कुछ साहित्यिक महाविभूतियाँ

कुछ साहित्यिक महाविभूतियाँ

यह महज संयोग की बात है कि मैंने जिस विद्यालय (काली चरण इंटर कॉलेज, लखनऊ) से दसवीं और इंटर पास किया, उसके प्रथम प्रिंसिपल आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वान् बाबू श्यामसुंदर दास थे। कालांतर में वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रथम हिंदी विभागाध्यक्ष बने। मैंने बाबू श्यामसुंदर दास को साक्षात् कभी नहीं देखा, परंतु हिंदी के विकास में उनके अमिट योगदान की छाप, उनके द्वारा अनुप्राणित हिंदी को संपुष्ट करनेवाली अनेक परंपराओं का श्रीगणेश पहले काली चरण कॉलेज में और बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्पष्ट अनुभव किया। यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में चिकित्सा शास्त्र की मेरी पूर्ण यात्रा १९६३ से प्रारंभ होकर १९८६ में संपन्न हुई। कालीचरण कॉलेज व काशी हिंदू विश्वविद्यालय का सम्मिलित प्रभाव मेरे ऊपर इतना गहरा था कि चिकित्सा विज्ञान की पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में होने के बावजूद मेरी हिंदी से निकटता घनी बनी रही। मैं विश्वविद्यालय में उपस्थित सभी हिंदी आचार्यों से उपयुक्त अवसर मिलने पर सुनता, मिलता-जुलता रहा। समय के साथ-साथ यह प्रीति दृढ़ होती रही। उनका स्नेहभाजन बना। तेईस वर्ष की इस लंबी अवधि में मुझे प्रोफेसर वासुदेव शरण अग्रवाल, श्री राय कृष्णदास, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, पंडित विश्वनाथ मिश्र तथा आचार्य विद्यानिवास मिश्र का आशीर्वाद मिलता रहा। यद्यपि इनमें से कोई भी आज अपने भौतिक रूप में विराजमान नहीं है, किंतु उनके आशीषमय वात्सल्य की छाया स्मृति के वातायन से अकसर मुझे संबल प्रदान करती रहती है। उनमें से कुछ ऐसे अंतरंग पल हैं, जो इन महाविभूतियों के विराट् मानवीय व्यक्तित्व का भी बोध कराते हैं। प्रस्तुत हैं ऐसे ही कुछ संस्मरण—

‘बिछुरत एक प्राण हर लेहीं’

मेरा यह परम सौभाग्य था कि वर्ष १९६३ में जब मुझे हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय में एम.बी.बी.एस. कोर्स में प्रवेश मिला, उस समय हिंदी तथा कला इतिहास के जाने-माने विद्वान् श्री वासुदेवशरण अग्रवाल काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कला संकाय के अधिष्ठाता थे। वासुदेवशरणजी लखनऊ विश्वविद्यालय में मेरे पिताश्री के संस्कृत शिक्षा काल के सहपाठी रहे थे, इसलिए पिताजी सर्वप्रथम मुझे उनके विश्वविद्यालय स्थित आवास पर ले गए।

मैं उनसे पहली बार मिल रहा था। प्रणाम-नमस्कार के बाद वासुदेवशरणजी के निकट बैठ गया। वे अत्यंत कृशकाय और धीरे-धीरे बोलनेवाले व्यक्ति थे। बदन पर एक शुभ्र बनियाइन और ढीली लपेटी सफेद धोती। उन्हें देखते ही लगता था, जैसे हम किसी प्राचीन काल के संत-ऋषि के पास बैठे हों। संस्कृत की मूल धारा से आकर हिंदी में अधिकारपूर्वक लिखनेवाले विद्वानों की वृहत्त्रयी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, पंडित विद्यानिवास मिश्र तथा श्री वासुदेवशरण अग्रवाल का नाम उन दिनों बड़े आदर से लिया जाता था। उनका घर मानो एक वृहद् पुस्तकालय था। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और कहा, कोई जरूरत हो तो संकोच मत करना। मैं जब भी उनके निवास पर जाता, वे अपने स्वागत-कक्ष के बाहर चबूतरे के ऊपर या लॉन में किसी वृक्ष के नीचे सूर्यालोक का आनंद लेते हुए छात्रों को पुराण, इतिहास या संस्कृत ग्रंथ का मर्म समझाते हुए मिलते। सहज मंद मुसकान के साथ पूछते, कैसे हो? फिर अपने अध्ययन-अध्यापन में तल्लीन हो जाते। मुझे बाद में मालूम पड़ा कि उन्हें डायबिटीज थी। उनकी भारतीय ज्ञान-विज्ञान और आयुर्वेद में प्रबल आस्था थी, इसलिए डायबिटीज के नियंत्रण के लिए वे पूर्णतः देशी दवाइयों पर आश्रित थे। जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने आधुनिक ओषधियों को स्वीकार किया। तब तक बहुत विलंब हो चुका था। मात्र ६२ वर्ष की अवस्था में १९६६ में उनका देहांत हो गया। उस समय मैं एम.बी.बी.एस. चतुर्थ वर्ष में गया ही था और डायबिटीज की भयंकरता से उतना परिचित भी नहीं था। अत्यंत अल्प समय में ही मैं उनकी स्नेहच्छाया से वंचित हो गया, परंतु उनकी ऋषिवत् काया मेरी आँखों के सामने साक्षात् है तथा उनकी विद्वत्तापूर्ण साधु-भाषा अभी भी मेरे कानों में गूँज रही है। अपने छात्रों के लिए वे ‘बिछुरत एक प्राण हर लेहीं’ वाली श्रेणी के आचार्य थे।

