हिंदी पत्रकारिता के मूल्यों के प्रतिमान गणेशशंकर विद्यार्थी

हिंदी पत्रकारिता के मूल्यों के प्रतिमान गणेशशंकर विद्यार्थी

साहित्य अकादेमी से प्रकाशित पुस्तक ‘गणेशशंकर विद्यार्थी’ कई कारणों से हमारा ध्यान खींचती है। इसके लेखक हैं कृष्णबिहारी मिश्र। वे हिंदी के ऐसे ललित निबंधकार-जीवनीकार-समीक्षक हैं, जिनकी ख्याति पत्रकारिता के इतिहास के विशेषज्ञ के रूप में भी है। ‘गणेशशंकर विद्यार्थी’ मिश्रजी की पत्रकारिता विषयक पाँचवीं किताब है। ११२ पृष्ठों के इस मोनोग्राफ में मिश्रजी ने गणेशशंकर विद्यार्थी के व्यक्तित्व और कृतित्व को विलक्षण ढंग से समेटा है। विद्यार्थीजी के व्यक्तित्व व कृतित्व का कोई भी महत्त्वपूर्ण प्रसंग मिश्रजी से छूटा नहीं है। पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है। ‘जीवन प्रसंग और व्यक्तित्व’ शीर्षक से पहले अध्याय के आरंभ में ही कृष्णबिहारी मिश्र जानकारी देते हैं कि गणेशशंकर विद्यार्थी का नामकरण उनकी मातामही गंगादेवी के सपने के आधार पर हुआ था। स्वप्न में गंगादेवी ने अपनी गर्भवती कन्या गोमती देवी को गणेश की मूर्ति भेंट की थी और जागने पर बड़े हुलास के साथ व्रत लिया कि दौहित्र का जन्म होने पर उसका नाम गणेश रखेंगी। गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म २६ अक्तूबर, १८९० को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। पिता जयनारायण हथगाँव, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश के निवासी थे और ग्वालियर रियासत में मुँगावली के एक स्कूल में हेडमास्टर थे। गणेश का बाल्यकाल वहीं बीता तथा प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। उनकी पढ़ाई की शुरुआत उर्दू से हुई और बाद में उन्होंने अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। सन् १९०७ में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में एंट्रेंस परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण लगभग एक वर्ष तक अध्ययन के बाद सन् १९०८ में उन्होंने कानपुर के करेंसी ऑफिस में ३० रुपए मासिक की नौकरी की, पर एक अंग्रेज अधिकारी से कहासुनी हो जाने के कारण नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कानपुर के पृथ्वीनाथ हाईस्कूल में अध्यापन का कार्य भी किया। उसी दौरान उन्होंने कई समाचार-पत्रों में लेख लिखे तथा ‘सरस्वती’ और ‘अभ्युदय’ में संपादकीय सहयोगी के रूप में काम किया। गणेशशंकर विद्यार्थी ने २ नवंबर १९११ को ‘सरस्वती’ में सहकारी संपादक के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की थी। १३ महीने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहयोगी के रूप में काम करने के बाद दिसंबर १९१२ में वे मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ में चले गए, जहाँ २३ सितंबर, १९१३ तक कार्यरत रहे। यहीं उनकी वैचारिक परवरिश हुई। सामाजिक-राजनैतिक जीवनचर्या के कारण विद्यार्थीजी अपनी गृहस्थी के प्रति उचित दायित्व नहीं निभा पा रहे थे और इसका उन्हें कितना मलाल था, इसे बताने के लिए कृष्ण बिहारी मिश्र ने विद्यार्थीजी