डॉ. बलदेव वंशी : बातें-मुलाकातें

डॉ. बलदेव वंशी : बातें-मुलाकातें

‘‘संसार की समस्त तोपें, बंदूकें और अस्त्र

मेरी विचारधारा और संकल्प के रास्ते में

कदापि नहीं आ सकते, जब तक माँ सरस्वती

का वरदान मेरी ‘कलम’ मेरे हाथ में है।’’

यह पंक्तियाँ चेतनावादी कवि डॉ. बलेदव वंशी की हैं, जो अब इस लोक में नहीं रहे। ८ जनवरी, २०१८ को एक मित्र लक्ष्मण बिष्ट का फरीदाबाद से फोन आता है, ‘‘भैयाजी नमस्ते, आपको एक दुखद समाचार देना है।’’

‘‘नमस्ते जी, कहो, क्या हुआ?’’

‘‘गुरुजी, बलदेव वंशी नहीं रहे।’’

‘‘क्या...कब...कैसे...?’’ उन्होंने कहा, ‘‘अभी केवल इतना ही पता चला है।’’ मैंने गुरुजी (वंशीजी) वाले नंबर पर ही फोन मिलाया। फोन लक्ष्य (वंशीजी का पोता) ने उठाया। मैंने पूछा, ‘‘यह सब कैसे हुआ?’’ उन्होंने बताया, ‘‘हाँ भैयाजी, गुरुजी को कल हार्ट अटैक आ गया। डॉक्टरों ने काफी प्रयास किया, लेकिन बचा नहीं पाए।’’ मुझे बहुत पीड़ा हुई और यह मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति भी थी। वंशीजी से मेरी पहली मुलाकात २२ जनवरी, २०१२ को हुई। उस दौरान मैं गुरुकुल काँगड़ी, हरिद्वार में ‘हिंदी पत्रकारिता को अज्ञेय का अवदान’ विषय पर शोध कर रहा था। तब मुझे लगा कि डॉ. बलदेव वंशी हिंदी के बड़े कवि हैं। ये अज्ञेय और उनके पत्र-पत्रिकाओं के बारे में अच्छी और प्रामाणिक जानकारी दे सकते हैं। मैंने फोन पर अनुमति माँगी और अपना आशय बताया। वंशीजी ने सहर्ष अनुमति दे दी। मैं तय समय पर उनका साक्षात्कार लेने फरीदाबाद पहुँच गया। वे बहुत ही स्नेह और आत्मीयता से मिले। खूब आतिथ्य-सत्कार किया। घर-परिवार की बातें हुईं और उन्होंने मेरी सभी जिज्ञासाओं का सही ढंग से समाधान किया। तब बातों-बातों में वंशीजी ने बताया कि ‘‘हम विचार कविता के कवि हैं, जो समकालीन है। समकालीन कविता अग्नि की लपटों पर बैठे कवि की वाणी है। एक श्रेष्ठ साहित्यकार के बुनियादी सरोकार क्या होते हैं, जानते हो? राष्ट्रीयता, जातीय स्मृति की पहचान, सांस्कृतिक बोध, समूचे विश्व के प्रति संवेदनशीलता, आस्थावान और निरंतर बदले प्रगतिशील मूल्यों का रक्षण-पोषण ही बुनियादी सरोकार हैं।’’ इस पहली मुलाकात से मुझे बहुत ही सुखद अहसास हुआ। किसी भी साहित्यिक व्यक्तित्व से यह मेरी पहली भेंट थी। इसके बाद बातों-मुलाकातों का सिलसिला गति पकड़ गया।

इसी ४ जनवरी को डॉ. बलदेव वंशीजी से आखिरी बातचीत हुई। इन छह वर्षों में मुझे उनके बहुत करीब रहने का अवसर मिला। मैं बीसियों बार उनसे मिला। भारतीय संस्कृति, परंपरा, संत साहित्य, संत संस्कृति, बदलता समाज, मूल्य रहित राजनीति और पत्रकारिता को लेकर काफी बातचीत होती थी, जिसे मैं फोन पर रिकॉर्ड कर लेता था। जितनी बार उनसे मिला, हर बार नया ज्ञान और अनुभव की ऊर्जा लेकर लौटा। इन मुलाकातों में वंशीजी ने अपने बचपन, अन्य साहित्यकारों, राजनेताओं, भाषा आंदोलन के बारे में संस्मरण सुनाए। उस दिन साक्षात्कार लेकर चलते हुए मैंने अपनी डायरी हस्ताक्षर के लिए उनके सामने की तो हँसते हुए कहने लगे, ‘‘अरे बेटा! जब पूरा बलदेव वंशी ही तुम्हारे साथ है, तो हस्ताक्षर में क्या है।’’ फिर उन्होंने हस्ताक्षर सहित अपना आशीर्वाद दिया।