‘जापर विपदा पड़त है सो आवति यह देश’

वर्ष १९६३ में जब मैंने प्रवेश लिया, उस समय जस्टिस एन.एच. भगवती हमारे कुलपति थे, यथा नाम तथा गुण वाले अत्यंत धर्मनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी राजनीतिक कारणों वश चंडीगढ़ विश्वविद्यालय चले गए थे। उस समय हिंदी विभाग की अध्यक्ष शायद सुश्री ज्ञानवती त्रिवेदीजी थीं। कुछ वर्षों के बाद जब श्री अमरचंद जोशीजी ने कुलपति का कार्यभार सँभाला तो वे आचार्य द्विवेदीजी को सम्मानपूर्वक विश्वविद्यालय के रेक्टर के रूप में ले आए। पूरे विश्वविद्यालय में हर्ष की लहर दौड़ गई। आखिरकार वे हिंदी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर्वोत्कृष्ट देदीप्यमान नक्षत्र जो थे।

हिंदी अनुरागी होने के कारण मैं उनके हर सार्वजानिक भाषण-व्याख्यान का यथासंभव आनंद उठाता। उन दिनों मेडिसिन के आचार्य प्रोफेसर बाजपेई उनके निजी चिकित्सक थे। उनके माध्यम से मैं आचार्यजी के निकट स्नेहपात्र बन गया। विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्ति के बाद वे रवींद्रपुरी स्थित अपने आवास पर चले गए। मेरा वहाँ यदा-कदा आना-जाना होता। उन्हें पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) की शिकायत थी, पेशाब में संक्रमण था। पीठ में दर्द होता था। एकदम से उठने में तकलीफ होती थी। उनके पिताश्री, जो पचासी पार कर रहे होंगे, उन्हें भी मूत्रकष्ट था। एकदम से पेशाब की हाजत होती थी। वे घर के भूमितल पार सोते थे और हजारी प्रसादजी शायद पहली मंजिल पर। रात में जब अत्यंत वृद्ध पिताश्री को मूत्र का आवेग होता तो चिल्लाकर कहते, ‘का रे हजरिया’ मानो आचार्यजी अभी भी ३०-३५ वर्ष के तरुण पुत्र हों। उस समय ७१ वर्षीय हजारी प्रसादजी अपनी पीठ को सहलाते हुए, कमर को किसी प्रकार सीधा करते हुए, धोती को साधते हुए सीढि़याँ उतरकर अपने पिताश्री को मूत्रपात्र में पेशाब कराते। आचार्यजी ने जब यह वर्णन मुझे सुनाया, तब मैंने उनके चेहरे पर पुत्रवत् कर्तव्यबोध और अपनी शारीरिक वेदना के मिश्रित भाव स्पष्ट देखे। एक दिन आचार्यजी कुछ अस्वस्थ थे। फोन पर उन्होंने प्रातः ८ बजे अस्पताल में आने की इच्छा प्रकट की। तय समय के अनुसार वे मेरे कक्ष में आ गए। अपरिहार्य कारणों से मुझे पहुँचने में १५-२० मिनट का विलंब हुआ। उस समय वहाँ पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्र जमा थे। शायद जोर-जोर से बात कर रहे थे। आचार्यजी चुपचाप एक चिट पर यह लिखकर चले गए, ‘प्रिय द्विवेदीजी, जापर विपदा पड़त है सो आवति यह देश। आपके कक्ष में आया था। पर यहाँ पर रामलीला लगी हुई है। फिर मिलूँगा। हजारी प्रसाद द्विवेदी।’ मैं जब कमरे में पहँुचा तब तक वे जा चुके थे। मुझे तो काटो खून नहीं। मैंने उपस्थित विद्यार्थियों से पूछा, आचार्यजी आए थे, विद्यार्थी बोले—हाँ, गुरुजी आए तो जरूर थे। प्रणाम-दंडवत् हुआ, पर बोले कुछ नहीं। एक कागज लिये, कुछ लिखे और चले गए।

