अमृताश्व

फर्गाना के हरे-हरे पहाड़, जगह-जगह बहती सरिताएँ तथा चश्मे कितने सुंदर हैं। इसे वही जान सकते हैं, जिन्होंने काश्मीर की सुषमा देखी है। हेमंत बीतकर बसंत आ गया है और बसंतश्री उस पार्वत्य उपत्यका को भू-स्वर्ग बना रही है। पशुपाल अपने हेमंत-निवासों गिरि-गुहाओं या पाषाण-गृहों से निकलकर विस्तृत गोचर-भूमि में चले आए हैं। उनके घोड़े के बाल के तंबुओं से, जिनमें अधिकतर लाल रंग के हैं—धुआँ निकल रहा है। अभी एक तंबू से एक तरुणी मशक को कंधे से लटकाए नीचे पत्थरों पर अट्टहास करती सरिता के तट की ओर चली। अभी वह तंबुओं से बहुत दूर नहीं गई थी कि एक पुरुष सामने आकर खड़ा हुआ। तरुणी की भाँति उसके शरीर पर भी एक पतले सफेद ऊनी कंबल के दो छोर दाहिने कंधे पर इस तरह बँधे हुए हैं कि दाहिना हाथ, मोढ़ा और वक्षार्ध तथा घुटनों के नीचे का भाग छोड़ सारा शरीर ढका हुआ है। पुरुष के पिंगल केश, श्मश्रु सुंदर रूप से सँवारे हुए हैं। सुंदरी पुरुष को देख ठहर गई। पुरुष ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सोमा! आज देर से पानी के लिए जा रही है?’’

‘‘हाँ, ऋज्राश्व! किंतु तू किधर भूल पड़ा?’’

‘‘भूला नहीं सखी! मैं तेरे ही पास चला आया।’’

‘‘मेरे पास! बहुत दिनों बाद।’’

‘‘आज सोमा याद आ गई!’’

‘‘बहुत अच्छा, मुझे पानी भरकर घर में पहुँचाना है। अमृताश्व खाने बैठा है।’’

बात करते हुए दोनों नदी तक जा, घर लौटे। ऋज्राश्व ने कहा—

‘‘अमृताश्व बड़ा हो गया।’’

‘‘हाँ, तूने तो कई वर्षों से नहीं देखा?’’

‘‘चार वर्ष से?’’

‘‘इस वक्त वह बारह वर्ष का है। सच कहती हूँ ऋज्राश्व! रूप में वह तेरे समान है।’’

‘‘कौन जाने, उस वक्त मैं भी तो तेरा कृपा-पात्र था। अमृताश्व इतने दिनों कहाँ रहा?’’

‘‘नाना के यहाँ, वाह्लीकों में।’’

सुंदरी ने जलपूर्ण मशक तंबू में रखी और अपने पति कृच्छ्रश्व को ऋज्राश्व के आने की खबर दी। दोनों ओर उनके पीछे अमृताश्व भी तंबू से बाहर निकले। ऋज्राश्व ने सम्मान प्रदर्शित करते हुए कहा, ‘‘कह मित्र कृच्छ्राश्व! तू कैसे रहा?’’

‘‘अग्निदेव की कृपा है, ऋज्राश्व! आ जा फिर, अभी-अभी सोम (भाँग) को घोटकर मधु और अश्विनी-क्षीर के साथ तैयार किया है।’’

‘‘मधु-सोम, किंतु इतने सबेरे कैसे?’’

‘‘मैं घोड़ों के रेवड़ में जा रहा हूँ। बाहर देखा नहीं, घोड़ा तैयार है।’’

‘‘तो आज शाम को लौटना नहीं चाहता!’’

‘‘शायद, इसीलिए तैयार है यह सोम की मशक और मधुर अश्व मांस।’’

‘‘अश्व-मांस!’’

‘‘हाँ, हमारे पशुओं पर अग्निदेव की कृपा है। मैं तो अश्वों को ही अधिक पालता हूँ।’’

‘‘हाँ, कृच्छ्रश्व! तेरा नाम उलटा है।’’

‘‘माँ-बाप के समय हमारे घर में अश्वों की कृच्छ्रता थी, इसीलिए यह नम रख दिया।’’

‘‘लेकिन अब तो ऋद्धाश्व होना चाहिए।’’

‘‘अच्छा, चलो भीतर।’’

‘‘किंतु मित्र! इसी देव-द्रुम की छाया में हरी घास पर क्यों न?’’

