अपने मोहल्ले के लोग

अपने मोहल्ले के लोग

हमारा खयाल है कि हर मोहल्ले में आधा दर्जन कवि, एकाध दार्शनिक, दस-बारह अदद झंझटी, चंद समाजसेवक और कुछ चुप्पे जरूर बसते हैं। इस विचार के पीछे अपना मोहल्ले का भोगा हुआ यथार्थ है। देश की तर्ज पर हमारा शहर भी पूरी तरह विकसित न होकर विकासशील है। यानी यहाँ मॉल और ठेलेवालों का सुखद सहअस्तित्व है। बायोमेट्रिक हाजिरी भी है और बाबुओं का भ्रष्टाचार भी। तभी तो मोहल्ले को कृतार्थ करते चतुर्थ श्रेणी के अधिकारी, अर्थात् राम प्रसादजी सरकार के हर दफ्तर के संपर्क-सूत्र हैं।

बस उनके वक्त की कीमत है, वह भी प्रतीक के बतौर। उनकी स्वीकारोक्ति है कि वे यह वसूली विवशता के नाते करते हैं, वरना लोग उनका जीना मुहाल कर दें। भुक्तभोगियों का अनुभव है कि रामप्रसाद फीस लेकर व्यक्ति को संबद्ध कार्यालय के अफसर तक पहुँचाने में समर्थ हैं। उसके बाद उनके वहाँ के समकक्ष का जिम्मा है, मिलवाने आदि का। जैसे रेल में सफर की दो पटरियाँ हैं, वैसे ही देश में समय की। एक पटरी उन्नीसवीं सदी की है, दूसरी इक्कीसवीं की। मुल्क की ट्रेन इन्हीं बेमेल पटरियों पर यात्रा कर विकास की ओर अग्रसर है। कोई नहीं जानता कि इस बारे में विकास की क्या प्रतिक्रिया है? उन्नीसवीं सदी की मानसिकता के अनुसार माई-बाप सरकार की घुसपैठ जीवन के हर क्षेत्र में है। वर्तमान जैसे कार्यालय के हैं, वैसे ही अस्पताल के। सबके अपने-अपने बिचौलिये हैं। इनकी मदद के बिना किसी भी सरकारी संस्थान में प्रवेश नामुमकिन है। दीगर है कि इसके पश्चात् भी काम होना या जान बचना नियति पर निर्भर है। कुछ की मान्यता है कि सरकारी अस्पताल मरघट की यात्रा के वैसे ही लाजिमी पड़ाव हैं, जैसे सर्वव्याप्त दफ्तर करप्शन के।

आलम यह है कि एक दफ्तर शराब रोकने का है, तो दूसरा उसे बेचने का। सरकार अपनी आमदनी के लिए दारू बेचती है और गांधी बाबा की आत्मा की शांति के लिए मद्यनिषेध की नीति अपनाती है। रावण के कुल जमा दस सिर थे, सरकार के न जाने कितने हैं? ठेके का लाइसेंस बेचना उसका व्यापारी अवतार है और मद्यनिषेध का प्रचार जन-कल्याणी। आश्चर्य का विषय है! विरोधी शासक-दल की हर नीति की भर्त्सना करते हैं और सत्ता पाकर उसी का अनुपालन। सरकार में इतने विरोधाभास कि उनका पता लगाने के लिए उसे कुछ शोधार्थियों को अनुदान देना चाहिए। शायद तब वह स्वयं के विभिन्न चेहरों से परिचित हो सके। सबसे रोचक स्थिति भारतीय बाबू की है। निजी जीवन में दहेज लेने, पत्नी को प्रताडि़त करने से लेकर मुफ्तखोरी तक के हर अपराध वह करता है, जबकि सार्वजनिक रूप से इन्हीं को रोकना उसका दायित्व है।

