बडे़ क्लोजअप का फ्रीज शॉट

बडे़ क्लोजअप का फ्रीज शॉट

अपने उलझे हुए बालों पर ब्रश चलाते हुए रिंकी ने कहा, ‘‘कुछ भी कहो, मुझे तो इस सपने में बड़ा मजा आया। मैंने तो भई लिट्रली एन्ज्वॉय किया। ऐसी भयानक परिस्थिति में भी इस तरह दौड़ते हुए चले जाना भला कम प्रिलिंग है? क्या कहते हो?’’

शुभव्रत थोड़ा मुसकराया, फिर बोला, ‘‘इससे तुम्हारे भीतर की प्रभुत्वकामी मानसिकता का पता चलता है।’’

‘‘क्या कामी...?’’ रिंकी ने शुभव्रत की आँखों में आँखें डालकर पूछा।

‘‘प्रभुत्वकामी। असल में तुम्हारे भीतर एक डिक्टेटर रहता है।’’

‘‘ऐसा है?’’ इस बार रिंकी के होंठों पर एक गुलाबी हँसी खिल उठी।

‘‘हाँ, तुम लोगों के सिर पर पैर रखकर चलना पसंद करती हो।’’

दीवार पर लगे हुए ओवल डिजाइन के दर्पण में अपनी आँखें गड़ाते हुए रिंकी बोली, ‘‘ऐसा भीतर से नहीं चाहती, यह भी तो मैंने कभी नहीं कहा। न तो मैं तुम्हारी तरह ‘क्रीम ऑफ द प्रोग्रेसिव सर्कल’ हूँ और न किसी तरह का ढोंग करती हूँ। मेरे खयाल में तो हर आदमी प्रभुत्वकामी होता है, दूसरे को हर क्षण डॉमिनेट करने की फिराक में रहता है।’’

शुभव्रत ने पहले कहना चाहा, ‘मैं इस फिराक में नहीं रहता।’ लेकिन चुप रहा।

इस वक्त वह किसी तर्क-कुतर्क के चक्कर में फँसना नहीं चाहता। सिर्फ रोचक होने के कारण उसने रिंकी के सपने को सुना। उसपर गंभीर चर्चा करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। छात्र-जीवन से ही उसका प्रगतिशील मंच में उठना-बैठना रहा है। कड़ी-तीखी प्रतिक्रिया वह बहुत सहजता से दे सकता था, किंतु इतनी सी बात पर बड़े परदे की इस ग्लैमरस हीरोइन के साथ बहस करके समय बरबाद करे, इतना बेवकूफ भी नहीं है वह।

दिन भर उसे कितनी मेहनत करनी पड़ी, यह सिर्फ वही जानता है। रायटर्स बिल्डिंग के कर्मचारियों के साथ इतनी बक-बक करनी पड़ी है कि उसका सिरदर्द होने लगा था। अभी भी भारीपन महसूस हो रहा है। इसी भारीपन से निजात पाने के लिए वह रिंकी के इस फ्लैट में आया है। शुभव्रत ने कुछ न कहते हुए गिलास में थोड़ी सी व्हिस्की उड़ेल ली।

अपने को मानसिक और शारीरिक रूप से आराम पहुँचाने के लिए ही वह अकसर दक्षिण कलकत्ता के इस हाईराइज बिल्डिंग में दसवें माले के इस फ्लैट का उपयोग करता है। रिंकी का यह फ्लैट धूल, गर्द और गंदगी से तो काफी ऊपर है ही, साथ ही भीड़ और शोरगुल से भी दूर है। इसके अलावा यहाँ शुभव्रत जब-तब उससे मिलने आनेवालों से भी बचा रहता है। यहाँ उसका कुछ समय शांति से कट जाता है। लगातार दो विदेशी फिल्मोत्सव में उसकी फिल्म ‘दो वक्त दो मुट्ठी’ के पुरस्कार पाने के बाद तो उसके लिए शांति से अपने हिसाब से रह पाना बहुत कठिन हो गया, जबकि किसी क्रिएटिव इनसान के लिए शांति से आईसोलेसन में रहना कितना जरूरी है, यह हर कोई समझ नहीं सकता। वैसे रिंकी से भी हर वक्त मिल पाना उसके लिए बहुत आसान नहीं है। आखिर वह भी तो टॉलीगंज की एक व्यस्त नायिका है।

