अभिव्यक्ति का अधिकार व सहनशीलता

हम अभिव्यक्ति के अधिकार के समर्थक हैं, और जब-जब किसी पुस्तक, आलेख या कलाकृति को प्रतिबंधित करने की माँग उठी है, तब इस स्तंभ में विरोध करते रहे हैं। इसी प्रकार किसी वक्ता को कुछ लोग नहीं सुनना चाहते हैं तो उस सभा को अस्त-व्यस्त या भंग करने की कोशिश को वाजिब नहीं कहा जा सकता है। हमारे यहाँ शास्त्रार्थ की परंपरा रही है। तर्क का उत्तर तर्क द्वारा होना चाहिए। हमारे यहाँ खजुराहो आदि में ऐसी कलाकृतियाँ हैं, विदेशी जिनकी आलोचना करते हैं, क्योंकि वे उनके निहित अर्थों को समझ नहीं पाते हैं। हमारे यहाँ रोमन कैथोलिक चर्च की तरह इनक्विजश्न जैसी प्रथा नहीं रही है, न पुस्तकों या पुस्तकालयों को जलाया जाता है और न उनके पढ़ने पर कोई बंधन। हमारे यहाँ ईशनिंदा अथवा धर्मनिंदा (अपधर्म) जैसे सिद्धांत नहीं रहे हैं। चार्वाक ऋषि माने जाते हैं, यद्यपि वे घोर नास्तिक और भौतिकवादी थे। भर्तृहरि ने शृंगार शतक लिखा और नीति तथा वैराग्य शतकों की भी रचना की। कामशास्त्र को शास्त्र की मान्यता है और इसके रचनाकार वात्सायन को ऋषितुल्य माना जाता है। गैलीलियो सिंड्रोम को भारत में पनपने नहीं दिया गया। आज जब देखो, यह बहाना लेकर कि हमारी भावनाओं को चोट पहुँच रही है, कोई भी वर्ग खड़ा हो जाता है और शांति भंग की नौबत आ जाती है।

पिछले दिनों पद्मावत फिल्म को लेकर कितना हंगामा हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद, जो राज्य सरकारें उसके प्रदर्शन पर रोक लगाने की घोषणा कर चुकी थीं, उन्हें भी पीछे हटना पड़ा। स्वयंभू नेता और हुड़दंग मचानेवाले सिरफिरे लोग दुम दबाकर बैठ गए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड किसी फिल्म या डॉक्युमेंट्री को मंजूरी देता है, तो वह सर्वमान्य होना चाहिए। उसके बाद एक ब्राह्मण संगठन ने आवाज उठाई कि रानी लक्ष्मीबाई पर जो फिल्म बनाई जा रही है, उससे ब्राह्मणों की भावनाओं को क्षति पहुँचेगी। मामला बहुत आगे नहीं बढ़ा, स्पष्टीकरण के बाद विरोधी तत्त्व शांत हो गए। केवल सुर्खियों में आने के लिए कुछ लोग इस प्रकार के विवाद बिना सोचे-समझे खडे़ करते हैं। अब गुरु नानक देव पर एक सिख अनुयायी सिक्का ने फिल्म बनाई, उसका विरोध हुआ है। सिक्का का कहना है कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से पहले इसकी स्वीकृति मिल चुकी थी। सिक्का ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई। न्यायालय ने वही निर्णय दिया, यदि सेंसर बोर्ड से अनुमति या सर्टिफिकेट मिल गया है तो फिल्म दिखाई जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सृजनात्मक कृतियों में इस प्रकार धर्म के नाम पर हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। सिक्का ने यह भी कहा कि पंजाब में वे फिल्म को प्रदर्शित नहीं करेंगे, किंतु फिर भी विरोध शुरू हो गया। यही नहीं, वे एस.जी.पी.सी. के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में क्यों गए, इस कारण उनको पंथ से निकाल दिया गया, यानी तनखैया घोषित कर दिया। उनके बीच जो पत्र-व्यवहार हुआ था, उसको भी कैंसिल कर दिया गया, मानो कुछ ऐसा हुआ ही नहीं। गुरु नानकदेव हम सबके अत्यंत आदर के पात्र हैं, फिर इस प्रकार की असहिष्णुता क्यों, यह समझ में नहीं आता है। राम जेठमलानी सर्वोच्च न्यायालय में सिक्का केवकील हैं। सिक्का केअनुसार उनकी फिल्म गुरु नानकदेव के सिद्धांतों का ही प्रचार करती है। यह भी विचित्र है कि तथाकथित उदारवादी बुद्धिवादी इस विषय में चुप्पी साधे बैठे हैं।