उपरोक्त निष्कर्ष मोहल्ले के झंझटियों का है। इसके लिए उन्होंने रामप्रसाद से बहस के दौरान कुछ तथ्य उगलवाए हैं, कुछ अपने जानकारों के माध्यम से। यों कुछ झंझटी सरकार में भी हैं। जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करना उनका स्वभाव है। दीगर है कि उन्होंने दफ्तर में हाजिरी लगाने के अलावा किसी सरकारी काम की जहमत नहीं उठाई है। इस कारण शासकीय गतिविधियों के विषय में उनके लिए दूसरों की सहायता अनिवार्य है। उनकी काहिली सूरदास की ऐसी काली कांबर है, जिस पर दूसरा रंग चढ़ने की गुंजाइश तक नहीं है। अपनी यही काहिली वह दूसरों को कार्य-कुशलता के नाम पर बाँटते रहते हैं। उनका इकलौता उपयोगी काम छिद्रान्वेषण है।

दफ्तर से लेकर घर तक उन्होंने यही किया है। मुहल्ले में उनका खौफ है। कोई भी ऐसा नहीं है, जिससे अकारण उन्होंने झगड़ा-झंझट न किया हो। लोग उनसे बचके निकलते हैं। उनकी विशेषता है कि वे किसी को बचने नहीं देते। वैसे ही जैसे शिकारी बिल्ली चूहे को। बिल्ली शिकार की जान लेती है, ये शिकार के चैन-हरण में माहिर हैं। कई सताए सिर पकड़कर बैठे पाए गए हैं। पूरा मोहल्ला प्रतीक्षारत है कि इन झंझटियों का कोई तोड़ मिले। सच्चाई कि ये बेजोड़ हैं। ऐसे जन्मजात झंझटी तभी खुश रहते हैं, जब दिन में दो-तीन झगड़े-झंझट कर लें, वरना कौन जाने उनका पेट पिराता हो या सिर? ऐसे इस तथ्य की पुष्टि अभी शेष है और शेष ही रहेगी। कौन माई का लाल है, जो झंझटियों से यह दरयाफ्त करने का जोखिम ले? ऐसे लोग यह कहकर संतोष कर लेते हैं कि इनसानी अजायबघर में किस्म-किस्म के प्राणी हैं।

मोहल्ले के समाजसेवक को हारी-बीमारी में ग्रसित हर घर से हमदर्दी है। उनकी व्यस्तताएँ हैं। मोहल्ला ही उनकी सेवा का दायरा नहीं है। पूरा शहर उनका क्षेत्र है, जो कभी-कभी पूरे सूबे तक विस्तारित हो जाता है। इसी के चलते वह बीमार के घर जाएँ, न जाएँ; कोई मरे तो वे श्मशान में जरूर पाए जाते हैं। यह घाट-सेवा उनकी समाज-सेवा का अनिवार्य अंग है। इसके अलावा वरदीवालों से उनकी निकटता जग-जाहिर है। मोहल्ले के शरीफ पुलिस से वैसे ही डरते हैं, जैसे पुलिस सफेदपोश डाकुओं से। किसी को काम पड़े तो समाजसेवक उसके साथ थाने जाने को प्रस्तुत रहते हैं।

पीडि़त महिलाओं की देखभाल के लिए उनका एन.जी.ओ. भी चलता है। समाजसेवक के घर के पास ही एक बिल्डिंग है। इसी में उनका दफ्तर और परित्यक्ता महिला-आश्रम भी है। प्रारंभ में कंधे पर झोला डाले समाजसेवक मोहल्ले में टहलते नजर आते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि दो पैरों की सवारी से लेकर स्कूटर पर ही सवारी करते थे। मोहल्ले के लोगों का विश्वास है कि परित्यक्ता महिलाओं की सेवा ने उनकी किस्मत खोल दी है। अब उनके दफ्तर में खासी चहल-पहल रहती है। महिलाओं-पुरुषों के सतत आगमन के कारण उनको एक सहायक रखना पड़ा है। अब वे केवल चुनिंदा लोगों को ही दर्शन देते हैं।