व्हिस्की की सिप लेते-लेते उसने मन-ही-मन रिंकी के सपने का शॉट डिवीजन कर लिया। सही जगह इस शॉट को लगा दिया जाए तो गलत नहीं होगा। सपना कुछ इस तरह था—एक बहुत बड़ा मैदान। हजारों की संख्या में लोग वहाँ एकत्र हुए हैं। मंच की तरह किसी ऊँची जगह से रिंकी सिर्फ लोगों के काले-काले सिर देख पा रही है। जहाँ तक नजर जाती, काले सिरों का समुद्र नजर आता, तभी अचानक मंच के पीछे कहीं आग लग जाती है। उस आग से डरकर रिंकी भागने लगी। वह जितना भाग रही थी, आग उतना ही उसका पीछा करती जा रही थी। वह और तेजी से भागने लगी। भागते-भागते मंच से कूद पड़ी, फिर लोगों के सरों पर पाँव रखकर दौड़ने लगी। वह समझ नहीं पा रही थी कि किस दिशा में भाग रही है। सिर्फ उन असंख्य सिरों पर पैर रखकर भागते रहना ही उसकी नियति बन गई थी।

तभी रिंकी बोली, ‘‘मुझे अपने इस सपने का अर्थ समझ में आ गया है।’’

‘‘कैसे...क्या मतलब है तुम्हारे हिसाब से?’’

‘‘मैंने तुम्हें बताया था न कि पब्लिक स्टेज में मेरे जाने की बात चल रही है।’’

‘‘विदेशों में तो स्टेज की हीरोइनों को कुछ ज्यादा ही सम्मान की नजर से देखा जाता है, लेकिन हम लोगों के यहाँ मामला बिल्कुल उल्टा ही है, स्वर, तुम अपनी बात कहो।’’

‘‘ग्रुप थियेटर तो छोड़ो, कभी मुहल्ले के थियेटर में भी काम करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। बाप रे! आँखों के सामने ढेरों काले सिर देखकर ही मेरे पाँव काँप उठते थे। मुझे तो लगता है, मेरे इस सपने के पीछे कहीं-न-कहीं यह डर जरूर काम कर रहा है।’’

शुभव्रत कुछ बोलने जा रहा था कि तभी फोन की घंटी बज उठी। रिंकी ने जाकर क्रेडिल से रिसीवर उठाया और फिर शुभव्रत को इशारे से बताया कि कोई उससे बात करना चाहता है।

‘‘मेरा फोन है?’’ धीमी आवाज में उसने रिंकी से पूछा और कुछ टूटने की आवाज के साथ सेंटर टेबल पर गिलास रखा। यहाँ कौन उसे फोन कर रहा है? ऐसा कौन है, जिसे मालूम है कि इस वक्त वह रिंकी के इस फ्लैट में हो सकता है। निश्चित रूप से इंदिरा नहीं हो सकती। इंदिरा सोम सवेरे ही पुत्र को लेकर कल्याणी चली गई है। उनके जाने के लिए गाड़ी भी देनी पड़ी थी। नई गाड़ी और नया ड्राइवर। शुभव्रत ने पहले उन लोगों को एक्सप्रेस बस से चले जाने को कहा था। बारासात से कृष्णानगर होते हुए पहुँचने में भला कितना समय लगेगा? सुनते ही इंदिरा बिगड़ गई थी। उसका तर्क था कि रिश्तेदारी में शादी का कार्यक्रम है, वहाँ अगर गाड़ी में नहीं जाया गया तो फिर गाड़ी खरीदने का क्या लाभ? निश्चित रूप से इंदिरा ने कल्याणी से फोन नहीं किया होगा।