संतहृदयी डॉ. बलदेव वंशी का जन्म १ जून, १९३८ को मुलतान शहर (पाकिस्तान) में रहनेवाले भसीन परिवार में हुआ। आठ-नौ वर्ष की अवस्था में ही विस्थापन के कारण उन्हें रिफ्यूजी कैंपों में रहना पड़ा। एक दिन मैंने बातों-बातों में उनकी इस दुखती रग को छू लिया तो बड़े ही भावुक होकर बताने लगे, ‘‘मेरे बचपन में मौज-मस्ती या तथाकथित सुख-सुविधाओं का कोई स्थान नहीं रहा। सात-आठ भाइयों में मैं सबसे बड़ा था। पिता को पेट का रोग (प्लुरसी) हो गया। तब मैं बाल मजदूर रहा। कहीं एक रुपया तो कहीं सवा रुपए में मैंने फावड़ा-कुदाल लेकर नालियाँ खोदीं, अखबार बेचे, लोहा गरम करनेवाली भट्ठी पर पंखा चलाया। ये बातें १९५० के आस-पास की हैं, जब मैं केवल १२ वर्ष का था। मैंने कुएँ से पानी निकालकर दो बाल्टियों को एक बाँस की बाही पर बाँधकर कंधे पर रखकर तीन-चार फर्लांग दूर श्रमिकों को पानी पिलाने का कठिन कार्य किया। तब मेरे पैरों में लकड़ी की आधी घिसी हुई खड़ाऊ होती थी, जिसमें मेरी एड़ी तपती रेत में जलती थी।’’ बताते-बताते वंशीजी रुक गए। थोड़ा सँभलकर फिर बताने लगे, ‘‘हाँ, फिर पत्नी और बड़े बेटे का देहांत हो गया। मेरे पास दो बच्चे और रह गए, तब माँ बनकर अपने दायित्व का निर्वाह किया। मैंने मुखर तो नहीं, पर शायद मन-ही-मन कहा, बच्चो, आज से तुम्हारा पिता नहीं रहा।’ तब मैंने माँ की तरह उनका पालन-पोषण किया और पिता की तरह कभी डाँटा नहीं। ‘सतत लपटों पर स्थित मेरा आत्म मुझे अशांत और संघर्षशील बनाए रखता है’, यह मेरा यर्थाथ और आत्मानुभूत सत्य है।’’ वंशीजी का यह आत्मकथ्य डॉ. महीप सिंह ने ‘संचेतना’ में भी प्रकाशित किया था। आत्मकथ्य के इस कॉलम में महत्त्वपूर्ण लेखकों के जीवन संघर्ष, उनकी प्रेरणा, सरोकार, चिंतन दृष्टि आदि कई पक्ष होते थे। फिर वंशीजी ‘धर्मयुग’ में ‘वाद्य’ नाम से प्रकाशित कविता सुनाते हुए उसका भाव भी स्पष्ट करते हैं—‘अभी हूँ मैं तार-तार कसा, पोर-पोर बँधा!/तुम मुझे अपनी झन्नाहट भरी उँगलियों से छुओ-बजाओ/अपनी मौन धुन में सजाओ/ताकि मुक्त हो मैं तुम्हें गाऊँ।’ वंशीजी इस कविता में परम चेतना (तुम) संबोधित करते हुए अपनी स्थितियाँ बताते हैं।

