अहंकार का आवरण

एक गाँव में एक मूर्तिकार रहता था। वह मिट्टी की अति सुंदर मूर्र्तियाँ बनाता, जो भी लोग उन मूर्तियों को देखते, वाह-वाह कर उठते! क्षेत्र में उसके हाथ के कौशल की प्रवीणता की चर्चा बनी हुई थी। मूर्तिकार की मूर्तियाँ अच्छी कीमत पर बिकती थीं; परिवार का भरण-पोषण ठीक प्रकार से चल जाता था।

उस मूर्तिकार के एक पुत्र था। मूर्तिकार पिता उसे भी अपनी। कला में प्रवीण बनाना चाहता था। अतएव पुत्र को भी सिखाना शुरू कर दिया। पुत्र ने भी मूर्ति बनाने की कला में अभिरुचि दिखाई, वह बारीकियों को समझने तथा उत्साहपूर्वक अभ्यास में मग्न रहने लगा।

पुत्र कुछ और बड़ा हुआ तो उसे अपने कार्य में अच्छी सफलता मिलने लगी। यहाँ तक कि उसकी मूर्तियाँ पिता की तुलना में ज्यादा कीमत में लोग खरीदने लगे। यह उचित भी था, एक तो सीखने की चेष्टा, दूसरे पुत्र की जन्मजात प्रतिभा क्रमानुसार निखार ला रही थी, पुत्र की प्रसिद्धि बढ़ती चली गई।

पुत्र रोज अपनी मूर्तियों को बनाकर पिता को दिखाता और फिर उसमें गुण-दोष की चर्चा करता। उनकी विक्रय-राशि दिखाता व पिता से प्रशंसा की पूर्ण अपेक्षा रखता। पिता उसकी लगन की प्रशंसा तो करते, पर साथ में जो कमी होती; उसका निवारण भी बताते।

अब रोज ही अपनी कमियाँ सुनने पर पुत्र को बुरा लगने लगा। आखिर में एक दिन झुँझलाकर उसने मूर्तिकार पिता से कह ही दिया, ‘‘पिताजी! मैं इतनी कोशिश करता हूँ, पर आप कुछ-न-कुछ कमी निकाल देते हैं। मूर्तियाँ भी आपकी मूर्तियों से मेरी ज्यादा कीमत देती हैं? फिर आप उसमें दोष क्यों निकालते हैं? हमको इसका कारण नहीं समझ में आ रहा, कभी तो अच्छाई भी देखें।’’

यह सुनकर पिता को बहुत दुःख हुआ। वह चुप ही रहा। जब पुत्र बाजार चला गया, तब भी वह दुःखी मन से लेटा रहा और भोजन भी नहीं किया।

पुत्र जब बाजार से लौटा तो उसे दुःखी पिता के बारे में सूचना मिली। पुत्र को अपने किए पर पछतावा हुआ कि उसने अपने पिता की बात का बुरा क्यों माना और बदले में तिरस्कार क्यों किया? पुत्र अपने दुःखी पिता से क्षमा माँगने गया और भोजन करने का अनुरोध किया।

मूर्तिकार पिता ने दुःखी मन से कहा, ‘‘प्रश्न यह नहीं है कि तुमने क्या कहा और मुझे कैसा लगा? सच बात तो यह है कि यदि तुम हमारी समीक्षा का बुरा मानोगे तो तुम्हारी मूर्तियों में जो सुधार की थोड़ी-बहुत कमी थी, तुम्हारी और प्रसिद्धि होने तथा और अधिक मूल्य मिलने की जो संभावना है, वह समाप्त हो जाएगी। समीक्षा ही सुधार का मार्ग प्रशस्त करती है, यदि वह बंद हो गई तो प्रगति का पथ भी रुक जाता है।’’

मूर्तिकार पिता की बात उचित थी। अहंकार के आने पर अथवा संपूर्ण पूर्णता की अनुभूति होने पर मनुष्य अपने दोष ढूँढ़ना तो दूर उन्हें बताने पर भी क्रोधी हो जाता है, फलस्वरूप उसकी प्रगति वहीं पर रुक जाती है।

पुत्र ने वास्तविकता को जाना और रोज अपनी मूर्ति-निर्माण में पिता से ही नहीं, परिचितों और ग्राहकों से भी विनम्र भाव से पूछने लगा। गलती पूछने तथा सुधारने के क्रम ने उसे अपनी कला-क्षेत्र का सर्वोत्तम मूर्तिकार बना दिया।

प्रगति जिस किसी क्षेत्र में, जिसे भी अभीष्ट हो, यही एकमात्र राजमार्ग है। चाहे आत्मसमीक्षा की जाए अथवा मार्गदर्शन माँगा जाए, प्रत्येक दृष्टि से यह रीति-नीति दूरदर्शितापूर्ण सिद्ध होती है।

८६/३२३ देवनगर

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