केदारनाथ सिंह : सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी

केदारनाथ सिंह : सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी

मेरी कवि पीढ़ी ने जब आँखें खोलीं और धीरे-धीरे चलना सीखा तो उसे देखना और चलना सिखानेवाले अग्रज कवियों में केदारनाथ सिंह की उपस्थिति सबसे आत्मीय और प्रिय थी। एक कवि और व्यक्ति के रूप में वे इतने बडे़ थे कि उनमें बड़प्पन की जरा भी बू नहीं थी। मुझे जब भारत भूषण सम्मान मिला तो उसके निर्णायक केदारजी ही थे। हिंदी कविता के लिए यह एक ऐसा प्रतिष्ठादायी सम्मान है, जो किसी भी युवा कवि के लिए हिंदी कविता की बड़ी दुनिया में स्थापित होने का सिंहद्वार ही नहीं खोलता बल्कि उसे उच्च क्रम पर स्थापित भी करता है। हर रचनाकार की अपनी पसंदीदा मनोभूमि होती है। उससे बाहर आना जरा मुश्किल होता है। केदारजी इस मामले में अपवाद जैसे रहे। केदारजी गाँव की संवेदना के कवि हैं, जबकि मेरा मानसिक विकास महानगरीय कवि के रूप में हुआ है। उन्होंने उक्त पुरस्कार के लिए जिस ‘सिलबट्टा’ शीर्षक मेरी कविता का चुनाव किया, उसकी भावभूमि शहर द्वंद्व और अंतर्विरोधों से निर्मित हुई है।

वे अपने बाद की युवा और युवतर कवि पीढि़यों से जुडे़ रहे। अनेक मंचों पर वे उनकी दिल खोलकर प्रशंसा किया करते थे। जब मैंने छपना शुरू किया तो मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था। केदारजी जे.एन.यू. में वरिष्ठ प्रोफेसर थे। एम.ए. के शुरुआती दिनों में ही मुझे उनका एक बेहद अपनेपन से भरा पत्र मिला। जिसमें मेरी कविता के विषय-वैविध्य और भाषा की ताजगी की उन्होंने घनघोर तारीफ की थी। वह मेरे लिए किसी भी बडे़ पुरस्कार से कम नहीं था। इससे अपने लेखन पर विश्वास जमना शुरू हुआ। मुझे उनका शोध छात्र माना जाता था। कई पत्रिकाओं में मेरा परिचय कविताओं के साथ इसी रूप में छपा है। अभी हाल ही में हिंदी कवियों की समृद्ध परंपरा को तीन-चार खंडों में प्रस्तुत करने के सिलसिले में उनका सान्निध्य मिला। स्वयंभू से लेकर अरुणकमल तक लगभग ८५ कवियों का चयन उनकी सहमति से किया गया। मेरे आलस्य और दूसरी बेमतलब व्यस्तताओं के चलते उनके सामने यह काम नहीं आ पाया। इसकी भूमिका भी उन्होंने ही लिखनी थी।

७ जुलाई, १९३४ से लेकर १९ मार्च, २०१८ तक फैले जीवनकाल में वे अंत तक रचनारत रहे। इसका साक्ष्य उनका उत्कृष्ट और विपुल लेखन है। ‘अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, ताल्सतॉय और साइकिल, सृष्टि का पहरा (कविता-संग्रह) के अतिरिक्त मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत, चिट्ठियाँ कैलाशपति निषाद के नाम, मेरे साक्षात्कार जैसी किताबों में उनके बेहतरीन गद्य का आस्वाद मिलता है।

सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, स्पेनी, रूसी, जर्मन, हंगारी, फ्रांसीसी, इतालवी, डच भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।

काव्यपाठ के लिए उन्होंने अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, कजाकिस्तान समेत अनेक देशों की यात्राएँ कीं और लेखन के लिए उन्हें कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया, जिसमें २०१३ का देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार शामिल है। यह पुरस्कार पानेवाले वे हिंदी के १०वें साहित्यकार थे। इसके अलावा १९८९ में ‘अकाल में सारस’ कृति के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, १९९३-९४ का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, १९९७ में उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ के लिए व्यास सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान पानेवाले केदारजी साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य रहे।

एक बातचीत में यह पूछने पर कि आप लंबे समय तक साहित्य के अध्यापक रहे हैं। अध्यापन ने आपके कवि की मदद की या अध्यापन की व्यवसायगत कंडीशनिंग कविता लिखने में कहीं भी बाधक बनी? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि आपने यह अच्छा प्रश्न पूछा! पहली बार किसी ने ऐसी जिज्ञासा रखी है। दरअसल मेरे मन में भी यह चीज कई बार उठती रही है। यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा कि किसी भी पेशे की तरह अध्यापन के पेशे में रहने की भी सीमाएँ जरूर होती हैं। साहित्य का अध्यापक चूँकि साहित्य के बारे में एक खास तरह की कंडीशनिंग भी करता है, इसलिए एक रचनाकार के लिए उस कंडीशनिंग से लड़ने की जरूरत लगातार होती है।

मैं तुलसी को पढ़ता रहता हॅँू। यहाँ सीधे कहूँ कि मैंने पहली बार रामचंद्र शुक्ल की आँख से उन्हें पढ़ा और वह मेरी एक ऐसी कंडीशनिंग थी, जिससे मुक्त होने में मुझे काफी समय लगा। इस तरह की सीमाएँ कुछ दूसरों को पढ़कर तथा कुछ अपनी तत्संबंधी मान्यताओं के कारण बनती चलती हैं। एक अध्यापक-सर्जक को उनसे लगातार लड़ना पड़ता है।