डॉ. बलदेव वंशीजी की कविताएँ अपने परिवेश से गहराई से जुड़ती हैं। इनमें मनुष्य, प्रकृति, समाज, भूगोल, संस्कृति और वैश्विक प्रगतिशील मूल्यों का उत्स है। संघर्ष के साथ संवेदना और स्पंदन है। ‘दर्शकदीर्घा से’ (१९७०) वंशीजी का पहला काव्य-संग्रह है। ‘उपनगर में वापसी’ इनकी पहली लंबी कविता है। ‘अँधेरे के बावजूद’, ‘बच्चे की दुनिया’, ‘कहीं कोई आवाज नहीं’, ‘हवा में खिलखिलाती लौ’, ‘नदी पर खुलता द्वार’, ‘इतिहास में आग’, ‘पत्थर पर जाग रहे हैं’ और ‘चाक पर चढ़ी माटी’ आदि प्रमुख काव्य-संग्रह हैं। पेड़, चिडि़या, बीज, सागर, मिट्टी, पत्थर इनके प्रिय बिंब और प्रतीक हैं। इनके अलावा ‘आत्मदान’ (१९८३), ‘मन्नु’ (१९९२), ‘वाक्गंगा’ (१९९२) पौराणिक मिथकों को लेकर लिखे गए बहुत ही महत्त्वपूर्ण खंडकाव्य हैं। ३१ अक्तूबर, २०१२ को मैं वंशीजी के साथ साहित्य अकादेमी के सभागार में था, जब डॉ. रमेश कुंतल मेघ, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, डॉ. महीप सिंह, डॉ. हरदयाल, राजेंद्र उपाध्याय और कृष्णदत्त पालीवाल (संपादक) ने ‘बलदेव वंशी : कविता समग्र’ (तीन भाग) का लोकार्पण किया और संगोष्ठी हुई।

प्रकृति-दोहन, पर्यावरण-प्रदूषण, जीव-जंतुओं के प्रति हिंसा, बच्चों व नारी के प्रति अमानवीयता, जल, हवा, मिट्टी आदि का विषाक्त होना आदि को लेकर वंशीजी बहुत चिंतित और संवेदनशील थे। वंशीजी बताते हैं कि ‘‘मनुष्यों की तरह प्रकृति का भी अपना संविधान है, जिसमें मनुष्य सहित पशु, पक्षी, पेड़, पौधे, नदी, पहाड़, झरने, समुद्र आदि सभी उस संविधान के घटक हैं और ये सभी अपने-अपने संकेंद्रकों द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक के प्रति हुई हिंसा से प्रकृति में असंतुलन बिगड़ने लगता है।’’ ‘धरती की प्यास’, ‘अग्निदूत’, ‘निष्ठा में पेड़’, ‘पत्थर तक जाग रहे हैं’ आदि अनेक कविताओं का रसास्वादन मैंने मुख से सुनकर किया है। वे कहते हैं, ‘न! पत्थरों को ऐसे मत छुओ/कि ये सचमुच पत्थर हों और तुम इनसे बेहतर-इनसान! इनके वजूद को हथेली पर उठा यों मत उछालो हवा में क्योंकि अब तुम्हारे फर्श संगमरमरी हो आए हैं और बार-बार चुक जाना तुम्हारी आदत।’ कविता-पाठ के समय उनके चेहरे का तेज, आँख, होंठ, हाथ आदि सभी शब्दानुकूल भाव-अर्थ प्रकट करते हैं और इससे वंशीजी को मन में उत्साह-उमंग, देह में नव ऊर्जा और आत्मा में आनंद की अनुभूति होती थी। एक बार मैंने कहा, ‘‘गुरुजी, मुझे मंच से अपनी कविता सुनानी है। श्री अजय कुमार शुक्ल स्मृति (२०१३) में आक्षित लैंगवेज सर्विस वालों ने बुलाया है, पर मैंने आज तक कविता-पाठ नहीं किया।’’ तब उन्होंने खुशी-खुशी मेरी चयनित कविता ‘अंतिम अभिलाषा’ को सुना और कैसे बोलना है, इसका दसियों बार अभ्यास कराया। इतने बड़े कवि के पास बैठकर कविता सुनना और सुनाने की अद्भुत एवं मधुर स्मृति मेरे हृदय में संचित है।

एक बार बैठे-बैठे वंशीजी ने पूछा, ‘‘अशोक! अच्छा यह बताओ कि हमारी कविता में प्रकृति के विभिन्न रूप हैं, पर्यावरण के प्रति चेतना है, मूल्य खंडित समाज है, ओछी और खोखली राजनीति है, भूखा, नंगा बचपन है, बंदी नारी की तड़प आदि ये समकालीनता के विचार तत्त्व हैं। तुम हमारी कविता को क्या नाम देना चाहोगे?’’ मैंने कहा, ‘‘समकालीन युगबोध या वैचारिक चेतनावादी।’’