पान उनके जीवन का अभिन्न अंग था। जीवन के अंतिम दिनों में जब वे सर सुंदरलाल अस्पताल में भरती थे और उन्हें पान खाना मना करना अपरिहार्य था, तो प्रोफेसर बाजपेई को इस बात को आचार्यजी से कहने और मनवाने में कितनी सजगता और चतुरता बरतनी पड़ी, यह घटना हममें से बहुतों के लिए एक शिक्षाप्रद घड़ी थी। एक वह समय भी आया, जब उन्हें आधुनिकतम उत्कृष्ट चिकित्सा के लिए दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया जाने लगा। वे स्वयं काशी छोड़कर अन्यत्र जाना पसंद नहीं करते थे, परंतु विधना के आगे सब परवश होते हैं। वे दिल्ली गए तो जरूर, पर काशी वापस नहीं आए और १९ मई, १९७९ को उनका देहांत हो गया। पूरे हिंदी-जगत् में शोक की लहर फैल गई। पूरा बनारस शोक में डूब गया। हिंदू विश्वविद्यालय में सन्नाटा पसर गया, मानो उसकी पारस मणि खो गई हो। ऐसे थे हिंदी के बाणभट्ट और विश्वविद्यालय परिसर में सबके चहेते परम आदरणीय आचार्य श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी, जिनका सान्निध्य और आशीर्वाद हम जैसे तमाम स्नातकों के लिए किसी अलभ्य वरदान से कम नहीं।

