हिरणा की सूझ

हिरणा की सूझ

काली नदी के किनारे एक जंगल में मनसुख नाम का बकरा और मंजरी नाम की बकरी रहा करते थे। इसी जंगल में एक दुष्ट सियार भी रहता था। इस दुष्ट सियार ने मनसुख और मंजरी के सभी बच्चों को खा डाला था। बच्चों के वियोग में दोनों बहुत दुःखी रहा करते थे। मनसुख और मंजरी ने बहुत उपाय किए, लेकिन सब व्यर्थ। सियार बहुत ही धूर्त था। जब भी मंजरी बच्चों को जन्म देती, सियार उन्हें उठाकर ले जाता था।

एक बार फिर मंजरी ने दो सुंदर बच्चों को जन्म दिया। बच्चों के पैदा होते ही सियार के डर से उन दोनों को न तो रातों को नींद आती थी और न ही दिन में चैन। दोनों ने बच्चों को एक गुफा में छिपा रखा था। गुफा के अंदर मंजरी बच्चों की देखभाल करती थी तथा मनसुख गुफा के बाहर पहरा देता था। सियार को जब पता चला कि मंजरी ने फिर दो बच्चों को जन्म दिया है और वह अपने बच्चों के साथ गुफा में छिपी बैठी है तो उसके मुँह में पानी भर आया। वह बच्चों को खाने के लिए आया, लेकिन जब उसने गुफा के बाहर मनसुख को पहरा देते देखा तो वापस चला गया। मनसुख के सींग बहुत नुकीले थे, जिनसे सियार को बहुत डर लगता था। इसलिए वह मनसुख से भिड़ना नहीं चाहता था। सियार रोज एक या दो बार बच्चों को खाने के इरादे से आता, लेकिन मनसुख हमेशा पहरे पर तैनात मिलता। सियार के डर से मनसुख और मंजरी दूर तक चरने भी नहीं जाते थे। जब गुफा के आस-पास की घास समाप्त होने लगी तो दोनों चिंता में और भरपेट खाना न मिलने के कारण दुबले पड़ने लगे।

एक दिन हिरणा नाम का एक बुड्ढा बकरा उधर से निकला। हिरणा संकटग्रस्तों की सहायता के लिए जंगल-जंगल घूमता रहता था। वह बहुत ही बुद्धिमान था। उसका रंग दूधिया सफेद था तथा उसकी लंबी लहलहाती सफेद दाढ़ी भी थी। जब उसने भूख से कुम्हलाए, दुबले-पतले और चिंताग्रस्त मनसुख को देखा तो समझ गया कि मनसुख किसी विपत्ति में फँसा है।

उसने मनसुख के पास जाकर उससे कहा, ‘‘क्यों भाई, इस हरे-भरे जंगल में तुम इतने दुबले-पतले क्यों हो? कौन सा दुख तुम्हें खाए जा रहा है?’’

इस पर मनसुख ने अपनी दुःख भरी कहानी हिरण को सुनाई और कहा, ‘‘हिरणा काका, तुम ही कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे उस दुष्ट सियार से छुटकारा मिल जाए और हम लोग भी सुख-चैन से जी सकें।’’

हिरणा ने कुछ देर तक सोचा और फिर अपनी दाढ़ी हिलाते हुए कहा, ‘‘एक उपाय है, जिससे वह दुष्ट सियार फिर तुम्हारे बच्चों की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखेगा।’’

फिर हिरणा ने मनसुख को वह उपाय बताया और उससे गुफा के अंदर छिप जाने के लिए कहा। जब मनसुख गुफा में छिप गया तो हिरणा ने मंजरी से कहा, ‘‘देखो मंजरी, मैं उस सामनेवाले टीले पर पहरा देता हूँ। जब भी मुझे सियार दिखाई पड़ेगा, मैं तुमसे पूछूँगा कि बच्चे क्यों रो रहे हैं?’’ तब तुम एक काँटा लेकर बच्चों को चुभो देना, जिससे बच्चे जोर-जोर, से रोने लगें। उसके बाद तुम मुझे खूब ऊँची आवाज में कहना कि बच्चों को सियार का कलेजा खाने की आदत है। मनसुख सियार का कलेजा लाने के लिए गया हुआ है। आने में देर हो रही है, इसीलिए बच्चे भूख से शोर मचा रहे हैं।’’

इस तरह मनसुख और मंजरी को समझाकर हिरणा टीले पर चढ़ गया और सियार की प्रतीक्षा करने लगा। जब सियार आता दिखाई पड़ा तो हिरणा ने खूब जोर से कहा, ‘‘ओ मंजरी, ओ मंजरी! तुम्हारे बच्चे क्यों रो रहे हैं?’’

