छोटू

छोटू

छोटू, आज फिर उनतीस तारीख है। शाम के पाँच बजने जा रहे हैं। पिछली उनतीस तारीख को अक्षय नवमी थी। अक्तूबर का अंत। हवा में हल्की ठंड। आज ही की तरह सूरज उस दिन भी अपनी लाल किरणें समेटकर रात के आँचल में छिपने की तैयारी कर रहा था। तुम उस समय अस्पताल में मरीजों की सेवा में जुटे थे। तुम्हारा जीवन भी कुछ घंटों में सिमट चुका था उस दिन। पर तुम्हें कहाँ खबर थी? हम सब भी तो हमेशा की तरह निश्चिंत थे। तुम एक-एक मिनट खिसककर मृत्यु की ओर जा रहे थे और त्योहार के हँसी-ठहाकों के बीच तुम्हारी ओर महाकाल के बढ़ते कदमों की आहट कोई नहीं सुन पा रहा था। सुन भी नहीं सकता। मनुष्य कितना भी अहंकार पाल ले अपने विकास का, पर है कितना बौना प्राणी। एक बुलबुले के समान। कब पैदा हुआ, कब फूट गया, पता  ही नहीं।

पर तुम्हें बुद्बुद-सा नश्वर मान लेने को मन तैयार नहीं होता, छोटू। क्यों लगता है कि तुम्हारे आधे-अधूरे जीवन की कहानी लिखे बिना मेरी लेखनी बेचैन रहेगी? नहीं जानती कि मेरी तर्जनी और अँगूठे के बीच पितृतीर्थ से झरते हुए ये अधोमुखी मुट्ठी भर शब्द तुम्हारी स्मृति को सहला भी पाएँगे या नहीं? तुम्हारे सूक्ष्म अस्तित्व को धीरे से छूकर तुम्हें चौंका भी पाएँगे या नहीं? पंचमहाभूतों में विलीन हुए तुमको हवा, जल, अग्नि, पृथ्वी या आकाश से क्षण भर के लिए ही सही, खींचकर तुम्हारी छोड़ी हुई यह दुनिया तुम्हें दिखा पाएँगे भी या नहीं?

जहाँ आज भी सूनी-सूनी आँखों से तुम्हारी माँ देखती है तुम्हारा रास्ता। गली के उस मोड़ तक, जिधर से आते थे तुम अपनी मोटर साइकिल पर अपने पापा को बैठाए। आज भी देती है वह सूर्य को अर्घ्य उसी तरह, पर ओठों की बुद्बुदाहट में तुम्हारी कुशलता की कामना नहीं होती। होती है एक प्रश्नाकुलता, ‘आखिर क्या गुनाह था मेरा या मेरे बच्चे का?’

हर दिन तुम्हारी माँ के इस निर्दोष प्रश्न से घायल होता है सूरज और उसकी पीड़ा की लाली कुछ और गहराकर पूरी पृथ्वी पर छितर जाती है। छोटू, हम जिसे कहते हैं सूर्योदय, दरअसल वह धरती की अनगिनत माँओं के सम्मिलित उच्छ्वासों की दाहकता से पैदा हुआ रक्तवर्णी वृत्त है। माँएँ, जो किसी भी माँ की पीड़ा और प्रेम, दोनों को बखूबी महसूस कर सकती हैं। मैं भी तुम्हारी माँ की उस पीड़ा को महसूस कर पा रही हूँ। अकथनीय है, शब्दों में कहाँ बाँध पाऊँगी! बिखर जाते हैं शब्द भी आकार लेते-लेते। तुम्हारी माँ और पापा की दुर्दांत पीड़ा, जिनके लिए शुक्ल पक्ष की नवमी की वह रात बन गई थी काली अमावस। तुम्हारे लिए छाती पीटती तुम्हारी माँ के चेहरे पर फैली थी वही स्याही, अमावस से भी काली, जंगल से भी भयावह, हिमालय के आकाश की ओर उड़ जाने से भी अविश्वसनीय, सागर के कुएँ में सिमट जाने से भी अकल्पनीय।