मृत्यु में भी सनातन

बात १९७० के समय की है। मैं मेडिसिन विभाग में हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर प्रेम नारायण सोमानी की यूनिट में प्रथम वर्ष स्नातकोत्तर डॉक्टर था। सवेरे का समय था। सर सुंदरलाल अस्पताल के स्पेशल वार्ड के सामने डॉ. सोमानी ने टीम के सदस्यों से कहा कि विश्वविद्यालय स्थित कलाभवन के निदेशक हिंदी के उद्भट विद्वान् राय कृष्णदासजी, जिन्हें लोग आदरपूर्वक ‘सरकारजी’ कहकर पुकारते थे, अचानक अचेत हो गए हैं। उन्हें स्पेशल वार्ड में भरती किया जा रहा है। तुरंत उनकी रीढ़ की हड्डी से पानी निकालकर प्राप्त मस्तिष्क सुषुम्ना द्रव्य को विस्तृत जाँच के लिए भेजना है। चिकित्सकीय भाषा में इस प्रक्रिया को लंबर पंक्चर (एल.पी.) कहते हैं। सोमानी महाशय की शर्त यह थी कि पहले प्रयास में ही कुशलतापूर्वक यह कार्य संपन्न होना है, क्योंकि राय कृष्णदासजी स्थूल बदन हैं। उस समय हम लोग करीब ५-६ लोग थे। सब लोग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। अजीब प्रकार की निस्तब्धता थी। सब इस बात से आशंकित थे, यदि प्रथम प्रयास में सफलता नहीं मिली तो बड़ी भद्द होगी। प्रोफेसर सोमानी की मंद-मंद हास्यमयी पैनी दृष्टि घूमते-घूमते मेरे ऊपर टिक गई। बोले, ‘डॉक्टर द्विवेदी, क्या आप यह कार्य कुशलतापूर्वक कर सकेंगे?’ मैंने साहस बटोरकर हामी भर दी। भगवान् का नाम लेकर कटि प्रदेश में दो कशेरुकाओं के बीच के स्थान में लंबर पंक्चर किया। सफलता तो मिल गई, परंतु मस्तिष्क-सुषुम्ना द्रव्य के स्थान पर रक्त की बूँदें टपक रही थीं। मस्तिष्क-सुषुम्ना द्रव्य के रक्तिम होने का अर्थ था ऊपर प्रमस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ था। पूछने पर पता चला कि राय कृष्णदासजी को बहुत दिनों से उच्च रक्तचाप था, जिसके कारण उनके मस्तिष्क की कोमल रक्त नलिकाएँ अंदर फट गई थीं। उनकी अचेतनता तथा मस्तिष्क-सुषुम्ना द्रव्य के रक्तिम होने का कारण अब स्पष्ट हो गया था। थोड़े दिनों में उचित ओषधि तथा सेवा-शुश्रूषा के बल पर वे धीरे-धीरे ठीक होने लगे। उनकी चेतना लौट आई। एक ऐसा समय भी आया, जब आंतरिक रक्तस्राव के कारण उनका हीमोग्लोबिन ६ के आस-पास पहुँच गया। गाड़ी फिर पटरी से उतरती नजर आई। बड़ी विकट रात थी वह। वे अत्यंत अशक्त हो गए थे। रक्त चढ़ाना बहुत जरूरी था। हमारे अस्पताल में उस गु्रप का रक्त मौजूद नहीं था। तय हुआ कि दिल्ली से रक्त लाया जाए। दिल्ली के ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट और रेडक्रॉस से संपर्क साधा गया। दिल्ली में सरकारजी के परम हितैषी श्री मंगलनाथ सिंह ने दौड़-धूप कर रक्त का प्रबंध किया। रक्त लाने के लिए मुझे हवाई जहाज से भेजा गया और मैं चार बोतल खून लेकर वापस लौटा। किस्तों में उन्हें खून चढ़ाया गया, तब उनकी स्थिति में तेजी से सुधार होने लगा। हाथ-पैरों की निर्बलता व्यायामिक चिकित्सा और उनकी प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर लौट आई। अब वे छड़ी के सहारे चलने लगे। दस दिनों के अंदर वे विश्वविद्यालय स्थित अपने आवास ‘सीता निवास’ लौट गए। डॉक्टर सोमानी साहब ने मुझे उनकी चिकित्सा देखभाल के लिए अपना प्रथम सहायक बना लिया। शनैः-शनैः उनका और उनके समस्त परिवार का मेरे ऊपर स्नेह तथा विश्वास बढ़ गया और मैं उनके परिवार का अंग बन गया।

वर्ष १९७१ आरंभ होते-होते सरकारजी पूर्णतः स्वस्थ हो गए। उनकी मेधा शक्ति पूर्ववत् हो गई। सोच-विचार, बात-व्यवहार में परम वैष्णव रायकृष्ण दासजी सौम्यता की साक्षात् मूर्ति थे। उनके घर पर हिंदी के दिग्गज विद्वानों का आना-जाना पुनः शुरू हो गया। इन लोगों में कुछ प्रमुख नाम थे—श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, सुश्री महादेवी, महाकवि दिनकर, स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त ‘दद्दा’ के परिवार के झाँसी से आए स्वजन, संगीत और कला के अन्य मर्मज्ञ विद्वान् महारथी। सरकारजी मुझे तथा डॉक्टर सोमानी साहब को इन पारिवारिक महोत्सवों पर अवश्य बुलाते और स्नेहवर्षा करते। १९७१ के सितंबर में बनारस में गंगाजी में भयंकर बाढ़ आई। भागीरथी का पानी विश्वविद्यालय के सिंहद्वार तक पहुँच चुका था। मालवीयजी की मूर्ति के सामने घुटनों से ऊपर पानी था। इसी समय मेरी पत्नी को सर सुंदरलाल अस्पताल में पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। तीन दिन बाद जब चिकित्सालय से मुक्ति मिली तो हम लोग बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए लंका में नौका के माध्यम से अपने निवास अमेठी कोठी में प्रवेश कर सके। यह सुनकर सरकारजी ने हमारे पुत्र का नाम गंगाधर रखने का सुझाव दिया और आशीर्वाद स्वरूप यह दोहा अपने हस्ताक्षरों में लिखा, ‘श्रीधर गंगाधर सहित जीएँ कोटि बरीस, कृष्णदास प्रति रोम ते देति यही आशीष।’ मुझे बाद में पता चला कि मेरे चचिया श्वसुर का नाम भी गंगाधर है। इसलिए सामाजिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सरकारजी के भावनात्मक आशीर्वाद का पूर्ण सम्मान करते हुए मेरे पिताश्री ने पुत्र का नाम ‘गिरीश’ रखने का सुझाव दिया। बहुत सारी अन्य बातें और अंतरंग प्रसंग हैं, जो सरकारजी की भारतीय मूल्यों में अनन्य आस्था को दरशाते हैं। इन सबमें हृदयस्पर्शी है, उनका महाप्रयाण के समय का सनातन आचरण।

