प्रयाग से रामेश्वरम्

प्रयाग से रामेश्वरम्

वाल्मीकि रामायण के कतिपय विलक्षण प्रसंगों में राम द्वारा अगाध-असीम महासागर पर सुदृढ़ सेतु का निर्माण और अपने आराध्य भगवान् शिव के रामेश्वर स्वरूप की स्थापना उनके अद्भुत पराक्रम का परिचायक होने के नाते मुझे सदैव आश्चर्यचकित करते रहे हैं। युवावस्था से ही उस विशाल सेतु-बंध, जिसका अधिकांश भाग काल के प्रवाह में टूटकर सिंधु-गर्भ में समा चुका है, को देखने और रामेश्वरम् भगवान् शंकर के प्रयाग की त्रिवेणी के जल से अभिषेक करने की प्रबल इच्छा थी, साथ ही दक्षिण भारत के अन्य प्रसिद्ध तीर्थों व विशाल मंदिरों के वास्तुशिल्प को देखने की भी। मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हुई २०१५ के अक्तूबर महीने के प्रथम सप्ताह में। सहयात्री थे अवधी के श्रेष्ठ गीत कवि मित्र श्री रामलखन शुक्ल और गीतकार भाई प्रद्युम्न नाथ तिवारी ‘करुणेश’। ‘करुणेश’ के कारण यात्रावधि छोटी करनी पड़ी, मात्र ८ दिनों में जाना और दर्शन करके वापस लौटना, क्योंकि उनका आवास (महादेवीजी द्वारा स्थापित साहित्यकार संसद् भवन) श्मशान से लगा हुआ और कलयुगी राक्षसों से घिरा हुआ है। उसे लंबे समय तक पत्नी के भरोसे छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।

२९-३० सितंबर को रात २ बजे हम लोग एर्नाकुलम एक्सप्रेस में बैठे। लगभग ३३ घंटों की लंबी यात्रा के बाद पहला पड़ाव तिरुपति में था, जहाँ हम लोग पहली अक्तूबर को प्रातः ११ बजे पहुँच गए। अभीष्ट था तिरुपति बालाजी का दर्शन। जीवन में प्रथम बार ऐसा होनेवाला था कि भगवान् के दर्शनार्थ टिकट लेना पड़ रहा हो, किंतु ऐसा हो नहीं पाया। ज्ञात हुआ कि दो अक्तूबर तक के टिकट बिक चुके हैं। टिकट काउंटर पर ही टिकट-विक्रेता ने मुझे दर्शन का विकल्प सुझाया। वहीं यह भी पता चला कि मुफ्त दर्शनवालों को पंक्तिबद्ध होकर मंदिर-द्वार तक पहुँचने में १०-१२ घंटे लग जाते हैं। भगवान् का यह स्वर्ण मंदिर पर्वत पर स्थित है—यह जानकर मन प्रसन्न हो गया। वन-पर्वत, पर्वतीय झरने, नदी, समुद्र सदा से ही मेरे आकर्षण का केंद्र रहे हैं। जब भी अवसर मिला है, इन्हें देखने, इनकी प्राकृतिक सुषमा को अनिमेष निहारने का लोभ-सँवरण मुझसे कभी न हो सका है।

उत्तराखंड के वनों और पर्वतों की शोभा का क्या कहना! देखो, देखते ही रह जाओ, घूमना शुरू करो, घूमते रह जाओ। न शरीर थकता है, न ही आँखें तृप्त होती हैं। और मन, यह तो मंत्रमुग्ध सा झूमने लगता है। प्रकृति ने जो अकूत वैभव अपने प्रिय कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्म-स्थली कौसानी की सघन श्याम वनराजि को प्रदान किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। वर्ष १९७० की एक घटना आज तक स्मृति में बनी हुई है, तनिक धूमिल नहीं हुई। मैं अपनी ऑडिट-टीम के साथ अल्मोड़ा के एक होटल में चाय पी रहा था। वहीं लखनऊ के तीन कवि-मित्र मिल गए, जो आकाशवाणी लखनऊ द्वारा आयोजित एक कवि-सम्मेलन में भाग लेने कौसानी जा रहे थे। उन्होंने मुझसे कौसानी चलने का आग्रह किया, मैं टाल नहीं पाया। ऑडिट अफसर को सूचित कर उनके साथ पहुँच गया कौसानी, कोसी के तटवर्ती अनार और बुरूँश के रक्त पुष्प लदे वृक्षों को निहारते हुए। बस को छोड़ पैदल जाते समय एक अंग्रेज दंपती मिल गए, दोनों हिंदी नहीं जानते थे, अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ा। पति कौसानी के उत्तरी पार्श्व में स्थिति सघन देवदार वनों की ओर उँगली के संकेत से बताने लगा कि उसने विश्व के लगभग हर देश के प्राकृतिक स्थलों को देखा है, किंतु वनों-पर्वतों का ऐसा नयनाभिराम वैभव किसी भी देश को सुलभ नहीं है।

तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए हम लोगों के पास मात्र दो अक्तूबर का दिन था। अगले दिन चैन्नई और वहाँ से कन्याकुमारी पहुँचना था। दर्शन की कोई युक्ति समझ में नहीं आ रही थी, क्योंकि टिकट नहीं प्राप्त हो पाया था। असमंजस की स्थिति में मन में उधेड़बुन चल रही थी, तभी कौंध गई अंधे कवि मिल्टन की पंक्ति—‘ञ्जद्धद्ग4 ड्डद्यह्यश ह्यद्गह्म्1द्ग 2द्धश शठ्ठद्य4 ह्यह्लड्डठ्ठस्र 2ड्डद्बह्ल. मैंने मंदिर के द्वार पर जाकर मत्था टेककर वापस आने का प्रस्ताव रखा, इसे सभी ने स्वीकार लिया।

मंदिर पहाड़ पर है, सुनते ही बाँछें खिल गईं। सोचा, अधिक-से-अधिक आध-पौने घंटे मे पहुँच जाएँगे। मंदिर न्यास की बस में बैठे। बस ने ज्यों ही पहाड़ चढ़ना शुरू किया, लगा जैसे मसूरी या नैनीताल जा रहे हैं। वैसी ही साफ -सुथरी बलखाती सर्पिल सड़कें, वैसे ही रस्सीनुमा मोड़, जगह-जगह सावधानी के संकेत। हाँ, यहाँ के पार्श्ववर्ती वनों में उत्तरांचल के वनों जैसी सघन हरीतिमा नहीं थी, न ही चीड़, देवदार, बाँस जैसे लंबे-चिकने वृक्ष थे। यहाँ के लोगों में कुमाऊँनी-गढ़वाली लोगों जैसी देवदारीय ऋजुता या सरलता भी नहीं थी। उनकी कन्नड़ तो जैसे कोंचती थी। किसी भी चीज के बारे में जानने की उत्कंठा को दबा लेना पड़ता था। संवाद का संकट था। कभी तो ऐसा लगता कि जैसे हिंदी समझते हुए भी यहाँ के लोग कुछ बताना नहीं चाहते थे।

तिरुपतिमाला (शहर) से तिरुपति बालाजी (मंदिर) की दो घंटे की यात्रा बड़ी सुखद रही। बस के साथ मेरा मन भी पहाड़ चढ़ रहा था। बादल घिर आए थे। कुछ घाटी में टहल रहे थे, कुछ हमारे साथ चल रहे थे। जगह-जगह सर्पिल मोड़। आँतें कभी दाएँ, कभी बाएँ चक्राकार घूम रही थीं। अंततः हम लोग पहुँच गए दुनिया के सबसे धनी मंदिर के परिक्षेत्र में। पहाड़ को डायनामाइट से तोड़कर इतनी अधिक भूमि हासिल कर ली गई थी कि वहाँ पर एक छोटा सा नगर ही बस गया था, जहाँ पैसा फेंको, हर तरह की सुविधा प्राप्त कर लो। सफाई व्यवस्था ऐसी चुस्त कि कहीं कोई दोना या कागज का टुकड़ा गिराने पर सफाई कर्मचारी उसे तुरंत उठाकर अपने कंधे में लटक रहे कनस्तर में डाल लेते।