मंजरी ने भी वैसा ही किया, जैसा उसको सिखाया गया था। काँटा चुभा-चुभाकर बच्चों को रुलाते हुए उसने कहा, ‘‘क्या करूँ हिरणा काका, बच्चों को सियार का कलेजा खाने की आदत है। इनके बाबू सियार मारने गए हैं। उनके आने में देर हो रही है, इसलिए बच्चे भूख से शोर मचा रहे हैं।’’

हिरणा ने कहा, ‘‘अरे, तो मुझे बताया होता, मैं ही दो-चार सियार मारकर ले आता। अब भी चिंता मत करो। सामने एक सियार आ रहा है, मैं अभी उसे मारता हूँ और उसका कलेजा निकालकर बच्चों को देता हूँ।’’

सियार ने जब यह सुना तो डर के मारे दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ।

एक बंदर ने उसको भागते हुए देखा तो उससे पूछा, ‘‘ओ सियार दा, ओ सियार दा! ऐसे क्यों भाग रहे हो? कौन पड़ा है तुम्हारे पीछे?’’ सियार हाँफते हुए बोला, ‘‘क्या बताऊँ बंदर भाई, एक बकरा मेरे पीछे पड़ा हुआ है। वह मुझे मारकर मेरा कलेजा निकालना चाहता है, अपने बच्चों को खिलाने के लिए।’’

‘हो-हो-हो’ हँसते हुए बंदर बोला, ‘‘सियार दा, लगता है, तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। घास खानेवाला बकरा भी कहीं सियार को मार सकता है भला?’’

सियार ने कहा, ‘‘बंदर भाई, मैं तो अपने कानों से सुनकर आ रहा हूँ।’’

बंदर ने कहा, ‘‘सियार दा, मुझे भी तो दिखाओ इस सियार मारनेवाले बकरे को।’’

डर से सिहरते हुए सियार बोला, ‘‘नहीं भाई, मैं तो नहीं जाता। मुझे अपने प्राण नहीं गँवाने हैं।’’

बंदर ने कहा, ‘‘कैसी बातें करते हो, सियार दा! बकरा तुमको चकमा दे रहा है। डरो मत। फिर मैं भी तो तुम्हारे साथ हूँ।’’

बंदर के बहुत कहने पर सियार राजी तो हो गया, लेकिन उसकी एक शंका बनी रही। वह बोला, ‘‘कहीं ऐसा न हो कि बकरे ने हमला किया और तुम भाग निकले। मैं तो फिर अकेला ही रह जाऊँगा।’’

‘‘नहीं भागूँगा, सियार दा। अगर विश्वास न हो तो अपनी पूँछ मेरी पूँछ से बाँध लो।’’

बंदर के ऐसा कहने पर सियार ने अपनी पूँछ उसकी पूँछ से बाँध ली और दोनों साथ-साथ बकरे की तरफ चले।

हिरणा ने उनको आते देख लिया था। जब वे थोड़ा पास पहुँचे तो हिरणा ने जोर से कहा, ‘‘ओ मंजरी-ओ मंजरी! बच्चों को चुप कराओ। वह देखो, हमारे मित्र बंदरजी एक सियार को पूँछ से बाँधे ले आ रहे हैं। अभी मैं उस सियार का कलेजा निकालकर बच्चों को देता हूँ।’’

इतना सुनते ही सियार ठिठक गया। हिरणा ने फिर कहा, ‘‘अरे ओ बंदर भाई! मनसुख को कहाँ छोड़ आए? तुम तो मनसुख के साथ सात सियार मारने निकले थे। तुम तो एक ही पकड़कर ला रहे हो। बाकी क्या मनसुख मारकर ला रहा है?’’ यह सुनकर सियार को पूरा विश्वास हो गया कि बंदर उसको धोखा देकर यहाँ लाया है। अब ये लोग उसे मारने वाले हैं। वह प्राणों के डर से भागा। अंधाधुंध भागा। पूँछ से बँधा बंदर भी उसके पीछे घसीटता चला गया। भागते-भागते सियार को ठोकर लगी और वह पहाड़ से नीचे लुढ़क गया। उसकी पूँछ से बँधा बंदर भी उसके साथ ही लुढ़का। लुढ़कते-लुढ़कते दोनों एक चट्टान से टकराकर मर गए।

मनसुख और मंजरी ने हिरणा दादा को धन्यवाद दिया और वह आगे चल पड़ा, फिर किसी दुखिया की सहायता करने। मनसुख और मंजरी निर्भय होकर चैन से अपने बच्चों का लालन-पालन करने लगे।

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