द्वारा पत्नी व माँ को लिखे गए मार्मिक पत्रों को उद्धृत करते हुए ठीक ही कहा है, देश सेवा का व्रत इतना कठोर था कि परिवार की अपेक्षित सेवा न कर पाने को वे निरुपाय थे। विद्यार्थीजी ने ९ नवंबर, १९१३ को कानपुर से साप्ताहिक ‘प्रताप’ निकाला। उनकी आदर्श निष्ठा और अर्थ शुचिता का आग्रह इतना पुष्ट था कि अथक परिश्रम से ‘प्रताप’ का जो कोष तैयार किया, उसे निजी उपयोग के लिए स्पर्श करना उन्हें अपराध लगा। लोकनायक की भूमिका में सक्रिय विद्यार्थीजी के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके अवदान पर कृष्णबिहारी मिश्र ने पहले ही अध्याय में प्रकाश डाला है।

‘समय संवेदना’ शीर्षक से दूसरे अध्याय में विद्यार्थीजी के सत्य के प्रति आग्रह का विवेचन किया गया है। विद्यार्थीजी ने ‘प्रताप’ के पहले संपादकीय में अपने मंतव्य तथा नीति का ऐलान इस प्रकार किया था, ‘‘आज अपने हृदय में नई-नई आशाओं को धारण करके और अपने उद्देश्यों पर पूर्ण विश्वास रखकर प्रताप कर्म क्षेत्र में आता है। समस्त मानवजाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति को समझते हैं। उन्नति से हमारा अभिप्राय देश की कृषि, व्यापार, विद्या, कला, वैभव, मान, बल, सदाचार और सच्चरित्रता की वृद्धि से है। भारत को इस उन्नतावस्था तक पहुँचाने के लिए असंख्य उद्योगों, कार्यों और क्रियाओं की आवश्यकता है। इनमें से मुख्यतः राष्ट्रीय एकता, सुव्यवस्थित, सार्वजिनक सर्वांगपूर्ण शिक्षा का प्रचार, प्रजा का हित और भला करनेवाला सुप्रबंध और सुशासन की शुद्ध नीति का राज-कार्यों में प्रयोग, सामाजिक कुरीतियों और अत्याचारों का निवारण तथा आत्मावलंबन और आत्म-शासन में दृढ निष्ठा है। हम इन्हीं सिद्धांतों और साधनों को अपनी लेखनी का लक्ष्य बनावेंगे। हम अपनी प्राचीन सभ्यता और जातीय गौरव की प्रशंसा करने में किसी से पीछे न रहेंगे और अपने पूजनीय पुरुषों के साहित्य, दर्शन, विज्ञान और धर्मभाव का यश सदैव गाएँगे। किंतु अपनी जातीय निर्बलताओं और सामाजिक कुसंस्कारों तथा दोषों को प्रगट करने में हम कभी बनावटी जोश या मसहल-वक्त से काम न लेंगे, क्योंकि हमारा विश्वास है कि मिथ्याभिमान जातियों के सर्वनाश का कारण होता है। किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने सुमार्ग से विचलित न कर सकेगी। सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से ‘प्रताप’ सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन, पोषण, रक्षण या विरोध के लिए नहीं हुआ है, किंतु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा। मनुष्य की उन्नति भी सत्य की जीत के साथ बँधी है, इसलिए सत्य को दबाना हम महापाप समझेंगे और उसके प्रचार और प्रकाश को महापुण्य। हम जानते हैं कि हमें इस काम में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और इसके लिए बड़े भारी साहस और आत्मबल की आवश्यकता है। हमें यह भी अच्छी तरह मालूम है कि हमारा जन्म पराधीनता और अल्पज्ञता के वायुमंडल में हुआ है। तो भी हमारे हृदय में केवल सत्य की सेवा करने के लिए आगे बढ़ने की इच्छा है और हमें अपने उद्देश्य की सच्चाई और अच्छाई पर अटल विश्वास है। इसीलिए हमें इस शुभ और कठिन कार्य में सफलता मिलने की आशा है।’’ उपर्युक्त टिप्पणी के आखिर में बल देकर विद्यार्थीजी सत्य की सेवा का व्रत लेते हैं।