‘‘ठीक सोमा! तू ला, सोम और मांस से यहीं मित्र को तृप्त करें।’’

‘‘किंतु कृच्छ्र! तू अश्वों में जा रहा था।’’

‘‘चला जाऊँगा, आज नहीं कल। बैठ ऋज्राश्व!’’

सोमा सोम की मशक और चषक (प्याले) लिये आई। दोनों मित्रों के बीच अमृताश्व भी बैठ गया। सोमा ने सोम (भाँग के रस) और चषक को धरती पर रखते हुए कहा, ‘‘बिस्तर ला दूँ, जरा ठहरो।’’

‘‘नहीं सोमे! यह कोमल हरी घास बिस्तर से अच्छी है।’’ ऋज्राश्व ने कहा।

‘‘अच्छा, यह बतला ऋज्र! लवण के साथ उबला मांस खाएगा या आग में भूना, ‘बछेड़ा आठ महीने का था। मांस बहुत कोमल है।’’

‘‘मुझे तो सोमे! भूना बछेड़ा पसंद आता है। मैं तो कभी-कभी संपूर्ण बछेड़े को आग पर भूनता हूँ। देर लगती है, किंतु मांस बहुत स्वादु होता है। और तुझे भी सोमे! मेरे चषक को अपने होंठों से मीठा करना होगा।’’

‘‘हाँ, हाँ सोमे! ऋज्र बहुत समय बाद आया है।’’ कृच्छ्राश्व ने कहा।

‘‘मैं जल्दी आती हूँ, आग बहुत है, मांस भूनते देर न लगेगी।’’

कृच्छ्राश्व को चषक पर उड़ेलते देख ऋज्राश्व ने कहा, ‘‘क्या जल्दी है?’’

‘‘सोम मधुरतम है। सोमा का हाथ और सोम! सोम अमृत है। यह सोमपायी को अमृत बनाता है। पी सोम और अमृत बन जा।’’

‘‘तू अमृत क्या बनेगा, जिस तरह चषक पर चषक उड़ेले जा रहा है, उससे तो अ-चिर में मृत-सा बन जाएगा।’’

‘‘किंतु तू जानता है ऋज्र! मैं सोम से कितना प्रेम रखता हूँ?’’

इसी वक्त भुने मांस के तीन टुकड़ों को चमड़े पर लिये सोमा आकर बोली, ‘‘किंतु कृच्छ्र! तू सोमा से प्रेम नहीं रखता?’’

‘‘सोमा से भी और सोम से भी।’’ कृच्छ्र ने परिवर्तित स्वर में कहा। उसकी आँखें लाल हो रही थीं। ‘‘और सोमा, आज तुझे क्या परवाह?’’

‘‘हाँ, आज तो मैं अतिथि ऋज्र की हूँ।’’

‘‘अतिथि या पुराने मित्र की?’’ हँसने की कोशिश करते हुए कृच्छ्र ने कहा।

ऋज्राश्व ने हाथ पकड़कर सोमा को अपनी बगल में बैठा लिया और सोमपूर्ण चषक को उसके मुँह में लगा दिया। सोमा ने दो घूँट पीकर कहा, ‘‘अब तू पी ऋज्र। बहुत समय बाद यह दिन आया है।’’

ऋज्राश्व ने सारे चषक को एक साँस में साफ कर नीचे रखते हुए कहा, ‘‘तेरे होंठों के लगते ही सोमे! यह सोम कितना मीठा हो जाता है।’’

कृच्छ्राश्व पर सोम का असर होने लगा था। उसने झटपट अपने चषक को भरकर सोमा की ओर बढ़ाते हुए लड़खड़ाती जबान से कहा, ‘तो-सो! इस—स्-से-भी-ी-म्-क-ध्-धु-र-व्-ब-ना-दे।’’

सोमा ने उसे होंठों से छू लौटा दिया। अमृताश्व को बड़ों के प्रेमालाप में कम रस आता था, इसलिए वह समवयस्क बालक-बालिकाओं के साथ खेलने निकल भागा। कृच्छ्राश्व ने झपी जाती पपनियों और गिरे जाते शिर के साथ कहा, ‘सो-ो-मं-े-! ग्-गा-ना-ा-ग्-गा-ऊँ?’

‘‘हाँ, तेरे जैसे गायक क्या कुरु में कहीं है?’’