इसी संदर्भ में देश में एक होड़ सी प्रारंभ हो रही है—महान् व्यक्तियों की मूर्तियाँ तोड़ने की या उनके साथ छेड़छाड़ करने की; उसकी भी हम भर्त्सना करते हैं। हमें इस विषय में सहनशीलता दिखानी चाहिए। पेरियार, डॉ. अंबेडकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गांधीजी की मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ करने, कालिख पोतने या तोड़ने के समाचार मिले हैं। यह खेदजनक है। इन सब नेताओं का देश के लिए अपना-अपना अवदान रहा है। उन्होंने अपनी सोच के अनुसार देश और समाज की सेवा की है। उनके विचार मानने या न मानने के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है। हमको यह अधिकार नहीं है कि किसी केआदर्श पुरुषों की मूर्ति तोड़कर उनके दिल को दुखाएँ। यह काम नासमझ लोगों का है या ऐसे असामाजिक तत्त्वों का है, जो समाज में उत्पात पैदा करना चाहते हैं। विभाजित समाज को और विभाजित करना चाहते हैं। त्रिपुरा में राज्य परिवर्तन के बाद लेनिन की मूर्ति गिरा दी गई, हम उसको भी गलत और अनुचित ही कहेंगे। बेशक लेनिन के विचारों से सहमत न हों, पर कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि वह एक मौलिक चिंतक थे, जिनकी विचारधारा वैश्विक विचारधारा का एक भाग बन गई है। व्यावहारिक रूप से हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र में सत्ता-परिवर्तन होते रहते हैं और जिनका आदर हम करते हैं, उनकी मूर्तियों का अनादर न हो। अनेक विदेशी महापुरुषों की मूर्तियाँ देश में स्थापित हैं, उनके नाम से सड़कें हैं।

रामास्वामी पेरियार तमिलनाडु में कांग्रेस के बडे़ नेता रहे हैं, पिछडे़ वर्गों में आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के प्रति सतर्कता जाग्रत् करने में उनकी महती भूमिका रही है। गांधीजी को हमने राष्ट्रपिता की संज्ञा दी है। उनके विषय में कुछ और कहना आवश्यक नहीं है। डॉ. अंबेडकर हमारे संविधान के निर्माताओं में मुख्य हैं। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस विषय में संविधान सभा में ही उनकी बहुत सराहना की थी। उनकी विद्वत्ता की सब धाक मानते हैं और उनके सतत प्रयास के कारण ही आज दलित वर्गों में आशा और आकांक्षाएँ पैदा हुई हैं तथा एक शिक्षित नेतृत्व उभर रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की सेवाएँ, कश्मीर के विलयन में जान की बाजी लगा देना, देश के विभाजन के समय बंगाल के विभाजन के लिए संघर्ष आदि इतिहास में रेखांकित हैं। इस विषय में न केवल राज्य सरकारों को सतर्क रहने और कड़ा रुख अपनाने की आवश्यकता है, राजनैतिक दलों को भी अपने उत्तरदायित्व का भान होना चाहिए।

शीर्ष न्यायालय का स्पष्टीकरण

२० मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्पीड़न के कानून के कारण निर्दोष व्यक्तियों को भी जेल जाना पड़ता है, क्योंकि एक शिकायतकर्ता की शिकायत के बाद न किसी प्रकार की जाँच होती है और न आरोपी व्यक्ति को जमानत मिल सकती है। उन्होंने गिरफ्तारी के पहले कुछ शर्तें लगाईं, इससे दलित वर्गों में बहुत उत्तेजना फैल गई। उनका कहना है कि यह विशेष कानून इसलिए बनाया गया था, ताकि इन वर्गों को न्याय मिल सके, क्योंकि ये बेचारे उससे वंचित रहते हैं। सत्ता दल के कई सांसद इस विषय में बहुत मुखर हुए, विरोधी दलों को भी यह प्रचारित करने का एक अच्छा मौका मिला कि मोदी सरकार दलित विरोधी है। सरकार की ओर से कहा गया कि वह कानूनी दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का अध्ययन कर रहे हैं और शीघ्र आगे की काररवाई करेंगे। इस बीच में यह मामला तूल पकड़ता गया। दलित वर्गों में काफी भ्रम फैल गया कि सरकार आरक्षण में भी कमी करेगी, उसे कमजोर करेगी, जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने उनके उत्पीड़न निरोधक कानून को कमजोर कर दिया गया। दलित समुदाय में रोष तो वाजिब है कि उनको सैकड़ों साल से न्याय और मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया है। पिछले दिनों भी कुछ क्षेत्रों से दलितों के उत्पीड़न, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार आदि के समाचार आते रहे हैं। इससे वातावरण काफी दूषित हो गया। दुर्भाग्य से यह सिलसिला अब भी जारी है। विरोधी दलों द्वारा इन भावनाओं का राजनीतीकरण हो रहा है, क्योंकि २०१९ में आम चुनाव होनेवाले हैं। २०१४ के आम चुनाव में अनुसूचित जातियों और जनजातियों का बहुत बड़ा समर्थन नरेंद्र मोदी को मिला। भाजपा में ही अनुसूचित जाति और जनजातियों के सर्वाधिक सांसद हैं। बसपा को तो एक भी सीट नहीं मिली थी।

