राजस्थान के विश्वप्रसिद्ध लोक-वाद्ययंत्र

राजस्थान के विश्वप्रसिद्ध लोक-वाद्ययंत्र

विश्व में अपनी अनोखी आन-शान-बान और पहचान रखनेवाला देश के क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य ‘रंगीले राजस्थान’ का महत्त्व संपूर्ण देश में ही नहीं, वरन् दुनिया में अद्वितीय है। चाहे यहाँ की संस्कृति, साहित्य, स्थापत्य कला, शिल्पकला, तीज-त्योहार, पहनावा, भोजन, शूरवीरता, दानशीलता, वैज्ञानिकता, लोक-नृत्य, लोकगीत, लोक-संगीत एवं सुरीले विलक्षण लोक-वाद्ययंत्र ही क्यों न हों, सब की खासियत अलग ही है। हर्ष का विषय है कि इन्हीं अनेकानेक विशिष्टताओं से भरा राजस्थान आज पर्यटन की दृष्टि से विश्व के मानचित्र पर आ चुका है।

गौरवमयी राजस्थान में उल्लास का रंग बिखेरते लोक-वाद्य हमारी सांस्कृतिक पहचान भी हैं। संगीत प्रकृति के कण-कण में रचा-बसा है। पक्षियों का कलरव, भौंरों का गुंजन, बादलों का गर्जन, पत्तों की सरसराहट और नदियों के जल की कल-कल का कर्णप्रिय संगीत सदैव ही प्रात्रिमात्र को आह्लादित करता है। संगीत मानव-मन की  सुंदर अभिव्यक्ति है। परंपरा और धरोहर से साक्षात् कराते, लोक-जीवन में समरसता लाते वाद्य यंत्र संगीत के प्राण हैं। शिव का डमरू, कृष्ण की बाँसुरी, मीरा का इकतारा, अर्जुन का पाँचजन्य (शंख) और सरस्वती की वीणा वाद्ययंत्रों की दिव्यता सिद्ध करते हैं। सुर, लय और ताल से सजे राजस्थानी लोकवाद्यों की स्वर लहरियाँ समृद्ध परंपरा की प्रतीक हैं। माटी की सौंधी महक के ताने-बाने से बने राजस्थान के लोकवाद्य अपना एक अलग स्थान रखते हैं। जन-मन को झंकृत करते इन लोक-वाद्यों ने बड़ी ख्याति अर्जित की है। राजस्थान लोक-वाद्यों की मुख्यतः तीन श्रेणियाँ हैं—तार वाद्य, फूँक वाद्य तथा खाल से गढ़े वाद्य। तार वाद्य—जैसे भपंग, इकतारा, सारंगी, रावण हत्था इत्यादि। फूँक वाद्य—अलगोजा, शहनाई व मोरचंग इत्यादि। खाल वाद्य—ढोलक, नौबत, नगाड़ा इत्यादि।

भपंग—भपंग डमरू के आकार का एक देसी साज है। यह वाद्य कटे हुए तूंबे से बना होता है, जिसके एक सिरे पर चमड़ा मढ़ा होता है। चमड़े में एक छेद निकालकर उसमें जानवर की आँत का तार अथवा प्लास्टिक की डोरी डालकर उसके सिरे पर लकड़ी का टुकड़ा बाँध दिया जाता है। वादक इस वाद्य को काँख में दबाकर एक हाथ से उस डोरी या ताँत को खींचकर या ढीला छोड़कर उसपर दूसरे हाथ से लकड़ी के टुकड़े से प्रहार (आघात) करता है। तन-मन में थिरकन पैदा करता यह वाद्य मेवात इलाके में विख्यात है।

