दूसरों को दोष देने की प्रतिभा

दूसरों को दोष देने की प्रतिभा

कल एक शादी में हमने अभूतपूर्व दृश्य देखा। आजकल शहर से दूर किसी ‘रिजॉर्ट’ या किराए के फार्महाउस में शादी के बाद ‘रिसेप्शन’ का चलन है। महिला समानता के स्वर्ण युग में वधू के परिवार पर आर्थिक वार करने का यह भी अंदाज है—‘देखिए, हमें न दहेज की अपेक्षा है, न धन-दौलत की। जो भी करना हो, आप अपनी और अब हमारी बेटी के लिए करें। हम तो बस इतना चाहते हैं कि बरात का ध्यान रखें। विवाह किसी आकर्षक स्थान से हो।’

यह स्थान अधिकतर शहर से दस-पंद्रह किलोमीटर दूर होता है। जाना जरूरी है, सामाजिक बाध्यता जो है। लिफाफा देने की रस्म भी निभानी ही निभानी है। हमारे परिचित पांडेजी जो खर्च किया, उसे वसूलने में विश्वास करते हैं। सबको पता है, बस से आएँ या स्कूटर से, पधारते वे अपनी पत्नी और बेटा-बेटी के साथ ही हैं। उनके घर का नियम है कि रात को ‘रिसेप्शन’ है तो दिन में खाना नहीं बनता है। रात को यदि किसी खाद्य-पदार्थ को चखने से चूके तो कहीं कोई देवता रूठ न जाएँ! शादी की सफलता में बाधा न आए। एक बार हमने गिना है। उन्होंने सात-आठ गिलास शीतल पेय का सेवन किया। सबसे पहले लपककर गिद्ध भोज का प्रारंभ कर अंत में अनिच्छा से सबके बाद प्लेट रखी। कई प्लेट-चम्मच लेने की प्रतियोगिता में दौड़े तो ऊँची-नीची घास ढकी जमीन के कारपेट पर, कुछ ठोकर खाकर सलाद पर गिरे, कुछ रायते पर। पांडेजी उन शहीदों में नहीं थे। सुनते हैं कि लौटते समय उन्हें सड़क के किनारे झाड़ी जरूर तलाशनी पड़ी।

दूसरे दिन शाम तक बार-बार ‘टॉयलेट’ की दौड़ से बचने के लिए उन्हें एक डॉक्टर के क्लीनिक का सहारा लेना पड़ा, और प्रतीक्षा के दौरान वहाँ बने कामचलाऊ शौचालय का भी। बाहर आकर उन्होंने मन-ही-मन डॉक्टर को गाली दी और बुदबुदाए, ‘‘कमबख्त, फीस सैकड़ों में लेता है और ढंग के टॉयलेट तक को कोई तरसे। जरूरतमंदों का शोषण इसे नहीं तो और किसे कहेंगे?’’ इस दुर्घटना के बाद ठीक होकर मिले तो बताने लगे, ‘‘यार! क्या कहें, जहाँ शादी में हम मिले थे, वहाँ मैन्यू तो ठीक था, बस खाना गड़बड़ था। अपना तो पेट चल गया ‘फूड-पॉइजनिंग’ के कारण। डॉक्टर और दवा की चोट अलग लगी।’’ तब से हम सोचते हैं कि अकाल पीडि़तों की मानसिकता से भोजन पर स्वयं पांडे ने आक्रमण किया, हर संभव खाद्य-पदार्थ का दुश्मन के समान संहार किया और लगन से अपनी दुर्दशा के लिए उसी में मिले ‘पॉइजन’ को दोष दे रहे हैं। हमें आश्चर्य हुआ। वसूली के चक्कर में सपरिवार पहुँचे। खाने पर चील की तरह झपटे, पेट में ऐसे ठूँस-ठूँसकर भरा, जैसे भविष्य में भोजन की संभावनाओं का अंत है और बेशर्म ऐसे कि अपने लालच को नहीं, कोस उसी खाने को रहे हैं।