‘‘ठ्-ठी-कम्-मे-रे-ज-जै-सा-ग्-गा-य-क-न-हीं-तू-तो-सु-सु-न-’’

‘‘प्पि-व्-वे-म्-मसो -मं—’’

‘‘रहने दे कृच्छ्र! देख तेरे संगीत से सारे पशु-पक्षी जंगल छोड़ भाग रहे हैं।’’

‘‘ह्, हु-म्-म!’’

इस समय सोम पी, अमृत बनने का नहीं था। आम तौर से उसका समय सूर्यास्त के बाद होता है, किंतु कृच्छ्राश्व को तो कोई बहाना मिलना चाहिए। उसके होश-हवाश छोड़ चित्त पड़ जाने पर, सोमा और ऋज्राश्व ने प्याले रख दिए तथा दोनों नदी के किनारे एक चट्टान पर जा बैठे। पहाड़ के बीच यहाँ धार कुछ समतल भूमि में बह रही थी, किंतु उसमें बडे़-छोटे पत्थरों से ढोंके भरे हुए थे। जिन पर जल टकराकर शब्द कर रहा था। पत्थरों की आड़ में जहाँ-तहाँ मछलियाँ अपने पंखों को हिलातीं चलती-फिरती दिखलाई पड़ती थीं। तट के पास की सूखी भूमि पर विशाल साल, देवदारु आदि के वृक्ष थे। पक्षियों के सुहावने गीतों के साथ फूलों से सुगंधित मंद पवन में श्वास तथा स्पर्श लेना बड़े आनंद की चीज थी। वर्षों बाद दोनों इस स्वर्गीय भू-भाग में अपने पुराने प्रेम की आवृत्ति कर रहे थे। इस वक्त फिर उन्हें वह दिन याद आ रहे थे, जबकि सोमा षोडशी पिंगला (पिंगल-केशी) थी, जब वसंतोत्सव के समय ऋज्राश्व भी वह्लीकों में अपने मामा के घर गया था। सोमा उसके मामा की लड़की थी। ऋज्राश्व भी उसके प्रेमियों में था। उस वक्त सोमा के चाहनेवालों में होड़ लगी थी, किंतु जयमाला कृच्छ्राश्व को मिली। दूसरों के साथ ऋज्राश्व को भी पराजय स्वीकार करनी पड़ी। अब सोमा कृच्छ्राश्व की पत्नी है, किंतु उस जिंदादिल युग में स्त्री ने अभी अपने को पुरुष की जंगम संपत्ति होना नहीं स्वीकार किया था, इसलिए उसे अस्थायी प्रेमी बनाने का अधिकार था। अतिथियों और मित्रों के पास स्वागत के रूप में अपनी रत्री को भेजना, उस वक्त का सर्वमान्य सदाचार था। आज वस्तुतः सोमा ऋज्राश्व की रही।

शाम को ग्राम के नर-नारी महापितर (कबीले के मुखिया या शासक) के विस्तृत आँगन में जमा हुए। सोम, मधुसुरा और स्वादिष्ट गो-अश्व मांस लाया जा रहा था। महापितर पुत्रोत्पत्ति का महोत्सव मना रहे थे। कृच्छ्र ने अपने को हिलने-डुलने लायक नहीं रखा था, उसकी जगह सोमा और ऋज्राश्व वहाँ पहुँचे। बड़ी रात तक पान, गीत, नृत्य महोत्सव मनाया गया। सोमा के गीत और ऋज्राश्व के नृत्य को सदा की भाँति कुरुओं ने बहुत पसंद किया।

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‘‘मधुरा! तू थक तो नहीं गई?’’

‘‘नहीं, मुझे घोड़े की सवारी पसंद है।’’

‘‘किंतु उन दस्युओं ने मुझे बुरी तरह पकड़ रखा था?’’

‘‘हाँ, बाह्लीक पक्यों की गौओं और अश्वों को नहीं, बल्कि लड़कियों को लूटने आए थे।’’

‘‘हाँ, पशु का लूटना दोनों जनों में चिरस्थायी शत्रुता पैदा करता है, किंतु कन्या को लूटना थोड़े ही समय के लिए, आखिर ससुर को जमाता का सत्कार करना ही पड़ता है।’’

‘‘किंतु मुझे तेरा नाम नहीं मालूम?’’

‘‘अमृताश्व, कृच्छ्राश्व—पुत्र, कौरव।’’

‘‘कौरव! कुरु मेरे मामा के कुल होते हैं।’’

‘‘मधुरा, अब तू सुरक्षित है। बोल कहाँ जाना चाहती है?’’