मंदिर के विस्तृत परिक्षेत्र में हम लोग लगभग आधे घंटे तक भटकते रहे, किसी ने मंदिर का सही रास्ता नहीं बताया। जहाँ देखो, दर्शनार्थियों की पंक्ति, किंतु मंदिर किस दिशा में है, उनमें से किसी को भी पता नहीं था। अंत में किराए की एक जीप लेनी पड़ी। ड्राइवर ने १० मिनट में मंदिर की देहरी के निकट पहुँचा दिया। हम लोग मत्था टेककर बस स्टॉप लौट रहे थे। देखा, निःशुल्क दर्शनार्थियों की लंबी कतारें। धुर देहात से गठरियाँ व कंधे पर बच्चे लादे स्त्री-पुरुषों की भीड़। क्षण भर के लिए मन में भाव आया कि हाड़तोड़ मेहनत से अर्जित अपने खून-पसीने की कमाई से कुछ-न-कुछ चढ़ावा अपने इस सोने के भगवान् को अर्पित करने की लालसा लिये इन गरीबों पर भी यदि भगवान् की थोड़ी कृपा बरस जाती तो इनकी गरीबी दूर हो जाती और किसान आत्महत्या करने को विवश न होते।

पहली अक्तूबर की रात तिरुपति के एक होटल में बिताने के बाद हम लोग बस द्वारा चैन्नई के लिए चल पड़े। बादल घिरे थे, रुक-रुककर हलकी बूँदाबाँदी भी हो जाती थी, हवा नम थी। मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र वाली उमस के विपरीत यहाँ का मौसम सुहाना था। सड़क के पश्चिमी ओर लगभग दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर पर्वत-शृंखला ने जो हरियाली से ढकी थी, आँखों को सुखद अनुभूति दे रही थी। सड़क के दाएँ-बाएँ खेतों में धान की रोपाई हो रही थी, कहीं-कहीं हल चलाकर रोपाई के लिए खेत तैयार किए जा रहे थे। जैसे-जैसे चैन्नई पास आ रहा था, धान के खेतों का स्थान नारियल व केले के विस्तृत बाग लेते जा रहे थे। नारिकेल व कदली के कुंजों से छनकर आनेवाली ठंडी हवा स्पर्श-सुख प्रदान कर रही थी। चैन्नई में ही सहयात्री शुक्लजी के समधी का बेटा, जो इंजीनियर था, ड्यूटी छोड़कर हम लोगों को लेने के लिए बस अड्डे पर हाजिर था। लगभग तीन दिनों के बाद उसके यहाँ घर के भोजन का स्वाद मिला, मन प्रसन्न हो गया। इंजीनियर के एक वर्ष के बेटे ने अपनी बाल-क्रीड़ा से ट्रेन-बस की यात्रा की सारी थकान ही दूर कर दी। भोजन करते समय घुटुरूवन आकर उसका मेरी थाली के पास बैठना, रोटी का टुकड़ा मुँह में लिये हुए माँ के पास रसोई में भागना, वहाँ से किवाड़ पकड़कर खड़े-खड़े लड़खड़ाते हुए पुनः मेरे पीछे जाकर कुरते की कॉलर पकड़कर झकझोरने लगना, भोजन के बाद अपनी टॉय मोटरसाइकिल लिए हुए मुझे चाभी भरने को देना, दौड़ती मोटरसाइकिल देखकर खिलखिलाकर हँसना, आज तक उसकी स्मृतियाँ मानसपटल पर अंकित हैं। शैशव भी कितना अलमस्त होता है, वह सिर्फ प्यार का भूखा होता है। अपनी गीत-पंक्तियाँ, ‘जिसने प्यार परोसा, ये उसके हो जाते हैं/ जिसने आँख दिखाई, उससे आँख चुराते हैं/ तन चंदन, मन चंदन, गंध-पिटारे लगते हैं/ बच्चे मन के सच्चे कितने प्यारे लगते हैं’—सहसा कौंध जाती हैं।