हम सब एक भयानक समय में खड़े थे। शब्द साथ छोड़ चुके थे। सांत्वना के बोल गूँगे हो उठे थे। सबकी आँखों से झरते आँसू ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े कर रहे थे। ऐसा क्रूर मजाक? क्या सचमुच यह मजाक ही था या कुछ और, छोटू? अब जबकि तुम उस ईश्वर के अधिक निकट हो, जहाँ से सबकुछ देखा जा सकता है, तुम्हें तो सब पता होगा? तुम देख सकते होगे अपने मम्मी-पापा की निरंतर बरसती आँखें, स्वजनों का करुण क्रंदन और अपनी होनेवाली जीवनसंगिनी के चकनाचूर हुए सतरंगी सपने। क्या काँच की तरह झनझनाकर टूटे उसके सपनों की किरचें तुम्हें भी चुभी थीं, जब तुम हमेशा के लिए इस धरा को छोड़कर जा रहे थे? उसी के घर के पास तो तुम ट्रक से टकराकर धराशायी हुए थे, छोटू। उसी घर के पास, जहाँ ठीक चालीस दिन बाद तुम बारात लेकर जानेवाले थे। वह तुम्हारा प्यार थी। बड़ी मुश्किल से पापा-मम्मी को तुम इस रिश्ते के लिए मना पाए थे। विवाह में पहननेवाले तुम्हारे सूट का ट्रायल दिलाकर ही तो लौटी थी वह उस रात। तुम उसे उसके घर तक छोड़ने गए था। तुम्हें दरवाजे से विदा करने के बाद वह कुछ देर तुम्हें पीछे से देखती रही थी। उसकी आँखों के झिलमिल सपनों ने अँगड़ाई ली थी। उसे नहीं पता था कि सपनों की विदाई की वेला आ गई थी। उसके स्वप्न आकाश की ओर उड़ चले थे। पीछे से तुम्हारे प्राण भी।

तुम आवाज देकर रोक लेना चाहते थे उसके आकाश छूते सपनों को, पर तुम्हारी आवाज उन सपनों तक नहीं पहुँच पा रही थी। सपनों को आकाश में ही उड़ने के लिए छोड़ तुम घबड़ाकर समय की गति से भी तेज चलकर आए थे उसके पास। वह मुसकरा रही थी आईने के सामने अपने नए-नए सिलकर आए लहँगे को सीने से सटा। तुम्हारी पसंद का चटख नारंगी सुनहरे कामवाला झिलमिलाता लहँगा। तुमने उसे झकझोरकर बताया था, पर वह सुन नहीं रही थी। बस उसके खुले बाल हवा के झोंकों के साथ उसके चेहरे पर आ गए थे। लहँगा सरसराकर हाथों से छूट गया था। उसने झट झुककर उसे उठाया था और शीशे के सामने से हट गई। बिस्तर पर फैलाकर वह अपना लहँगा तहाने लगी थी। उसके ओठों पर संयोग के गीत फूट रहे थे। उसने सिरहाने रखे मोबाइल की ओर देखा था। मुसकराकर बुदबुदाई थी—सोते समय रात में बात करूँगी।

तुम हैरान थे। बिजली की गति से अपने मोबाइल के पास पहुँचे थे, जो छिटककर तुम्हारे शरीर से बहुत दूर सड़क के किनारे झाड़ी में जाकर गिरा था। पुलिसवालों की नजर तक नहीं पड़ी थी। तुमने देखा था अपने मोबाइल की ओर। घंटी बज रही थी।

‘आंटी।’ निःसंदेह तुम बोलना चाह रहे होंगे, पर बोल नहीं पाए थे। काल रिसीव भी नहीं कर पाए होगे।

हाँ छोटू, यह मैं ही थी जो घबड़ाहट में तुम्हें फोन कर रही थी अपने घर से। संभवतः तुम्हारे मोबाइल पर यह अंतिम ही कॉल रही हो। थानाध्यक्ष ने तुम्हारी मोटर साइकिल के कागजात से तुम्हारे घर का पता ढूँढ़ा था और तुम्हारे अंकल से परिचित होने के नाते उनसे जानकारी ली थी, ‘क्या आपकी कॉलोनी में कोई वैभव नाम का डॉक्टर रहता है?’

