उदयपुर व आबू की यात्रा

उदयपुर व आबू की यात्रा

योंतो भारत विविधता का संगम है। यहाँ नाना भाषा, बोली, वेषभूषा, नाना पंथ, समुदाय जीवन जीते हैं। बोली के विषय में तो यहाँ तक कहा जाता है, ‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी’। भिन्न खान-पान, भिन्न रहन-सहन होते हुए भी इसका मूल एक है। यह बात कमोबेश इसके प्रदेशों पर भी सटीक बैठती है। विशेषरूप से राजस्थान के विषय में तो यह अक्षरशः सत्य है।

बात २०११ की है। जयपुर में हम निजानंदियों का एक धार्मिक कार्यक्रम था, उसमें जाना था, इसलिए हम घर से कार्यक्रम से कई दिन पूर्व ही चल पडे़ और पहुँच गए उदयपुर, जो वीरता के स्तंभ उदयसिंह के नाम पर है। वही उदयसिंह, जिसकी रक्षा हेतु उनकी धाय माँ ने न केवल अपनी स्वामिभक्ति, देशप्रेम, त्याग और बलिदान की ऐसी मिसाल कायम की जो आज सदियों बाद भी राजस्थानी इतिहास की अनुपम धरोहर है, जिसकी कर्तव्यनिष्ठा हर नर-नारी की प्रेरणास्रोत है। ऐसी महान् नारी के समक्ष शीश स्वतः श्रद्धा से झुक जाता है। शायद ऐसी ही नारियों के कारण प्रसादजी कह उठे थे, ‘नारी, तुम केवल श्रद्धा हो।’

हाँ जी तो, मैं बता रही थी कि हम जयपुर से पहले उदयपुर पहुँच गए, जबकि उदयपुर इससे पहले भी हम जा चुके थे अर्थात् यह हमारी उदयपुर की दूसरी यात्रा थी। कारण कि जब पहली बार उदयपुर से देहली आ रहे थे, तो ट्रेन में एक व्यक्ति से भेंट हुई, जो अपनी नौ-दस वर्षीय पुत्री के पैरों का ऑपरेशन कराकर आ रहा था। उससे ज्ञात हुआ कि वह भी उदयपुर से ही आ रहा है। वहाँ नारायण सेवा संस्थान है, जो गरीबों का मसीहा है, बिना किसी खर्च के ऑपरेशन कराता है। साथ ही, रहने व खाने का खर्च भी उठाता है। तब से ही मन में था कि हम उदयपुर के बहुत से स्थल देख आए, लेकिन ‘नारायण सेवा संस्थान’ नहीं देखा, वहाँ के सेवाभावियों के दर्शन नहीं किए। बस अपनी इसी लालसापूर्ति हेतु हमारा यह उपक्रम था।