चैन्नई से कन्याकुमारी, वहाँ से मदुरई, मदुरई में मीनाक्षी देवी के दर्शन के बाद सीधे अपने असली गंतव्य रामेश्वरम् जाना था, जहाँ भगवान् शिव के जलाभिषेक के लिए हम लोगों ने २८ सितंबर को ही तीर्थराज प्रयाग की पावन त्रिवेणी का जल सहेजकर झोले में रख लिया था। दो अक्तूबर को शाम ५ बजे प्रारंभ हुई ट्रेन द्वारा कन्याकुमारी की यात्रा। यात्रा रात की थी। शाम से ही मन ऊब रहा था। यदा-कदा जब ऐसी उदासी घेरती है तो मैं कभी शुक्लजी से तो कभी करुणेश से गीत सुनाने का आग्रह करता हूँ। दोनों के स्वरों में माधुर्य है। करुणेश गीत सुनाने लगे, अगल-बगल व ऊपर की बर्थ से लोग आकर नीचे बैठ गए। गीत समाप्त होने पर कई लोग गीत-संग्रह मोल ले लेते हैं। करुणेश अपने गीतों के कई संग्रह बैग में रखकर चलते हैं।

रात के नौ बज रहे थे। बेयरा खाने की तीन थालियाँ रखकर चला गया। शुक्लजी ट्रेन का भोजन नहीं लेते, फल-फूल खाकर सफर काट लेते हैं। उनके हिस्से की थाली भी करुणेश की भूख को तृप्त करने के लिए अपर्याप्त थी। मैंने प्लास्टिक की थाली में रखी तीन रजतवर्णी प्लेटों का आवरण हटाया। एक में चार निवालों के दो कृशकाय पराँठे, दूसरी में चार निवाले भर चावल और तीसरी में सात-आठ चम्मच भर दाल। मुश्किल से दस रुपए का भोजन और देने पडे़ चालीस रुपए। मैंने रेल मंत्री को दिल से धन्यवाद दिया। आखिर ठेके पर भोजन-आपूर्ति करनेवालों से इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है? वे यात्री को चालीस का भोजन उपलब्ध कराएँगे तो मंत्रीजी को क्या देंगे? खाना खाने के बाद खुद को नींद के हवाले करना था। बाहर हलकी बूँदाबाँदी हो रही थी, हवा नम थी, इसलिए नींद जल्दी आ गई। मुश्किल से दो घंटे सोये होंगे कि खुली खिड़की से आ रही बौछारों ने नींद में खलल डाल दिया। नींद उचटी तो घंटों नहीं लगी। मन में देश का दक्षिणी सीमांत और सीमांत पर तीन सागरों का संगम लहराने लगा। इस संगम-तट पर बसी प्राचीनतम नगरी (कन्याकुमारी) के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होने जा रहा था, जिसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसी सागर-तट पर पराशक्ति ने कन्या-वेश में तपस्या की थी, इसीलिए कालांतर में इसका नाम कन्याकुमारी पड़ गया।

इस पराशक्ति का माहात्म्य ही नरेंद्र (विवेकानंद) को कोलकाता से इतनी दूर खींच लाया। कहते हैं कि नरेंद्र लगभग दो किलोमीटर तक तैरकर एक विशाल चट्टान तक आए और यहीं पर तीन दिनों तक निराहार रहकर तपस्या की। उन्हें इसी स्थल पर देवी का साक्षात्कार हुआ। उसी चट्टान पर विवेकानंदजी की विशाल प्रतिमा है, जिसे रामकृष्ण मिशन और विश्व हिंदू परिषद् के सौजन्य से एक मंदिर का स्वरूप दे दिया गया। मंदिर के तीन तल हैं—ऊपरी तल पर विवेकानंद की विशाल प्रस्तर-प्रतिमा है, मध्य तल पर देवी कन्याकुमारी के उभरे हुए युगल चरण-चिह्न हैं और निम्न तल पर आराधना कक्ष है, जिसकी उत्तरी दीवार पर रुपहले वर्ण में ‘ऊँ’ उत्कीर्णित है, जिससे निरंतर ओंकार-ध्वनि निकलती रहती है। यहाँ अद्भुत शांति का साम्राज्य है। थोड़ी देर बैठकर ध्यानपूर्वक ‘ऊँ’ जाप करने से मन पवित्र हो गया। उठने की इच्छा ही नहीं हो रही थी, जैसे उतनी देर के लिए मैं निर्वेद की स्थिति में पहुँच गया।