इकतारा—प्राचीन वाद्य इकतारा भारत का अति लोकप्रिय तंतु वाद्य है। इसका दंड बाँस का बना होता है। गोल तूंबे में एक बाँस फँसा दिया जाता है। इसके नीचे तुंबड़ा लगाते हैं। तुंबड़े का कुछ भाग काटकर उस पर चमड़ा मढ़ देते हैं। इसके ऊपर फौलाद के तार चढ़ाते हैं। यह वाद्ययंत्र एक हाथ से ही बजाया जाता है। इसे संस्कृत ग्रंथों में तंत्रीवीणा भी कहा जाता है। प्राचीनकाल में संगीतकार भी इसका रियाज करते थे। इकतारा घुमक्कड़ साधुओं के पास प्राप्त होता है, जिस पर वे स्वांतः सुखाय भजन गा लिया करते हैं। कृष्ण-भक्ति में लीन मीराबाई के हाथ में इकतारा शोभायमान रहता था।

रावण हत्था—भोपों का प्रमुख वाद्य है रावण हत्था। पाबूजी की फड़ पूरे राजस्थान में विख्यात है, जिसे भोपे बाँचते हैं। ये भोपे विशेषकर थोरी जाति के होते हैं। भारतीय संस्कृति की इस ऐतिहासिक धरोहर को वर्षों से उन्होंने अपनी परंपरा में सँभालकर रखा और विकसित किया है। फड़ कपड़े पर पाबूजी के जीवन-प्रसंगों के चित्रों से युक्त एक पेंटिंग होती है। भोपे पाबूजी की जीवनकथा को इन चित्रों के माध्यम से कहते हैं और गीत भी गाते हैं। फड़ के सामने ये नृत्य भी करते हैं। ये गीत रावण हत्था पर गाए जाते हैं, जो सारंगीनुमा वाद्ययंत्र होता है। यह भोपों का प्रमुख वाद्य है, जिसकी बनावट सरल है, लेकिन सुरीलापन अनूठा है। इसमें नारियल की कटोरी पर खाल मढ़ी होती है, जो बाँस के साथ लगी होती है। बाँस में जगह-जगह खूँटियाँ लगी होती हैं, जिनमें तार बँधे होते हैं। दो मुख्य तारों में से एक घोड़े की पूँछ का बाल व एक लोहे या स्टील का तार होता है। साथ ही ३ से १३ तक अन्य सहायक तार भी ब्रिज के ऊपर लगे होते हैं। यह वायलिन की तरह गज या कमान से बजाया जाता हैं। इसमें एक सिरे पर घुँघरू बँधे होते हैं। बजाते समय हाथ के ठुमके से घुँघरू भी बजते हैं।

मशक—मशक भैंरूजी के भोपों का प्रमुख वाद्य है। चमड़े की सिलाई कर बनाए गए इस वाद्य में एक सिरे पर लगी नली से मुँह से हवा भरी जाती है तथा दूसरे सिरे पर लगी अलगोजेनुमा नली से स्वर निकाले जाते हैं। इसके स्वर पूँगी की तरह सुनाई देते है।

सारंगी—संगत वाद्य के रूप में बजाए जानेवाली सारंगी के राजस्थान में विविध रूप दिखाई देते हैं। लोक-कलाकार इसे बड़े चाव से बजाते हैं। मारवाड़ के जोगियों द्वारा गोपीचंद भृर्तहरि, निहालदे आदि के खयाल गाते समय इसका प्रयोग किया जाता है। मीरासी, लंगे, जोगी, मांगणियार आदि कलाकार सारंगी के साथ ही गाते हैं। सारंगी सागवान, कैर तथा रोहिड़ा की लकड़ी से बनाई जाती है। सारंगी के तार बकरे की आँत के और गज में घोड़े की पूँछ के बाल बँधे होते हैं। इसे बिरोजा पर घिसकर बजाने पर ही तारों से ध्वनि उत्पन्न होती है। कानों में मिश्री घोलती सारंगी की धुन मन मोह लेती है।