वहाँ पहुँचने पर हम अपनी पूर्वपरिचित धर्मशाला में गए। सामान्य औपचारिकताओं के बाद सामान एक कक्ष में स्थापित किया और निकल पडे़ ‘नारायण सेवा संस्थान’ के लिए। एक ऑटोरिक्शा वाले ने हमें वहाँ पहुँचा दिया। देखा कि संस्थान के बाहर काफी लोग हैं। कुछ लोग पंक्तियों में खडे़ हैं, एक ओर रोगी बच्चे हैं। वहाँ के कार्यकर्ता थोड़ी लिखा-पढ़ी जैसी औपचारिकताओं की पूर्ति कर रहे हैं। हम भी उनके पास पहुँच गए और संस्थान में प्रवेश की अनुमति लेकर अंदर चले गए। एक कक्ष से दूसरे कक्ष, सभी में ऑपरेशन किए जा चुके बच्चे व किशोर थे। उनके साथ उनकी माँ या माँ सरीखी परिचारिका। एक कक्ष में भगवान राम, कृष्ण, हनुमान व महादेव जैसे देवों की सुंदर प्रस्तर प्रतिमाएँ भी स्थापित थीं, जिससे वह कक्ष देवालय के रूप में प्रतिष्ठित था। घूमते हुए हम ऊपर की मंजिल पर भी पहुँच गए। एक कक्ष की खुली छत पर खडे़ हुए हमने देखा कि दूसरी छत पर एक व्यक्ति टहल रहा है, जिसके साथ एक सहायक जैसा व्यक्ति भी है। पूछने पर ज्ञात हुआ कि वे मानवजी हैं, जो इस संस्थान के संस्थापक व संचालक हैं और वे सूरदास हैं। हम आश्चर्य व श्रद्धा से भर उठे। नीचे उतरते समय हमने एक-दो अभिभावकों से जानना चाहा कि वे कहाँ से और क्यों आए हैं? दूसरे-दूसरे प्रदेशों से आए उन अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चे की दोनों टाँगें पोलियोग्रस्त होने से वह चल-फिर नहीं सकता था। यहाँ आकर वह ठीक हो गया। जब खर्च के विषय में पूछा तो उन्होंने भी वही बताया, जो ट्रेन में मिले यात्री ने बताया था, जिससे यह विश्वास दृढ़ हो गया कि मानवजी स्वयं ज्योतिविहीन होकर भी न जाने कितने परिवारों को खुशियाँ बाँट रहे हैं। भगवान को दीनबंधु, दीनानाथ कहा जाता है, पर यहाँ मानवजी प्रत्यक्ष में इन विशेषणों को चरितार्थ कर रहे हैं। उनके अथक प्रयास व दृढ़संकल्प से संस्थान का विस्तार होते-होते कई भवन बन गए हैं, जिनमें सभी प्रकार के संसाधन जुटाए गए हैं, जिससे दूर-दराज से आए किसी भी रोगी व उसके तीमारदार को कोई कष्ट न हो। उनका पुत्र, पत्नी, यों कहूँ कि सारा परिवार व अन्य सेवाभावी जन संस्थान के प्रति समर्पित हो सेवाकार्य में लीन हैं। यहाँ तक कि अगर कोई किशोर या युवा स्वस्थ होकर वहीं रहना चाहे, तो रह सकते हैं; वहाँ रहकर लघुशिल्प सीखकर स्वावलंबी भी हो सकते हैं। इतना सब देख-सुनकर हमने भी उस परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की कि ऐसे सेवाभावी मानवजी जैसे मानव को भी वह ज्योति प्रदान करे।

संस्थान के साथ ही एक मंदिर था, जिसमें शिव के विभिन्न रूप आकार पाए थे, उसके भी दर्शन करते हुए हम अपने पड़ाव पर आ पहुँचे। थोड़ा विश्राम और रात्रि भोजन। यहाँ के दर्शनीय स्थल तो पहली यात्रा में देख चुके थे, इसलिए पुनः इन्हीं स्थलों को देखने की अपेक्षा हमने आबू जाने का निर्णय लिया। रात्रि में ही हम बस में सवार हो गए। यह रात्रि-यात्रा होने के बस-पथ के आस-पास के दृश्यों की तो हम जानकारी नहीं ले पाएँगे, इसलिए इस समय में मैं उदयपुर के देखे गए स्थलों को आपसे परिचय कराती हूँ।

पहला दर्शनीय स्थल जगन्नाथजी का मंदिर, राजस्थान के भव्यतम व विशालतम मंदिरों में से एक। शिल्पकला की दृष्टि से भी अनुपम व अनूठा। इसके निर्माण का श्रेय जाता है महाराजा जगत सिंह को, जिन्होंने सन् १६५१ में १५ लाख रुपयों की राशि से इसे निर्मित कराया। इस मंदिर की दीवारों पर भी दर्शनीय व आकर्षक खुदाई व रंगों का संयोजन है। भगवान् विष्णु ही जगन्नाथ स्वरूप में यहाँ प्रतिष्ठित हैं। जब-जब भी मैं इस प्रकार के देवालयों, ऐतिहासिक भवनों की शिल्पकला, स्थापत्यकला, मूर्तिकला व चित्रकला को देखती हूँ तो देखती ही रह जाती हूँ। अपने भारतीय कलाकारों के कारण गौरवान्वित अनुभव करती हूँ और ऐसे उन कलाकारों व शिल्पकारों को नमन करती हूँ, जिन्होंने अपने कौशल से जड़ पाषाण को भी सजीव कर उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी है।