विवेकानंद-स्मारक से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक दूसरे शिलाखंड पर तमिल के सुविख्यात भक्तकवि तिरुवल्लुवर की ३० फीट ऊँची प्रस्तर-प्रतिमा है। यदि इस भक्तकवि के हाथ में पुस्तक की जगह तलवार होती तो दर्शक इसे शिवाजी कहने की भूल कर बैठते। एक के अनंतर एक हहराती-गरजती सिंधु लहरों का इन चट्टानों से निरंतर जूझना, टकराना और टूटना, किंतु उनपर अपने संघर्ष का अमिट लेख लिखते जाना, जीवन से थके-हारे आदमी के लिए उत्साहवर्धक संदेश है।

जनश्रुति है कि कन्याकुमारी में ही देवी कन्याकुमारी ने त्रिलोकजयी बाणासुर का वध किया था। बाण-तीर्थ इसका प्रमाण है। मंदिर से प्राप्त पुस्तिका में एक जगह उल्लेख है कि परशुरामजी ने यहीं पर सर्वप्रथम ‘कन्या का आलय’ नाम से देवी कन्याकुमारी को प्रतिष्ठापित किया था। कालांतर में किसी राजा ने यहीं पर भव्य मंदिर बनवा दिया।

दोनों स्मारकों को देखते, घूमते-टहलते, शंख-सीपियाँ बटोरते दिन ढलने को आ गया। तभी एक विशाल रेला भागता-पराता सागर-तट पर जमा हो गया, दिन भर जलते-तपते सूरज को अरब सागर में डुबकी लगाते देखने (सूर्यास्त-दर्शन) के लिए। थोड़ी देर तक बादलों में लुका-छिपी करता हुआ सूरज अंततः प्रगट हो जाता है और हम लोग ताँबई क्षितिज पर टँगे उस अग्नि-गोलक को जल-समाधि लेते हुए देखने में सफल हो जाते हैं।

आज का दिन सार्थक रहा, सोचकर संतोष हुआ।

होटल में रात्रि-विश्राम। सुबह ‘हिंदू’ अखबार में प्रथम पृष्ठ पर ही एक बड़ी खबर—‘व्यापारी ने साढ़े तीन करोड़ का सोना तिरुपति भगवान् के पद-पाद में अर्पित किया।’ सोचा, सोने के भगवान् की स्वर्ण-संपदा में थोड़ी और वृद्धि हो गई। प्रथम पृष्ठ पर ही एक और बड़ी खबर, ‘आंध्र प्रदेश में भीषण बाढ़ से ६५ लोगों की मृत्यु और हजारों गाँव जलमग्न, लाखों लोग बेघर-बार।’ प्रदेश के एक भाग में स्वर्ण-वृष्टि और दूसरे में प्रलयंकारी जल-उपल-वृष्टि—लाखों लोगों के आवास और फसलों को मटियामेट करनेवाली। काश! व्यंकटेश भगवान् के स्वर्ण-भंडार की निरंतर श्री-वृद्धि करनेवाले धन-कुबेरों के धन का शतांश भी इन बाढ़-पीडि़तों की सहायता में खर्च हो पाता! यदि ऐसा होता तो आंध्र और कर्नाटक के लाखों किसान आत्महत्या करने को विवश न होते, न ही गरीब वनवासी नक्सलपंथ अपनाने को।

अखबार अभी हाथ में ही था कि करुणेश ने हाँका लगाया— ‘जल्दी कीजिए, सूर्योदय होने में ज्यादा विलंब नहीं है। देर होगी तो सूर्योदय नहीं देख पाएँगे।’ तुरंत होटल से निकल पड़े, बाहर देखा, लोग बेतहाशा समुद्र की ओर भागे जा रहे हैं। वहाँ पहुँचते-पहुँचते तट पर एक विशाल मेला जुट गया था। कॉफी, नाश्ते, खिलौने, गुब्बारे, शंख-सीपी, असली-नकली मोतियों की मालाएँ—सबकुछ उपलब्ध था उस मेले में। जगह-जगह कैमरे साधे हुए लोग; सभी की निगाहें विवेकानंद और तिरुवल्लुवर स्मारकों के मध्यभाग में, जहाँ जल से प्रगट होना था उस आलोक-मधुर बालारुण को। किंतु अरब सागर की ओर से बादलों का एक बड़ा टुकड़ा आकर वहीं ठहर गया। पूर्वी क्षितिज की अरुणिमा श्याम हो गई और इसी के साथ सूर्योदय-दर्शनार्थियों की उम्मीदें भी धुँधला गईं। बीच-बीच में एक काले विशाल घनखंड के पीछे से झाँकने का यत्न करती किरणें अपने अस्तित्व का बोध तो कराती हैं, किंतु उम्मीदों की धुंध हटाने में सफल नहीं हो पातीं। हजारों निगाहें जिसकी प्रतीक्षा कर रही थीं, वह अंततः प्रगट तो हुआ, किंतु जल से नहीं, बादल से, स्वर्णाभा के साथ नहीं रजताभा के साथ; समय से नहीं, समय के आधे घंटे बाद।