तीसरे अध्याय ‘लोकयात्रा की प्रमुख सरणि ः पत्रकारिता’ और चौथे अध्याय ‘विचार कोण की पहचान’ में कृष्णबिहारी मिश्र विद्यार्थीजी की पत्रकारिता तथा उनके विचारों का सम्यक् विवेचन करते हैं। ‘प्रताप’ के प्रवेशांक के संपादकीय में संपादक ने जो कुछ कहा था, उसका निर्वहन सदा-सर्वदा किया। विद्यार्थीजी आदर्श से कभी च्युत न हुए। उन्होंने लिखा था, ‘‘लेकिन जिस दिन हमारी आत्मा इतनी निर्बल हो जाए कि अपने प्यारे आदर्श में डिग जावें, जानबूझकर असत्य के पक्षपाती बनने की बेशर्मी करें और उदारता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता को छोड़ देने की भीरुता दिखावें, वह दिन हमारे जीवन का सबसे अभागा दिन होगा, और हम चाहते हैं कि हमारी उस नैतिक मृत्यु के साथ ही साथ हमारे जीवन का भी अंत हो जाए।’’ राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर ‘प्रताप’ की नजर थी। २५ जनवरी, १९१४ के ‘प्रताप’ में ‘देश का स्वास्थ्य’ शीर्षक से अग्रलेख इसका ज्वलंत प्रमाण है, ‘बड़ा ही अभागा है वह देश, जिसके युवक और युवतियों के चेहरों पर स्वास्थ्य की आनंददायिनी झलक देखने में न आवे। हृदय के क्लेश का ठिकाना नहीं रहता, जब हम देखते हैं कि ऐसे देशों में हमारा ही देश सबसे आगे बढ़ा हुआ है। देश के युवक और युवतियाँ नाम के युवक और युवतियाँ हैं, उनमें से ९९ फीसदी अपने अमूल्य स्वास्थ्य को खो चुके हैं और इस बात के पूरे व पक्के साक्षी उन्हीं का दबा हुआ हृदय, उन्हीं के बैठे हुए गाल और उन्हीं के चुचके और सूखे हुए शरीर हैं। कमजोर शरीरों से बलवान हृदयों की आशा नहीं की जा सकती, और पीले चेहरोंवाले बलवानों की ठोकरों से अपनी रक्षा नहीं कर सकते। सच है कि जातियों का निवास स्थान नगर ही नहीं होते और अधिकतर नगर निवासी ही प्रकृति के प्रारंभिक और आवश्यक स्वत्वों के शत्रु बन जाया करते हैं। लेकिन हृदय की अशांति और भी बढ़ जाती है, जब हम दूर नजर फेंकते हैं और उन झोंपड़ों को देखते हैं, जिनमें जनता का निवास है। हमारे देश के झोंपड़ों में भी विकसित और हँसमुख चेहरे, हृष्ट-पुष्ट शरीर और स्वस्थ्य मधुर कंठों का अभाव है। एक तरफ मलेरिया, हैजा और प्लेग घात लगाए हुए बैठे हैं, दूसरी ओर अविद्या, अज्ञान, निर्धनता और तरह-तरह के अत्याचार लोगों को अपने कठोर पैरों तले रौंदकर पूर्व-कथित मूर्तियों के शिकार बनाने में सुविधाएँ पैदा करते हैं।’’

‘चलिए गाँवों की तरफ’ अग्रलेख (१९ जनवरी, १९२५) में ‘प्रताप’ ने भावी दिशा-निर्देश दिया, ‘‘जिन्हें काम करना है, वे गाँवों की तरफ मुड़ें, शहरों में काम हो चुका। शहर के लोगों को उतनी तकलीफें भी नहीं, शहरों में देश की सच्ची आबादी रहती भी नहीं। देश भर में फैलते हुए छोटे-छोटे गाँवों के छोटे-छोटे झोंपड़े ही देश की सच्ची संतति के निवास स्थान हैं। उन्हें जगाने का अभी बहुत कम प्रयत्न हुआ है। इस वर्ष जबकि मि.