इस मंदिर के दर्शनों के बाद हम पहुँचे, सहेलियों की बाड़ी। यों तो यह एक वाटिका है, जिसमें तरह-तरह के पुष्पों की मादक गंध किसी को भी आनंदित करने में सक्षम है, लेकिन यहाँ तो फव्वारों से युक्त जलाशय व घास के मैदान भी हैं, जिनपर कभी राजकुमारियाँ अपनी सहेलियों के साथ जलक्रीड़ा हेतु आया करती थीं। उनकी सजीव सी प्रतिमाएँ भी यहाँ इस अंदाज में खड़ी दिखती हैं, मानो वे अभी दौड़कर अपनी सखी को पकड़ लेंगी और जलक्रीड़ा का आनंद भी लेंगी। जिस प्रकार कभी राजकुमारियाँ खेल के साथ ग्रीष्म की तपन से अपने को बचा पाती थीं, उसी प्रकार पर्यटक भी यहाँ पहुँचकर राजस्थान की गरमी को भूल जाता है।

उदयपुर का महाराणा प्रताप स्मारक फतहसागर झील के किनारे मोती नगरी पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ चेतक पर सवार महाराणा की कांस्य मिश्रित प्रतिमा पर्यटकों का मन मोह लेती है। यहाँ भी उद्यान में फूलों की क्यारियाँ व फव्वारों युक्त जलाशय इसके सौंदर्य को द्विगुणित करते हैं। उदयपुर के नगररूप में स्थापित होने से पूर्व महाराणा उदयसिंहजी इसी स्थान पर रहा करते थे। उनके महल के अवशेष आज भी यहाँ देखे जा सकते हैं। बाद में उन्होंने यह नगर बसाया।

इसके बाद हमने फतहसागर झील को देखा, जो तीन ओर से पहाड़ी से व एक ओर मोती नगरी से घिरी है। महाराणा फतहसिंह ने इस झील का पुनरुद्धार १७५४ ई. में कराया, क्योंकि महाराणा जयसिंह द्वारा निर्मित झील उचित रखरखाव व अतिवृष्टि के कारण नष्टप्राय हो गई थी, यों कह सकती हूँ कि लुप्त होने के कगार पर थी। फतहसिंह द्वारा पुनर्जीवन दिए जाने के कारण उन्हीं के नाम से विख्यात हो गई। १८०० लंबी ३० गहरी यह झील नगर को रेगिस्तान से निजात दिलाती पूरे साजो-सामान के साथ पर्यटकों को आकर्षित करने में समर्थ है।

हमारा अंतिम पड़ाव लोककला मंडल था, जहाँ पहुँचकर हमने अनुभव किया कि यह लोककला मंडल सही अर्थों में भारतीय लोक कलाओं को संरक्षित कर उन्हें संजीवनी दे रहा है। यहाँ विभिन्न वेशभूषाओं में कठपुतलियाँ तरह-तरह के लोकनृत्य प्रस्तुत करती हैं। कभी बचपन में कठपुतलियों का नृत्य अभिनय देखा था, तब यह समझ नहीं आया था कि ये निर्जीव हैं या सजीव। यहाँ भी कठपुतलियों द्वारा जो प्रस्तुति दी गई, वह सराहनीय है, क्योंकि उसे देखते हुए हम एक अलग भावलोक में खो गए थे। यहाँ लोककलाओं से संबंधित चित्र, मूर्तियाँ, मॉडल वस्त्र व आभूषण आदि सभी संगृहीत हैं। रखरखाव की दृष्टि से भी यह प्रशंसनीय है।

हाँ, तो हमारी बस माउंट आबू के लिए बढ़ रही थी। लगभग प्रातः के तीन बजे हम लोग आबू रोड पहुँच गए। यों तो रास्ते भर यात्री उतरते-चढ़ते रहे, लेकिन यहाँ आकर तो हमें छोड़कर सभी यात्री उतर गए, जिससे हमने सोचा कि शायद यही बस का अंतिम पड़ाव है, हम भी उतरे और कंडक्टर के पास जाकर पूछा कि भई, आ गए क्या आबू? उत्तर ‘न’ में था। अभी २८ कि.मी. पीछे थी बस, इसलिए पुनः बस में बैठ गए और फिर रेहड़ीवालों से चना-चबैना, चिप्स आदि ले आए। दरअसल यही पश्चिम रेलवे की मीटर गेज लाइन अहमदाबाद-दिल्ली का ‘आबू रोड स्टेशन’ है। यहाँ से लगभग साढे़ चार बजे, डेढ़ घंटे के ठहराव के बाद बस पुनः चली। तब तक उसमें १५-२० यात्री और दाखिल हो गए थे। हम अपने गंतव्य पर पहुँच गए, बस से उतरे और ढाबेनुमा एक चायवाले की दुकान पर पहुँच गए। वहीं गरमागरम चाय की चुस्कियाँ लीं, साथ ही वहाँ के दर्शनीय स्थलों की जानकारी भी।