विरोधी दलों को इस मामले में तिनके का सहारा मिल गया। भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एंटी-दलित हैं, यह प्रोपेगेंडा जोर पकड़ने लगा। सरकार की ओर से कहा गया कि कानून को डायलूट नहीं होने देंगे, पर जितनी जोर से और जिस प्रभावी ढंग से कहा जाना चाहिए था, वह संभवतः नहीं हुआ। सरकार ने जब निर्णय लिया कि वह पुनर्निरीक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध करेगी, यह संदेश भी सर्वसाधारण तक नहीं पहुँचा। टीवी पर एकपक्षीय दृष्टिकोण ही काबिज रहा। मार्च की छुट्टियों के कारण भी रिव्यू में देरी हुई। इस बीच अनेक छोटे-मोटे दलित समुदाय के दलों ने सोशल मीडिया पर २ अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया। विरोधी दलों की शह तो थी ही। राहुल तथा अन्य जनप्रतिनिधि विरोध जताने के लिए राष्ट्रपति से मिले थे, यह सब जानकारी इन वर्गों तक पहुँची। गृह मंत्रालय ने राज्यों को भारत बंद के विषय में सावधानी बरतने की सलाह तो भेजी, पर खुफिया तंत्र को, एक बंद बिना नेतृत्व के इतना विशद हो सकता है, इसका अनुमान न था बंद की संभावित गंभीरता का आकलन गुप्तचर विभाग नहीं कर सका। जिसमें करीब १२ व्यक्तियों की जान गई। सरकार (कहना चाहिए जनता) के माल का कितना नुकसान हुआ, इस समय कहना कठिन है। इसके जवाब में तथाकथित अगड़े वर्गों के कुछ गुटों ने सोशल मीडिया द्वारा १० अप्रैल को आरक्षण विरोध में भारत बंद की घोषणा की। मध्य प्रदेश, राजस्थान में थोड़ा-बहुत असर रहा, किंतु ऐसे सिरफिरे लोगों के कारण माहौल तो व्यर्थ में बिगड़ता ही है।

केंद्र सरकार की ओर से एटॉर्नी जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने निर्णय को स्थगित करने का अनुरोध किया, पर स्थगन प्रस्ताव को न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। कोर्ट का कहना था कि जिन लोगों ने विरोध किया है, उन्होंने निर्णय को न पढ़ा है और न समझा है। अपने निर्णय के द्वारा न्यायालय ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के उत्पीड़न निरोधक कानून की प्रक्रिया को और मजबूत ही बनाया है। एटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने अपने लिखित आवेदन में बहुत तर्क दिए हैं। कहा है कि न्यायालय को इस प्रकार के निर्णय का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने पार्लियामेंट या विधायिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है, जो स्वीकार नहीं किया जा सकता है। आगे मामला न्यायालय में सुना जाएगा, क्या नतीजा निकलता है, यह तभी पता चलेगा। दलित वर्गों की ओर से यह माँग भी है कि केंद्र सरकार अध्यादेश के द्वारा न्यायालय के फैसले को निरस्त करे, ताकि प्रभावित लोगों का आक्रोश शांत हो। आक्रोश को तुरंत ठंडा करने का यह तरीका है, परंतु अध्यादेश को भी चुनौती दी जा सकती है और न्यायालय उसको स्थगित कर सकता है। हम समझते हैं कि केंद्र सरकार अध्यादेश के रास्ते को न अपनाकर न्यायालय की अगली तारीख का इंतजार करेगी। वैसे समाचार है कि जरूरत पड़ने पर अध्यादेश भी तैयार है। केंद्रीय सरकार केअतिरिक्त केरल सरकार ने भी पुनर्निरीक्षण के लिए आवेदन किया। अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड की सरकार भी फैसले के रिव्यू के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा रही हैं। देखना है कि इस संवेदनशील विषय में न्यायालय का क्या रुख रहता है। दलितों का विक्षोभ समाप्त होना चाहिए और देश में शांतिपूर्ण वातावरण रहे, ताकि सबका साथ, सबका विकास में अनावश्यक रुकावटें न आएँ।