हम लोग सिंधु-तट से होटल आए। बिखरे हुए सामान अटैची व बैग के हवाले कर नटराज टूरिस्ट सेंटर पहुँचे, जहाँ एक दिन पूर्व, यानी कल ही मदुरई चलने की बात तय हो गई थी। अब बस-यात्रा दो चरणों में पूरी करनी थी, कन्याकुमारी से मदुरई और वहाँ से रामेश्वरम्। बस वाले ने पूरे पैसे जमा करा लिये थे। इसलिए उसपर कोई दबाव भी नहीं बना पा रहे थे। सुबह आठ बजे छूटनेवाली बस ग्यारह बजे छूटी। मदुराई पहुँचते-पहुँचते रात के आठ बज गए। मदुरई में बसवाले ने मीनाक्षी मंदिर के पास ही ठहरने की व्यवस्था कर दी। जल्दी ही दर्शन कर लेना था और क्योंकि मंदिर का कपाट नौ बजे तक बंद हो जाता है। हाथ-पाँव धोए और कपड़े बदलकर भागे। लगभग दौड़ते हुए मंदिर पहुँचे। मंदिर के चतुर्दिक् १५ फीट ऊँची सुरक्षा प्राचीर, चारों दिशाओं में एक-एक विशाल द्वार। एक द्वार से भीतर गए, लगभग २०० श्रद्धालु पहले से ही पंक्तिबद्ध खड़े थे। हम तीनों भी पंक्ति में लग गए। लगभग आधे घंटे बाद देवी-दर्शन का सौभाग्य मिला। इस आधे घंटे में मंदिर के अंतर्प्राचीरों पर स्थापित नारी व पुरुष-प्रतिमाओं का जो शिल्प-सौंदर्य देखा तो देखते ही रह गए। पुरुष-मूर्तियों की सुगठित देह, स्फीत वक्ष, सुदृढ़ संतुलित भुजाएँ, भुजाओं पर मांसपेशियों का उभार, पुष्ट स्कंध—सबकुछ अद्भुत! नारी-प्रतिमाएँ तो और भी सुंदर; देखकर आँखें ठगी रह गईं। बहुत पहले पढ़ी गई विदेशी लेखिका स्ट्रेला कैमरिश की पुस्तक ‘इंडियन आर्ट’ का सहसा स्मरण हो आया। पुस्तक के आरंभ में ही एक घटना का उल्लेख है। एलोरा के शिव-मंदिर के शिल्प-सौंदर्य पर स्वयं उसका मूर्तिकार इतना मुग्ध हो गया कि उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि इसे उसने बनाया है। एकदम ठगा-ठगा-सा, घंटों निहारता रहा। अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि इसे उसने नहीं, किसी और ने बनाया है। वस्तुतः ऐसा देखा गया है कि विलक्षण कलाकृतियों की रचना किसी कलाकार की व्यक्ति-सत्ता द्वारा संभव ही नहीं है। उत्कृष्ट सृजनकर्म मन की नितांत निर्वैयक्तिक अवस्था में ही संभव है और यह उस मनोदशा में संपन्न होता है तो अहंकार के पूर्व की स्थिति होती है। यहाँ ‘स्व’ तिरोभूत हो जाता है। ऐसी ही भाव-दशा में ऋषि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की होगी। एक आखेटक द्वारा रति-क्रीड़ारत क्रौंच का वध होता है। ऋषि का मन इतना विषण्ण, शोकाभिभूत हो जाता है कि वह अपनी व्यक्तिसत्ता भूल जाता है, बुद्धि का चैतन्यमय स्तर जाग्रत् हो जाता है और हृदयोच्छ्वास स्वतः शाप के रूप में फूट पड़ता है श्लोक बनकर—