समाजसेवक के असली ठाठ और रुतबे का प्रदर्शन चुनाव के समय होता है। हर दल का प्रत्याशी उसके चक्कर काटता है। वह जैसे मधुमक्खी, जिससे सबको वोट के शहद की अपेक्षा है। मोहल्ले में अफवाह है कि वह उसी प्रत्याशी के साथ प्रचार करता है, जो उसको सबसे अधिक नकदी दे। उसके प्रचार से मोहल्ले के वोट पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। कुछ का आरोप है कि समाजसेवक बिकाऊ है। उसके कोई आदर्श या सिद्धांत नहीं हैं। थोक वोट दिलाने का वादा वह सबसे अधिक बोली लगानेवाले प्रत्याशी से करता है और आलू-भटे सा बिक जाता है। समाजसेवक के कुछ समर्थक भी हैं। उनका तर्क है कि सिद्धांतों के दिन कब के लद गए। अब हर दल का एकमात्र लक्ष्य सत्ता पाना है। इस पावन लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रत्याशी धन, ईमान, उसूल आदि सबकी कुरबानी को कटिबद्ध है। यदि समाजसेवक ने अपने सेवा-संस्थान की खातिर लक्ष्मी की बहती गंगा से कुछ चंदा वसूल ही लिया तो कौन सा जुर्म हो गया? प्रत्याशी का हो, न हो, समाजसेवक का उसूल सेवा है और वह उसी में लगन और समर्पण से लगा है।

इधर उसके सेवा-संस्थान में किसी महिला की शिकायत पर पुलिस की रेड हुई और उससे वहाँ चल रहे सैक्स रैकेट जैसे कई खुलासे हुए हैं। पूरे मोहल्ले का मत है कि सवाजसेवक के चारित्रिक गमले में स्वार्थ के कैक्टस उगते हैं, सेवा के गुलाब नहीं। इसका एक दुखद परिणाम है। समाजसेवकों की पूरी जमात से मोहल्ले की आस्था उठ गई है, खासकर सेवा की स्वैच्छिक संस्थाओं से। पूरे मोहल्ले को संदेह है कि जाने किन में कौन-कौन से ‘फ्रॉड’ और निजी स्वार्थ पनपते हैं।

मुहल्ले की विविधता में कवि नामक जंतु भी उपलब्ध हैं। अगर कोई मोहल्ले के पार्क में खडे़ होकर गला फाड़कर कवि-सम्मेलन की हाँक लगाए तो कुछ घरों के दरवाजे अचानक खुलेंगे और कुछ विभूतियाँ आधी जगी, कुछ खोई, कुछ सोई बाहर निकलेंगी। उन्हें यकीन है कि यदि कवि-सम्मेलन है तो मंच पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें निमंत्रित किए बगैर कवि-सम्मेलन की कल्पना तक व्यर्थ है। इसका कोई क्या करे कि सफल कवि-सम्मेलन होते रहते हैं उनके बगैर, फिर भी उन में गजब का आत्मविश्वास है या फिर इसे आत्ममुग्धता कहें? वह मन-ही-मन व्रत लेते हैं कि दफ्तर के वार्षिक कवि-सम्मेलन में बहैसियत आयोजक वह उसी बडे़ कवि को बुलाएँगे, जो ठेके पर ऐसे आयोजन करवाता है। कौन कहे, वह उनपर कृपालु हो जाए और उसे भी ठेके की टोल में शामिल कर ले? फिर उनकी प्रसिद्धि का देशव्यापी होना कोई रोक नहीं सकता है। यह भी संभव है कि इंग्लैंड-अमरीका जाकर उनपर अंतरराष्ट्रीय कवि का ठप्पा लगे।

दरअसल इधर उन्होंने दस-पंद्रह चुटकुले पत्र-पत्रिकाओं से चुराए हैं। वे बेचैन हैं उन्हें सुनाने को। कहीं किसी प्रतिद्वंद्वी के हाथ लग गए तो उन्हें फिर नयों की तलाश करनी पडे़गी। कभी-कभी उन्हें दुःख होता है कि आज काव्य के मंच पर कविता की कद्र न होकर चुटकुलों का सम्मान है। सिर्फ चुटकुलों के बल पर कई कवि तालियाँ ही नहीं बटोरते, कवि-सम्मेलन भी फतह करते हैं। कितना भी हास्यास्पद क्यों न हो, मंचीय कविता अब न गीत है, न गजल, बस चुटकुलों का पर्याय होकर रह गई है। वह समर्पित कवि है। श्रोताओं की रुचि के कारण उन्हें चुटकुले सुनाने पड़ते हैं, वरना उनके भंडार में एक-से-एक शानदार कविताएँ हैं। वह अधीरता से मंच पाने को प्रतीक्षारत हैं। कोई उन्हें बुलाए तो वे इस हद तक आतुर हैं कि अपने खर्चे पर कवि-सम्मेलन की शोभा बढ़ाने को तैयार हैं।

