हमारे पुरखों का फास्ट फूड : सत्तू

हमारे पुरखों का फास्ट फूड : सत्तू

अक्षय तृतीया शुभ मुहूर्त की तिथि है। इस दिन जो भी कार्य किया जाता है, वह अक्षय होता है। प्राचीनकाल से ही लोक-जीवन में यह अक्षय धान्य, अक्षय पुण्य और अक्षय कीर्ति देनेवाले कार्यों का शुभारंभ पर्व माना जाता है।

पर यह पर्व ‘सतुआखानी तीज’ के रूप में जन-जन को भोजन की चिंता और भोजन पकाने के झंझटों से अक्षय मुक्ति दिलानेवाला सुयोग बना। वह यों कि अक्षय तृतीया ‘फास्ट फूड’ सत्तू का जन्मदिन है।

भोजन पकाने के झंझटों से मुक्ति दिलानेवाला ठोस और साकार आविष्कार है ‘सत्तू’, जो साथ में बँधा हो तो मनुष्य खाने की चिंता भूलकर सौ-सौ कोस तक जा सकता है। सत्तुआ घोरकर वह किसी भी काम के पीछे पड़ सकता है, हर परिस्थिति से लड़ सकता है सतुआ बाँधकर।

इस अक्षय मुहूर्त में किसान चैत्री फसल का अनाज लीप-पोतकर स्वच्छ और कीटाणु रहित की गई खत्तियों, अड्डों और कुठिलों में भरकर सुरक्षित करता था, ताकि धान्य क्रम अक्षय रहे। बीजों की पीढि़याँ वर्षानुवर्ष अंकुरित होती रहें; इसलिए खरीफ की फसल का बीज उठाकर रखा जाता था।

खत्तियों में धान्य सुरक्षित करने के बाद किसान इसी अक्षय मुहूर्त में कृषि के लिए औजार बनवाने का लग्गा लगाता। पुराने हल, फावडे़, कुदाली की मरम्मत की तरफ ध्यान देता। नए बनवाता। कुआँ, तालाब पोखर खुदवाने, नया मकान और मंदिर बनवाने के मुहूर्त भी इसी दिन किए जाते। चारपाई बुनवाई जाती; छींके-पीढे़, तख्त, ईडोनी, पंखे, बुनने अनेक कला-कौशल के कार्यों का शुभारंभ कराया जाता। खेतों में थोड़ी-थोड़ी खाद डालकर हल भी चला दिया जाता।

लेकिन यह सब शुभारंभों की शृंखला गूँथने के पूर्व सतुआखानी तीज मनाई जाती।

सतुआ अधिकतर चैती फसल के अनाज चना और गेहूँ का बनता है। जहाँ धान रबी की फसल है, वहाँ चावल का सत्तू बनता है। बरेली की ओर सिर्फ चने भुनाकर पीसकर सत्तू बनाया जाता है। इसमें खाली घी, बूरा मिलाकर खाते हैं, यह ‘बुढ़ौर’ कहा जाता है। बुंदेलखंड और ब्रज में सूखे बेरों का भी कूट-पीसकर सत्तू बनाते हैं, जिसे ‘बिरचन’ कहते हैं। यह बहुत पौष्टिक और अग्निमांद्य का नाशक होता है।

अकती या अखैतीज के सप्ताह भर पहले ही भड़भूजों के यहाँ सतुआ भुनानेवालों की भीड़ लग जाती है। गाँव की गलियाँ भुने अनाज की सोंधी-सोंधी महक से भर जाती हैं।

सत्तू के अनेक नाम और रूप हैं। सामान्यतः सत्तू केवल जौ, जौ में चना और गेहूँ या सिर्फ चना मिलाकर उन्हें भाड़ में भुनाकर पीसकर बनाया जाता है। भुनाने से पहले सत्तू बनानेवाला अनाज पानी में भिगो देते हैं, ताकि नए अनाज की गरमी शांत हो जाए। भुना हुआ, ओखली में छरकर भुसी निकाला हुआ जौ ‘घाटि’ कहलाता है। भुने हुए जौ ‘चबैना’ भाड़ में भुने गरम-गरम गेहूँ में राब या गुड़ मिलाकर अथवा चाशनी चढ़ाकर ‘गुड़धानी’ बनाई जाती है। बच्चों के लिए मुरमुरे और ज्वार-मक्का के फूले बनाए जाते हैं। गरमियों के पहाड़ से दिन-दोपहरी में श्रमिक वर्ग के घरों में ये सभी चीजें बच्चे, बूढे़, जवान सभी के लिए थोड़ा खाकर पानी पीने का आधार हैं।