गांधी देश की फूट और आपसी लड़ाई को मिटाने का प्रयत्न करेंगे, स्वराजी लोग कौंसिलों में अपनी युद्ध कला दिखाएँगे, नेता लोग कौंसिल की मेंबरियों और सरकारी नौकरियों और अधिकारों के बँटवारे की चिंता में रत रहेंगे, तेज लोग सरकार से भिड़ने के उपाय को खोजते फिरेंगे, साधारण काम करनेवालों को चाहिए कि इधर-उधर न भटकें, वे देश के गाँवों की छिपी हुई शक्ति का संगठन करें। इस बात की शिकायत है कि बेलगाँव कांग्रेस ने देश के सामने कोई ऐसा राजनैतिक काम नहीं रखा, जिसमें देश की बिखरी हुई ताकतें लग जातीं और जिसके करने से हम राजनैतिक क्षेत्र में आगे बढ़ सकते। निस्संदेह हमारे इस समय के काम में कोई बात ऐसी नहीं है, जिसके आधार पर हम सरकारी सत्ता से भिड़ सकें। परंतु देश का शासन देश के आदमियों के हाथों में न होने के कारण सरकारी सत्ता से हर समय भिड़े रहने की आवश्यकता होने पर भी, ऐसा कर सकना संभव नहीं है। हमारे पिछले तीन वर्ष इस सत्ता से लड़ाई लड़ने में कटे। साधारण दृष्टि से देखनेवाला यह कहेगा कि हमारे हाथों कुछ भी नहीं आया। परंतु बात ऐसी नहीं है। हम अपने क्षेत्र में पहले आज तक बहुत आगे बढ़े हुए हैं, सरकारी सत्ताधारियों को बहुत पीछे हटना पड़ा है। इस समय हमारा और आगे बढ़ सकना इसलिए कठिन ही नहीं, असंभव सा है कि हम आगे बहुत बढ़ आए हैं, हमने अपने पीछे की तैयारी अधूरी छोड़ रखी है। यदि हमारे पीछे पूरी तैयारी हो तो हमें पीछे मुड़ना ही न पड़े।’’ २ मार्च, १९२५ को ‘प्रताप’ में ‘लक्ष्य से दूर’ अग्रलेख में स्वतंत्रता-संग्राम में आई शिथिलता के विरुद्ध आगाह किया गया था, ‘‘हम अपने लक्ष्य से दूर हटते जा रहे हैं। देश की आजादी का सवाल हमारे सामने है। कुछ समय पहले अधिकांश कार्यकर्ताओं को रात-दिन उसी की धुन थी। परंतु इस समय वे शिथिल हैं। शिथिल ही हों, सो नहीं, क्योंकि अधिक परिश्रम के साथ कुछ समय तक काम कर लेने के पश्चात् कुछ शिथिल पड़ जाना स्वाभाविक सा है, किंतु वे भ्रम में भी पड़े हुए हैं, क्योंकि देश की स्वाधीनता के लक्ष्य की ओर उनका ध्यान इस समय उतना नहीं है और उनमें से बहुतों की शक्तियाँ इधर-उधर और किसी-किसी दिशा में तो हानिकारक दिशाओं तक में लग रही हैं। हम सब इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि देश के साधारण आदमी जब तक मिल-जुलकर इस योग्य न बनेंगे कि वे अपने बल को जानने लगें और अत्याचार एवं अन्याय को मिटाने के लिए उस बल का संयत प्रयोग करने लगें, तब तक जिन सत्ताओं ने हमारी बाढ़ रोक रखी है, वे पीछे नहीं हटेंगी और हमारे हाथ-पैर नहीं खुलेंगे। साधारण आदमियों की शक्ति के संगठन की आवश्यकता न केवल इसलिए है कि उसके बल पर हमें देश के वर्तमान हकिमों के हाथ से शक्तियाँ छीननी है, किंतु उसकी आवश्यकता सबसे अधिक इसलिए भी है कि देश में जो स्वराज्य आगे चलकर स्थापित हो, वह सच्चे अर्थ में ‘स्वराज्य’ हो और उससे देश के इने-गिने आदमियों को ही लाभ न हो, देश के साधारण-से-साधारण मनुष्य को विकास का पूरा अवसर मिले। परंतु इस अमोघ शक्ति की उपासना और उसकी प्राप्ति की ओर से इस समय लोगों का ध्यान बे-तरह हटता जाता है। असहयोग की समाप्ति हो चुकी है। जो लोग अपने को