क्या आप कल्पना करेंगे कि मृत्यु जब आपके सामने साक्षात् खड़ी हो और आप गायत्री मंत्र का उच्चारण कर रहे हों? ऐसा आज के युग में शायद ही किसी ने देखा हो। मैं साक्षी हूँ उस मध्याह्न का, जब हिंदी और कला इतिहास जगत् के मूर्धन्य नक्षत्र अठहत्तर वर्षीय रायकृष्ण दासजी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित अपने आवास में अंतिम साँसें ले रहे थे और साथ-साथ गायत्री मंत्र का पाठ कर रहे थे। उनके हृदय की कार्य क्षमता समाप्त हो चुकी थी। दिल एकदम शिथिल हो चुका था। तीव्र हृदय फैल्योर की स्थिति थी। दोनों फेफड़ों के वायुकोष अपने अंदर इकट्ठे पानी से बजबजा रहे थे। नासारंध्रों में ऑक्सीजन लगी हुई थी। मैं उन्हें नस के द्वारा प्राणरक्षक ओषधि दे रहा था, जिससे दिल के ऊपर बोझ कुछ कम हो सके और वे शांतचित्त से गायत्री का मंत्रोच्चार कर रहे थे। अद्भुत दृश्य था। ऐसे थे स्वनामधन्य रायकृष्ण दासजी। ‘जनम जनम मुनि जतन कराहीं, अंत राम कहि आवत नाही’ से मिलती-जुलती स्थिति। सरकारजी अब निढाल पड़े थे। थोड़े समय के बाद उनकी इहलीला समाप्त हो गई। उनके निधन के साथ-साथ कला-इतिहास का प्रकांड विद्वान्, चलता-फिरता विश्व-कोष और भारतीय संस्कृति के एक पुरोधा का अंत हो गया।

पांडित्य और सादगी की प्रतिमूर्ति

विश्वविद्यालय में लंबे काल तक हृदय रोग अनुभाग से जुड़े होने के कारण मेरा अनेक स्टाफ तथा शैक्षणिक वर्ग के लोगों से पारिवारिक संबंध हो गया था। विश्वविद्यालय की रिसर्च पत्रिका ‘प्रज्ञा’ के संपादक डॉक्टर राम मोहन पांडेय ने १९८९ जून के आस-पास बातचीत के क्रम में बताया कि पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, जो उन दिनों अतिथि आचार्य के रूप में मेरे आवास के अत्यंत निकट किसी फ्लैट में रहते थे, ब्लड प्रेशर से पीडि़त हैं। क्या मेरे लिए उन्हें अपने घर पर ही देखना संभव होगा? मैं अभी तक उनसे कभी नहीं मिला था। केवल सुना भर था कि वे हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वान् हैं। निस्पृह व्यक्ति हैं। पूर्व में विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक भी रह चुके हैं। ऐसे सुधी-गुणी विद्वान् की सेवा करने का सुअवसर कौन छोड़ना चाहेगा? मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। शाम करीब ७ बजे का समय सुनिश्चित हुआ। पंडित अपनी शुभ्र टोपी और कुरता-धोती में जोधपुर कॉलोनी स्थित आवास में आए। उनको देखते ही मेरे मन में अपार श्रद्धा और आदर के भाव स्वतः जाग्रत् हो उठ। कुशल-क्षेम के पश्चात् उन्होंने बताया कि उन्हें विगत कई दिनों से सर में भयंकर दर्द है। आकुल कर देनेवाली पीड़ा। दो-तीन बार उल्टी भी हो चुकी थी। मैंने तुरंत ब्लड प्रेशर लिया। उस समय उनका ब्लड प्रेशर १८०/१०० था। मैंने उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती होने का अनुरोध किया। भरती करने के लिए अस्पताल की इमरजेंसी को फोन किया। उन्हें सघन चिकित्सा-कक्ष में रखा गया। एक दिन बाद उन्हें उन्हें पुनः उग्र रक्तचाप का प्रकोप हुआ और तीव्र मस्तिष्काघात हुआ। उनके प्रमस्तिष्क की कोमल धमनियाँ फट गईं। उनसे रक्तस्राव हो रहा था। दिमाग का दौरा इतना जबरदस्त था कि उन्हें अथक प्रयासों के बावजूद बचाया न जा सका। ब्लड प्रेशर के कारण हिंदी और हिंदू विश्वविद्यालय ने अपने एक और सपूत को खो दिया। मेरी आँखों में उनकी सादगीपूर्ण, भव्य और भद्र प्रतिमूर्ति अभी भी अंकित है।