रिसीवर कान से लगाते ही वह क्रोध से फट पड़ा, ‘‘व्हाट नॉनसेंस! हू द हेल टोल्ड यू आई एम हेयर?’’ तारापद रक्षित की आवाज सुनते ही शुभव्रत बिल्कुल आपे से बाहर हो गया। तारापद रक्षित शुभव्रत के यूनिट का ही लड़का है। पेशे से असिस्टेंट कैमरामैन। कभी सबर्ब के जिलों में गु्रप थियेटर में काम करता था। स्कूल की उच्च कक्षाओं में आते ही वह पार्टी की छत्रच्छाया में आ गया। बाद में पार्टी का कैडर बन गया। ज्यादातर वक्त पार्टी की कल्चरल विंग में ही व्यस्त रहा। जिन दिनों पार्टी का चरित्र काफी उग्र था, शुभव्रत से तारापद के बड़े भाई की सलाम-दुआ थी, किसी बलवे में गोली लगने से उनकी मृत्यु हो गई थी। उसी परिचय का हवाला देकर तारापद शुभव्रत के पास काम के लिए आया था। देखने में आज्ञाकारी और मेहनती लगा था, इसलिए शुभव्रत ने उसे अपनी यूनिट में रख लिया। आगे चलकर गिल्ड का सदस्य भी बना दिया। वही तारापद इतना गैर-जिम्मेदार होने लगा कि डायरेक्टर से बात करने के लिए सीधे-सीधे हिरोइन के घर फोन कर रहा है। ऐसे लोगों में साधारण एटिकेट नाम की भी चीज नहीं होती है। शुभव्रत गुस्से से उसके ऊपर चीख पड़ा, किंतु उसने शांत आवाज में कहा, ‘‘दादा, असल में दो-तीन जगह फोन करने पर भी आप नहीं मिले तो मैंने सोचा, यहाँ फोन करके देख लूँ। मुझे इस वक्त पैसे की बहुत जरूरत है दादा, अभी अगर पैसे नहीं मिले तो मैं बहुत मुसीबत में पड़ जाऊँगा।’’

‘‘लेकिन तारापद, मैंने तो तुमसे पहले भी कहा है कि इस वक्त मेरे हाथ बिल्कुल खाली हैं, अभी तुम्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।’’

‘‘मैं जानता हूँ, दादा, लेकिन मेरा तो सर्वनाश हो जाएगा। मुझ पर दया कीजिए, दादा। आपके पास न हों तो किसी से लेकर ही दे दीजिए।’’

‘‘इससे अच्छा यह होगा कि तुम ही किसी से लो, किसी तरह काम चलाओ। अगले महीने की शुरुआत में ही तुम्हें तुम्हारा पैसा मिल जाएगा।’’

‘‘मुझे भला कौन देगा? किसी पैसेवाले के साथ मेरा कोई उठना-बैठना तो है नहीं और फिर मेरे जैसों को वे लोग क्यों पैसा देने लगे? आप खुद मुझे नहीं दे पा रहे हैं तो एक अपरिचित आदमी किस आधार पर देगा?’’

तारापद रक्षित की इस बात से शुभव्रत का पूरा शरीर क्रोध से जलने लगा, ‘‘तारापद, जरा सोच-समझकर बात करो। तुम्हें तो मालूम ही है कि इस वक्त मैं एक बड़ी फिल्म बनाने की तैयारी कर रहा हूँ। स्क्रिप्ट पर डिस्कशन चल रहा है। मैं इस मामले में बहुत सीरियस हूँ और तुम अभी मुझे डिस्टर्ब कर रहे हो।’’

‘‘इस मुसीबत की घड़ी में मुझे अगर आप जैसा फिल्म मेकर ही...’’

‘‘तारापद, ज्यादा फालतू बातें मत करो। तुम कहाँ से फोन कर रहे हो?’’