‘‘न, केवल चेतनावादी कविता!’’ वंशीजी ने कहा। उनका वैचारिक फलक अति विस्तृत और वैश्विक है। संपूर्ण मानव समाज और राष्ट्र उनकी दृष्टि के वृत्त में है। उनका काव्य-कर्म और भाव सौंदर्य का समन्वय है। वे एक सच्चे साहित्यकार के बुनियादी सरोकार आत्मसात् किए हुए हैं। उनकी कविताएँ मिशाल नहीं, बल्कि मिसाइल की तरह अपने लक्ष्य का भेद न करती हुई गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। श्रम-निष्ठा, लगन, संकल्प, अनुभव और ज्ञान चेतना के बल पर वे समकालीन कविता में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। राममनोहर लोहिया का समाजवाद उन्हें खूब प्रभावित करता है था, और वे मानते थे कि वर्तमान की सभी समस्याओं का समाधान लोहिया के चिंतन द्वारा किया जा सकता है। वे ओशो के संन्यासी बने और उनकी पुस्तक ‘पतंजलि योग सूत्र’ भाग-२ की भूमिका लिखी। संत साहित्य उन्हें बहुत आकृष्ट और प्रभावित करता है। संत साहित्य पर जितना काम उन्होंने किया, आज तक नहीं किया गया था। उन्होंने ‘भारतीय संत परंपरा’, ‘भारतीय मुसलिम संत परंपरा’ और ‘नारी संत परंपरा’ पुस्तकें प्रकाश में लाकर ऋषिकर्म का बेजोड़ कार्य किया है।

उन्होंने कबीर, दादू, मलूकदास, मीरा और मुसलिम संतों पर खूब लिखा और इनके वाणी-संदेशों का संपादन किया। अनेक संतों के जीवन चरित्र व वाणी को बालोपयोगी बनाकर सरल भाषा में प्रस्तुत करने का उपयोगी और श्रमसाध्य कार्य किया। संत साहित्य अकादेमी की स्थापना करना भी एक नई पहल है। वे इस संस्था के माध्यम से विभिन्न स्तरों पर कुछ अलग कार्य करनेवालों का सम्मान करते थे। यह संस्था प्रतिवर्ष सम्मेलन करती है। वंशीजी ने मुझे हर बार बुलाया, पर मैं केवल दूसरे और तीसरे सम्मेलन में ही जा पाया। वंशीजी स्पष्ट कहा करते थे, ‘‘वर्तमान का भौतिक विकास अधूरा और पंगु है। इस विकास को आध्यात्मिक या आत्मिक विकास से जोड़कर पूर्ण किया जा सकता है। वर्तमान में भय, आतंक, भुखमरी, गरीबी, शोषण, प्रकृति-प्रदूषण, सांप्रदायिक हिंसा इसी अधूरे विकास का परिणाम है। विश्वशांति और मानवीय विकास के लिए पूरे विश्वसमाज को भारतीय संस्कृति के संत-दर्शन की ओर आना पड़ेगा। संतमत के आधार पर ही इन वैश्विक समस्याओं का सम्यक् समाधान किया जा सकता है। इसी दर्शन में प्रकृति और पर्यावरण के रक्षण-पोषण के बीजतत्त्व हैं।’’

८ दिसंबर, २०१२ को गुरुजी के साथ हुई बैठक में भी भारतीय संस्कृति, संत साहित्य और प्रकृति पर्यावरण के त्रिकोण पर बहुत ही सार्थक बातचीत हुई, जिसे मैंने अपने मोबाइल मे रिकॉर्ड किया। वंशीजी ने आध्यात्मिकता का अर्थ, संत और भगत में अंतर, नर-नारायण का संबंध और संतों के जीवन के अद्भुत-अलौकिक प्रसंग सुनाए। बीच-बीच में किसी संत का कोई दोहा सुनाकर अपनी बात को प्रमाणित करने की भी उनमें अद्भुत क्षमता थी।