दिसंबर का महीना, तिस पर हम पहुँच गए राजस्थान के एकमात्र पर्वतीय क्षेत्र आबू। राजस्थान की मरुस्थली होने के सत्य को झुठलाता, तपती रेत का भ्रम तोड़ता यह शहर आबू नदी, झील व झरनों के उपहारों से मालामाल आबू, हिंदू व जैन धर्माबलंबियों की आस्था का बेजोड़ उदाहरण आबू राजस्थान का सिरमौर, मानव मन की सारी अवधारणाओं पर प्रहार करता आबू, वहाँ हम पहुँचे खडे़ हैं। सिरोही जिले में स्थित यह पठारी शहर प्रकृति व अध्यात्म का बेजोड़ नमूना, जिसे देखने-परखने की ललक में हम उस समय की शीत को भी मात दे गए और बढ़ चलें अर्बुद विश्वनाथ मंदिर की ओर।

शिव का यह मंदिर प्राचीन व भव्य है शिवलिंग को एक ऊँचे पीठ पर स्थापित किया गया है यहीं से हम कात्यायनी शक्तिपीठ पहुँचे, इसी को अर्बुदा देवी का मंदिर कहा जाता है। यह एक ऊँचे पहाड़ पर एक विशाल चट्टान के नीचे स्थापित किया गया है, इस मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत छोटा है, जिसमें बैठकर या काफी झुककर प्रवेश कर पाते हैं। मंदिर में बनी यह प्रतिमा पृथ्वी से कुछ ऊपर होने के कारण इसे अधर देवी का मंदिर भी कहते हैं। इसके बाद हम पहुँचे ओऽम शांति भवन। यहाँ प्रवेश करते ही घोड़ों की पाँच प्रतिमाएँ दृष्टिगत होती हैं, जिन्हें एक जंजीर से पकड़ा गया है। पूछने पर ज्ञात हुआ कि ये अश्व मानव की पाँच इंद्रियों के प्रतीक हैं, जिन्हें आत्मरूपी जंजीर जकडे़ हुए है।

यह भवन नवनिर्मित व स्तंभरहित है, तीन-चार हजार व्यक्तियों को बैठा सकता है, इसलिए एशिया के पाँच विशाल भवनों में से एक, भारत के तीसरे और प्रदेश के पहले स्थान पर है। अपने नाम की सार्थकता सिद्ध करता शांति प्रदाता भी है।

शांति भवन से शांति समेटते हुए हम पहुँच गए शिव मंदिर। यह अचलेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है, जो प्रवेश द्वार के दोनों ओर गज प्रतिमाओं से सुशोभित है। प्रवेश करते ही पीतल की पत्तर चढ़ी नंदी की प्रतिमा दीख पड़ती है। शिवलिंग के स्थान पर महादेव के चरण के अँगूठे की पूजा होती है, क्योंकि यहाँ शिवलिंग न होकर महादेव के अँगूठे से बना एक कुंड है। मान्यता है कि यह कुंड महादेव के अँगूठे से ही बना है। यहाँ से हम पहुँच जाते हैं दत्तात्रेय मंदिर, जो विष्णु के स्वरूप हैं। हिमालय व नीलगिरि पहाडि़यों के मध्य सबसे ऊँचे शिखर पर है, इसलिए इसको ‘गुरु शिखर’ भी कहा जाता है।