‘‘आपके फ्लैट से ही कर रहा हूँ। आपका यह सर्वेंट भी तो मुझे पहचानता नहीं है, फोन करने नहीं दे रहा था, बड़ी मुश्किल से...’’

‘‘इस तरह फिर कभी फोन मत करना,’’ कहकर शुभव्रत ने फोन काट दिया। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो रहा था। रिसीवर को क्रेडिल पर रखकर उसने रिंकी को देखा। रिंकी भी उसकी ओर देख रही थी। रुमाल निकालकर माथे पर छलक आए पसीने की बँूदों को पोंछते हुए शुभव्रत ने कहा, ‘‘ऐसे लोगों के रहते कोई भी सीरियस काम करना बहुत मुश्किल है। तारापद आजकल कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगा है।’’

‘‘पैसे माँग रहा है?’’

‘‘हाँ, वही जो टी.वी. सीरियल की एक कहानी पर काम किया था, उसका पैसा अभी तक उसे नहीं मिला, वही माँग रहा था। इन लोगों को जब देखो, तब कोई-न-कोई समस्या घेरे रहती है।’’

‘‘इस बार कौन सी समस्या बता रहा था?’’

‘‘कह रहा था, बारासात के अस्पताल में उसकी बहन भरती है। ऑपरेशन होना है। खून की भी जरूरत पड़ेगी, ब्लड बैंक जाना है, वगैरह-वगैरह।’’

फिर फोन की घंटी बज उठी। इस बार भी रिंकी ने लपककर रिसीवर उठाया। दूसरी ओर से आवाज सुनने के बाद माउथपीस पर हाथ रखकर रिंकी ने धीरे से कहा, ‘‘फिर वही...’’

‘‘तारापद?’’

‘‘हाँ, आवाज तो वही लग रही है।’’

शुभव्रत ने रिसीवर उससे लिया, कान से लगाया और फिर तेजी से उसे क्रेडिल पर रख दिया।

तभी रिंकी ने उससे पूछा, ‘‘बारासात के अस्पताल में उसकी बहन क्यों? क्या तारापद वहीं रहता है?’’

‘‘हाँ, बामनगाछी और दत्तपुकुर के लगभग बीच में ही उसका घर है।’’

अचानक तीसरी बार फिर से घंटी बजने लगी। इस बार शुभव्रत ने रिसीवर को क्रेडिल से हटाकर कुछ देर सुना, फिर मेज पर लिटाकर रख दिया।

रिंकी मुसकराते हुए बोली, ‘‘लग रहा है, रक्षित ने तुम्हें बहुत ज्यादा गुस्सा दिला दिया है। तुम्हें फोन पर गाली तो नहीं दे रहा था?’’

‘‘नहीं, नसीहत दे रहा था। कह रहा था कि एक कमिटेड डायरेक्टर से कुछ ज्यादा एक्सपेक्ट किया ही जाता है। वह मुझसे कुछ खास उम्मीद लगाए हुए था।’’

‘‘कैसी उम्मीद? शूटिंग बंद करके लोगों का परोपकार करते रहना?’’

‘‘हाँ, ऐसा ही कुछ समझ लो। तुम तो जानती ही हो, मेरे पास जितना पैसा है, उससे नेक्स्ट लॉट का पैच वर्क ही ज्यादा-से-ज्यादा हो सकता है। तारापद चाहता है कि मैं इसमें से ही उसका पैसा दे दूँ।’’

‘‘ऐसा करने से तो तुम्हें अपना नेक्स्ट शिड्यूल कैंसिल करना पड़ेगा। इस तरह तो तारापद को भी नुकसान होगा यह उसकी समझ में नहीं आता।’’

‘‘सब समझ में आता है, लेकिन कुछ ज्यादा ही समझता है। मैंने ‘धर्मपुरुष’ में दिखाना चाहा कि धार्मिक बाबाओं ने तो ऐसा माहौल बना दिया है कि देश कभी शनिपूजा, ताबीज और रंग-बिरंगे पत्थरों से बाहर शायद ही निकल पाए। अगर संभव होता तो मैं छुटभैए नेताओं की बेवकूफियों पर भी एक फिल्म बनाता, लेकिन इस तरह की फिल्म बनाने से मेरा बेस खत्म हो जाएगा।’’