पांडेजी कोई अपवाद नहीं हैं। दूसरों को दोष देने की कला के कई विशेषज्ञ भारत में बसते हैं। इनमें कई प्राध्यापक-बुद्धिजीवियों का तो स्वभाव ही अपने सहकर्मियों के चरित्र में खोट की खोज है। कभी-कभी हमें शंका होती है कि चमचों के उद्भव में कहीं बुद्धिजीवियों का योगदान तो नहीं है? ये सामने वरिष्ठों को सराहते हैं, कनिष्ठों को धमकाते हैं और पीठ पीछे दोनों को दुत्कारते हैं। तब श्रोताओं में अधिकतर इनके शोध-छात्र हैं। शोध-कर्मियों के रहते इन्हें घर में किसी सेवक की दरकार नहीं है। भाजी-सब्जी की खरीद से लेकर घर की सफाई तक, किसी भी शोध-छात्र की सफलता की बुनियादी शर्त है। इसके अलावा उसके कर्तव्यों में गुरु के परिवार की भूरि-भूरि प्रशंसा, उसकी हर बात में मुंडी हिलाना, उसके ज्ञान के आगे सबको अल्पज्ञ समझने का दिखावा करना आदि सम्मिलित है। इन सबके सफल निर्वाह से ही शोधार्थी के नाम के आगे ‘डॉक्टर’ का विशेषण संभव है, वरना उसका शोधार्थी का शोधार्थी बने रहना निश्चिंत है। इधर बुद्धि के इन गुरूकंटालों ने धनार्जन के नए साधन का आविष्कार किया है। यह अब पी-एच.डी. का विषय ही नहीं सुझाते, उसपर शोध-प्रबंध भी लिखवा देते हैं। बौद्धिक क्षेत्र में यह सरकारी औद्योगिक नीति की ‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस’ का नया प्रयोग है। आठ-दस हजार रुपए के एवज में डॉक्टर की उपाधि क्या बुरी है? यों मुद्रा स्फीति तथा गुरु के घटते-बढ़ते प्रभाव के साथ यह दर घटती-बढ़ती रहती है। कहते हैं कि गुरु ‘रिटायर’ तो कभी नहीं होते हैं, अपने विभाग में बस उनका दबदबा गिरता-उठता है। बहुधा वे सबसे स्नेह संबंध बना के रखते हैं, फिर भी कभी खटपट सामान्य बनाम आरक्षित वर्ग के मुद्दे पर मुमकिन है, कभी अन्य निजी मसलों को लेकर। रिटायर्ड प्रोफेसर इन सबसे बचने को गिफ्ट-भेंट और मौखिक चापलूसी-प्रशंसा पर निर्भर हैं। फॉर्मूला कभी कामयाब होना है, कभी नहीं।

बुद्धिजीवियों की तकरार का एक अन्य प्रमुख विषय राज्य सरकार या निजी संस्थाओं के पुरस्कार-सम्मान हैं। सार्वजनिक रूप से हर बुद्धिजीवी यही घोषणा करता है कि न वह पुरस्कारों के लिए लिखता है, न उसका इनसे कोई लेना-देना है। उल्टे वह इन सबसे उदासीन है। यह अलग है कि यदि कोई राज्य सरकार या निजी संस्थान उसे इस योग्य समझे तो वह इनकार भी नहीं करेगा।