वंशीजी सांस्कृतिक स्मृति के कवि और समकालीन परिवेश के अद्भुत चितेरे हैं। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी सृजना के मूल तत्त्व हैं। इसी संदर्भ में वंशीजी एक दिन बताने लगे कि ‘मार्क्सवादी हमें देखकर अधिक खुश नहीं होते, लेकिन जो प्रबुद्ध मार्क्सवादी चिंतक हैं, वे हमारा सम्मान करते हैं। हमें अच्छा कवि मानते हैं। हम भी उनका सम्मान करते हैं। हमने देश के सर्वोच्च मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रमेश कुंतल मेघ के निर्देशन में पी-एच.डी. की है। जनवादी लेखक संगठन के प्रमुख शिवकुमार मिश्र उनके भाई के बेटे हैं। उन्होंने हमारे ऊपर खूब अच्छा लिखा और छापा। रमेश कुंतल मेघ ने ‘समुद्र से उठता पहाड़’ नामक एक काव्य संकलन तैयार किया और उसमें हमारी कविताएँ शामिल की हैं। हम किसी खेमेबाजी में शामिल नहीं हुए।’’ वे मातृभाषा को सेवा, संस्कार, सृजन और शिक्षा का श्रेष्ठ माध्यम मानते थे। भारतीय भाषाएँ ही शिक्षा, न्याय व रोजगार का माध्यम बनें, इस कार्य हेतु अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के संस्थापक अध्यक्ष बने। पुष्पेंद्र चौहान, राजकरण सिंह, हीरालाल, विघ्नेश्वर पांडे, श्योचंद्र निर्वण इस संगठन के सक्रिय भाषाई योद्धा थे। संगठन का उद्देश्य १८ जनवरी, १९६८ का संसदीय संकल्प लागू करवाना था। उनके नेतृत्व में इस संगठन ने धरना-प्रदर्शन, क्रमिक अनशन और आमरण अनशन की कार्यविधि अपनाई। यह विश्व का सबसे लंबा धरना था, जो संघ लोकसेवा आयोग के मुख्य द्वार पर चला। वे दो बार साथियों सहित जेल में भी गए। उनके आग्रह, प्रभाव और कार्य शैली से अनेक पत्रकार, साहित्यकार और राजनेता इससे जुड़ते चले गए। भाषा आंदोलन के विषय में वंशीजी बताते हैं, ‘‘इसमें हमारे साथ प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, मृणाल पांडे, भानुप्रताप शुक्ल, वेद प्रताप वैदिक, विद्यानिवास मिश्र, लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, महीप सिंह, राजेंद्र यादव आदि अनेक लोग जुड़ते चले गए।’’

भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए वंशीजी ने ‘भारतीय भाषाएँ लाओ देश बचाओ’, ‘भाषा समस्या : संपादकीयों की फटकार’ और ‘भारतीय भाषाओं की एकता’ तीन पुस्तकों का संपादन किया, जिसमें विभिन्न विद्वानों के बहुत ही ज्वलंत विचार हैं। इनका संपादन बहुत ही सराहनीय और रचनात्मक कार्य था। इसके साथ ‘विचार कविता’ त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया और अनेक विशेषांक निकाले, जिनमें ‘काला इतिहास’, ‘युवा कविता : नए हस्ताक्षर’, ‘बच्चे की दुनिया’, ‘आधी दुनिया का जलता संविधान’, ‘कविता महानगर’, ‘परिवार कविता’, ‘संबोधित कविता’, ‘प्रकृति कविता और विज्ञानबोध कविता’ आदि अति महत्त्वपूर्ण विशेषांक हैं। उन्होंने अपने समकालीनों, अनुजों, अग्रजों और दिवंगतों सभी को ‘विचार कविता’ में लाकर सम्मान दिया है। इसके साथ प्रकृति, पर्यावरण, विज्ञान, बाल एवं नारी विमर्श पर बड़ी संजीदगी से लिखा और आग्रहपूर्वक लिखवाया।

शमशेर बहादुर सिंह ने वंशीजी के बारे में बहुत ही सार्थक टिप्पणी की है—‘‘आप कवि रूप में काफी आगे आगे आए हैं। उपलब्धियाँ तो हर कवि के पास होती हैं, मगर मूल्यवान उपलब्धियों का ही मूल्य होता है।’’ ७ जनवरी, २०१८ को डॉ. बलदेव वंशी का यों अचानक चले जाना साहित्यिक जगत् के लिए बहुत बड़ी क्षति है। ‘‘बाग में सैर करते/आज अचानक/एक पेड़ के नीचे पाँव ठिठके/मैं उसके नीचे रुका/आँख भर पेड़ को देखा/उसके आगे झुका/फिर बोला, पेड़ मुझे शक्ति दो/अपने जैसा धैर्य दो, भक्ति दो/और कहकर गहरा हुआ मौन/.../रक्त सनी धरती में लाकर बो गया!/लो, अब मैं भी पेड़ हो गया।’’ इन पंक्तियों के साथ मैं उनके स्नेह-सहयोग को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।

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