यह तो रहा कानूनी पक्ष, पर इस विवाद का एक गंभीर राजनैतिक पक्ष भी है, जो २०१९ के आम चुनाव से संबंधित है। संयोग से १४ अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर का १२७वीं जयंती दिवस भी था। भारतीय जनता पार्टी को एक सत्तारूढ़ होने के कारण ही नहीं, बल्कि उसके अपने भारत की एकता, अखंडता तथा समरसता में अटल विश्वास के कारण भी आवश्यक है कि दलित वर्ग की भ्रांतियों के निवारण के लिए जो भी कदम जरूरी हों, वे शीघ्रतातिशीघ्र उठाए जाएँ और निरंतर ध्यान रखा जाए कि उनका अनुपालन सही तरीके से हो। प्रधानमंत्री का यह कहना काफी हद तक सही है कि पिछले चार वर्षों में जो काम उनकी सरकार ने दलित वर्ग के लिए किए, वैसे कांग्रेस के इतने लंबे शासन में नहीं हुए। ‘जन धन’, ‘उज्ज्वला’, मुद्रा आदि का लाभ बड़े पैमाने पर उपेक्षित समुदायों को हुआ है। इसी प्रकार की अन्य योजनाएँ हैं, जैसे स्टार्ट अप आदि, जिनसे कार्यक्षमता बढ़ती है, उसका भी फायदा उन्हें हो रहा है। जिस प्रकार शिक्षा आदि की सुविधा से उपेक्षित वर्गों में मुखर एवं कुशल नेतृत्व उभरकर सामने आया है, उसी प्रकार कुछ समय के उपरांत इन योजनाओं का लाभ दिखने लगेगा, क्योंकि ये योजनाएँ उनको सक्षम बनाने अथवा शक्तीकरण की योजनाएँ हैं, ये लुभावनी वस्तुओं का वितरण नहीं हैं। लंदन में जिस स्थान पर डॉ. अंबेडकर अपने प्रवास में रहे, उसको सरकार ने खरीद लिया है। उसको भारतीय विद्यार्थियों के रहने के उपयोग में लाया जाएगा। दिल्ली में अलीपुर रोड पर, जहाँ डॉ. अंबेडकर का निधन हुआ, प्रधानमंत्री ने उसका उद्घाटन मेमोरियल के रूप में किया। वहाँ शोध, प्रदर्शनी, गोष्ठियों आदि सबकी व्यवस्था है।

बस्तर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवादियों से अपील की कि वे हथियार रख दें, बाबासाहब अंबेडकर ने जो संविधान दिया है, उनमें उनके अधिकार दिए हुए हैं और उसका कार्यान्वयन सरकार का काम है। ‘आयुष्मान भारत’, जो स्वास्थ्य एवं चिकित्सा की सुविधाओं की दृष्टि से एक बहुत बड़ा कदम है, उसके प्रारंभ की घोषणा भी प्रधानमंत्री ने की है। यह एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा। प्रधानमंत्री ने यह भी अपने भाषण में कहा कि वे एक गरीब माँ के बेटे और पिछड़े वर्ग के होने के बावजूद प्रधानमंत्री बन सके, क्योंकि बाबासाहब ने जन-साधारण में अपने अधिकारों के विषय में चेतना का प्रसार कर दिया था। उन्हीं को श्रेय है मेरे प्रधानमंत्री बनने का। पिछले दिनों में जो घटनाएँ हुई हैं और जिनके कारण दलितों में भाजपा के प्रति जो शंका उत्पन्न हुई है, उसके समाधान के लिए सरकार और पार्टी स्तर पर भाजपा को अपनी रणनीति ऐसी बनानी होगी, जिसके नतीजे तुरंत दिखाई दें और जो दीर्घकालीन दृष्टि से भी दलितों को शक्तिवान बनाएँ। उनकी शिकायत-शिकवों पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। कुछ राज्य सरकारों ने भी डॉ. अंबेडकर की जयंती के अवसर पर कुछ सुविधाओं और योजनाओं की घोषणा की है, पर उनको ध्यान देना जरूरी है कि जो वादे किए गए हैं, उनका कड़ाई से अनुपालन हो और उसका लाभ इन वर्गों को मिले। सबसे जरूरी है कि समाज में सबकी मानसिकता बदले। ये सब वर्ग हमारे ही हैं, अपने हैं और उनकी उन्नति के सब मार्ग प्रशस्त होने चाहिए। समता, समरसता और भाईचारे के निर्माण की भरसक कोशिश होनी चाहिए।

एक बात हम फिर दोहराना चाहेंगे कि पार्टी के नेताओं, सांसदों, विधानसभा के सदस्यों को, वे जो बोलते हैं, उन्हें अपने शब्दों को तौलकर कहना चाहिए। वाणी में संतुलन आवश्यक है। आचरण भी ऐसा होना चाहिए कि कथनी और करनी में भेद न लगे। आजकल टीवी और सोशल मीडिया का जमाना है। एक भी शब्द अगर गलत निकला तो बात का बतंगड़ बन जाता है। उसे मीडिया सनसनीखेज बना देता है। कितनी भी सफाई दी जाए, वह कोई प्रभाव नहीं छोड़ती। भले पार्टी भी उसे नकार दे, किंतु उसको बार-बार दोहराया ही जाता है और वह लोगों के दिमाग में घर कर जाती है। इससे सावधान रहना बड़ा जरूरी है। बड़बोलों की जबान पर नियंत्रण जरूरी है। भावनाओं में उद्वेलित होकर वे क्या कह रहे हैं, उसका क्या नतीजा होगा, उसका उन्हें भान नहीं रहता। इससे पार्टी की सदाशयता और ईमानदारी को गंभीर नुकसान होता है। उनकी स्वयं की पार्टी भाजपा, जिसे राष्ट्रवादी कहा जाता है, जो सामाजिक सौष्ठव, समरसता और भाईचारे के लिए प्रयत्नशील है, उसको समाज-विभाजक और दलित विरोधी कहने तथा बदनाम करने की सामग्री इन बड़बोलों के कथन से मिल जाती है। माननीय राष्ट्रपति ने डॉ. अंबेडकर के जन्मस्थान मऊ जाकर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। अपने उद्बोधन में उन्होंने याद दिलाया कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में अराजकता, असंवैधानिक तौर-तरीकों का कोई स्थान नहीं है। हर विवादास्पद मसले को कानून और संविधान के दायरे में हल करना होगा। डॉ. अंबेडकर के इस संदेश की देश को आज के वातावरण में, जब राजनीति सब सीमाओं का उल्लंघन करती दिखती है, बहुत आवश्यकता है।