दुर्दशा इतनी है कि वे शादी-ब्याह से लेकर वर्षगाँठ तक पर अपना हुनर प्रस्तुत करने को मजबूर हैं। कार्यालय उन्हें हिंदी दिवस तक पर याद नहीं करते हैं। उनका अपना दफ्तर ही एक अपवाद है, जहाँ वे अधिकारियों के स्वागत-विदाई, सेवानिवृत्ति पर अपने काव्य की बानगी से भावों के पुष्प चढ़ाने को कृतसंकल्प हैं। इतना ही नहीं, हिंदी दिवस पर उनकी कविताएँ समारोह का अपने आप समापन कर देती हैं। भरा हॉल खाली हो जाता है और अध्यक्ष मन मसोसकर काव्य-पाठ से वंचित रहकर उन्हें कोसता घर लौटता है। बस यही गनीमत है कि पैसे मिल गए, वरना क्या कर लेते?

इस सबके बावजूद कवि मोहल्ले की शान है। उनके रहते मोहल्ले को संतोष है कि वे साहित्य-कला विहीन नहीं हैं। बात छोटे-बडे़ की है। मोहल्ले की पोखर में तुक्कड़ ही सही, हैं तो अपने। ऐसे भी कोई माने या न माने, कविता का जमाना अब लद चुका है। मंचों पर चुटकुले छाए हैं, नहीं तो तुक्कड़। ऐसे में मोहल्ले को इस लुप्त होती सफेद शेर जैसी प्रजाति को बचाकर रखना आवश्यक है। ऐसे भी यह एक-दूसरे की आलोचना भले कर लें, झंझटियों और समाजसेवकों के समान खतरनाक नहीं है। केवल मौके-बेमौके कविता सुनाकर बोर ही तो करते हैं, पर क्षतिपूर्ति के बतौर चाय-कॉफी भी पिलाते हैं। इनके घरों में अपेक्षाकृत शांति रहती है। बीबी लड़ने पर उतारू हो तो वे उसे कविता सुनाकर चुप ही नहीं कराते, बल्कि पत्नी स्वयं पलायन कर जाती है। उनकी कविता घरेलू अमन-चैन का प्रभावी साधन है। कई घरेलू तकरार से त्रस्त पति यह मनाने लगे हैं कि काश! वे भी कवि होते।

कुछ चुप्पे भी हैं, जो हमारे मोहल्ले की शोभा हैं। कहीं मिले और किसी ने पूछा कि ‘सब ठीक है?’ तो वे सिर्फ ‘हूँ’ करते हैं। कहना कठिन है कि आशय हूँ से हाँ है कि न? यह सुननेवाले पर निर्भर है कि वह इसका क्या अर्थ लगाए? यों ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’ चक्कर भावना का है। कोई उन्हें स्वस्थ समझता है, कोई बीमार। भारत में बातचीत के दो लोकप्रिय और प्रचलित विषय परचर्चा और पॉलिटिक्स हैं। मोहल्ले का घुन्ना इन तक पर खामोश है। कुछ कहते हैं कि वह ‘जाए न व्यापे जगत् गति’ के संकट से त्रस्त है तो कुछ को संदेह है कि वह इनसे वीतराग है। कुछ को लगता है कि एक चुप सौ मर्जों की दवा है तो कुछ को शक है कि वह कहीं पुलिस के सूचना-तंत्र का हिस्सा तो नहीं है? यह भी मुमकिन है कि वह वर्तमान वक्त की बकबक के प्रदूषण से इतना तंग है कि उसने चुप रहने की कसम खाई है। कम-से-कम एक के ध्वनि प्रदूषण से तो मोहल्ला बचे।