‘‘बेस खत्म नहीं होगा, बल्कि तुम्हारी लॉबी बदल जाएगी और एक बार अगर नाम हो जाए तो फिर ‘लॉबी’ बदलना यहाँ कतई गलत नहीं समझा जाता है।’’

शुभव्रत ने उसकी बात का जवाब दिए बिना व्हिस्की से भरे गिलास को फिर मुँह से लगाया और कहा, ‘‘तारापद ने तो आज सारा मूड ही खराब कर दिया। रिंकी, तुम्हारे नौकर को जरा बाहर भेजना है। बहुत भूख लग रही है। चौराहे के चाइनीज रेस्टोरेंट से कुछ खाने के लिए मँगवाया जाए।’’

‘‘आजकल मैं देख रही हूँ, तुम्हें भूख कुछ ज्यादा ही लग रही है। कहीं यह भूख पर फिल्म बनाने का रिएक्शन तो नहीं है?’’

शुभव्रत की अगली फिल्म ‘धर्मपुरुष’ की नायिका रिंकी ही है। इस तरह का कैरेक्टर रिंकी ने पहले कभी प्ले नहीं किया। उसकी कोमल, किंतु उत्तेजक देहयष्टि और अभिजात चेहरे से ‘धर्मपुरुष’ के भूख से पीडि़त चरित्र को निकाल पाना आसान काम नहीं है, पर शुभव्रत जानता है कि रिंकी से यह संभव है। वह अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर देह की मांसलता और चमड़ी की मक्खनी आकर्षण को गौण बना देगी।

पर्स से दो पचास के नोट निकालकर शुभव्रत ने रिंकी के नौकर को दिए और बताया कि उसे क्या-क्या लाना है। फिर थोड़ी देर के लिए बाथरूम गया। बाहर आने के पहले मुँह पर पानी के छींटे मारकर रुमाल से पोंछा और आईने में थोड़ी देर खुद को देखता रहा। आजकल वह पहले जैसा दुबला-पतला नहीं लगता है, फिर भी अभी तक शरीर में एल्कोहलिक फैट जमा नहीं हुआ है, जबकि सिर्फ बियर पीते हुए दो साल में ही इंदिरा कितनी मोटी हो गई। उसका बेटा भी गोलमटोल लगता है।

शुभव्रत की नई फिल्म में कई सौ दुधमुँहे बच्चों की जरूरत पड़ेगी, जो जन्म से ही कुपोषण के शिकार दिखते हों। पसलियाँ बाहर निकली हुईं। उन सैकड़ों बच्चों के शॉट की कल्पना करते उसका ध्यान रिंकी के कंधे और सीने की कोमलता पर चला गया। शॉट में भूख से बिलबिलाते कई सौ बच्चे एक पंक्ति में पड़े होंगे। ट्रॉलीशॉट में उस दृश्य को शूट करना होगा। कैमरे की गति के साथ अपनी गति को मेंटेन करते हुए फटे-चीथड़े कपड़ों में ढकी रिंकी गिरते-पड़ते आगे बढ़ेगी।

रिंकी के नौकर के बाहर जाने के दस मिनट बाद डोरबेल बज उठी। ‘इतनी जल्दी नौकर वापस क्यों आ गया?’ रिंकी ने यह सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने तारापद रक्षित को देखकर सन्न रह गई, लेकिन प्रत्यक्ष रूप में उसकी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी, मानो वह रक्षित को लॉन्ग शॉट में देख रही है। यही तो खूबी है रिंकी की। पल भर में चेहरे के भावों को बदलने में महारत हासिल है उसे। अपनी पसंद और स्तर के अनुरूप वह करीबी व्यक्ति को दूर का और दूर के किसी इनसान को बहुत करीबी होने का एहसास अपने चेहरे के भावों के आधार पर करा सकती है।