मधुरा के मुख पर कुछ प्रसन्नता की रेखा दौड़ने लगी थी, किंतु वह बीच ही में रुक गई। अमृताश्व समझ गया और बात का रुख दूसरी ओर मोड़ते हुए बोला, ‘‘पक्थों की कन्याएँ हमारे ग्राम में भी आई हैं।’’

‘‘सभी लूटकर?’’

‘‘नहीं, उनमें मातुल पुत्रियाँ अधिक हैं।’’

‘‘तभी तो। किंतु लड़कियों के लिए यह लूट-मार मुझे बहुत बुरी मालूम होती है।’’

‘‘और मुझे भी मधुरा! वहाँ पुरुष-स्त्री यह भी जानते हैं कि उनमें प्रेम की संभावना है भी।’’

‘‘मातुल-पुत्री का ब्याह इससे अच्छा है; क्योंकि उसमें पहले से परिचित होने का मौका मिलता है।’’

‘‘तेरा कोई ऐसा प्रेमी था मधुरा?’’

‘‘नहीं, मेरी कोई बुआ नहीं है।’’

‘‘कोई दूसरा?’’

‘‘स्थायी नहीं।’’

‘‘क्या तू मुझे भाग्यवान् बना सकती है?’’

‘‘मधुरा की शर्मीली निगाहें नीची हो गईं। अमृताश्व ने कहा, ‘‘मधुरा! ऐसे भी जनपद हैं, जहाँ स्त्रियाँ दूसरे की नहीं, अपनी होती हैं।’’

‘‘नहीं समझी अमृताश्व!’’

‘‘उन्हें कोई लूटता नहीं, उन्हें कोई सदा के लिए अपनी पत्नी नहीं बना पाता। वहाँ स्त्री-पुरुष समान होते हैं।’’

‘‘समान हथियार चला सकते हैं।’’

‘‘हाँ, स्त्री स्वतंत्र है।’’

‘‘कहाँ है वह जनपद, अमृत-आँ अमृताश्व!’’

‘‘नहीं अमृत ही कह मधुरा! वह जनपद यहाँ से पश्चिम में बहुत दूर है।’’

‘‘तू वहाँ गया है अमृत?’’

‘‘हाँ। वहाँ की स्त्री आजीवन स्वतंत्र रहती है; जैसे जंगल में स्वतंत्र विचरता मृग, जैसे आकाश उड़ती चिडि़याँ।’’

‘‘वह बड़ा अच्छा जनपद होगा! वहाँ स्त्री को कोई नहीं लूटता न?’’

‘‘स्वतंत्र बाघिन को कौन जीते-जी लूट सकता है?’’

‘‘और पुरुष, अमृत?’’

‘‘पुरुष भी स्वतंत्र है।’’

‘‘बाल-बच्चे।’’

‘‘मधुरा! वहाँ का घर-बार दूसरी ही तरह का है और सारे ग्राम का एक परिवार होता है।’’

‘‘उसमें बाप का कर्तव्य?’’

‘‘बाप नहीं कह सकते मधुरा! वहाँ स्त्री किसी की पत्नी नहीं, उसका प्रेम स्वच्छंद है।’’

‘‘तो वहाँ कोई बाप को नहीं जानता?’’

‘‘सारे घर के पुरुष बाप हैं।’’

‘‘यह कैसा रिवाज है?’’

‘‘इसीलिए वहाँ स्त्री स्वतंत्र है; वह योद्धा है, शिकारी है।’’

‘‘और गाय-घोड़ों का पालन-पोषण?’’

‘‘वहाँ गाय-घोड़े जंगलों में पलते हैं, वैसे ही, जैसे यहाँ हिरण।’’

‘‘और भेड़-बकरियाँ?’’

‘‘वहाँ लोग पशुपालन नहीं जानते। शिकार, मछली और जंगल के फल पर गुजारा करते हैं।’’

‘‘सिर्फ शिकार! फिर उन लोगों को दूध नहीं मिलता होगा?’’

‘‘मानवी का दूध और वह भी बचपन ही में।’’

‘‘घोड़े पर चढ़ना भी नहीं?’’

‘‘नहीं। और चमड़े के सिवा दूसरा परिधान भी नहीं जानते।’’

‘‘उन्हें बड़ा दुःख होता होगा?’’