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वामगमः शाश्वती समाः।

यत्क्रौंच मिथुनादेकं वधीः काममोहितम॥

अब सामने था यात्रा का अंतिम चरण। मदुरई से रामेश्वरम्—तीन समुद्रों की संगम-स्थली। मन के भीतर असीम सागर हिलोरें लेने लगा, साथ ही यह प्रश्न भी उठने लगा कि हहराती-गरजती, व्यालों सी फन फैलाए, फेन उगलती उत्ताल लहरों पर राम ने कैसे किया होगा ऐसे सुदृढ़ सेतु का निर्माण? क्या महासागर के अनंत विस्तार और अगाध जलराशि को देखकर उनका मन तनिक भी विचलित न हुआ होगा? कार्य दुष्कर था, किंतु राम जैसे कर्मयोगी पुरुषार्थी के लिए असंभव नहीं था। राम केवल पराक्रमी ही नहीं थे, वे राजनीति के भी पंडित थे। वे सुग्रीव और हनुमान से नहीं, शत्रु के भाई विभीषण से मंत्रणा करते हैं। उसकी राय मानकर समुद्र से रास्ता देने की प्रार्थना करते हैं, किंतु अहंकारी समुद्र प्रार्थना ठुकरा देता है। रक्तांत लोचन राम को तेवर तिरछा करना पड़ता है—‘अद्य त्वां शोषयिष्यामि सपातालं महार्णव।’ नीतिज्ञ राम भलीभाँति जानते हैं कि साम द्वारा इस लोक में न तो कीर्ति प्राप्त होती है और न ही युद्ध में विजय। वे अग्नि बाण का संधान करते हैं। अहंकार पुरुषार्थ के समक्ष स्वर्ण-थाल में मणियों और रत्नों के साथ नतशीश होकर उपस्थित हो जाता है। राम जानते हैं कि सेतु-निर्माण जैसा महान् कार्य प्रारंभ करने के पूर्व भगवान् शंकर की कृपा परमावश्यक है, क्योंकि जिस रावण के वध का उन्होंने संकल्प लिया है, वह भी उन्हीं का भक्त है। रावण को अपनी शक्ति का ही नहीं, अपनी भक्ति का भी अहंकार है। वह जब अपने आराध्य भगवान् शंकर को शीश काट-काटकर चढ़ाता था, उसके मुख पर दर्प मिश्रित अहंकार स्पष्ट दिखाई देता था। राम विनयावनत होकर हृदय की संपूर्ण श्रद्धा से पहले शिवलिंग की स्थापना करते हैं, तदनंतर प्रारंभ करते हैं सेतु-निर्माण-कार्य।

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बस रामेश्वरम् मंदिर की ओर द्रुत गति से भागी जा रही है। चालक बताता है कि सिर्फ आधे घंटे में बस वहाँ पहँुच जाएगी। जिधर दृष्टि जाती है, समुद्र-ही-समुद्र। सड़क के समानांतर रेल-पथ भी हैं, कोई रेलगाड़ी गुजर रही है। ऐसा आभास होता है कि यह छोटी नगरी किसी द्वीप पर बसी है। सड़क के दोनों तरफ  मछुवारों की बस्ती है। घर के नाम पर नारियल के पत्तों के झोंपड़े, झोंपड़ों के पास सूखती मछलियों की ढेरी। हवा में मत्स्य-गंध घुल गई है। सभी नाक पर रूमाल बाँध लेते हैं। मछुवारों के अर्धनग्न काले बच्चों की देह पर फटे-चिथड़े देखकर मन भीग जाता है। इन्हीं दरिद्र-नारायणों की दयनीय दशा देखकर स्वामी विवेकानंदजी आवेशित हो गए थे, आवेश में ही बोल पड़े, ‘मेरा ऐसे भगवान् से कुछ लेना-देना नहीं, जो भूखे को रोटी और नंगे को वस्त्र नही दे सकता।’ इसी तमिलनाडु में कभी लाखों पैरिया आदिवासी धर्म बदलकर हिंदू से ईसाई बन गए थे। ब्राह्मण उनकी छाया के छू जाने पर स्नान करते थे। व्यवस्था का आदेश था कि वे कमर में घंटी बाँधकर तथा पीछे झाड़ू लटकाकर चलें, ताकि उनके अपवित्र पद-चिह्न मिटते जाएँ। इतना ही नहीं, वे मुख्य मार्ग से इतनी दूरी बनाकर चलें कि उनकी छाया तक मार्ग पर न पड़ सके। ब्राह्मणों के कुत्सित आचरण को देखकर स्वामीजी ने क्रोधावेश में यहाँ तक कह दिया कि ‘छुआछूत पंथियों के ऐसे घृणित आचरण पर मार झाड़ू, मार लात।’ सड़क के पूरब में बनी चर्च देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इन गरीब मत्स्यभोजी मछुवारों ने इस घोर अपमान से तंग आकर ही ईसाई धर्म स्वीकार किया होगा।