ललित निबंध के विद्यानिधि

आचार्य विद्यानिवास मिश्र यद्यपि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से औपचारिक रूप से कभी संबंधित नहीं रहे, किंतु हिंदी व भाषा विज्ञान में उनके अप्रतिम योगदान का कारण उन्हें समय-समय पर अतिथि आचार्य के रूप में हमेशा बुलाया जाता था। यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि विद्यानिवासजी जैसे किसी प्रकांड विद्वान् को किसी एक विश्वविद्यालय की भौतिक सीमा में बाँधना-देखना विश्वविद्यालय के सार्वभौमिक स्वरूप की अवधारणा का अपमान है। वे ऐसे विद्वान् थे, जिनका व्याख्यान सुनने के लिए हर हिंदीभाषी हमेशा आतुर रहता था।

ऐसे ही एक आयोजन पर १९७२ के आस-पास मेरी उनसे भेंट मालवीय भवन में हो गई, जहाँ मैंने महामना के बारे में उनसे सुना। वे बोलते क्या थे, मानो फूल झर रहे हों और शब्द नृत्य कर रहे हों। उनके श्रीमुख से मानो सरस्वती बरस रही थी। ऐसा लगता था, मानो माँ भारती का शारदीय-ललित रूप हमारी आँखों के सामने साक्षात् विराजमान हो। बोलने के समय उनके मुखमंडल की आभा उनके अंदर उठ रहे विचारों का ऐसा आईना थी, जिसको निहारने मात्र से उपस्थित सभी सुधी कृतकृत्य हों।

उनका भाषण समाप्त होने के पश्चात् मैंने उन्हें प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। आचार्य मिश्र ने संस्कृत विश्वविद्यालय स्थित अपने आवास पर यथासमय मिलने को कहा। संयोग से उनके एक अन्य आत्मीय-पाल्य डॉक्टर कमलाकर त्रिपाठी उन दिनों मेडिकल संस्थान आई.एम.एस. बी.एच.यू. में अध्ययन कर रहे थे। डॉक्टर कमलाकर प्रबल हिंदीप्रेमी और कुशाग्र अध्येता थे। मैं उनके साथ पहली बार पंडितजी के संस्कृत विश्वविद्यालय स्थित निवास पर गया। उनका पूरा घर संस्कृतमय और भक्तिरस से सराबोर था। स्वस्तिक, तुलसी, गोमाता, पूजाघर, पूजा करते लोग स्वयं आचार्यजी ध्यान निमग्न, ऐसा दृश्य किसी प्रोफेसर निवास में पहली बार मिला। पंडितजी पूजा समाप्त करने पर बड़े ही आत्मीय और स्नेहमयी मुद्रा में हँसते हुए मिले। उन्हें अल्प श्रेणी का उच्च रक्तचाप था और थोड़ी रक्ताल्पता थी, जिसके कारण परिश्रम करने के बाद शारीरिक कमजोरी की शिकायत थी। मैंने उन्हें कम-से-कम जाँच और ओषधियाँ लिखीं और घर लौट आया। वह दिन था और उसके बाद २००५ तक मैं न जाने कितने बाद उनसे मिला, परंतु उनके चेहरे से मधुर हास्य को कभी हटते हुए नहीं देखा। घर पर जब भी मिला, उन्हें पूजा में रत पाया। शायद यह संस्कार उन्हें अपने पितृव्य से मिला था।