अपरिवर्तनवादी दल का कहते हैं, वे भी बदल चुके। कम-से-कम उन्होंने असहयोग तो छोड़ ही दिया। इस समय वे चरखा और खद्दर पर ही बहुत जोर देते हैं। काम दोनों बहुत अच्छे हैं। परंतु वे ही सबकुछ नहीं हैं। उनका महान् क्षेत्र देहातों में कहा जाता है। उन्हें देहात के आदमियों का त्राता कहा जाता है। यह बात ठीक है, परंतु देश के अधिकांश गाँव अभी तक अछूते पड़े हुए हैं। उनमें न उन्हें सबल बनानेवाला कोई काम है और न इस प्रकार का कोई काम करनेवाला ही। इस प्रकार देश के इस सिरे से लेकर उस सिरे तक करोड़ों व्यक्ति गाँवों में ऐसे पड़े हुए हैं, जो समेटे और समझाए जाएँ तो देश की बड़ी भारी पूँजी और शक्ति बन जाएँ।’’

गणेशशंकर विद्यार्थी की टिप्पणियों से उस पूरे युग की पीड़ा का पता चलता है। २० अप्रैल, १९२५ को ‘हिंदुओं की कूप-मंडूकता’ अग्रलेख में उन्होंने लिखा था, ‘‘हिंदुओं की शिथिलता देखकर हृदय में व्यथा होती है। कितना बड़ा समुदाय है। कितनी शक्तियाँ उसमें निहित हैं। कितनी बड़ी पूँजी उसके पास है। परंतु सब बेकार। उनकी यह दुरर्दशा है, जो न देखी और न सुनी हो। दिल-दिमाग पर निर्जीवता का राज्य है। अंग-प्रत्यंग टूक-टूक होते जाते हैं। पहाड़ की सी विपत्तियाँ सिर मँडराती हैं, परंतु उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता। घटनाएँ भयंकर रूप धारण करके खोपड़ी को चकनाचूर करने के लिए आगे बढ़ती आती हैं, परंतु हमारे बुद्धि-विशारदों की समझ में कुछ आती ही नहीं। यही समझे बैठे हैं कि कहीं कुछ भी नहीं होता। और यदि कुछ हो भी रहा है, तो वह सब अनुकूल ही हो रहा है और आगे भी जो कुछ होगा, वह भी क्या मजाल कि हमारे प्रतिकूल हो जाए। मूर्खों का स्वर्ग है, जिसमें ये बुद्धि-निधान विचरण करते हैं। उनकी दशा को देखकर यदि कोई यह कहे कि इन्हें पक्षाघात हो गया है, तो बेजा न होगा।’’ १९२६ में थानेदार शिवदयाल सिंह के खिलाफ एक विस्तृत रिपोर्ट ‘प्रताप’ में छपी तो उसने मुद्रक-प्रकाशक सुरेंद्र शर्मा तथा संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। १७ नवंबर, १९२६ को दोनों को चार सौ रुपया जुर्माना या छह-छह महीने की कैद की सजा सुनाई गई। विद्यार्थीजी ने कहा, ‘‘हमारे साथ घोर अन्याय हुआ है। इस मामले में हम जुर्माना न देकर जेल जाने को तैयार बैठे हैं, इसलिए कि दुनिया आपके इनसाफ का नमूना देख ले।’’ ३० मार्च को प्रयाग उच्च न्यायालय के जस्टिस वाल्श और जस्टिस बनर्जी की अदालत में अपील की गई। इस अदालत ने निचली अदालतों को आड़े हाथों लेते हुए थानेदार पर अभियोग चलाने की आज्ञा दी तथा जुर्माने की रकम वापस करने का आदेश दिया। १९३० के प्रेस ऑर्डिनेंस का पूरे देश ने विरोध किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह अपील की कि प्रेसवालों को इस ऑर्डिनेंस के तहत माँगी गई जमानत जमा नहीं करनी चाहिए, चाहे प्रेस ही बंद क्यों न करना पड़े। ‘प्रताप’ ने प्रेस बंद करना ही उचित समझा। विद्यार्थी जी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, युगलकिशोर सिंह और देवव्रत शास्त्री को सजा हो गई। छह माह बाद ऑर्डिनेंस खत्म हुआ, परंतु इतने दिनों तक प्रेस