‘हाँ, क्यों?’ उन्होंने पूछा था।

‘उसका एक्सीडेंट हो गया है। चेहरा पहचान में नहीं आ रहा है। किसी को अपनी मोटर साइकिल तो नहीं दिया रहा होगा न?’ थानाध्यक्ष ने एक उम्मीद की रेखा छोड़ दी थी। सुनकर मैं परेशान हो उठी थी। मेरे बेटे ने सांत्वना दी थी, ‘हो सकता है, खबर झूठी हो?’ पर भय और अनहोनी की आशंका से उसके भी ओठ काँप रहे थे।

‘भगवान् करे बेटा, ऐसा ही हो। एक महीने बाद ही तो उसकी तिलक और शादी है। ऐसा करो, छोटू को फोन मिलाओ। अगर उठा लेगा तो बताना मत कि इतनी रात में हम लोग उसे किस बात के लिए फोन मिला रहे हैं? बस रिसीव कर ले तो पता चल जाएगा कि वह ठीक-ठाक है।’

फोन मिलाया था तुम्हें, छोटू। तुम्हारी घंटी पूरी बजकर खत्म हो गई थी, पर काल रिसीव नहीं हुई थी। मन आशंका से धड़क उठा था। तुम्हारे मम्मी-पापा को यह सूचना कैसे दी जाए? कहीं सदमे में उनके भी जीवन ने साथ छोड़ दिया तो? डर के मारे मेरे पेट में एक तेज मरोड़ सी उठी थी। मैं बदहवास सी बाथरूम की ओर जाने लगी थी। बिल्कुल बगल में तो घर है तुम्हारा। इस तरह की कोई नकारात्मक घटना सुनकर मैं ऐसे ही बदहवास सी हो उठती हूँ। एक बार तुम्हीं ने तो कहा था, ‘आंटी, आप अपने को मजबूत करिए। यह नर्वस डायरिया है।’ तुम और याद आए थे छोटू उस समय।

तुम्हारे उसी मोबाइल फोन में तुम्हारी मम्मी का भी मिस कॉल पड़ा रहा होगा। वे भी तो तुम्हें शाम से कई बार मिला चुकी थीं। चाहती थीं कि तुम जल्दी घर आ जाओ। तुमने नहीं उठाया था उनका फोन। शायद मरीजों को देखने में व्यस्त रहे होगे। हो सकता है, कहीं और का कार्यक्रम बना चुके थे, इसलिए मिस कॉल पर पलटकर बात नहीं की। यह तो तुम्हारे स्वभाव के विपरीत था, छोटू। तुम्हारी मम्मी यही कहकर दहाड़ें मारकर रो रही थीं। फोन उठा लिए होते तो शायद यह मनहूस घड़ी टल गई होती। माँ की इच्छा पर जल्दी घर आ गए होते। अक्षय नवमी का पर्व मनाया जा रहा था। फलों से लदे आँवले के वृक्ष के नीचे सुलगा अहरा। अहरे के ऊपर मिट्टी की बड़ी सी हँडि़या में चुरती दाल और बुझते अंगारों के बीच सेंकी जाती बाटी का सोंधापन। अपने-अपने पुण्य को अक्षय कर लेने की हड़बड़ी में लोग। ब्राह्मण को आँवले के नीचे भोजन कराते, दान देते लोग। अभी-अभी बीती दीपावली, अन्नकूट, गोपाष्टमी जैसे त्योहारों की थकन उतारते, घर से बाहर आँवले के नीचे हँसी-ठहाकों के बीच रिश्तों को सहेजते लोग। तुम्हारे भी तो सभी रिश्तेदार आँवले के नीचे जुटे थे।

खाना शुरू करने से पहले तुम्हारी मम्मी ने एक बार फिर तुम्हें फोन मिलाया था। तुमने फिर नहीं उठाया था। बेमन से उन्होंने खाना खाया था और तुम्हारे लिए टिफिन में भरकर घर ले आई थी। अकसर तुम रात को देर से ही लौटते थे। खाना खाने के बाद रात में अपने लॉन में टहलते हुए हम सब तुम्हारी मोटर साइकिल की आवाज से पहचान लेते थे, क्योंकि गली में मुड़ते ही तुम उसकी स्पीड बिल्कुल धीमी कर लेते थे। कारण, मैंने एक बार तुम्हें डाँटते हुए समझाया था कि तेज न चला करो। दो बार पहले भी तुम अपना पैर एक्सीडेंट में तोड़ चुके थे। पता नहीं यह मेरे मना करने का असर था या तुम छोटू से एक गंभीर डॉक्टर वैभव में परिवर्तित हो चुके थे, उसका परिणाम था, पर मोटर साइकिल तुम धीमे चलाने लगे थे। तुम पर कुछ अधिक ही मैं अपना अधिकार मानती थी। क्योंकि डॉक्टर वैभव आज तक मेरे लिए छोटू ही रहा। तुम्हें छोटे से बड़ा होते देखा मैंने। मेरे आहाते में मेरे बेटे के साथ क्रिकेट खेलते तुम, मेरी गायों की नाँद पर बैठ घंटों अपने दोस्त से बतियाते तुम, अमरूद के पेड़ से कच्चे-पक्के अमरूद तोड़कर बिना धोए ही खाने पर मेरी डाँट सुनते तुम, होली-दीवाली पर पैर छूकर आशीर्वाद लेते तुम, सब पल में कैसे खत्म हो गया, छोटू? हर दिन बाहर निकलने से पहले अपनी मम्मी और पापा के पैर छूकर आशीर्वाद लिये बिना तो तुम नहीं जाते थे। क्या वे आशीर्वाद भी उस रात कवच नहीं बन सके थे, छोटू? उन नन्ही-नन्ही चीटियों ने भी तो ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ का आशीर्वाद मन-ही-मन दिया होगा, जब-जब उन्हें आटे का चारा तुम्हारी मम्मी ने दिया था।