दीगर है कि हर छोटे-बड़े सम्मान के लिए वह क्या-क्या नहीं करता है? हर संबद्ध अधिकारी को साधता है। दूसरों की खुशामद करके अपनी संस्तुति भिजवाना, पुरस्कार की चयन समिति के संभावित सदस्यों की सूची बनाकर उन्हें अपने पक्ष में करना, प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध प्रचार आदि उसके निजी हथकंडे हैं, जिनमें नियम से अभ्यास के कारण वह सिद्धहस्त है। हर पुरस्कार से पूर्व वह उसे हथियाने का जी-जान से प्रयास करता है। यदि सफल होता है तो अपनी योग्यता का हवाला देता है, अन्यथा पानेवाले के राजनैतिक प्रभाव और चयन समिति के पूर्वग्रह को—‘‘हमें ऐसे पुरस्कारों की हसरत नहीं है, पर साहित्य में इस प्रकार की सियासत का प्रवेश उचित नहीं है।’’

यदि उसे नहीं मिलता है तो पुरस्कार पर राजनीति से लेकर हर प्रकार के दूषित प्रभाव, जैसे चयनकर्ताओं का जातिवाद आदि हावी हो जाते हैं, वरना वह सम्मान पूरी तरह निष्पक्ष और योग्यता की सही कसौटी, पहचान और आकलन है। ऐसे बुद्धिजीवी स्वयं को समाज का प्रेरक और दिशा-निर्देशक मानते हैं। समाज में समता, धर्म निरपेक्षता और समाजवाद उन्हीं की लेखकीय उपलब्धि है। नहीं तो इस देश को जाति और संप्रदाय के मध्य युग के अंधकार से छुटकारा कैसे मिलता? यह तो उनकी तरह के प्रगतिशील लेखकों ने विचारों की कंदील जलाकर हर प्रकार के तिमिर को दूर किया है। यह उनकी व्यक्तिगत त्रासदी है कि उनके अहम योगदान को सरकार ने अब तक नहीं सराहा है, नहीं तो कब से वह किसी-न-किसी पद्म सम्मान के वास्तविक अधिकारी हैं।

ऐसों को अपने मुँह मिट्ठू बनने की महारत हासिल है। अपने पर लिखवाई गई प्रशंसा की पत्रिका उन्हें स्वयं बाँटने से न परहेज है, न शर्म। उनकी प्रचारित छवि एक आदर्श पुरुष की है, पर असलियत में वे आम आदमी से बदतर भले हों, बेहतर कतई नहीं हैं। उनके दिखाने के दाँत उसूल और सिद्धांत के हैं, जबकि खाने के निजी स्वार्थ के। यह निश्चित नहीं है कि वे कब किसको किसी क्षुद्र लाभ के लिए धोखा दे बैठें। इसीलिए जानकारों का मत है कि न इनसे दुश्मनी अच्छी है, न दोस्ती। समझदार इनसे बचकर ही रहते हैं।

सरकारी सेवकों से बात कीजिए तो एहसास होता है कि सारे जहाँ का बोझ इन्हीं के नाजुक कंधों पर टिका है। बेचारे रात-दिन एक कर उसे ढो रहे हैं। कभी बेबात उनपर घूसखोरी के आरोप लगते हैं, कभी अकर्मण्यता के। कोई सोचे, करें तो क्या करें? वेतन है कि सुबह के साये सा महँगाई से हमेशा पीछे रहता है, काम है कि ताड़का के सन्मुख हनुमानजी के विशाल रूप सा बढ़ता ही जाता है। कोई पद सेवानिवृत्ति अथवा किसी दुर्घटना से खाली हुआ तो बस खाली रहना ही उसकी नियति है। सुस्ती सरकार की और कर्मचारियों की कामचोरी की सुर्खी अखबार की। वह क्या-क्या झेले? घर चलाने को कुछ लेता है तो भ्रष्टाचार है। खाली पेट काम करना मुमकिन है क्या? कुछ-न-कुछ खाना तो प्रकृति का नियम है। कभी रोटी खा ली, कभी पैसा। कितना दुखद है। उसका पक्ष सुनने तक को कोई प्रस्तुत नहीं है। जब तक न्यायालय में साक्ष्य न हो, डाकू भी डाकू नहीं है। पर कोई उसकी स्थिति पर विचार करे। सबको उसे नाकारा और भ्रष्ट का फतवा देने में वैसा ही आनंद आता है, जैसा ‘कौमनष्टों’ को दूसरे दलों को जन-विरोधी या कम्युनल का खिताब देने में। सच्चाई न कोई जानता है, न जानने का इच्छुक है। झूठ के पंख होते हैं, वह अफवाहों सा फैलता है, सच के पैर तक नहीं हैं। वह कैसे अपना बचाव करे?