कठुआ और उन्नाव कांड

कठुआ (जम्मू-कश्मीर) और उन्नाव (उ.प्र.) की दो बालिकाओं के बलात्कार के मामलों ने निर्भया केस के बाद पुनः देश का दिल और दिमाग फिर झकझोर दिया है। कठुआ की तरह सूरत में भी इसी प्रकार एक नाबालिग बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके बाद हत्या का समाचार आया है। कठुआ में एक बकरवाल की आठ साल की लड़की अपने जानवरों को जंगल से लाने गई थी, उसका अपहरण हो गया और बाद में लाश पाई गई। बकरवाल एक घुमंतू जाति है, जो जानवरों को पालती है। सर्दी के मौसम में ये पहाडि़यों से मैदानी इलाके में आते हैं और गरमियों में फिर चारे की तलाश में पहाडि़यों में चले जाते हैं। ये अधिकतर मुसलमान होते हैं। इन चरवाहों ने ही १९४७ में और फिर कारगिल में पाकिस्तान से आए आक्रमणकारियों की जानकारी कश्मीर अधिकारियों को दी थी। यह एक मुसलमान बालिका थी। ऐसे तथ्य मीडिया में आए हैं और उनके विवरण में जानना अनावश्यक है, जो हुआ वह जघन्य अपराध है। फिर भी यह मामला और भी दयनीय है। उसके पिता ने बताया कि इस लड़की को, जब वह घुटनों चलती थी, तभी अपने एक रिश्तेदार से गोद ले लिया था, चूँकि इसके दो लड़के एक दुर्घटना के शिकार हो गए थे। माँ-बाप की सांत्वना के लिए रिश्तेदार ने इस लड़की को दे दिया था और आशा थी कि वह बड़ी होकर अपने असली माँ-बाप के पास चली जाएगी। जब भी इसकी असली माँ और बहनें इसको वापस आने के लिए कहती थीं तो उसका उत्तर यही होता था कि मैं आ जाऊँगी तो मेरे माँ-बाप अकेले रह जाएँगे और फिर जानवरों की देखभाल कौन करेगा? आरोपी हिंदू हैं और कहा जाने लगा कि उनको झूठा फँसाया जा रहा है। उनमें एक पुलिसवाला भी है। जघन्य अपराध का कोई धर्म नहीं होता। जम्मू का वातावरण ऐसा सांप्रदायिक हो गया कि हिंदू एकता मंच के अंतर्गत न केवल भाजपा के, बल्कि कांग्रेस, एनसीपी, पैंथर्स पार्टी आदि के लोग शामिल हो गए और उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया कि मामले की तफतीश राज्य का क्राइम ब्रांच न करे, यह केस सी.बी.आई. को दे दिया जाए। क्राइम ब्रांच ने जाँच पूरी कर ली, पर कठुआ बार एसोसिएशन और जम्मू बार एसोसिएशन ने चार्जशीट को अदालत में पेश करने में अड़चन पहुँचाई।