घर के भीतर संपन्नता थी या विपन्नता, यह बाहर के लोग कब जान सके थे? तुम उस परिवार के वैभव थे। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करके आए थे तुम तो पापा-मम्मी की आँखों में वैभव छलक रहा था। रोम-रोम से वैभव प्रकट हो रहा था। छोटी सी क्लीनिक में वैभव, लेटर पैड पर वैभव, घर के बाहर-भीतर वैभव। दुःख भरे वे दिन बीत चुके थे, जब तुम्हारे पापा ने बैंक से कर्ज लेकर तुम्हें मेडिकल की पढ़ाई करवाई। शर्ट के नीचे बनियान थोड़ी फटी भी चल जाती थी। जैकेट के नीचे सिकुड़कर छोटा हो गया स्वेटर भी काम देने लगा था। तुमने उसे महसूस भी किया था।

पापा-मम्मी के सुख के लिए तुम्हारी आँखों में कई स्वप्न पल रहे था। उन्हें तीर्थ कराना, चार पहिया गाड़ी खरीदकर देना, ब्रांडेड कपडे़ और जूते खरीदना जैसी तमाम अपनी इच्छाएँ तुम धीरे-धीरे पूरी कर रहे थे। अपनी होनेवाली पत्नी से तुम अपने मम्मी-पापा के संघर्षों के बारे में बताकर उनकी खूब सेवा करने का वादा भी ले चुके थे, पर नियति का चक्र कितना गंदा और विद्रूप हो चुका था! जिस घर में उसे दुलहन बनकर एक महीने के बाद आना था, उसी घर में वह बदहवास सी उसी रात भागी आई थी और पापा-मम्मी से लिपटकर बिलख पड़ी थी। पत्थर का भी कलेजा विदीर्ण हुआ जा रहा था। जिसे अपने घर में प्यार से लाने के लिए तुमने फूलों से सजी डोली तय की थी, वह नंगे पाँव गली के पत्थरों पर ठोकरें खाते हुए तुम्हारे घर की ड्योढ़ी पर पहुँची थी। प्रतिदिन तुम्हारे निमित्त गरुड़ पुराण सुनते हुए और अंत में आरती करते हुए उसे देखकर सभी की आँखें भीग जातीं। सभी ईश्वर को कोसते, पर ईश्वर तब भी तसवीरों में मुसकराता रहता, जैसे तुम अपनी तसवीर में मुसकरा रहे होते। मुसकराहटें कागज की निर्जीव तसवीरों में सिमट गई थीं और जीते-जागते चेहरों से मुसकराहटें गायब हो गई थीं।

जानते हो छोटू, तुम्हारे पापा के कंधे झुक गए हैं। उनपर कितना भारी बोझ तुमने रख दिया। दुनिया का सबसे भारी बोझ...किसी बाप के कंधे पर बेटे की अरथी। कंधों को तो झुकना ही था। अपनी कोई जिद मनवाने के लिए जब तुम उनके कंधों पर झूल जाया करते थे तो उनका दिल फूल की तरह हल्का महसूस करता था, परंतु उनके कंधों पर इस तरह लदकर जाने की क्या जरूरत थी, पगले, कि हमेशा के लिए उनके कंधे बोझ से झुक जाएँ, जिन कंधों पर चढ़कर बचपन में तुमने किलकारी भरी, उन्हीं कंधों को इस तरह चरमराकर रख दिया कि वे कभी अब तनकर ऊँचे ही न हो सकेंगे। तुम्हारी मोटर साइकिल पर पीछे बैठ जिस तसल्ली और विश्वास से वे तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर जाते थे, उसे ही अपने कंधों पर लादकर जब वे हरिश्चंद्र घाट की ओर बढ़े थे तो उनकी आत्मा फट गई थी और उसमें बैठा ईश्वर एकाएक मर गया था। गीता के वचन झूठे लगने लगे थे कि आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता। वह तो चीथडे़-चीथडे़ हो गया था।