अचानक तारापद को देखकर शुभव्रत खुद को संयत नहीं कर सका। उसकी गले की नसें तन गईं, जब वह ‘स्क्राउण्ड्रल’ कहकर जोर से चीखा। ‘गेट आउट आई से’ कहकर दुबारा चीखा और धड़ाम से उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया। इसके बाद भी डोर बेल लगातार बजता रहा। क्रोध में जैसे शुभव्रत के चेहरे पर खून उतर आया। उसने झटके से दरवाजा खोला और तारापद पर झपटने को हुआ तो वह चीखते हुए बोला, ‘‘दादा, मैं पैसे के लिए नहीं आया हूँ। आपकी गाड़ी का एक्सिडेंट हुआ है। भाभीजी और आपका बेटा दोनों इस वक्त बारासात के अस्पताल में हैं।’’

‘‘क्या...यह कैसे हुआ? कहाँ से खबर मिली तुम्हें?’’ अचानक शुभव्रत का चेहरा जैसे एकदम पीला पड़ गया।

रिंकी ने भी पूछा, ‘‘जरा खुलकर बताओ न?’’

तारापद उस वक्त हाँफ रहा था। इतनी दूर दौड़ते-भागते खबर देने आया था, बस लिफ्ट में ही जो कुछ सेकेंड के लिए खड़ा रहा, धीरे-धीरे बोला, ‘‘शुभ दा ने जैसे ही फोन की लाइन काट दी, बारासात से भाभीजी के फुफेरे भाई प्रशांत बाबू ने फोन किया था। शुभ दा को तुरंत बुलाया था। मैं तब से लगातार इन्हें फोन मिलाता रहा, लेकिन लाइन नहीं मिली। मजबूरन भागते-दौड़ते आना पड़ा।’’

शुभव्रत ने रिंकी की ओर असहाय नेत्रों से देखा और फिर पर्स निकालकर उससे बोला, ‘‘मेरे पास तो इस वक्त बहुत ज्यादा पैसे नहीं हैं, तुम्हारे पास कुछ हैं क्या? कल बैंक खुलते ही तुम्हें वहाँ से निकालकर दे दूँगा।’’

‘‘जितना होगा, उतना दे रही हूँ। मैं भी तो घर पर ज्यादा पैसा नहीं रखती हूँ,’’ कहते हुए रिंकी भीतर चली गई।

‘‘तारापद, तुम थोड़ी देर बैठो, मैं आता हूँ।’’ कहकर शुभव्रत तेजी से भीतर रिंकी के पास चला गया।

आलमारी के भीतर जितना मिला, रिंकी ने शुभव्रत को देकर कहा, ‘‘और कुछ पैसे साथ में ले जाते तो अच्छा होता। किसी प्रोड्यूसर से क्या कुछ इंतजाम हो सकता है?’’

‘‘ट्राई कर सकता हूँ, लेकिन इसमें काफी देर हो जाएगी।’’ कहते हुए शुभव्रत रिंकी के साथ बाहर निकल आया।

‘‘दादा!’’ तारापद ने उससे कहा, ‘‘मेरी बहन का ऑपरेशन तो परसों है। उसके ऑपरेशन के लिए कुछ पैसे इकट्ठे किए थे, वे अभी मेरे पास हैं। आप रख लीजिए, कल मुझे दे दीजिएगा। जाते वक्त अपने यूनिट के कुछ लोगों को साथ ले लिया जाएगा। अब और देर मत कीजिए।’’

तारापद को शुभव्रत ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जैसे गले में आवाज फँस गई और उस वक्त लॉन्ग शॉट में नहीं, रिंकी और तारापद शुभव्रत को एक बड़े क्लोजअप के फ्रीज शॉट में दिख रहे थे।

एफ/१७, शांति नगर (कैंट)

कानपुर-२०८००४

दूरभाष : ०९६५१९२४१००

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