हत्याकांड और बलात्कार की शिकार बच्ची के परिवार की ओर से वकील दीपिका सिंह राजावत को भी धमकियाँ मिलने लगीं कि वह अपने को इस मामले से अलग कर लें। सर्वोच्च न्यायालय और बार एसोसिएशन ने स्थानीय बार एसोसिएशनों को चेतनावनी दी और कानून में अड़चन न पहुँचाने की ताकीद की। आंदोलन में भाजपा के दो मंत्री भी शामिल थे, उन्होंने जाँच सी.बी.आई. के द्वारा होने की माँग का समर्थन किया। यह अत्यंत अनुचित था, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। स्थानीय वकीलों का कार्य उनकी व्यावसायिक तथा नैतिक संहिता के खिलाफ था। अब मुकदमा शुरू हो गया है। इस बालिका को गाँववालों ने वहाँ दफन नहीं होने दिया, जहाँ परिवार के और लोग दफन हुए थे। उसको आठ कि.मी. दूर जंगल में एक बकरवाल की जमीन में दफनाया गया। दुःखी माँ-बाप, जिन्होंने गोद लिया था, इस वर्ष वे एक महीने पहले ही पहाड़ की ओर चले गए। हिंदू एकता मंच की काररवाई को किसी रूप में ठीक नहीं माना जा सकता। स्थानीय बार एसोसिएशन का रुख तो बहुत ही गलत था। वे अपने व्यवसाय और मानवीय कर्तव्यों को भूल गए। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आरोप-पत्र के दाखिले में बाधा पहुँचाने के लिए कुछ वकीलों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई है। लड़की के असली पिता ने सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि जम्मू के सांप्रदायिक वातावरण में न्याय की आशा नहीं है, अतएव मुकदमा चंडीगढ़ स्थानांतरित किया जाए। राज्य सरकार से जवाब माँगा गया है, उसके बाद न्यायालय निर्णय करेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने परिवार और उसके वकील दीपिका सिंह राजावत की सुरक्षा के निर्देश दिए हैं। देश में जगह-जगह इस बलात्कार को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। विरोधी दल तो ऐसे समय में तरह-तरह से मामला उठाकर आग में घी डालने का काम करेंगे ही। न्यायपालिका के कार्य में इस प्रकार बाधा डालना एक प्रकार से संविधान को चुनौती है। धर्म के चश्मे से अपराध को देखना सर्वथा निंदनीय है। इस प्रकरण का संज्ञान राष्ट्र संघ के सेक्रेटरी जनरल ने भी लिया है। व्यर्थ में कुछ व्यक्तियों की अदूरदर्शिता के कारण मानवीय अधिकारों के संरक्षण की दृष्टि से वे देश के चेहरे पर कालिख पोतने का काम कर रहे हैं।

इसी प्रकार उन्नाव कांड भी देश में लज्जा और विवाद का विषय बन गया है। तथ्यों के विवेचन की आवश्यकता नहीं। एक लड़की के साथ बांगरमऊ के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, उनके भाई और अन्य लोगों ने पिछले वर्ष सामूहिक बलात्कार किया, जब वह नाबालिग थी। पीडि़ता का बयान अब लखनऊ में सी.बी.आई. अदालत में दर्ज हो गया है। पीडि़ता के पिता को विधायक सेंगर के एक भाई ने बहुत मारा और पुलिस ने उसको जेल में बंद कर दिया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। दलबदल विधायक सेंगर हर राजनैतिक दल की ओर से विधायक रह चुका है। बाहुबली है और क्षेत्र में उसकी धाक है। ऐसा मालूम होता है कि स्थानीय प्रशासन ने उसके दबदबे में मामले को दबाने का काम किया। अब डॉक्टर और कुछ अधिकारी निलंबित कर दिए गए हैं। विधायक का भाई पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। विधायक की गिरफ्तारी में पुलिस आनाकानी करती रही। इसी से असंतोष बढ़ा। जगह-जगह प्रदर्शन हुए और राज्य सरकार की कटु आलोचना हुई। डी.जी.पी. और राज्य के गृह सचिव पर समाजवादी पार्टी ने विधायक सेंगर को बचाने का अभियोग लगाया है। केस सी.बी.आई. को देने के बाद आवश्यक काररवाई शुरू हो गई है। सेंगर अब हिरासत में है। कुछ और अपराधी पकडे़ गए हैं। आगे न्यायालय निर्णय करेगा, किंतु कुछ हीलाहवाली ऐसे मामले में हुई, इससे उत्तर प्रदेश सरकार की साख और प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है। इस प्रकार के आचरण से विरोधियों को भाजपा को महिला विरोधी तथा अल्पसंख्यक विरोधी बताने का मौका मिलता है। प्रधानमंत्री ने दोनों बलात्कार और हत्याकांडों की कड़ी भर्त्सना की है, उससे जनता में विश्वास पैदा होगा। उन्होंने संपूर्ण न्याय का आश्वासन दिया है। यदि प्रधानमंत्री अपनी सब व्यस्तताओं के बावजूद पहले अपनी बात कह देते तो माहौल दूसरे प्रकार का होता। दोषियों को चाहे वे किसी भी जाति के हों, किसी भी दल के हों, उनको राज्य प्रशासन से किसी प्रकार की मदद नहीं मिल सकती है। यह संदेश जनता में जाना चाहिए। राज्य की संवैधानिक शक्ति, नैतिक शक्ति के सामने चाहे कोई कितना भी बाहुबली हो, चाहे कितना भी पैसेवाला हो, मुकाबला नहीं कर सकता। अपने राजधर्म के निर्वाह करने में ही राज्य की सार्थकता है।