‘‘किंतु वहाँ की स्त्रियाँ स्वतंत्र, पुरुषों की तरह स्वतंत्र हैं। वे फल जमा करती हैं, शिकार करती हैं, युद्ध में शत्रुओं पर पाषाण-परशु और बाण चलाती हैं।’’

‘‘मुझे भी यह पसंद है। मैंने शस्त्र चलाना सीखा है, किंतु युद्ध में पुरुषों की भाँति जाने का सुभीता कहाँ?’’

‘‘पुरुष ने यह काम अपने ऊपर लिया है। घोड़ों, गायों, भेड़-बकरियों को वह पालता है, स्त्री को उसने पशु-पत्नी नहीं, गृह-पत्नी बनाया है।’’

‘‘और लड़कियों को लूटने लायक बनाया है। वहाँ तो लड़कियाँ नहीं लूटी जाती होंगी, अमृत?’’

‘‘एक जन के लड़के-लड़की सदा उसी जन में रहते हैं, न बाहर देना, न बाहर से लेना।’’

‘‘कैसा रिवाज है?’’

‘‘वह यहाँ नहीं चल सकता।’’

‘‘इसलिए लड़कियाँ लूटी जाती रहेंगी?’’

‘‘हाँ तो मधुरा? क्या कहती है?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘मेरे प्रेम के बारे में।’’

‘‘मैं तेरे वश में हूँ, अमृत।’’

‘‘किंतु मैं लूटकर नहीं ले जाना चाहता।’’

‘‘क्या मुझे युद्ध करने देगा?’’

‘‘जहाँ तक मेरा बस होगा।’’

‘‘और शिकार करने?’’

‘‘जहाँ तक मेरा बस होगा।’’

‘‘बस?’’

‘‘क्योंकि मुझे महापितर की आज्ञा तो माननी पड़ेगी। अपनी ओर से मधुरा! मैं तुझे स्वतंत्र समझूँगा।’’

‘‘प्रेम करने, न करने के लिए भी।’’

‘‘प्रेम हमारा संबंध स्थापित कर रहा है। अच्छा उसके लिए भी।’’

‘‘तो अमृत! मैं तेरा प्रेम स्वीकार करती हूँ।’’

‘‘तो हम कुरुओं में चलें या पक्थों में?’’

‘‘जहाँ तेरी मरजी।’’

‘‘अमृत ने घोड़े को लौटाया और वह मधुरा के बताए रास्ते से पक्थों के ग्राम में पहुँचा। ग्राम में किसी के तंबूघर में कोई मारा गया था; किसी में कोई घायल पड़ा था, किसी की लड़की लूटी गई थी। चारों ओर कोहराम मचा हुआ था। मधुरा की माँ रो रही थी और बाप ढाढ़स बँधा रहा था, जबकि घोड़ा उसके बालों के तंबू के बाहर खड़ा था।

अमृताश्व के उतर जाने पर मधुरा कूद पड़ी और अमृताश्व को बाहर खड़े रहने के लिए कहकर भीतर चली गई। एकाएक सामने आ खड़ी बेटी को देख, पहले माँ-बाप को विश्वास न हुआ। फिर माँ ने गोद में ले उसके मुख को आँसुओं से भिगोना शुरू किया। उसके शांत होने पर बाप ने पूछा और मधुरा ने बतलाया, ‘‘बाह्लीक पथ्य लड़कियों को लूटकर ले जा रहे थे। मुझे लूटकर ले जानेवाला पिछड़ गया था। मौका पाकर मैं घोड़े से कूद गई। वह पकड़कर फिर चढ़ाना चाहता था। मैं उसका विरोध कर रही थी। उसी वक्त एक सवार आ गया, उसने बाह्लीक को ललकारा और उसे घायल कर गिरा दिया। वही कुरु तरुण मुझे यहाँ पहुँचाने आया है।’’

बाप ने कहा, ‘‘तो तरुण ने तुझे नहीं ले जाना चाहा?’’

‘‘बलात् नहीं।’’

‘‘किंतु हमारे जनपद के नियम के अनुसार तू उसकी हुई।’’

‘‘और मैं उससे प्रेम भी करती हूँ, तात!’’