तुम पापा के कंधे पर अपनी देह के पास बैठे सब देख रहे थे—उनकी आत्मा का चीथडे़-चीथडे़ होना, ईश्वर की मौत, स्वजनों का विलाप। तुम्हें अपने ऊपर भी क्षोभ हो रहा होगा। क्यों नहीं ट्रक आते देख बाइक एक ओर खड़ी कर रुक गए थे? ट्रक ड्राइवर नशे में था। पुलिसवालों की वसूली के डर से भागकर उस सँकरी सड़क पर तेज गति से जा रहा था। बस सबकुछ समाप्त। अब तो क्षोभ या सोचने का विषय। ईश्वर के एक क्रूर मजाक को घटित होते देखना। ऐसे न जाने कितने मजाक हर दिन ईश्वर करता रहता है। आत्माएँ मरती हैं, उसमें बसा ईश्वर भी मर जाता है। फिर भी संसार चलता रहता है। नहीं मरती है तो भूख और प्यास। आदमी की भूख नहीं मरती, प्यास भी नहीं मरती। अब यदि भूख-प्यास जिंदा है तो संसार के सारे कार्य भी फिर से शुरू हो जाते हैं। सृष्टि का चक्र घूमता ही रहता है—अनवरत।

तुम्हारे जाने के बाद भी सृष्टि चल रही है, छोटू। मौसम बदल रहा है। ठंड कुछ अधिक हो चली है। इसके बाद वसंत और ग्रीष्म आ ही जाएँगे। बरसात भी होगी। तुम्हारे जाने के दो-तीन दिन बाद ही सामनेवाले घर में संगीत की कक्षाएँ चलने लगी थीं—कौन गली गए श्यामऽऽऽ। पिछवाडे़ वाले घर में किसी का विवाह भी हुआ। डी.जे. पर बजता गाना चुभ रहा था, पर किसी के जाने से दुनिया थम तो नहीं जाती, छोटू! दूल्हा-दुलहन की आँखों में स्वप्नों का झिलमिलाना तो नहीं रुकेगा।

तुम्हारे घर संवेदना प्रकट करने आए रिश्तेदार धीरे-धीरे विदा होने लगे थे। तुम्हारे तिलक में खाना बनाने के लिए तुमने जिस हलवाई को तय किया था, उसी ने सिसकते हुए तुम्हारे निमित्त अंतिम भोजन पकाया था। यह सब हृदय-विदारक था। पर समय के पास कहाँ समय है कि वह ठिठककर इस दारुण समय को देखे? वह तो गांधारी बना चलता चला जाता है। संसार अपनी गति से चल रहा है, छोटू। तुम्हारे पापा रोते हुए मुश्किल से कुछ खाते हैं। किसी मोटर साइकिल की आवाज सुनकर उन्हें आभास होता है, जैसे तुम लौट आए हो। उनकी हताश निगाहें गली के उस मोड़ तक बरबस घूम आती हैं, जिधर से तुम आते थे। मम्मी की अनवरत बरसती आँखें अब भी सूर्य को अर्घ्य देती हैं, पर ओठों की बुदबुदाहट में पहले जैसी तुम्हारी कुशलता की कामना नहीं रहती, बल्कि होती है एक अव्यक्त शिकायत भगवान् से, जो पूछती है बार-बार—‘क्या गुनाह था मेरा? कौन सी कमी थी मेरी पूजा में?’