रबाब—सर्वप्रथम अहोबल द्वारा चरित ‘संगीत पारिजात’ नामक ग्रंथ में रबाब का उल्लेख मिलता है। इसका पेट सारंगी से कुछ लंबा त्रिभुजाकार तथा डेढ़ गुना गहरा होता है। शास्त्रीय संगीत का वर्तमान सरोद इसी का परिष्कृत रूप है। इसमें तीन से सात तार तक होते हैं। इसे जवा से बजाया जाता है। यह एक तत् लोकवाद्य है। इसकी मधुर तान दिन भर की थकान दूर कर देती है।

कमाँयचा—कमाँयचा लंगा, मांगणियार कलाकारों की पहचान है। यह सारंगी की तरह का एक वाद्ययंत्र है, जो रोहिड़े या आक की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें जानवर की खाल लगाई जाती है। इसमें तीन मुख्य तार लगे होते हैं, जो पशुओं की आँत के होते हैं। साथ ही चार सहायक स्टील के तार ब्रिज के ऊपर लगे होते हैं। इसकी लकड़ी की गज या कमान भी घोड़े के बाल की बनती है। यह जैसलमेर-बाड़मेर के मांगणियारों के द्वारा बजाया जाता है।

सुरनाई—सुरनाई बनाने में शीशम, सागवान, टाली की लकड़ी का प्रयोग होता है। पीतल एवं ताँबे की नलीवाली सुरनाई शहनाई के समान होती है। जहाँ शहनाई शास्त्रीय वाद्य है, वहीं सुरनाई लोकवाद्य है। सवा फुट, लंबाई का यह लोक-वाद्य दो रीड का होता है, जो खजूर या ताड़ वृक्ष की पत्ती की बनती है। इसे बजाते समय रीड को पानी से गीला किया जाता है। यों तो सुरनाई पूरे राजस्थान में प्रचलित है, लेकिन मुख्य रूप से जोगी, भील, ढोली तथा जैसलमेर क्षेत्र के लंगा लोग इसे बजाते हैं।

मांगणियार गायकों के प्रमुख वाद्यों में सारंगी, कमाँयचा, खड़ताल, मोरचंग, ढोलक, भपंग, मटका, मुरली और सुरनाई आदि हैं।

अलगोजा—अलगोजा वादन से १९८२ के दिल्ली एशियाड का शुभारंभ हुआ था। प्रसिद्ध फूँक वाद्य अलगोजा बाँसुरी की तरह का होता है। इसमें सात छिद्र होते हैं। वादक दो अलगोजे मुँह में रखकर एक साथ बजाता है। एक अलगोजे पर स्वर कायम किया जाता है तथा दूसरे पर बजाया जाता है। यह वाद्य केर व बाँस अथवा सुपारी की लकड़ी से बनाया जाता है। इसे चरवाहों तथा राणका फकीरों का वाद्य कहा जाता है।

शहनाई—शहनाई एक लोकप्रिय मांगलिक वाद्य है। विवाह आदि प्रमुख अवसरों पर शहनाई वादन पूरे माहौल को एक अलग रंग में सराबोर कर देता है। चिलम की आकृति का यह वाद्य पीतल, ताँबे, शीशम या सागवान की लकड़ी से बनाया जाता है। वाद्य के ऊपरी सिरे पर ताड़ के पत्ते की तूँती बनाकर लगाई जाती है। फूँक देने पर इसमें से मधुर स्वर निकलता है।

मोरचंग—मोरचंग/मुरचंग लंगा गायक समुदाय का पारंपरिक वाद्ययंत्र है। ‘संगीत परिजात’ नामक ग्रंथ में इसे मुखचंग बताया गया है। मोरचंग लोहे का एक यंत्र है, जो काफी छोटा होता है तथा कैंची जैसा दिखता है। इस यंत्र को दाँतों के बीच रखकर बाएँ हाथ से पकड़ा जाता है। दाएँ हाथ की उँगलियों से बजाते हुए साँसों को अंदर या बाहर खींचने पर इस यंत्र से धुनें निकलती हैं। घरासिया, कालबेलियों द्वारा बाँस का मुरचंग बजाया जाता है, जिसे ‘घुरालियो’ कहते हैं। डीजे और आधुनिक वाद्यों को मात देता राजस्थान के मोरचंग का भी जवाब नहीं है, इससे मंत्रमुग्ध कर देनेवाली धुनें निकलती हैं।

