झुकाता शीश जिसे संसार

गरमियों के दिन

बीत पाए थे न पल हैरानियों के

आ गए दिन धूप की शैतानियों के,

गरमियों के आगमन का पत्र लेकर

डाकिया फिरता हवा का पूछता घर,

महल हैं किस ओर राजा-रानियों के

अनमने हैं तरु लताएँ फूल पत्ते,

हो गए रीते शहर के शुष्क छत्ते

कोष खाली हो गए रसदानियों के,

फिर हरे होंगे हृदय विश्वास है ये

रोज दुहराए समय इतिहास है ये,

जागते हैं भाग्य छप्पर छानियों के

आ गए दिन धूप की शैतानियों के।

 

मेरा देश

प्राण से प्यारा मेरा देश

नयन का तारा मेरा देश,

उठो, इसकी रक्षा में आज

लगा दें अपना जीवन प्राण,

देश पर हो जाएँ बलिदान!

यही सुख-संपत्ति का आगार

यही धन-रत्नों का भंडार,

विश्व में ऊँचा जिसका भाल

झुकाता शीश जिसे संसार।

जगत् से न्यारा मेरा देश

नयन का तारा मेरा देश,

चलो इसकी सीमा पर आज

शत्रु का चूर करें अभिमान,

देश पर हो जाएँ बलिदान!

निर्झरों-नदियों के उद्गार

गा रहे इसकी जय-जयकार,

मूक हैं पर्वत औ’ पाषाण

छिपाए संस्कृति का विस्तार।

दूर तक सारा मेरा देश

नयन का तारा मेरा देश,

बढ़ो इसके पौरुष का आज

तान हिमगिरि पर नया वितान,

कोटि जन हो जाएँ बलिदान।

 

दिन बसंत के

उजले-पीले दिन बसंत के

रंग-रँगीले दिन बसंत के,

छलके घट ज्यों सौरभ रस के

गीले-गीले दिन बसंत के।

चंपा महके साँस-साँस में

बेला लहके आस-पास में,

चंदन वन के पथ में खोए

चरण चिह्न ज्यों किसी संत के,

पीले-पीले दिन बसंत के।

दबे पाँव आए अपनों से

बचपन के भूले सपनों से,

फूलों भरी घाटियाँ लगतीं

बिखरे ज्यों मोती अनंत के।

घाट-घाट फहरे आँचल से

साँसों बसी प्रीति के पल से,

नेह निमंत्रण देने आए

फिर हरकारे दिन-दिगंत के।

 

उजले-पीले दिन बसंत के,

रंग-रँगीले दिन बसंत के।

उजले-पीले दिन बसंत के,

रंग-रँगीले दिन बसंत के।

इंद्रपुरी, पोस्ट मानस नगर

लखनऊ-२३ (उ.प्र.)

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