भ्रष्टाचार और बैंक घोटाले

एक और प्रकरण चिंता का विषय है। यह है भ्रष्टाचार का विषय, परोक्ष और अपरोक्ष रूप में। मलय्या, नीरव मोदी और चौकसी के बाद नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं। विजिलेंस कमीशन की चेतावनी के बाद भी पंजाब नेशनल बैंक ने नियमों में सुधार तथा संवेदनशील पदों पर कितने दिन किसी व्यक्ति को रखना चाहिए इत्यादि, मुद्दों की ओर ध्यान नहीं दिया। क्यों? किसी के बाहरी दबाव के कारण अथवा अधिकारियों की निष्क्रियता की वजह से अथवा राजनेताओं, बैंक अधिकारियों और निदेशक मंडल की मिलीभगत के कारण। यु.को. बैंक के पूर्व सी.ई.ओ. और अध्यक्ष कौल को करोड़ों रुपए के घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया है। प्रश्न उठता है कि इनफोर्समेंट विभाग, इनकम टैक्स विभाग, फ्रॉड ऑफिस आदि निगरानी क्यों नहीं रख रहे हैं। यही बात रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के बारे में भी कुछ हद तक कही जा सकती है। पहले एन.पी.ए. के बारे में आशा रहती थी कि कुछ अंश तो वसूल हो ही जाएगा। पिछले वर्षों में ऐसा हुआ भी। रिजर्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार वापसी में भी अब कमी ही होती जाती है। चाहे पब्लिक सेक्टर के बैंक हों अथवा प्राइवेट, दोनों ही समस्याओं से ग्रस्त हैं, अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि पब्लिक सेक्टर बैंकों का निजीकरण एक विश्वसनीय नीति है। व्यवस्था में बहुत परिवर्तन करने होंगे। अब वोडाफोन के धूत आई.सी.आई.सी. लोन ट्रांजेक्शनों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। आई.सी.आई.सी. की सीओ चंदा कोचर के पति के व्यापारिक संबंध धूत के वीडियोकॉन से हैं। ६४ करोड़ का लाभ उन्हें हुआ है। उनसे सी.बी.आई. की पूछताछ चल रही है। उनके बोर्ड के लिहाज से इसमें कोई Conflict of Interest हुआ, अभी कहा नहीं जा सकता है कि बैंक के और सी.ई.ओ. के दायित्व के बीच कोई आपसी लेन-देने हुआ है। इसकी जानकारी नहीं है।

नैतिकता एवं औचित्य का सवाल तो उठता ही है। क्या यह व्यवहार उचित था। कोचर के देवर से भी पूछताछ की गई। उन्हें सिंगापुर जाने से रोका गया। कहा जाता है, उनके पति पर भी विदेश जाने की पाबंदी है। उधर एक्सिस बैंक की सी.ई.ओ. श्रीमती शर्मा का जो कार्यकाल बढ़ाया गया था, उसे भी दिसंबर तक सीमित कर दिया गया है। इन सब बातों से बैंक व्यवस्था की साख घटती है। आर्थिक दृष्टि से इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। उधर सरकार में देखें तो एक जे.पी. अग्रवाल, जो गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे और उसके बाद डी.डी.ए. में हाउसिंग कमिशनर बने, रिश्वत लेते रँगे हाथ पकड़े गए। इसी प्रकार समाचार आया कि पाँच सौ से अधिक आई.पी.एस. अधिकारियों ने, अपनी वार्षिक प्रॉपर्टी की जो रिपोर्ट देनी पड़ती है, नहीं दी है। कुछ दिनों पहले आई.ए.एस. अधिकारियों और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस के अधिकारियों के बारे में समाचार आया था। अधिकारी इसको गंभीरता से क्यों नहीं लेते हैं? कारण कि स्वयं सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है। जो अधिकारी कोताही करते हैं, सरकार उनके विरुद्ध काररवाई नहीं करती है। इस सबमें जाति-पाँति, राजनैतिक संबंध आड़े आ जाते हैं। ऐसे में हम कैसे प्रशासनिक व्यवस्था के चुस्त और ईमानदार होने की आशा कर सकते हैं। हम स्वच्छ प्रशासन, निष्पक्षता और पारदर्शी चाहते हैं, वे केवल मौखिक जुमले बनकर रह जाते हैं। उच्च स्तर पर चाहे थोड़े ही अधिकारी दोषी हों, उनका कुप्रभाव दीर्घ दृष्टि से गहरा और व्यापक होता है।