१५० सीढि़याँ चढ़ने पर मंदिर के दर्शन होते हैं, जहाँ चरण पादुकाएँ अंकित हैं। मंदिर में एक प्राचीन व विशाल पीतल का घंटा है, जिस पर सन् १४११ का लेख खुदा है। १४वीं सदी के धर्म सुधारक स्वामी श्री रामानंदजी व समाज-सुधारक संत कबीरजी के गुरु के पदचिह्न भी यहाँ अंकित हैं।

गुरु शिखर की चढ़ाई व दर्शनों के बाद हम पहुँच जाते हैं ‘ब्रह्म कुमारी पीस पार्क’, जो बहुत सुंदर व आकर्षक उद्यान के रूप में विकसित किया गया है। स्थान-स्थान पर संकेत चिह्न मार्गदर्शन हेतु लगाए गए हैं। अनेक प्रकार के फूलों की सुगंध सारे उद्यान को सुगंधित कर रही है, बीच-बीच में फव्वारों से निकलती जलफुहारें किसी भी पथिक की थकान को दूर करने में समर्थ हैं। यहाँ कई बड़े-बडे़ हॉल हैं, जिनमें आत्मा-परमात्मा व अध्यात्म ज्ञान को परदा पर चलचित्र की भाँति दरशाया जाता है, हमने भी उसका रसपान किया। एक उत्तम पिकनिक स्थल भी है, इस प्रकार यह पार्क लौकिक व पारलौकिक आनंद का संगम है। इस आनंद रस से सराबोर हो हम पहुँच जाते हैं आबू की नक्की झील, जो चारों ओर ऊँची-ऊँची पहाडि़यों से घिरी हरे-भरे पेड़ों की कतारों से सजी नयनाभिराम हो जाती है, जिस पर झील की सैर करने को तत्पर खड़ी रंग-बिरंगी नौकाएँ इसके सौंदर्य को चार चाँद लगाती हैं। बीच में एक फव्वारा व जलपान गृह पर्यटकों को अधिकाधिक आने का निमंत्रण देता है।

इस सबके बाद जो देखा—अद्भुत, अनुपम, दिलवाड़ा के जैन मंदिर। सफेद संगमरमर से बने इनके भवन शिल्प व स्थापत्य कला की अनुपम धरोहर हैं। ये मंदिर डाकघर से उत्तर की ओर जाती सड़क पर तीन कि.मी. की दूरी पर दिलवाड़ा ग्राम में स्थापित हैं। पाँच मंदिरों का समूह है दिलवाड़ा के मंदिर। पहला मंदिर गुजरात के महाराजा भीम के मंत्री विमलशाह द्वारा निर्मित विमलवसहि शिल्पकला का भव्य मंदिर है। १०३१ ई. में बनकर तैयार हुए इस मंदिर में उस समय १८ करोड़ ५३ लाख रुपए की राशि खर्च हुई। कहा जाता है कि विमलशाह ने अनेक युद्ध किए, जिसमें असंख्य मानवों के साथ असंख्य जीव भी काल कवलित हुए। अपने को उसका भागीदार मानते हुए श्री सूरीश्वर महाराज की प्रेरणा से प्रायश्चित्त स्वरूप एक भव्य मंदिर निर्माण का बीड़ा उठाया, किंतु यह क्षेत्र हिंदुओं की पवित्र तीर्थ भूमि होने के कारण ब्राह्मणों ने इसका विरोध किया। लेकिन राजा ने इस सारी भूमि का स्वर्ण मोहरों से ढककर विरोध को भी अपने पक्ष में कर लिया। फलतः यहाँ प्रथम मंदिर तीर्थंकर ऋषभदेवजी (आदिनाथ) को समर्पित है। मुख्य मंदिर का मंडप अष्टकोणीय है व ४८ स्तंभयुक्त है, जिसकी लहरदार मेहराबें एक-दूसरे से मिलती हैं। इसमें संगमरमर के ११ केंद्रगामी छल्लों द्वारा निर्मित छत पर मानव, हाथी व अन्य प्राणियों की सजीव सी मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के मुख्यद्वार के सामने ही स्थित हस्तिशाला में १० हाथियों की प्रतिमाओं के मध्य विमलशाह की अश्वारोही प्रतिमा स्थापित है।