मधुरा के बाप ने बाहर आकर अमृताश्व का स्वागत किया और उसे तंबू के भीतर लिवा लाया। गाँववालों को यह अजीब-सी बात मालूम हुई; किंतु सभी के सम्मान और सहानुभूति के साथ अमृताश्व ने मधुरा के साथ ससुराल छोड़ी।

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अब अमृताश्व अपने कुरु-ग्राम का महापितर था। उसके पास पचासों घोड़े, गायें तथा बहुत-सी भेड़-बकरियाँ थीं। उसके चार बेटे और मधुरा रेवड़ और घर का काम देखते थे। ग्राम के दरिद्र-कुलों के कुछ आदमी भी उसके यहाँ काम करते थे—नौकर के तौर पर नहीं, घर के एक व्यक्ति के तौर पर। एक कुरु को दूसरे कुरु से समानता का बरताव करना पड़ता। अमृताश्व के चलते-फिरते ग्राम में पचास से ऊपर परिवार थे। आपसी झगड़ों, मामलों-मुकदमों का फैसला महापितर को ही देखना पड़ता था। फिर पानी, रास्ते और दूसरे सार्वजनिक कामों का संचालन भी महापितर करता और युद्ध में जो सदा सिर पर बैठा ही रहता—सेना का मुखिया बनना तो महापितर का सबसे बड़ा कर्तव्य था। वस्तुतः युद्धों में सफलता ही आदमी को महापितर के पद पर पहुँचातीहै।

अमृताश्व एक बहादुर योद्धा था। पक्थों, बाह्लीकों तथा दूसरे जनों के अनेक युद्धों में उसने अपनी बहादुरी दिखलाई थी। मधुरा को दिए वचनों का उसने पालन किया। मधुरा ने अमृताश्व के साथ रीछ, भेडि़ये और बाघ के शिकार ही नहीं किए थे, बल्कि युद्धों में भी भाग लिया था। यद्यपि जनवालों में से किसी-किसी ने इसे पसंद नहीं किया था, उनका कहना था कि स्त्री का काम घर के भीतर है।

अमृताश्व जब पहले-पहल महापितर चुना गया, उस दिन कुरुपुर महोत्सव मना रहा था। तरुण-तरुणियों ने आज के लिए अस्थायी प्रणय बाँधे थे। ग्रीष्म के दिनों में नदी की उपत्यका और पहाड़ पर घोड़ों और गायों के रेवड़ स्वच्छंद चर रहे थे। गाँववाले भूल गए थे कि उनके शत्रु भी हैं। पशुधन के होते ही उनके शत्रुओं की संख्या बढ़ती थी। जब कुरु-जन वोल्गा के तट पर था, उस वक्त उसके पास पशुधन नहीं था। उस वक्त उसे आहार जंगल से लेना पड़ता था, कभी शिकार, मधु या फल न मिलने से भूखा रहना पड़ता था। अब कुरुओं ने शिकार के कुछ पशुओं—गाय, घोड़े, भेड़, बकरी, खर को पालतू बना लिया था। वह उन्हें मांस, दूध, चमड़ा ही नहीं, बल्कि ऊन के वस्त्र भी देते थे। कुरुआनियाँ सूत कातने और कंबल बुनने में कुशल; किंतु यह कुशलता समाज में उनके पहले स्थान को अक्षुण्ण नहीं रख सकी। अब स्त्री नहीं, पुरुष का राज्य है। जन-नायिका, जन-समिति का नहीं, बल्कि लड़ाके महापितर का शासन है। जो जनमत का खयाल रखते हुए भी बहुत कुछ अपने मन से निर्णय करता और संपत्ति, जहाँ स्त्री के राज्य में परिवार का परिवार सदा एकत्र रहता, एक साथ काम करता, वहाँ अब अपना-अपना परिवार, अपना-अपना पशुधन और उसका हानि-लाभ भी अपने ही को था। हाँ, सबके संकट के वक्त जन फिर एक बार पुराने जन का रूप लेना चाहता था।