अक्षय तृतीया से भगवान् बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलते हैं, अतः घर-घर में अखैतीज को सुबह गुड़ के पानी में सत्तू घोलकर बदरीनाथ भगवान् को भोग लगाया जाता है। पहले किसी कन्या को सत्तू खाने को देते हैं। इसके बाद अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार समस्त श्रमिक वर्ग को पसेरी भर से लेकर कटोरा भर तक सत्तू और भेली से लेकर पाव-आधा पाव की डली तक गुड़ देने की प्रथा है। इसके बाद कृषक परिवार सत्तू खाता है। यदि अखैतीज को कोई अतिथि-अभ्यागत आ जाए तो इस दिन उसका आतिथ्य भी सत्तू से ही होता है।

आयुर्वेद के अनुसार ग्रीष्मकाल में सत्तू आदर्श आहार है। यह नए आए अनाज से उत्पन्न उष्णताजन्य बीमारियाँ नहीं देता। सत्तू पित्तशामक, शीघ्र पचनेवाला, हलका और पौष्टिक आहार है। गरमियों में सत्तू खाने से प्यास कम लगती है। गुड़ में घोलकर खाया गया सत्तू लू से बचाता है। दही या छाछ में मिलाकर खाने पर सत्तू अतिसार में लाभ पहुँचाता है।

ऋग्वैदिक युग में सत्तू को ‘करंभ’ कहा जाता था। उस काल में सत्तू केवल जौ का ही भून-पीसकर बनाया जाता था। महाराष्ट्र में तो जौ को आज भी सत्तू कहा जाता है। महाभारत युद्ध तक सत्तू राजा-प्रजा दोनों का प्रिय भोजन था। वैदिक आर्यों को ही नहीं, उनके देवताओं को भी करंभ अतिप्रिय था। ऋग्वेद की कई ऋचाओं में देवताओं को करंभ अर्पित करने का उल्लेख आया है।

महाभारत की विराट् युद्धभूमि में घी में जौ भूनकर, पीसकर बनाया गया करंभ ही युवा सैनिकों और द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे वृद्ध सेनापतियों का आहार था। महाभारत के योद्धा वैदिक आर्यों के सदृश्य सत्तू में दही, शहद, दूध, पानी, एक बार में एक, अलग-अलग या कभी इच्छानुसार थोड़ी-थाड़ी सारी चीजें मिलाकर खाते थे। शल्यराज को तो सत्तू बहुत ही प्रिय था।

आजकल गाँवों में सत्तू गुड़, नमक या राब (शीरा गुड़) डालकर खाया जाता है।

पर राजा-प्रजा और देवताओं का यह प्रिय सत्तू कीमा, कबाब, कोरमा, बिरयानी की मुगलशाही भोजन संस्कृति के बोलबालेवाले मध्ययुग में शाही दस्तरखान से अपदस्थ होकर किसान, मजदूर और जनसाधारण का भोजन बनकर रह गया। जो सत्तू कभी देवताओं को अर्पित होता था, उसे किसी मेहमान को खाने के लिए देना अतिथि का अनादर बन गया। दसवीं-बाहरवीं सदी के लोक महाकाव्य ‘महादेव विवाह’ में शुक्र-शनिचर शिवजी से कहते हैं, ‘‘हाँ-हाँ, खूब आतिथ्य किया हमारा तुम्हारी सास मैना ने। हमें तो उसने सत्तू खिला दिये हैं, तुम्हारे लिए दलिया बनाकर रखा है। जाओ, जल्दी पहुँचो खाने के लिए।’’

सत्तू मात्र भोजन ही नहीं, एक पूरी संस्कृति है। सर्वहारा वर्ग, किसान-मजदूरों, जन सामान्य की संस्कृति में सत्तू अनथक कर्मठता का मुहावरा है। सतुआ घोलना कला है, कोई ऐसा-वैसा कार्य नहीं। सत्तू बाँधकर, सतुआ घोरकर ही किसी जमाने में बेटी के लिए वर ढूँढ़ने जैसे कठिन कार्य पार पड़ते थे।