पुंगी—पुंगी वाद्य एक विशेष प्रकार के तूंबे से बनता है। तूंबे का ऊपरी हिस्सा लंबा और पतला तथा नीचे का हिस्सा गोल होता है। तूंबे के निचले गोल हिस्से में छेदकर दो नलियाँ लगाई जाती हैं। इन नलियों में स्वरों के छेद होते हैं। अलगोजे के समान ही उस नली में स्वर कायम किया जाता है और दूसरी से स्वर निकाले जाते हैं। कालबेलियों और सपेरों का यह प्रमुख वाद्य है।

बाँकिया—पीतल का बाँकिया बना वाद्य ढोल के साथ मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। आकृति में यह बड़े बिगुल की तरह होता है। इसे तुरही का एक प्रकार माना जा सकता है। जोश, जुनून और जज्बे को उजागर करता बाँकिया वाद्य प्राचीन समय में युद्ध के समय प्रयोग में लाया जाता था।

खड़ताल—अन्य वाद्यों के साथ केवल ताल और लय में चमक पैदा करने के लिए खड़ताल बजाए जाता है। छह इंच से आठ इंच लंबी और डेढ़-दो इंच चौड़ी साधारण सी दिखाई देनेवाली लकड़ी की दो पटियाँ खड़ताल कहलाती हैं। खड़ताल बनाने के लिए सामान्य तथा रेगिस्तान में पैदा होनेवाले कैर और बबूल की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। कैर और शीशम की लकड़ी से बनी खड़ताल से अद्भुत ध्वनि निकलती है। चौकोर लकड़ी की इन पटियों के कोने थोड़ी गोलाई लिये होते हैं, ताकि हाथ में चुभे नहीं। हाथ के एक अँगूठे के आंतरिक भाग एवं दूसरी चारों उँगलियों में हथेली के बीच खड़ताल रखकर बजाया जाता है। मीराबाई के एक हाथ में इकतारा तो दूजे में खड़ताल दृष्टिगोचर होता है।

नगाड़ा—कहावत मशहूर है कि ढोल की थाप और नगाडे़ की चोट एवं नगाड़े की संगत के बिना रंगत ही नहीं आती। नगाड़ा दो प्रकार का होता है—एक छोटा और दूसरा बड़ा। छोटे नगाडे़ के साथ एक नगाड़ी भी होती है। इसे लोकनाट्यों में शहनाई के साथ बजाया जाता है। लोक-नृत्यों में बड़ा नगाड़ा नौबत की तरह ही होता है। इसे बम या टामक भी कहते हैं। यह युद्ध के समय भी बजाया जाता था। यह वाद्य लकड़ी के डंडों से ही बजाया जाता है। ढोल और नगाड़े के सम्मिलित वादन को नौबत कहते हैं। नगाड़े का छोटा रूप ढमामा कहलाता है।

करणा—तुरही से मिलता-जुलता करणा एक फूँक लोक-वाद्य है। इसे मांगलिक अवसरों पर बड़े चाव से बजाया जाता है। इसकी मधुर तान सुननेवालों पर जादू सा असर करती है। इसकी लंबाई ८ से १० फुट तक होती है। यह पीतल की चादर से बनता है। इसके तीन-चार भाग होते हैं, जिन्हें अलग-अलग करके जोड़ा व समेटा जा सकता है। देखने में यह चिलम की शक्ल का होता है। इसके सँकरे भाग में शहनाई की तरह रीड लगी होती है, जिसे होंठों में दबाकर फूँक से बजाया जाता है।

यह वाद्य मुख्यतः युद्धक्षेत्र व राज दरबारों में बजाया जाता था। पाली क्षेत्र के मंदिरों में भी इसका वादन किया जाता है।