अमृताश्व महापितर के महोत्सव में मस्त जन को अपने पशुधन की फिक्र न थी। बाजे की आवाज पर थिरकते तरुण सिर्फ सोम-सुरा और सुंदरियों का खयाल रख सकते थे। पहर रात रह गई थी, किंतु नृत्य अब भी बंद होना नहीं चाहता था। इसी वक्त चारों ओर कुत्ते जोर-जोर से भौंकते हुए उपत्यका के ऊपर के भाग की ओर दौड़ते मालूम हुए। अमृताश्व उन पुरुषों में था, जो सोम को उतना ही पीने में आनंद मानते हैं, जितने में उनकी आँखों में लाली उतर आए और साथ ही होश-हवाश भी हाथ से जाने न पावे। कुत्तों की आवाज सुन चुपके से उठ उसने काठ के बेटवाली अपनी पाषाणी गदा को सँभाला और नदी के किनारे-किनारे आवाज आने की दिशा की ओर चलना शुरू किया। थोड़ी ही दूर जाने पर अस्तांचल पर पहुँचते चंद्रमा की रोशनी में कोई स्त्री आती दिखाई पड़ी। वह ठहर गया। पास आने पर मालूम हुआ, वह मधुरा है। मधुरा की साँस अभी तेजी से चल रही थी, उसने उत्तेजित स्वर में कहा,  ‘‘पुरु हमारे पशुओं को हाँके लिये जा रहे हैं।’’

‘‘हाँके लिये जा रहे हैं! और हमारे सारे तरुण नशे में चूर हैं! तू कहीं तक गई थी, मधुरा?’’

‘‘उतनी ही दूर तक, जितने में कि मैं इतना जान सकी।’’

‘‘सारे पशुओं को ले जा रहे हैं?’’

‘‘देर से जान पड़ता है, बिखरे रेवड़ को एकत्र करने में लगे हुए थे।’’

‘‘तू क्या सोचती है, मधुरा?’’

‘‘देर करने का समय नहीं!’’

‘‘और हमारे सारे तरुण नशे में चूर हैं।’’

‘‘जो चल सकें, उन्हें लेकर धावा बोलना चाहिए।’’

‘‘हाँ जरूर, लेकिन एक बात है मधुरा! तुझे मेरे साथ नहीं चलना चाहिए। इन तरुणों का आधा नशा तो इस समाचार से ही उतर जाएगा और बाकी को दही खिलाना। जैसे-जैसे नशा उतरता जाए, वैसे-वैसे भेजती जाना।’’

‘‘और कुरुआनियाँ?’’

‘‘मैं कुरुओं के महापितर की हैसियत से आज्ञा दे सकता हूँ उन्हें युद्धक्षेत्र में उतरने की; उस पुरानी विस्मृत प्रथा को हमें जगाना होगा।’’

‘‘मैं आगे आने की कोशिश नहीं करूँगी; अच्छा जल्दी।’’

महापितर की आज्ञा पर बाजे एकदम बंद हो गए। नर-नारी महापितर के इर्द-गिर्द जमा हो गए। सचमुच गो-अश्व-हरण की बात सुनते ही उनमें से कितनों का नशा उतर गया; उनके चेहरों पर प्रणय-मुद्रा की जगह वीर-मुद्रा छा गई। महापितर ने मेघ-गंभीर स्वर में कहा—

‘‘कुरुओ और करुआनियो! पुरु शत्रुओं से हमें अपने धन को छीनना है। लड़ाई होगी। तुममें से जितने होश में हैं, अपने हथियार को ले, घोड़ों पर सवार होकर मेरे पीछे आएँ। जो नशे में हों, मधुरा से दही लेकर खाएँ और उतरते ही दौडे़ आएँ। कुरुआनियो! आज तुम्हें भी मैं रणक्षेत्र में आने की आज्ञा देता हूँ। पुरानी कुरुआनियाँ युद्धक्षेत्र में पुरुषों के समान भाग लेती थीं; यह हम वृद्धों से सुनते आए हैं। आज तुम्हारा महापितर अमृताश्व तुम्हें इसकी आज्ञा देता है।’’

दम के दम में चालीस घोड़े जमा हो गए। पुरु जितने पशुओं को जमा कर पाए थे, उन्हें उपत्यका के ऊपर की ओर भगाए लिये जा रहे थे। पर दो घंटे की दौड़ के बाद पौ फटते वक्त कुरुओं ने उन्हें देखा। घोड़ों और गायों के इतने झुंड को इकट्ठा कर उस पहाड़ी से दौड़ाते हुए हाँकना आसान काम न था। पुरु सवार अपने चमड़े के कोड़ों को हवा और पत्थरों पर पटककर पशुओं को भयभीत कर रहे थे। अमृताश्व ने देखा, पुरुओं की संख्या सौ के करीब होगी। अपनी चालीस की टुकड़ी से लड़ाई शुरू करनी चाहिए या नहीं, इस पर ज्यादा माथापच्ची वह करना नहीं चाहता था।