इसीलिए जनसाधारण ने तुरंत भूख मिटाने की क्षमता रखनेवाले इस सहज-सुलभ भोजन को नमक की डली और गुड़ की डेली के साथ अपनी गठरी-मोटरी में रोटी-रोजी और दूर-दराज की तलाश-प्रवासों में बाँधे ही रखा। एक भरोसेमंद साथी की तरह साथ रखा, बिना जोरू जाते के घर भी मटकी में भरे ही रखा। जीविका की खोज में कलकत्ता गए बिहारी मजदूरों का तो अभिधान ही है सत्तू। कलकत्ता का भद्रलोक उन्हें ‘सत्तूखोर’ कहकर ही पुकारता है, पहचानता है।

सत्तू ने तो रंधैन है, न पकवान। अतः भोज्य पदार्थों में सत्तू का मान घरजँवाई जैसा है। घरजँवाई को जैसे घर के छोटे-से-छोटे कार्य करने पड़ते हैं, वैसे ही सत्तू को सर्वहारा की भूख मिटानी होती है।

दो साढ़ू भाइयों की कहानी में दूर गाँव से आए अपनी सास के जमाई अपने साढ़ू भाई को घर जमाई अपनी सतुआ जैसी स्थिति बता ही तो देता है—

‘‘पहलैं तो ए वासुदेव! अब भये बसुआ, कंधा पै पाम चरिके चढि़ गई ससुआ तुम तो खाईं खीर-पूरी हम खाए सतुआ।’’

कुछ भी हो, पर सत्तू अपने समय का सुपर फास्ट फूड था। किसी अच्छी विज्ञापन कंपनी की निगाह अब भी अगर उसपर पड़ जाए, कोई अच्छी एजेंसी चलानेवाला मिल जाए तो सत्तू के सोए भाग्य जग सकते हैं। कोई सुपर हिट अभिनेत्री अगर सत्तू का विज्ञापन कर दे तो आज भी वह अपना खोया गौरव फिर से पा सकता है।

आज के धीमे विष की तरह असर करनेवाले प्रिजरवेटिवों से युक्त डिब्बाबंद भोज्य पदार्थों की तुलना में सत्तू उत्तम फास्ट फूड है। इसका उपयोग अधिक सुरक्षित, कम खर्चीला, पोषक और सहज-सरल है। सत्तू का भंडारण बिना झंझट का है। सत्तू से क्या-क्या नहीं बनाया जा सकता?

प्राचीन समय में नाई ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल सभी के विज्ञापन में प्रवीण होते थे। तब का विज्ञापन विभाग इन्हीं के हाथों में था। सत्तू के बारे में एक ब्राह्मण देवता छत्तीसाजी नाई की विज्ञापन कला के हाथों मात खा गए।

बात इस तरह है कि अपने यजमान की बेटी के लिए दोनों ही साथ-साथ वर ढूँढ़ने निकले थे। अब पंडितजी की पंडितानी ने साथ में बाँधा था सत्तू और नाई की नात्रों गोरली को शायद नहीं मिला था वक्त तो नाई ले लाया था धान।

भोजन के समय दोनों ने एक-दूसरे से पूछा कि आप खाने के लिए क्या लाए हैं?

ब्राह्मण की सत्तू लाने की बात सुनकर नाई के मुँह में पानी आ गया। वह किसी तरह ब्राह्मण से सत्तू हथियाने की सोचने लगा। विचित्र सा मुँह बनाकर बोला, ‘अरे पंडितजी, सत्तू लाए हैं आप! उसमें तो कितनी झंझटें हैं, सुनिए—

सत्तू मन भत्तू, भिजोए, भिजाए

सुखाए-भुजाए, फिर कहूँ छरे-छराए

तब पीसे फिर छाने, फिर घारे तब खाए।

बाप रे! मैं तो लाया हूँ धान, बेचारे सीधे-सादे हैं, उनका क्या? धान बिचारे धरि लिये कूटे-काटे छरि लिये।’

बस, ब्राह्मण नाई की विज्ञापन-पटुता के जाल में फँस गया। उसे सत्तू दे दिया। नाई तुरंत घोलकर खा गया। बेचारे ब्राह्मण देवता गाँव की गलियों में अपनी चावल की पोटली लिये उसे पकाने का आग्रह करते घर-घर घूमते रह गए।

देखा आपने, विज्ञापन का कमाल! आज ही नहीं, उस युग में भी गजब की मार करता था।

देखना है, सत्तू का यह डाउन सीजन कब तक चलता है?

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१०३४/१ मॉडल कॉलोनी, कैनाल रोड

पुणे-४११०१६ (महाराष्ट्र)

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