साँझ ढल रही है। सूरज अपनी किरणें समेट रहा है। समय-चक्र चल रहा है। हो सकता है, कुछ दिनों बाद तुम्हारी भी स्मृति धुँधली पड़ जाए। संसार का यही नियम है, छोटू। तुम्हारे घर पर लगा यह मयूरपंखी पेंट, जिसे तुमने अपने विवाह की तैयारी में अपनी पसंद से लगवाया था, हो सकता है, दो-चार साल में बूढ़ा हो जाए और अपनी चमक खो बैठे। तुम्हारे कमरे के सामने बालकनी को हिल-हिलकर छूती नीम के पेड़ की हरी डालियाँ छिनगा दी जाएँ, तुम्हारे कमरे में पड़ा स्टेथस्कोप किसी की धड़कन न सुन सके, वह मोटर साइकिल औने-पौने दामों में बिक जाए, जिस पर तुम अंतिम बार बैठे थे, तुम्हारे कपडे़ भिखारियों में बाँट दिए जाएँ, पर तुम्हारी धड़कनों का स्वर हवाओं में घुला-मिला अब भी यहाँ-वहाँ डोल रहा है। तुम्हारी आवाज के स्पंदन का हस्तक्षेप वातावरण के कोलाहल में हमेशा रहेगा। तुम्हारी छत की मुँड़ेर पर बैठी चिडि़या कई बार मन में एक विश्वास सा दिला जाती है कि तुम देह बदलकर अपने घर आए हो। विश्राम कर रहे हो। मम्मी को देख रहे हो, पापा को आँख भर निहार रहे हो, कमरे में बिखरे अपने सामानों को देख रहे हो, जिसे ठीक करने की हिम्मत तुम्हारी मम्मी में आज तक नहीं आ पाई है। लोग कहते हैं कि किसी-न-किसी रूप में आत्मा अपने स्वजनों को आकर देखती है। पता नहीं कितना सच है, कितनी कल्पना!

तुम्हारे द्वादशाह वाले दिन अकाल मृत्यु के कारण मिली प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने और ईश्वर के चरणों तक पहुँचा देने के लिए नारायण-बलि दी गई थी, छोटू। जल से भरे नारियल के गोले को जीवात्मा का प्रतीक मान तुम्हारे पापा के हाथों में पकड़ाया गया था। उस नारियल के गोले को उन्होंने उसी तरह सँभालकर पकड़ा था, जैसे तुम्हारे जन्म लेने पर उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच तुम्हें पहली बार सँभालकर उठाया था। नारियल के गोले को हृदय से सटा वे बिलख पडे़ थे। यह अत्यंत आश्चर्यजनक ही तो था छोटू कि भगवान् की मूर्ति के पास उस नारियल को रखते ही वह अपने आप चटक गया था। पंडितजी मंत्रोच्चार कर रहे थे। मंत्र समाप्त कर बोल बडे़, ‘पूजा सफल हुई। जीवात्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर ईश्वर के चरणों में पहुँच गई।’

यह मंत्रों की शक्ति थी या कोई चमत्कार, कोई नहीं समझ सका था। उस कठोर नारियल का अपने आप चटक जाना सभी को हतप्रभ कर गया था। तसल्ली भी हुई—चलो, छोटू अब ईश्वर के सान्निध्य में है। सनातन धर्म के मंत्रों में आस्था और गहरा उठी थी।

संसार की इन सब आस्थाओं-अनास्थाओं के बीच तुम्हारी यह आधी-अधूरी कहानी लिखते हुए, तुम्हारे लघु जीवन को विराट् शब्द ब्रह्म में समाहित करते हुए कुछ अक्षर उछालती हूँ आकाश की ओर। अब जबकि धरती पर सब यह मानते हैं कि तुम ईश्वर के पास हो, संभव हो तो इन अक्षरों को अपनी दिव्य हथेली में चुनकर तुम ईश्वर के सामने फूल की तरह बिखरा देना और बता देना कि जब-जब वह धरती पर इस तरह का क्रूर मजाक किसी के साथ करता है तो आत्मा विदीर्ण होती है और आत्मा में बसा वह ईश्वर भी मर जाता है। ईश्वर से कहना कि वह मनुष्य का सृजन करता है और मनुष्य अपनी आत्मा में ईश्वर का सृजन करता है। दोनों एक-दूसरे को अपनी कल्पना के अनुसार गढ़ते हैं, पर जब-जब मनुष्य के भीतर ईश्वर मरता है, कुछ दिनों बाद वह उसे अपनी आस्था से पुनः उसी रूप में जीवित कर लेता है। इतना उदार है मनुष्य कि फिर से ईश्वर को मन के सिंहासन पर बैठा पूजने लगता है। पर बोलो ईश्वर, तुम्हारे पास भी वह क्षमता है क्या कि किसी को पुनः उसी रूप में जीवित कर सको? छोटू, पूछना जरूर! यह आस्था का प्रश्न है।

मधुवन

सा. १४/५९८, सारंगनाथ कॉलोनी,

सारनाथ, वाराणसी-२२१००७

दूरभाष : ०९७९२४११४५१

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