अक्तूबर १९७३ के आसपास आचार्य विद्यानिवासजी का पेट कष्ट और रक्ताल्पता बढ़ती जा रही थी। सांगोपांग परीक्षण के लिए उन्हें सर सुंदरलाल अस्पताल के स्पेशल वार्ड में भरती करना पड़ा। इन्हीं दिनों मेरे घर लक्ष्मी के रूप में एक कन्या ने जन्म लिया। पत्नी अस्पताल में थी। आचार्यजी को पता चला तो बोले, ‘श्रीधर, इसकी जन्मपत्री मैं बनाऊँगा।’ मैं अवाक् था। मुझे उनके ज्योतिष पक्ष का बिल्कुल ज्ञान न था। मैं यह तो जानता था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत एम.ए. में उनके द्वारा स्थापित प्राप्तांक का कीर्तिमान अभी तक कोई तोड़ नहीं पाया है, परंतु ज्योतिष में भी उनका उतना ही अच्छा प्रवेश है, इसका मुझे अनुमान न था। उन्होंने तुरंत अस्पताल में कुरसी पर बैठे-बैठे सद्यःजात पुत्री की जन्मपत्री बना दी। हल्दी द्वारा अभिषिक्त कर जन्मपत्री अपने आशीर्वाद के साथ मुझे दे दी। कहना न होगा, यही जन्मपत्री मेरी पुत्री रोली के समस्त मांगलिक कार्य, पढ़ाई-लिखाई, विवाह आदि शुभ कार्यों का आधार बनी। आचार्य विद्यानिवासजी के ज्योतिष कौशल का भान शायद ही किसी अन्य को हो।

वे जब काशी से दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ के मुख्य संपादक के रूप में दिल्ली आ गए तो मेरा उनसे अकसर मिलना होता। वे मुझसे अकसर कहते, वर्तमान दिल्ली एक बहुत बड़े कब्रगाह की भाँति है। हुमायूँ के मकबरे से लेकर राजघाट-विजयघाट तक हर जगह कब्र ही कब्र। इन कब्रों के बीच किसे अध्यात्म या सनातनता की अनुभूति होगी? स्पंदनहीन-संवेदनहीन है दिल्ली। उनका मानना था कि बनारस जैसी आध्यात्मिक जीवंतता दिल्ली में रंचमात्र देखने को नहीं मिलती। ‘नवभारत टाइम्स’ के बाद उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ के संस्थापक-संपादक के रूप में काम किया। काशी का आकर्षण उन्हें अंततः भगवान् भूतनाथ और माँ भागीरथी की नगरी ले गया। वहाँ उन्होंने पुराण प्रसिद्ध अस्सी नाले के किनारे अपना अत्यंत सुरुचिपूर्ण स्थायी निवास बनवाया। बनारस को केंद्र बनाकर वे अपने लेखन, पठन-पाठन, ध्यान-अनुशीलन, भाषण, वर्कशॉप-सेमिनार आदि गतिविधियाँ सक्रिय रखते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेने हेतु वे वाराणसी से आजमगढ़ की तरफ कार से जा रहे थे कि बनारस से कुछ दूरी पर उनकी कार एक वृक्ष से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई। आचार्यश्री की दुर्घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। उनके शव की पहचान एक राहगीर ने की। ‘बाप रे बाप, गजब हो गया, अरे यह तो परम पूज्य विद्यानिवासजी मिश्र हैं।’ उनके अनुज डॉक्टर दयानिधिजी को सूचना दी गई। उनकी दुःखद मृत्यु पर सारे काशीवासियों की आँखें नम थीं। वे काशी के गौरव थे। उन्हें हमारा शत-शत प्रणाम। वे वास्तव में हिंदी साहित्य विशेषतः ललित निबंध के विद्यानिधि थे।

चिकित्सकीय संदेश

इन महाविभूतियों की संस्मरण शृंखला में हृदयस्पर्शी मानवीय पक्षों से जुड़ी बातों के अतिरिक्त एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सकीय संदेश भी है—प्रकृति ने इन धुरंधर मनीषियों के निधन के माध्यम से मानो आज के पचास वर्ष पूर्व भविष्य में होनेवाली महाव्याधियों के विषय में हमें पर्याप्त पूर्व चेतावनी दे दी हो। लेकिन फिर भी हमने खतरे की इन घंटियों को सुनकर अनसुना कर दिया। काश, अब हम इन सब महाव्याधियों पर काबू कर पाते!

वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ

नेशनल हार्ट इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली-११००६५

दूरभाष : ९८१८९२९६५९

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