डमरू—शिवजी का डमरू जगप्रसिद्ध है। बंदर नचानेवाले, नट, जादूगर तथा जोगी लोगों का यह एक प्रतीक वाद्य है। एक से दो बालिश्त तक लंबा डमरू दोनों सिरों पर चमड़े से मढ़ा होता है। इसके दोनों मुख रस्सी से कसे रहते हैं। इसके बीच का हिसा एकदम पतला होता है, जिसमें एक रस्सी अलग से लटकी रहती है और रस्सी के मुख पर घुंडी बनी होती है। हाथ को इधर-उधर घुमाने से घुंडीदार रस्सी डमरू के दोनों मुखों पर चोट करती है तो डिम-डिम की ध्वनि निकलती है। इसके छोटे स्वरूप को डुगडुगी या डिम-जिमी कहते हैं।

चंग—चंग चार अंगुल चौडे़ लकड़ी के छोर पर चमडे़ से मढ़ा हुआ या चक्राकार १६ से २० अंगुल व्यास तक का होता है। इसे बाएँ हाथ से पकड़कर हृदय के समीप स्थित कर दाहिने हाथ के द्वारा बजाते हैं। इसके छोटे स्वरूप को डफली और बड़े को डफ  कहते हैं। चंग के जरिए लोक-गाथाओं और शेरो-शायरी की प्रस्तुति भी की जाती है। आज भी ग्रामीण होली के अवसर पर चंग की थाप पर झूमते-नाचते और गीत गाते हैं।

ताशा—ताशा मुगलकालीन वाद्य है। मिट्टी की दो बालिया व्यास की कटोरी जैसा इस वाद्य को जब चमड़े से मढ़ दिया जाता है तो उसे ताशा कहते हैं। दोनों हाथों में दो इंद्रियों (खपच्चियाँ) लेकर तड़बड़ शब्द निकाले जाते हैं। ताशे को गले में भी लटका लिया जाता है और ढोल के आश्रय से विभिन्न लयकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।

खंजरी—डफली के घेरे में तीन या चार जोड़ी झाँझ लगे हों तो उसे खंजरी कहते हैं। इसका वादन चंग की तरह हाथ की थाप से किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों का यह प्रसिद्ध वाद्य है। बाँसुरी के साथ इसका वादन मनोहारी होता है।

जंतर—यह वाद्य वीणा की तरह होता है। वादक इसको गले में डालकार खड़ा-खड़ा ही बजाता है। वीणा की तरह इसमें दो तूंबे होते हैं। इनके बीच बाँस की लंबी नली लगी होती है। इसमें कुल चार तार होते हैं। राजस्थान में यह गूजर भोपों का प्रचलित वाद्य है।

झाँझ—आठ से सोलह अंगुल के व्यास तक के धातु के गोल टुकड़े झाँझ कहलाते हैं। इनके मध्य में डोरी निकालकर उसपर रस्सी या कपड़ा बाँधकर इसे हाथ से पकड़ने योग्य कर लेते हैं। और फिर एक-एक हाथ में एक-एक टुकड़ा पकड़कर दोनों को आघात से मनचाही झंकार निकालते हैं। झाँझ का छोटा स्वरूप मंजीरा है। प्रायः देवी-देवताओं की स्तुति के साथ इनको बजाया जाता है।

नड़—माता या भैरव का गुणगान करने के लिए राजस्थान के भोपें मशक की तरह के जिस वाद्य को फूँक द्वारा बजाते हैं, उसे नड़ कहते हैं। उत्तर भारत में इसे भोपे की बीन कहा जाता है। मुँह की फूँक द्वारा मशक में पहले पूरी हवा भर ली जाती है, फिर बाँसुरी की तरह उसमें लगी हुई नली के तीन छिद्रों पर उँगली के संचालन से स्वर पैदा किए जाते हैं।