उसने सींगों के लंबे भाले को सँभालकर दुश्मन पर हमला करने की आज्ञा दी।

कुरु वीर और वीरांगनाओं ने—हाँ, वीरांगनाएँ आधी से कम न थीं—निर्भय हो घोड़ों को आगे दौड़ाया। उन्हें देखते ही कुछ को पशुओं को रोके रखने के लिए छोड़, पुरु नीचे की ओर दौड़ पड़े और घोड़ों से पूरा फायदा उठाने के लिए नदी के किनारे एक खुली जगह में खड़े हो कुरुओं का इंतजार करने लगे। अमृताश्व की आकृति उस वक्त देखने लायक थी। उसका घोड़ा अमृत और वह, दोनों एक ही शरीर के अंग मालूम होते थे। हरिण के तेज सींग का उसका भाला एक बार जिसके शरीर पर लगता, वह दूसरी बार के लिए अपने घोड़े पर बैठा नहीं रह सकता था। पुरुओं ने धनुष-बाण और पाषाण-परशु पर ज्यादा भरोसा कर गलती की थी, यदि उनके पास भी उतने ही सींग के भाले होते तो निश्चय ही कुरु उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। एक घंटा संग्राम होते हो गया, कुरु अब भी डटे हुए थे, किंतु उनके एक-तिहाई योद्धा हताहत थे, यह डर की बात थी। उसी वक्त तीस कुरु घुड़सवार ललकारते हुए संग्राम-क्षेत्र में पहुँचे। कुरुओं की हिम्मत बहुत बढ़ गई। पुरु बुरी तरह से मरने लगे। उनकी नाजुक हालत देख पशुओं को रोके रखने के लिए छोड़े हुए घुड़सवार भी आ पहुँचे; उसी समय चालीस कुरु-कुरुआनियों का जत्था लिये मधुरा आ पहुँची। डेढ़ घंटा जमकर युद्ध हुआ। अधिकांश पुरु हताहत हुए, कुछ भाग निकले।

घायलों का खात्मा कर कुरु-वाहिनी पुरु-ग्राम की ओर बढ़ी। वह चार कोस ऊपर था। सारा ग्राम सूना था। लोग तंबुओं को छोड़कर भाग गए थे। उनके पशु जहाँ-तहाँ चर रहे थे। किंतु कुरुओं को पहले पुरुओं से निबटना था। पुरु बुरी तरह घिर गए थे; ऊपर भागने का उतना सुभीता न था। उपत्यका सँकरी होती गई थी और चढ़ाई कड़ी थी, तो भी प्राण बचाने के लिए नर-नारी घोड़ों पर भागे जा रहे थे। आखिर ऐसा भी स्थान आया; जहाँ घोड़ा आगे नहीं बढ़ सकता था। लोग पैदल चलने लगे। कुरु उनके नजदीक आ गए थे। बच्चे, बूढ़े, स्त्रियाँ तेजी से नहीं बढ़ सकते थे; इसलिए उन्हें भागने का मौका देने के लिए कुछ कुरु-भट एक सँकरी जगह में खड़े हो गए। कुरु अपनी संख्या का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सकते थे; इसलिए उन्हें इन पुरुओं से रास्ता साफ करने में कुछ घंटे लगे। पुरु और कुरु अब दोनों ही पैदल थे, किंतु पुरुओं में मर्द मुश्किल से एक दर्जन रह गए थे। इसलिए वे कुछ ही दिनों तक सारे पुरु-परिवार की रक्षा कर सकते थे। उन्होंने एक दिन कुछ साहसी स्त्रियों को ले एक दुरूह पथ पकड़ वह उपत्यका छोड़ दी और पहाड़ों को पार करते दक्खिन की ओर बढ़ गए। कुरुओं ने जहाँ-तहाँ छिपे प्राणों की भिक्षा माँगते पुरु बच्चों, वृद्धों और स्त्रियों को पकड़ा। बंदी बनाना इस पितृ-युग के नियम के विरुद्ध था, इसलिए बच्चे से बूढ़े तक सारे ही पुरुषों को उन्होंने मार डाला।

स्त्रियों को वे अपने साथ लाए। पुरुओं का सारा पशु-धन भी उनका हुआ। अब वह हरित रोद (नदी) उपत्यका, नीचे से ऊपर तक कुरुओं की चरागाह थी। एक पीढ़ी तक के लिए महापिता ने एक से अधिक पत्नी रखने का विधान कर दिया और इसी वक्त कुरुओं में पहले-पहल सपत्नी देखी गई।

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