लोक का प्रभाष

लब्ध-प्रतिष्ठित पत्रकार एवं बहुआयामी सोशल एक्टिविस्ट प्रभाष जोशी की जीवनी देखकर प्रसन्नता हुई। ‘लोक का प्रभाष’ के लेखक रमाशंकर कुशवाहा बधाई के पात्र हैं। (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली प्रकाशन) रामबहादुर राय का पुरोकथन महत्त्वपूर्ण है। वह न केवल प्रभाष जोशी के जीवन एवं कार्यशैली को उजागर करता है वरन् किस प्रकार का मार्गदर्शन एक संपूर्ण जीवनी के लेखन के लिए नए युवा लेखक को मिला, उसका भी कुछ विवेचन इसमें है। इससे लेखक के प्रयास को उल्लेखनीय सफलता मिली। प्रभाषाजी के बारे में सामग्री एकत्र करने के लिए, जहाँ जोशीजी का रहना हुआ, लेखक वहाँ गया और उनके मित्रों, सहयोगियों व जाननेवालों से साक्षात्कार के द्वारा जानकारी प्राप्त की। लेखक ने प्रभाष जोशी के अपने लेखन का भी पूरा उपयोग किया। राम बहादुर राय ने प्रभाषजी के लेखन को ‘आत्मकथ्य शैली’ की संज्ञा दी है। प्रारंभ से जब कहा जाए, जो प्रभाष जोशी के निर्माण का काल है, से लेकर अंत तक हम एक जीवंतता की झलक पाते हैं। किन-किन समस्याओं से प्रभाषजी को गुजरना पड़ा, किन-किन नेताओं और वे विशिष्ट व्यक्तियों के संपर्क में आए, किन महत्त्वपूर्ण घटनाओं में किस प्रकार की भूमिका जोशीजी की रही और उनकी कैसी प्रतिक्रियाएँ रहीं, इन सब पर पुस्तक प्रकाश डालती है। इस प्रकार लेखक प्रभाष जोशी के सजीव व्यक्तित्व व कृतित्व को बड़ी रोचकता से प्रस्तुत करता है। कुशवाहा कृत प्रभाष जोशी की जीवनी समकालीन भारतीय इतिहास को समझने में भी सहायक है। पुस्तक पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, बहुत कुछ राजनेताओं के बंद मानसिक वातायन को खोलने का काम कर सकती है। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और जनपुस्तकालयों में इसे समुचित स्थान मिलना चाहिए। कुछ आश्चर्य ही है कि प्रभाषजी की जीवनी की जैसी चर्चा होनी चाहिए थी, वह देखने में नहीं आई।

मैं हिंदू क्यों हूँ?

इन दिनों देश में जो विचार-विमर्श, जो प्रायः विवाद का भी रूप ले लेता है कि ‘आइडिया ऑफ इंडिया क्या है,’ अर्थात् जब हम भारत की बात करते हैं तो हमारी किस प्रकार के भारत की अवधारणा है। इसी से मिला-जुला सवाल हिंदुइज्म और हिंदुत्व का है। इस पृष्ठभूमि में शशि थरूर ने अपनी पुस्तक ‘व्हाई आई एम ए हिंदू’ (मैं हिंदू क्यों हूँ) का प्रणयन किया है। एक लंबे फलक पर विषय के विवेचन की चेष्टा थरूर ने की है। प्रकाशन है रूपा, दिल्ली। प्रारंभ में उन्होंने हिंदुइज्म क्या है, कैसे हिंदू धर्म में उनका विश्वास है, उसकी विविधिता एवं उदारता की चर्चा की है। थरूर का कहना सही है कि हिंदुइज्म एक सभ्यता है, कोई मत नहीं है। उसमें अपधर्म जैसा कोई विचार नहीं है। अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार हर हिंदू अपने ईश्वर की कल्पना करता है। वे चारों वेदों, उपनिषदों और पुराणों का जिक्र करते हैं। शंकर और आचार्यों के अवदान का जिक्र है। भक्ति आंदोलन की चर्चा है। हिंदुइज्म को ब्रिटिश शासन की प्रतिक्रिया और उसके उपरांत राम मोहन राय, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, स्वामी दयानंद का उल्लेख है, साथ ही ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन तथा आर्यसमाज की चर्चा है। प्रथम भाग कुल मिलाकर हिंदू धर्म, आस्थाओं, रीति-रिवाज आदि से संबंधित है। पुस्तक का दूसरा भाग, जिसे उन्होंने पालिटिकल या राजनैतिक हिंदूवाद कहा है। वहाँ उनके अपने व्यक्तिगत विचार हैं, राजनैतिक दृष्टिकोण और कांग्रेस का नजरिए का दिग्दर्शन है। वीर सावरकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, डॉ. हेडगेवार, गोलवलकरजी के विचारों को उन्होंने अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है, जहाँ बहुत से पाठकों का विरोध होना स्वाभाविक है। उसी में भारतीय जनता पार्टी तथा राम जन्मभूमि आंदोलन भी आ जाते हैं। नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना है कि वह देश के उन नेताओं के ‘प्रोप्रिएट’ अपने में शामिल करने की कोशिश करती है, यद्यपि उनका भाजपा की विचारधारा से संबंध नहीं है। यह एक विवादास्पद विषय है। अपने-अपने विचार हैं, अपने-अपने दृष्टिकोण, उनको समझने की जरूरत है। पुस्तक रोचक ढंग से लिखी गई है और लेखक के अपने दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। एक पठनीय पुस्तक है। हिंदू धर्म या हिंदुइज्म एक गतिशील और परिवर्तनशील धर्म है, संकुचित संप्रदाय नहीं। समय के साथ उसमें परंपरा और आधुनिकता के सामंजस्य की अद्भुत क्षमता है।

 

 

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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