तांबूरा—यह कटहल की लकड़ी को खोखला करके या कद्दू की मोटी छाल का बना होता है। इसका व्रिज लकड़ी या हाथी-दाँत का बना होता है। तांबूरा में तीन स्टील और एक पीतल का तार होता है। प्रथम और चतुर्थ तारों की ध्वनि-खूटियाँ गरदन के एक ओर होती है और दूसरी व तीसरी सिर के ऊपर सीधी खड़ी होती है।

नौबत—धातु की लगभग चार फीट गहरी अर्ध-अंडाकार कुंडी को भैंसे की खाल से मढ़कर चमड़े की डोरियों से कसा जाता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है। नौबत प्रायः मंदिरों में या राजा-महाराजाओं के महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाता था।

ढोल—राजस्थानी लोक-वाद्यों में ढोल का प्रमुख स्थान है। यह लोहे अथवा लकड़ी के गोल घेरे पर दोनों तरफ चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। इस पर लगी रस्सियों को कडि़यों के सहारे खींचकर इसे कसा जाता है। वादक इसे गले में डालकर लकड़ी के डंडे से बजाता है।

श्रीमंडल—डेढ़ मीटर धातु का एक ढाँचा होता है, जिसमें कई प्लेटें लटकी रहती हैं। ये प्लेटें भिन्न-भिन्न मोटाई और व्यास की होती हैं और भिन्न-भिन्न तारता के संगीत-स्वर उत्पन्न करती हैं। यह अन्य तरंग वाद्यों की तरह है। यह ताज्जुब की बात है कि ठीक इसी तरह का वाद्य चीन में पाया जाता है, जिसे वे युनलो कहते हैं।

भूंगल—यह भवाई जाति के लोगों का वाद्य है। पीतल का बना यह वाद्य तीन हाथ लंबा होता है। यह वाद्य बाँकया से मिलता-जुलता है। इसे भेरी भी कहते हैं। इस वाद्य को रणक्षेत्र में भी बजाया जाता था।

रमझोल—ये घँुघरू से बड़े आकार के होते हैं, जो चमड़े की एक पट्टी पर टँगे रहते हैं। ये पट्टी पैर में पिंडली तक बाँधी जाती है। राजस्थान में होली के अवसर पर नृत्यमंडली में इनका प्रयोग किया जाता है।

पाबूजी के माटे—मिट्टी के दो बरतनों से बना वाद्य नीचे स्वर में मिला वाद्य नर कहलाता है और ऊँचे स्वर का मादा कहलाता है। पश्चिम राजस्थान की थोरी या भील जातियों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है।

तंदूरा—इसमें चार तार होने के कारण कहीं-कहीं इसे चौतारा भी कहते हैं। यह पूरा लकड़ी का बना होता है। कामड़ जाति के लोग तंदूरा ही बजाते हैं। यह तानपुरे से मिलता-जुलता वाद्य है।

ढाँक—लोक देवी-देवताओं के आह्वान के लिए ढाँक का प्रयोग किया जाता है। यह डमरू जैसा, आकार में उससे करीब चौगुना होता है।

धौंसा—यह भी नगाड़े की तरह का ही वाद्य है। इसे घोड़े पर दोनों तरफ  रखकर लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है।

माँदल—मिट्टी से बनी माँदल मृदंग जैसी होती है। यह आदिवासी भीलों और गरासियों का प्रमुख वाद्य है।

कुंडी—मिट्टी का बना हुआ वाद्य है। मेवाड़ के जोगियों के पंचपद नृत्य में इसका प्रयोग होता है।

गूजरी—रावण हत्था से छोटे आकार का वाद्ययंत्र है।

अन्य लोक-वाद्ययंत्र—सुरमंडल, सुरिंदा, घेरा, डैंरू, ढोलक, काँसे की थाली, तसली,  झालर, घंटा, मटका, तारपी, सिंगा, नागफणी, लेजिम, सतारा, पैली, वीणा, चिकारा, घुँघरू, मुरली।

ब्रह्मपुरी, हजारी चबूतरा

जोधपुर-३४२००१

दूरभाष : ९४१४४७८५६४

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