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बस जिसे ११ बजे पहुँचना था, पहुँची १२ बजे। मंदिर का कपाट एक बजे बंद हो जाता है। हम लोग सुबह से निराहार थे। प्रयाग का त्रिवेणी-जल रामेश्वर भगवान् शिव को श्रद्धापूर्वक चढ़ाने के बाद ही अन्न-ग्रहण करने का संकल्प लिया था। बस लेट होने से वही मदुरई वाली आपाधापी शुरू हुई। बस-स्टॉप पर मिले पंडा महाराज के निर्देशानुसार हम लोग दौड़ते हुए समुद्र-तट पर आए। मंदिर में प्रवेश-पूर्व समुद्र-स्नान आवश्यक था। धोती-कुरता बस में ही छूट गया। ऐसी धर्मसंकट की स्थिति में हाथ-पाँव धोकर और जल छिड़ककर पवित्र मान लेने के अलावा हम लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। पंडाजी के साथ लगभग दौड़ते हुए मंदिर में आए। प्रवेश करते ही मंदिर-परिक्षेत्र स्थित २४ कुओं के जल से स्नान करना आवश्यक था। इस कार्य के लिए प्रत्येक कुएँ पर एक व्यक्ति तैनात था, जो बाल्टी से जल खींचकर स्नान कराता था। यह औपचारिकता भी पूरी हो गई। तदनंतर साथ चल रहे पंडा ने एक वयोवृद्ध पुजारी को बुलाकर हम लोगों से १५१-१५१ रुपयों का संकल्प कराया। अब शुरू हुआ पंडाजी का मोल-तौल। उनकी अलग से हजार-हजार रुपयों की माँग। अनुमान यही था कि वृद्ध पुजारी को दिए गए रुपयों में से इन्होंने भी अपना हिस्सा ग्रहण कर लिया होगा, लेकिन नहीं। वे हठ कर बैठे, इधर हम लोग भी और अधिक देने को तैयार नहीं थे। पंडे ने बिना द्रव्य चुकाए जलाभिषेक न करने देने की धमकी दी। करुणेश ने क्रोधावेश में उसे अपशब्द कह दिया। वह मरकहे बैल की तरह भड़क उठा। हम लोग किंकर्तव्यविमूढ़, कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी। तभी करुणेश की प्रत्युत्पन्नमति ने हमें उबार लिया। ‘आई एम अ पुलिस ऑफिसर!’ उनके इस छोटे से झूठ ने पंडा महाराज को सद्बुद्धि दे दी और उन्होंने मौन हो जाने में ही भलाई समझी। तो भी अपने हाथ से भगवान् रामेश्वरम् का जलाभिषेक करने की अभिलाषा पूर्ण न हो सकी। हम तीनों चार मीटर दूर थे, तभी एक पुजारी ने हमारे हाथ से जल-पात्र लेकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ा दिया। परंपरा भी यही थी। हम लोग आप्तकाम हुए। मन को तो तुष्टि मिली, किंतु आँखें अपने दक्षिण भारत के अन्यान्य रमणीक स्थलों के दर्शन-सुख से वंचित रह गईं।

डी-११, पी.डब्ल्यू.डी. फ्लैट (पंजाबी कॉलोनी) अलोपी बाग,

इलाहाबाद-२११००६

दूरभाष : ०८८५३९९१२२६

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