कविता के जीवन-रस की प्राप्ति के लिए केदारजी बार-बार अपने गाँव जाते रहे। उनके यहाँ गाँव का कोई यूटोपिया तो नहीं है, लेकिन वहाँ एक नॉस्टेलेजिक अनुभव की तरह उसे देख सकते हैं। केदारजी ने स्वीकार किया कि ‘आपने ठीक कहा! दिल्ली में २५ वर्षों से हूँ, लेकिन आज भी यहाँ स्वयं को अजनबी की तरह पाता हूँ। इसका कारण यह है कि मेरे जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा गाँव में या गाँव जैसे परिवेश में बीता है। मैं दिल्ली आना नहीं चाहता था, जे.एन.यू. में नियुक्ति के बाद भी नहीं! बल्कि एक बार तो शायद १९६७ में दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज में नियुक्ति का ऑफर भी अस्वीकार कर दिया था। पता नहीं क्यों, दूर बैठे-बैठे दिल्ली से डर लगता था! अब इनसाइडर हूँ, तब भी उस डर से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ हूँ। शायद इस शहर का विराट् आकार और उसका जनसंकुल परिवेश, आपाधापी, भागदौड़—इस भय के मूल में हों!’

केदारजी अपने प्रभा-मंडल के सम्मोहन से परिचित थे। लेकिन वरिष्ठ, समकालीन और अनुज—सबके प्रति सम्मान का भाव उनमें बना रहा। बातचीत में परेशान करने वाला मैंने एक सवाल किया कि ‘हिंदी कविता को सर्वाधिक लोकप्रिय मुहावरा आपने दिया है। कई कवि तो देर तक आपकी आवाज में बोलते रहते हैं। आपने कविता को आसान और आकर्षक बना दिया है। सुगम गायकी की शुरुआत के लिए मुकेश का अनुकरण किया जाता है, ऐसे ही कविता की दृष्टि से आपका काम रेफरेंस की तरह है। आज की हिंदी कविता को प्रभावित करने की दृष्टि से रघुवीर सहाय का नाम भी महत्त्वपूर्ण है। इस संदर्भ में उनके साथ तुलना किए जाने पर आपकी टिप्पणी?’ इसके संतुलित और गंभीर जवाब में उन्होंने कहा कि यह आपने संकोच में डालनेवाला सवाल पूछ लिया है। ऐसा प्रश्न पहले किसी ने पूछा नहीं और पूछा भी जाता तो मैं उसका जवाब नहीं देता। इसलिए इसका उत्तर देने में मुझे थोड़ी कठिनाई हो रही है—तब भी मैं बात साफ करने की कोशिश करता हूँ।

दरअसल जब भी मैं सुनता हूँ—रघुवीर सहाय बनाम केदारनाथ सिंह—तो मुझे यह एक सरलीकरण की तरह लगता है और इससे मुझे हमेशा परेशानी होती है। पता नहीं यह स्थिति कब और कैसे बन गई और अब तो यह एक चालू मुहावरे जैसा बन गया है। मैं इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ।

आज की कविता को जहाँ तक मेरे द्वारा प्रभावित करने का सवाल है, उसको लेकर कुछ ठीक-ठीक आकलन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ। बाद की पीढ़ी ने जिस परंपरा का विकास किया, उसमें मैं कहाँ, कितना या बिल्कुल नहीं हूँ, इस संदर्भ में मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह सकता हूँ कि इसे जाँचने का कोई पैमाना मेरे पास नहीं है। मैं मानता हूँ कि बाद की पीढ़ी जो आई है, वह अपने से पहले की पीढ़ी के बावजूद आई है। यह और बात है कि हर पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से कुछ लिये-दिए, अपने वजूद में आती है। मेरा खयाल है कि रघुवीर सहाय-केदारनाथ सिंह की ऐसी चर्चा स्वस्थ आलोचना का विषय नहीं है और किसी भी प्रकार की तुलना की दृष्टि से इसे नहीं देखा जाना चाहिए। असल में केदारजी उस समय जोर-शोर से जारी हिंदी कविता के कथित षड्यंत्र-प्रहसन को पहचानते थे। वे न किसी की तरह दिखना चाहते थे, न किसी को अपनी तरह बनने की महत्त्वाकांक्षा उनमें थी। हालाँकि उस समय ऐसे कई थे, जो केदारजी जैसा दिखना और लिखना चाहते थे—इसका भी उन्होंने समर्थन नहीं किया!

कोई भी स्मृति अंततः बिंब होती है। हर बड़ा कवि अपने बिंबों से पहचाना जाता है।

केदारनाथ सिंह की काव्य-पीढ़ी के ज्यादातर कवियों की कविता विचारों से बोझिल दिखाई देती है। केदारनाथ सिंह छोटे लेकिन स्थायी असर डालनेवाले बिंबों केद्वारा बड़ी बात कहनेवाले कवि हैं। वस्तुओं और मनोदशाओं के जितने बिंब उन्होंने निर्मित किए हैं, शायद ही किसी आधुनिक हिंदी कवि ने किए होंगे। यह काव्यात्मक-अकाव्यात्मक, सहज-जटिल को एकसाथ साधने की विलक्षण कला का साक्ष्य है।

शब्दों के बचे रहने तक बचे रहने का स्थायीभाव केदारनाथ सिंह की कविताओं का है। अपने अंतिम प्रकाशित संकलन की आखिरी कविता में उन्होंने लिखा—‘रहेगा सब जस का तस/सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी/साँझ को जब लौटेंगे पक्षी/लौट आऊँगा मैं भी/सुबह को जब उडेंगे/उड़ जाऊँगा उनके साथ।’ शब्द में अर्थ की तरह उनकी कविता का सौंदर्य बार-बार सघन और प्रासंगिक होता रहेगा।

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