संभव है कि वह मौन चिंतक है, जो जगत् की चिंता करते-करते जुबान रहते भी जान-बूझकर उसका प्रयोग नहीं करता है। सबकी अपनी चिंताएँ हैं। उनको बढ़ाने से क्या फायदा? बोलने या बात करने से देश की सियासत में अब तक कुछ अंतर आया है, जो कोई भविष्य की उम्मीद रखे? पारिवारिक श्रेष्ठता हो या सरकार में शुचिता, देश की दशा जैसी थी, वैसी है और कुछ नैराश्य के निराश प्रतिनिधियों के अनुसार आगे भी ऐसी ही रहेगी। उसका परिवार चुप रहकर मोहल्ले की हर गतिविधि में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। यों इस चुप्पा परिवार के न दोस्त हैं, न दुश्मन। न उसे होली का चंदा देने से इनकार है, न ईद का। फिर भी शोर-समर्पित मोहल्ला उससे अकारण सशंकित है। कुछ की सोच कि ‘यह पुलिस का इन्फॉर्मर है’ तक तो गनीमत है, पर घुन्ने पर किसी पड़ोसी देश का खुफिया होनेका शक नाइनसाफी है। शक्ल हो या बातचीत, पड़ोसी देशों और हममें कोई बुनियादी फर्क तो नहीं है। कभी सभी एक रहे हैं। कहीं यह इसीलिए तो चुप नहीं है कि बोला तो किसी-न-किसी संदर्भ में पोल न खुल जाए? हमें पहली बार समझ में आया है कि न बोलने के कितने दुष्परिणाम हैं? चुप्पी कितनी अफवाहों को जन्म देने में सफल है?

मोहल्ले के दार्शनिक अकसर पान की दुकान पर पाए जाते हैं। उनका इतिहास रोचक है। वे कभी सरकार में मुलाजिम थे। बिना सूचना गायब रहने के अपराध में अनुशासनात्मक काररवाई के पश्चात् निकाले जाने पर कोर्ट चले गए। मुकदमा अभी भी लंबित है। कुल जमा दस साल ही तो हुए हैं। न्याय की जटिल प्रक्रिया की बदौलत कई फरियादी तो निर्णय के इंतजार में ‘ले लो अपनी लकुट-कमरिया’ कहते-कहते स्वर्ग सिधार जाते हैं। सरकार और न्यायालय की ‘अब मैं नाचो बहुत गोपाला’ जैसी प्रक्रिया के बावजूद ये यहीं जमे हैं। जैसे और कुछ न कर पाने की अवस्था में अफसर बिना अधिकार और काम के सलाहकार बन जाता है, वैसे ही निष्क्रियता से तंग आकर कभी के कामचोर बाबू ने दार्शनिक अवतार का वरण किया है। अब वे पास की पान की दुकान के स्थायी सदस्य और दार्शनिक हैं। वहाँ पड़ी चारपाई पर अधलेटे, लेटे या बैठे हर बातचीत में अपनी टाँग अड़ाते और दर्शन झाड़ते हैं।

एक दिन मोहल्ले की विविधता की बात चली तो उनका निष्कर्ष था—‘‘हमारा मोहल्ला शहर का ही नहीं, देश का प्रतीक है। सब तरह के लोग हैं देश में। पैसे का लोभ और उसे और पाने की लालच की प्रतिभा हमें वास्तविक भारतीय बनाती है।’’ किसी ने उन्हें हमारी सांस्कृतिक विरासत और अध्यात्म की याद दिलाई। उनका दो-टूक उत्तर था, ‘‘दुनिया के हर देश की संस्कृति और विरासत है। रहा अध्यात्म, तो भैये! कौन ऐसा मशहूर स्वामी-गुरु नहीं है, जिसका अपना महल न हो और जो मोर की आकांक्षा नहीं करता है? कितने हैं, जो अपने उपदेश पर अमल करते हैं? क्या इन्हें पता नहीं है कि जीवन नश्वर है और हम अपने को कुछ भी समझें, मात्र साये के अलावा और है ही क्या? तभी तो कवि कहता है कि ‘छाया मत छूना मन, होगा दुःख दूना मन।’

इस दार्शनिक गुरु की चर्चा के बाद देश के नागरिक, नेताओं और धर्मगुरुओं में अपनी आस्था-श्रद्धा और बढ़ गई है। जब तक पकड़ में न आएँ, हम सब सम्मानित शरीफ हैं। भविष्य का कौन जाने?

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१ (उ.प्र.)

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

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