बंद रहने के कारण ‘प्रताप’ की आर्थिक स्थिति बहुत विपन्न हो गई थी। फिर भी श्री प्रकाश नारायण शिरोमणि के संपादन तथा श्री हरिशंकर विद्यार्थी के प्रबंधन में ‘प्रताप’ पुनः अवतरित हुआ। थोड़े दिनों बाद ही शिरोमणिजी को भी सजा हो गई। १ फरवरी, १९३१ को श्रीनिवास बालाजी हार्डीकर संपादक बने और १५ मार्च तक रहे। ९ मार्च, १९३१ को विद्यार्थीजी रिहा हुए। उनकी इच्छा थी कि ‘प्रताप’ पुनः दैनिक स्वरूप में निकले। ११ दिसंबर, १९३० को इसका दैनिक सांध्य संस्करण निकलना शुरू भी हो गया था। विद्यार्थीजी ने संपादन अपने हाथों में ले लिया। २३ मार्च, १९३१ को सरदार भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी हुई। कानपुर हिंदू-मुस्लिम दंगे की आग में जल उठा। २४ मार्च को दंगों का रूप और विकराल हो गया। विद्यार्थीजी लोगों को शांत करने और सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने के लिए निकल पड़े। २५ मार्च, १९३१ को कानपुर के चौबे गोला इलाके में उन्हें अपने प्राणों की आहूति देनी पड़ी। विद्यार्थीजी के लिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की श्रद्धांजलि थी, ‘‘भगत सिंह से शूर किसी भी पुरावृत्ति के हैं शृंगार। पर पौराणिक युग में भी बस शिव-दधीचि तुझसे दो-चार।’’ किताब के छठवें अध्याय सत्याग्रही की सनातम नियति में गांधीजी की तरह विद्यार्थीजी की आहूति का विवरण दिया गया है। विद्यार्थीजी का अंतिम अग्रलेख या संपादकीय टिप्पणी थी, ‘अंत का आरंभ’। वे लिखते हैं, ‘‘निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की प्रत्येक घटना, जिसकी भयंकरता से हृदय काँप उठे, जिसकी कटुता भावी संतति के लिए कलेजा छेदनेवाली कही जा सके, आशा और शुभ संदेश की वाहिनी है। देश में जिस स्वाधीनता का जन्म हो रहा है। यह उसी की प्रसव-वेदना है।’

‘साहित्यिक सरोकार’ शीर्षक अध्याय इस किताब को पूर्णता प्रदान करता है। उसमें कृष्णबिहारी मिश्र ने ठीक लिखा है कि विद्यार्थीजी की साधना की राह पत्रकारिता और व्यावहारिक राजनीति थी, किंतु साहित्य से उनकी संवेदना नैसर्गिक रूप से जुड़ी थी। अपने लेखन से विद्यार्थी जी ने श्रेष्ठ गद्यशिल्पी का प्रमाण दिया था। उनके अवदान की महत्ता को हिंदी जगत् ने स्वीकार किया था। गोरखपुर हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए उनका चयन साहित्यकार कुल का ही सम्मान प्रतीक था। इन अध्यायों के अलावा परिशिष्ट में बहुत मूल्यवान् सामग्री दी गई है, जैसे साप्ताहिक ‘प्रताप’ के प्रवेशांक की संपादकीय, ‘प्रभा’ के एक जनवरी १९२० का संपादकीय, ‘प्रताप दैनिक किसलिए’। इस किताब के रूप में हिंदी पत्रकारिता के अनन्य स्तंभ गणेशशंकर विद्यार्थी के व्यक्तित्व और कृतित्व को दीप्त ढंग से कृष्णबिहारी मिश्र ही प्रस्तुत कर सकते थे, क्योंकि हिंदी पत्रकारिता के शिल्पकारों का उनके जैसा अध्ययन-अनुशीलन किसी ने नहीं किया है।

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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता

दूरभाष : ०९८३६२१९०७८

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