अफसरों की एक अन्य त्रासदी भी है। सरकार में ऐसे पद भी हैं, जो महत्त्वहीन हैं। शासकीय जीवन में उनका वही स्थान है, जो सामाजिक संदर्भ में जेल जाने की सजा का है। न कोई उनके दर्शनार्थ पधारता है, न फोन, न सिफारिश, न स्टाफ। उनकी हालत उस कार सी है, जिसका ढाँचा तो बरकरार है, पर इंजन नदारद है। उसकी उपयोगिता किसी के लिए नहीं है। बस कार का नाम है। यदि कोई उससे संतोष करे, तो कर ले। लोग भी समझदार हैं। जिसका कोई असर ही नहीं, वह कैसा अफसर है? जब यह बिना ‘सर’ का अफसर घर लौटता है तो डरा-सहमा। पत्नी का उसे घूरना ही पर्याप्त है, जैसे बिना कुछ बोले कहे ‘‘और ईमानदार बनो, देशहित का ढोल पीटो, अंजाम यही होना है। नाक नाम का अंग चेहरे पर है, किंतु पद, अधिकार और सत्ता की नाक कटनी थी, कट चुकी है।’’ पत्नी की आँखें जैसे उस पर दोषारोपण करती हैं। उनके पिता भी प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे, पर उन्होंने जीवन भर सबसे बना के रखा। सरकार सरकार है, किसी भी दल की हो। हर मंत्री के अकेले में उन्होंने पैर छुए और सबके सामने झुककर प्रणाम किया। सबको ऐसे पटा के रखा, जैसे महत्त्वपूर्ण पदों का अपने नाम पट्टा लिखा के सरकारी नौकरी में पैदा हुए हों! रिटायर होकर भी मरते दम तक सलाहकार रहे। एक उनका पति है, बिल्कुल अक्खड़, गँवार, कतई बी.के.जी. (बिल्ली का गू)। वह हिकारत की नजर से सब कह जाती है और पति है कि सीता के समान जमीन में गड़ना चाहता है, पर इसमें भी असमर्थ है।

सियासी महापुरुषों की खासियत है, वे कभी भी न गलत बोलते हैं, न करते हैं। यदि उनके अल्पसंख्यक समर्थन को कोई वोट का दाँव कहे तो यह उसकी बुद्धि का फेर है। हर चुनाव हारने से साबित होता है कि जनता उनकी बात समझ नहीं पा रही है। पर विकास की अपनी प्राथमिकता के लिए उनके पास न कोई कार्यक्रम है, न कोई एजेंडा। उनके भाषणों को सुनकर केवल यही लगता है कि उनका पूरा ध्यान सत्ताधारी दल के नेता की व्यक्तिगत आलोचना पर ही केंद्रित है। वह कभी सत्ता में आए तो क्या नए गुल खिलाएँगे, इसका कहीं जिक्र तक नहीं है।

