पाठक के लिए भी यह अत्यंत लाभदायक है। इस अंक का संपादकीय कई ऐसे बिंदुओं की विवेचना करता है, जो चिंता के विषय है। अतएव देश की लोकतांत्रिक सफलता के लिए यह हम सबके लिए विचारणीय है। साहित्य की मासिका ‘अक्षरा’ के संपादक मंडल को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ!

बडे़ दुःख के साथ कहना पड़ता है कि ‘साहित्य अमृत’ के इस अंक में प्रख्यात कवि और विचारक बालकवि बैरागी, जिनका एक आलेख प्रकाशित कर रहे हैं, अब हमारे बीच में नहीं हैं। ‘साहित्य अमृत’ से उनका प्रारंभ से ही स्नेह था। प्रायः वे अपनी कविताएँ या आलेख भेजते रहते थे, जो सुधी पाठकों को पसंद आते थे। वे रचनाकार कवि और विचारक के साथ संवेदनशील समाजसेवी और राजनेता भी थे। वे समतामूलक समाज के हामी थे। वे मध्य प्रदेश में कई विभागों के मंत्री भी रहे। पिछले कुछ समय में विकृत प्रवृत्तियाँ राजनीति में आने के कारण उनका राजनीति से मोहभंग हो गया था। वे लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य रहे। जब वे राज्यसभा में सदस्य थे, हम भी राज्यसभा के लिए चुने गए। उस समय उनको और निकट से जानने का अवसर मिला। कविता और साहित्य के क्षेत्र में उनकी कमी सभी को खलती रहेगी। एक कार्यक्रम में भाग लेने के उपरांत अपने घर वे चिर निद्रा में लीन हो गए। उनके लिए उनके निर्मल जीवन का तो यह परमात्मा का प्रसाद ही कहा जाएगा, चाहे उनके परिवार और मित्रों के लिए यह विषाद का कारण रहा हो। अंत समय में न स्वयं को कोई कष्ट और न दूसरों को ही कोई कष्ट दिया। संतप्त परिजनों के लिए हमारी गहरी सहानुभूति और संवेदना है। बालकवि बैरागीजी अपनी रचनाओं के माध्यम से सदैव जीवित रहेंगे। उनकी पुण्य स्मृति को हमारा सादरनमन!

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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