दूसरा मंदिर लूणवसहि, पहले मंदिर के दो सौ वर्ष बाद, लूणवेश के दो भाइयों ने सन् १२३० में १२ करोड़ ५३ लाख की राशि से बनवाया। इस मंदिर को श्रेष्ठ शिल्पकार शोमनदेव व उसके १,५०० कारीगरों ने अपनी कला के बेजाड़ नमूने के रूप में तैयार किया व भगवान नेमिनाथ को समर्पित किया। यह पहले मंदिर से कुछ छोटा किंतु शिल्पकला में उसे मात देता प्रतीत होता है। इसकी दीवारें, तोरण, स्तंभ व छत के गुंबजों पर बेलबूटे, फूल-पत्ती, हाथी-घोडे़ व बाघ-सिंह आदि की आकृतियाँ उकेरी गई हैं। नर-नारी, देवी-देवताओं की मर्तियों के साथ-साथ राजदरबार, विवाहोत्सव व बारात आदि के दृश्यों को जीवंतता के स्तर पर दरशाया गया है, जिन्हें देखते हुए हम किसी स्वप्नलोक में विचरण करने जैसी अनुभूति करने लगे।

इस मंदिर के गूढ़ मंडप के मुख्य दरवाजे के बाहर नव चौकी द्वार में दोनों ओर दो अप्रतिम गोखले (आले) बनाए गए हैं, जो देवरानी व जेठानी की स्पर्धा के प्रमाण हैं। दो भाई निर्माण करा रहे हैं। छोटा भाई अपनी पत्नी के लिए गोखड़ा बनवाए तो बडे़ भाई की पत्नी के लिए न बने, यह कैसे हो सकता है? यों भी वह बड़ी है, जेठानी है।

इस मंदिर की गजशाला में दस खंड हैं, जिनमें से प्रत्येक पर एक-एक संगमरमर की गज प्रतिमा और उन गजों पर वस्तुपाल व तेजपाल जैसा योद्धाओं की प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर को तेजपाल मंदिर भी कहा जाता है।

लूणवसहि के दक्षिणी दरवाजे के बाहर दाईं ओर दादा साहब की पालकी व बाईं ओर चबूतरे पर कीर्ति स्तंभ खड़ा है। लूणवसहि से निकलने पर दाईं ओर श्वेतांबर मंदिरों की परिधि में बना यह एक दिगंबर जैन मंदिर है, जिसमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की एक सौ आठ मन वजनी पीतल की प्रतिमा स्थापित है।

एक मंदिर में काले संगमरमर से निर्मित तीन तल के चौमुखे मंदिर में जैन प्रतिमाएँ हैं। यह मंदिर यों तो पार्श्वनाथ को समर्पित है, इसलिए उनकी चौमुखी प्रतिमा प्रतिष्ठित है, लेकिन अन्य तीर्थंकरों व अश्वों आदि की प्रतिमाएँ भी हैं। इस मंदिर के निर्माण के विषय में कहा जाता है कि धनाभाव के कारण इस मंदिर का कार्य अपूर्ण रह गया है, जिसे उसके सेवाभावी शिल्पकारों ने अपनी आस्था व स्वामिभक्ति के कारण बिना पारिश्रमिक लिये अधूरे कार्य को संपन्न कर एक भव्य मंदिर बनाया।

दिलवाड़ा के मंदिरों की जितनी प्रशंसा की जाए, कम ही होगी। दिलवाड़ा के ये मंदिर किसी का भी दिल जीतनेवाले हैं। अपनी शिल्पकला, आस्था, समर्पण, रंगों के संयोजन, चित्रों के अंकन, सभी में अद्भुत व अनुपम। लगा कि माउंट आबू की यह यात्रा चिरस्मरणीय हो गई और हमारा उदयपुर आना सार्थक हुआ। उन्हीं विभिन्न भावों से भरे हम विवश से अपने जयपुर के कार्यक्रम के लिए चलने को विवश थे। सो चल पडे़ और वहाँ के त्रिदिवसीय आयोजन का आनंद लेकर अपने गृह नगर पटियाला लौट आए, क्योंकि आरक्षण की नियत तिथि पर यहाँ पहुँचना भी आवश्यक होता है।

२८-बी, प्रेमनगर,

पटियाला-१४७००१ (पंजाब)

दूरभाष : ०९४१७०८८४६६

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