सत्ता में रहकर उनके दल ने भ्रष्टाचार का नया कीर्तिमान रचा है। यदि वह फिर कभी कुरसी पर बिराजे तो इस विषय में क्या कदम उठाएँगे, इस बारे में उनका मौन रहस्यमय है। क्या उनका विचार है कि जनता की सामूहिक याददाश्त इतनी कमजोर है कि उसे निकट अतीत का कुछ याद नहीं है? यदि ऐसा होता तो उनका राष्ट्रीय दल इतिहास की सबसे बुरी हार न झेलता। संभावना यही है कि वह स्वयं स्मृति-दोष से पीडि़त है, वरना कैसे भूलते कि उन्होंने खुद को हमेशा प्रजातंत्र, दल और सरकार से ऊपर समझा है। कैबिनेट के फैसले को फाड़ना क्या दरशाता है? सियासी महानता उनकी खुद की कमाई नहीं है। यह उनको विरासत में मिली दौलत है। दल ने उनके नेतृत्व में ज्यादातर चुनाव हारे हैं। फिर भी पारिवारिक प्रजातंत्र का ऐसा प्रभाव है कि वे अपनी पार्टी के सर्वोच्च और एकच्छत्र नेता हैं। किसकी मजाल है कि उनके बारे में चँू भी कर सके? यदि किसी ने ऐसा दुस्साहस दिखाया तो दल से उसका निष्कासन निश्चित है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है या जेबी पारिवारिक जनतंत्र? यह निर्णय देश के चिंतक मतदाताओं और राजनीति-शास्त्र के अध्येताओं पर निर्भर है।

यों असलियत यह है कि नेता की चर्चा चलते ही सामान्य लोग थूकने की कोशिश करते दिखते हैं, जैसे उन्हें उल्टी आ रही हो। जो पान के लतियल हैं, उनके लिए यह पीक का स्वर्णिम अवसर है। अतीत के सम्मानित और सिद्धांतों को समर्पित जनसेवक का नाम वर्तमान के अवतारों ने स्वार्थ प्रेरित कर्मों से ऐसा बदनाम किया है कि उनकी हैसियत आज मोहल्ले के सार्वजनिक कूड़ेदान सी हो गई है। उसमें हर प्रकार के उच्चारित उसूल का कचरा पड़ता रहता है और एक-दो दिन बाद उसे किसी भी दल के कूड़ास्थल में फेंक दिया जाता है, गँधाने के लिए। सुविधानुसार कूड़ा-मैदान के स्थान बदलते रहते हैं और पार्टियों के लेबल भी। हर पार्टी ने अपने प्रवेश-द्वार पर जैसे एक ड्राई-क्लीनिंग की दुकान खोल रखी है। जब कोई तथाकथित कम्युनल नेता उस स्वप्रचारित सेक्युलर दल में घुसता है तो ड्राई क्लीनिंग के द्वारा अचानक धर्मनिरपेक्ष बन जाता है। ऐसे आज के नेता उस पर्यटक के समान हैं, जो सत्ता के रमणीक स्थलों की सैर के विशेषज्ञ हैं। कभी चुनाव हारे तो अकेले बंद कमरे में जनता को असली मुँह से गरियाते हैं और बाहर जन-निर्णय को विनम्रता का मुखौटा लगाए सिर झुकाकर स्वीकार ही नहीं करते, उसकी सेवा करते रहने की कसम भी खाते हैं। श्रोता भयग्रस्त हैं। अब तक की सेवा में उन्होंने डरा-धमकाकर सिर्फ पैसे खाए हैं, अब क्या उनके हाथ-पैर तुड़वाएँगे?

जहाँ तक समाज के सामान्य व्यक्ति का सवाल है, उसे लोकतंत्र में जुबान चलाने की आजादी है। त्रासदी यह है कि कमबख्त जुबान भी भरे पेट ही चलती है। लिहाजा वह भूख-पीडि़त पेट बजाकर नियति को दोष देता है। कुछ हद तक सही भी है। जन्म की दुर्घटना कहीं भी मुमकिन है। अभावग्रस्त निर्धन के घर न होकर यदि उसका जन्म किसी नेता या समृद्ध पूँजीपति के यहाँ होता तो उसकी जुबान भी मौके-बेमौके चलती रहती और पेट बजाने की नौबत भी शायद ही कभी आती!

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

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